गुरुवार, 27 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २३)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता

आँखों में छलकते भावबिन्दु, हृदयों में उफनती भावोर्मियाँ-सभी की अंतर्चेतना गहन भावसमाधि में डूबने लगी। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे कि कालचक्र थम गया हो। बाहरी जीवनधारा थमने की भले ही प्रतीति न हुई हो, पर सभी के अंतस्थ प्राण अवश्य ठिठक गये थे। देवर्षि नारद के द्वारा कहे गये सूत्र एवं महर्षि देवल की अनुभूति कथा का रस था ही कुछ ऐसा, कि सभी की अंतश्चेतना उसमें भीग गयी थी। सभी की यह अवस्था कितनी देर रही, कहा नहीं जा सकता। चेतना को चैतन्य तब प्राप्त हुआ, जब आकाश सामगान के मंत्रों की अनुगूँज से पूरित होने लगा। दरअसल साम के ये मधुर स्वर पक्षीराज गरुड़ के पंखों से झर रहे थे।
    
विनितानन्दन गरुड़, भगवान के वाहन गरुड़ और सबसे बढ़कर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़, उनकी यह उपस्थिति सभी की चेतना में भक्ति का नया गीत बनकर उतर गयी। वैनतेय ने सभी ऋषियों को नमन किया। देवर्षि तो जैसे उनके प्राणप्रिय सखा ही थे। भगवान नारायण के इन पार्षदों का मिलन अवर्णनीय था। कुछ ऐसा जैसा कि भक्ति की दो धाराएँ मिलकर भावसमाधि की नव सृष्टि कर रही हों। हिमालय के इन हिम-धवल शिखरों ने भी इसे अनुभव किया। पहले ही हो चुके भक्तिमय वातावरण में नवपुलक भर गयी। अब तो बस देवर्षि के मुख से नवसूत्र उच्चारित होना था-
‘अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥ १०॥’
अन्य आश्रयों का त्याग ही अनन्यता है।
    
हृदय वीणा की झंकृति की एक समवेत गूँज उठी। इस मधुर झंकृति में भक्ति के अनुभव नवगीत कौन पिरोयेगा? सभी की दृष्टि पक्षीराज गरुड़ की ओर जाकर टिक गयी। सप्तऋषियों ने भी आग्रह किया- ‘‘हे हरिवाहन! आज आप ही इस सूत्र की व्याख्या करें। आप स्वयं प्रभु के श्रेष्ठ भक्त हैं। भक्तों के लिए भगवान की विकलता आपने स्वयं देखी है। भक्तों के हृदय की विह्वलता के भी आप साक्षी रहे हैं। आपके हृदय की अनुभव कथा भी भक्ति में भीगी है।’’ सप्तर्षियों के इस आग्रह पर गरुड़ का गात्र पुलकित हो उठा। उन्होंने विनम्र भाव से कहा- ‘‘हे ऋषिगण! आप सब त्रिलोकी के मार्गदर्शक हैं। भगवान स्वयं आपके हृदय प्रेरक हैं। आपके आदेश को स्वीकारते हुए आज मैं भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा सुनाऊँगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४८

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