गुरुवार, 27 मई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २३)

👉 दुखों का कारण

वस्तु स्थिति को न जानने के कारण ही विविध भांति के दुःख संताप उत्पन्न। महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को दुखों का कारण अज्ञान बताते हुये उससे मुक्त होने का उपाय ज्ञान साधना ही बताया है।
योगवाशिष्ठ का वचन है—
‘‘आयधो व्याधयश्चैव
द्वय दुःखस्य कारणम् ।
तत्क्षयो मोक्ष उच्यते ।।’’
अर्थात्—आधि, व्याधि—अर्थात् मानसिक और शारीरिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में हैं। इनकी निवृत्ति विद्या अर्थात् ज्ञान द्वारा ही होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।’’

इस प्रकार इस न्याय से विदित होता है कि यदि मनुष्य जीवन से दुःखों का तिरोधान हो जाय तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जाये। दुःखों का अत्यन्त अभाव ही आनन्द भी है। अर्थात् मोक्ष और आनन्द एक दूसरे के पर्याय हैं। इस प्रकार यदि जीवन के दुःखों को नष्ट किया जा सके तो आनन्द वाची मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। बहुत बार देखा जाता है कि लोग जीवन में अनेक बार आनन्द प्राप्त करते हैं। वे हंसते, बोलते खाते, खेलते, मनोरंजन करते, नृत्य-संगीत और काव्य-कलाओं का, आनन्द लेते, उत्सव-समारोह और पर्व मनाते, प्रेम पाते और प्रदान करते, गोष्ठी और सत्संगों में मोद-विनोद करते और न जाने इसी प्रकार से आमोद-प्रमोद पाते और प्रसन्न बना करते हैं—तो क्या उनकी इस स्थिति को मोक्ष कहा जा सकता है?

नहीं, मनुष्य की इस स्थिति को मोक्ष नहीं कहा जा सकता। मोक्ष का आनन्द स्थायी, स्थिर, अक्षय, समान अहैतुकं और निःशेष हुआ करता है। वह न कहीं से आता और न कहीं जाता है। न किसी कारण से उत्पन्न होता है और न किसी कारण से नष्ट होता है। वह आत्म-भूत और अहैतुकं होता है। वह सम्पूर्ण रूप में मिलता है सम्पूर्ण रूप में अनुभूत होता है सम्पूर्ण रूप में सदा-सर्वदा ही बना रहता है। वह सार्वदेशिक सर्वव्यापक, और सर्वस्व सहित ही होता है। मोक्ष का आनन्द पाने पर न तो कोई अंश शेष रह जाता है और न उसके आगे किसी प्रकार के आनन्द की इच्छा शेष रह जाती है। वह प्रकाम, पूर्ण और परमावधिक ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

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