रविवार, 23 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २१)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि अपनी किन्हीं स्मृतियों मे खो गये। इन स्मृतियों की मधुरता उनके होठों पर मुस्कान बनकर खेलने लगी। उनके पास बैठे महर्षि देवल देवर्षि का यह भाव परिवर्तन देख रहे थे। उनसे रहा न गया और उन्होंने पूछ ही लिया- ‘‘किसी भक्त के चरित्र का स्मरण हो आया क्या देवर्षि?’’ नारद ने महर्षि देवल की ओर बड़ी स्नेहिल दृष्टि से देखा और बड़े आत्मीय स्वरों में बोले- ‘‘हाँ महर्षि! वह परम भक्त स्वयं आप हैं।’’ देवर्षि के ये वचन सुनकर देवल थोड़ा संकुचित हुए और कहने लगे- ‘‘भगवन्! भला मैं किस तरह का भक्त हूँ। मेरा अतीत तो आप जानते ही हैं। बस माता जगदम्बा के स्मरण ने मुझे आप सब भगवद्भक्तों का सेवक होने का अवसर दिया है।’’
    
‘‘सो तो ठीक है महर्षि देवल, परन्तु मेरा अनुरोध है कि अपनी भक्तिकथा आप स्वयं सुनायें।’’ देवर्षि के इस कथन पर सभी ने हामी भरी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो इस प्रस्ताव पर विभोर हो गये और बोले- ‘‘जिसे पराम्बा जगदीश्वरी ने स्वयं अपना पुत्र कहा है, उनकी कथा हम स्वयं सुनेंगे।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन पर महर्षि देवल ने बड़े विनय भरे स्वरों में कहा- ‘‘यह सच है ऋषिगण कि मैं माँ की ममता से कृतार्थ हुआ हूँ, लेकिन इसका कारण मेरा कोई गुण नहीं, बल्कि माता का अपनी संतान के प्रति प्रेम है।
    
मैं तो बचपन से ही कुसंगति के कारण अनेक बुरे कर्मों में लिप्त हो गया। कुसंस्कार अपने अनुरूप कुसंग, कुप्रवृत्ति, कुकर्म एवं कुपरिणाम देते हैं। मेरे साथ भी यही प्रक्रिया चल रही थी। मेरे दुर्गुणों ने ही मुझे दोषों से घेर लिया था। पाप का अँधेरा था, पीड़ा गहरी थी। अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों के कारण देह रोगी हो चली थी और मन संतप्त। किसी दिशा में कोई किरण नहीं नजर आ रही थी। तभी माँ के कृपापुञ्ज बनकर आए देवर्षि ने बड़ी आश्वस्ति से कहा-देवल! माँ की कृपा से सब कुछ सम्भव है। उनकी कृपा से न केवल तुम्हारी पीड़ा का निवारण हो सकता है, बल्कि तुम स्वयं औरों की पीड़ा का निवारण कर सकते हो।
    
इन वचनों के साथ देवर्षि ने मुझे माता सिंहवाहिनी-अष्टभुजा दुर्गा का ध्यान बताया और उनके पावन मंत्र का उपदेश दिया। भगवान विष्णु के परम भक्त नारद के श्रीमुख से दुर्गा का ध्यान एवं मंत्रोपदेश कुछ अचरज सा लगा, परन्तु देवर्षि हँसते हुए बोले-इस अचरज भरे प्रश्न का उत्तर तुम्हें ब्राह्मी अवस्था में पहुँचने पर मिलेगा। विष्णु ही वैष्णवी हैं, दुर्गा ही गायत्री हैं, परन्तु साधना का पथ जन्मांतर के संस्कारों पके अनुरूप निर्धारित होता है। यदि पिछले जन्म के संस्कारों को पहचान कर भक्ति साधना की जाय तो चित्त का निरोध शीघ्र होता है। देवर्षि ने ही बताया कि मुझमें भगवती पराम्बा हिमालय नन्दिनी की भक्ति के संस्कार हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४५

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