रविवार, 23 मई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २१)

👉 अपनी अपनी दुनिया

सच तो यह है कि स्वाद की तरह रंगों की अनुभूति में भी हर मनुष्य का अनुभव एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता और उसमें अन्तर होता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म होता है कि उसका वर्णन हमारी शब्दावली ठीक तरह से नहीं कर सकती। एक वस्तु की मिठास एक व्यक्ति को जैसी अनुभव होती है, दूसरे को उसकी अनुभूति जैसी होगी, उसमें अन्तर रहेगा और अन्तर इतना हलका है कि सभी लोग गन्ने को ‘मीठा’ कह सकते हैं पर इस मिठास को किसने किस तरह के स्तर का अनुभव किया इस की कोई सूक्ष्म परीक्षा व्यवस्था हो तो सहज ही यह कहा जा सकता है कि एक ने दूसरे से काफी अन्तर वाली मिठास चखी हैं। इसका कारण मुख में रहने वाली रासायनिक द्रवों की संरचना एवं मात्रा में अन्तर होना होता है।

हमारी आंखें जिस वस्तु का जो रंग देखती हैं क्या वस्तुतः वह उसी रंग की है? हमारी आंखों को जिस वस्तु का जो रंग दीखता है क्या अन्य जीवों को भी वैसा ही दीखता है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बेखटके नहीं दिया जा सकता है।

तथ्य यह है कि वस्तुतः किसी पदार्थ का कोई रंग नहीं है। अणुओं की विशेष प्रकार की संरचना ही सघन होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं जैसी बनती है। अणुओं का कोई रंग नहीं। फिर रंगीनी क्या है?

वस्तुएं सूर्य की केवल सफेद किरणों को आत्मसात करती हैं और उन किरणों के किसी एक रंग को प्रतिबिम्बित करती हैं। पौधे की पत्तियां रहे रंग की इसलिए दीखती हैं कि वे सूर्य किरणों का हरा रंग पचा नहीं पातीं और उसकी उलटी कर देती हैं। पत्तियों द्वारा किरणों का हरा रंग वापिस फेंक देना यही है उनका हरा रंग दिखाई पड़ना।

तत्व ज्ञानियों का यह कथन एक दृष्टि से सर्वथा सत्य है कि—‘‘हर मनुष्य की अपनी दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहां अणुओं की धूल बिखरी पड़ी है और वह किन्हीं प्रवाहों में बहती हुई इधर-उधर भगदड़ करती रहती है। इसके अतिरिक्त यहां ऐसा कुछ नहीं है जिसे स्वादिष्ट अस्वादिष्ट या रूपवान कुरूप कहा जा सके। हमें नीम की पत्ती कड़वी लगती हैं पर ऊंट उन्हें रुचि पूर्वक खाता है संभव है उसे वे पत्तियां बिस्कुट या मिठाई की तरह मधुर लगती हों। वस्तुतः कोई वस्तु न मधुर है न कड़वी हमारी अपनी संरचना ही अमुक वस्तुओं के साथ तालमेल बिठाने पर जैसी कुछ उलटी-पुलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है उसी आधार पर हम उसका रंग स्वाद आदि निर्धारण करते हैं।

यही बात प्रिय अथवा अप्रिय के सम्बन्ध में लागू होती है। अपने और बिराने के सम्बन्ध में भी अपनी ही दृष्टि और अपनी ही मान्यता काम करती है। वस्तुतः न कोई अपना है न बिराना। इस दुनिया के आंगन में अगणित बालक खेलते हैं। इनमें से कभी कोई किसी के साथ हो लेता है, कभी प्रतिपक्षी का खेल खेलता है। इन क्षणिक संयोगों और संवेगों को बालबुद्धि जब बहुत अधिक महत्व देने लगती है तो प्रतीत होता है कि कुछ बहुत बड़ी अनुकूलता-प्रतिकूलता उत्पन्न हो गई है। हर्ष शोक के आवेशों में घटना क्रम उतना उत्तरदायी नहीं होता जितना कि  अपना मनःस्तर स्वयं सोचने का दृष्टिकोण। सन्त और चोर के—ज्ञानी और अज्ञानी के—दृष्टिकोण में एक ही स्थिति के सम्बन्ध में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है उसका कारण प्रथक-प्रथक मनःस्थिति ही है। घना क्रम का उतना श्रेय या दोष नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

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