शुक्रवार, 21 मई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २०)

👉 अपनी अपनी दुनिया

दुनिया वैसी है नहीं—जैसी कि हम उसे देखते हैं। सच तो यह है कि संसार के समस्त पदार्थ कुछ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र है। हमारी आंखों की संरचना और मस्तिष्क का क्रिया-कलाप जिस स्तर का होता है, उसी प्रकार की वस्तुओं की अनुभूति होती है।

हमारी आंखें जैसा कुछ देखती हैं, आवश्यक नहीं दूसरों को भी वैसा ही दीखें। दृष्टि के मन्द, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं। एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दीखता है तो दूसरे को दूसरी तरह का। यही बात स्वाद के सम्बन्ध में है। रोगी के मुंह का जायका खराब होने के कारण हर वस्तु कड़वी लगती है। पेट भरा होने या अपच रहने पर स्वादिष्ट वस्तु का भी स्वाद बिगड़ जाता है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, हर मनुष्य के स्रावों में कुछ न कुछ रासायनिक अन्तर रहता है जिसके कारण एक ही खाद्य पदार्थ का स्वाद हर व्यक्ति को दूसरे की अपेक्षा कुछ न कुछ भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यों नमक, शकर आदि का स्वाद मोटे रूप से खारी या मीठा कहा जा सकता है पर यदि गम्भीर निरीक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इस खारीपन और मिठास के इतने भेद प्रभेद हैं जितने कि मनुष्य। किसी का स्वाद किसी से पूर्णतया नहीं मिलता, कुछ न कुछ भिन्नता रहती है। यही बात आंखों के संबन्ध में है आंखों की संरचना और मस्तिष्क की बनावट में जो अन्तर पाया जाता है उसी के कारण एक मनुष्य दूसरे की तुलना में कुछ न कुछ भिन्नता के साथ ही वस्तुओं तथा घटनाओं को देखता है।

मनुष्यों और पक्षियों की आंखों की सूक्ष्म बनावट को देखता है। मस्तिष्कीय संरचना में काफी अन्दर है इसलिए वे वस्तुओं को उसी तरह नहीं देखते जैसे कि हम देखते हैं। उन्हें हमारी अपेक्षा भिन्न तरह के रंग दिखाई पड़ते हैं।

रूस की पशु प्रयोगशाला ने बताया है कि बैल को लाल रंग नहीं दीखता, उनके लिए सफेद और लाल रंग एक ही स्तर के होते हैं। इसी तरह मधु-मक्खियों को भी लाल और सफेद रंग का अन्तर विदित नहीं होता। जुगनू सरीखे कीट पतंग एक अतिरिक्त रंग ‘अल्ट्रावायलेट’ भी देखते हैं जो मनुष्यों की आंखें देख सकने में असमर्थ हैं। पक्षियों को लाल, नीला, पीला, और हरा यह चार रंग ही दीखते हैं। हमारी तरह वे न तो सात रंग देखते हैं और न उनके भेद उपभेदों से ही परिचित होते हैं।

ठीक इसी प्रकार हरी घास की हरीतिमा सबको एक ही स्तर की दिखाई नहीं पड़ेगी। किन्तु हमारी भाषा का अभी इतना विस्तार नहीं हुआ कि इस माध्यम से हर व्यक्ति को जैसा सूक्ष्म अन्तर उस हरे रंग के बीच दिखाई पड़ता है उसका विवरण बताया जा सके। यदि अन्तर प्रत्यन्तर की गहराई में जाया जाय तो स्वाद और रंग के अन्तर बढ़ते ही चले जायेंगे और अन्ततः यह मानना पड़ेगा कि जिस तरह हर मनुष्य की आवाज, शकल और प्रकृति में अन्तर होता है उसी प्रकार रंगों की अनुभूति में भी अन्तर रहता है। स्वाद के सम्बन्ध में भी यही बात है। गन्ध में भी यही अन्तर रहेगा। सुनने और छूने में भी हर व्यक्ति को दूसरे से भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यह भिन्नता बहुत ही सूक्ष्म स्तर की होती है, पर होती अवश्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

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