शुक्रवार, 21 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २०)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

प्रतीक्षा के इन पलों में सभी की अंतश्चेतना में भक्ति के नये सूत्र की जिज्ञासा गहरी हुई। देवर्षि इस सच से परिचित थे। उन्होंने वीणा के तारों की झंकृति के साथ मधुर स्वरों में उच्चारित किया-
‘तस्मिन्नन्यता तद्विरोधिबूदासीनता च’॥ ९॥
उस प्रिय परात्पर चेतना में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदसीनता को निरोध कहते हैं।
    
नारद की वाणी इतनी सजल थी कि वह सहज ही सबमें संव्याप्त हो गयी। दो पलों तक समूची व्यापकता में मौन पसरा रहा। एक नीरव निःस्पन्दता सब तरफ छायी रही। अंततः महर्षि मरीचि मुखर हुए। उन्होंने कहा कि ‘‘देवर्षि सभी तपस्वी, साधक एवं सिद्ध इस निरोध अवस्था को पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रकारों ने चित्त के निरोध को योग की संज्ञा दी है। आप बताएँ कि निरोध का स्वरूप क्या है और इसकी साधना की प्रक्रिया क्या है?’’
    
महर्षि मरीचि के ये वचन सभी को अपने से लगे। ब्रह्मर्षि क्रतु तो इस जिज्ञासा पर अति प्रसन्न हो गये और कहने लगे- ‘‘देवर्षि सच तो यही है, चित्त का निरोध ही मानव चेतना का आरोग्य है। इसके विपरीत जो कुछ भी है, उसमें मानव मन रुग्ण एवं संतप्त ही रहता है।’’ अभी तक देवर्षि मौन भाव से महर्षियों के इस कथन को सुन रहे थे। उनकी आँखें हिमालय की सुषमा को निहार रही थीं। श्वेत हिमशिखर और निरभ्र आकाश सभी पर अपनी परम निर्मलता की वृष्टि कर रहे थे। समूची प्रकृति देवात्मा हिमालय के सान्निध्य में निरोध अवस्था में विराज रही थी। समूचे अस्तित्व में आनन्द और चैतन्यता घुल-मिल रहे थे।
    
देवर्षि का दृष्टा अंतःकरण इन अनुभूतियों के साथ एकरस था। उन्होंने मन्दस्मित के साथ देवों और महर्षियों को कहा- ‘‘हे प्रज्ञाजन! भक्ति का यह नया सूत्र पिछले कहे हुए सूत्र का ही विस्तार है। पिछले सूत्र में भक्ति साधना में निरोध और न्यास की बात थी। उन्हीं की समरूपता इस सूत्र के अनन्यता और उदासीनता में है। एक होता है, दूसरा स्वयं ही आ जाता है। प्रथम यदि क्रिया है तो दूसरा परिणाम। निरोध शब्द में निषेध या नकार नहीं है, बल्कि इसमें आत्म विकास की निरन्तरता और उसका चरम है। निरोध चित्त की ऐसी अवस्था है, जिसमें एकाग्रता, शान्ति, विश्रान्ति एवं बोध का परम जागरण है। भक्त जब अपने आराध्य में अनन्य भाव रखता है तो इसकी शुरुआत हो जाती है। ज्यों-ज्यों उसकी अनन्यता प्रगाढ़ एवं परिपक्व होती है, त्यों-त्यों उसका अंतःकरण सभी ्रकार के दोषों से मुक्त होता है। उसे दोषों को छोड़ना नहीं पड़ता, बल्कि ये अपने आप ही छूटते हैं। उसकी भाव चेतना उपराम एवं उदासीन (उत्+आसीन) ऊपर चली जाती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४४

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