मंगलवार, 1 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २६)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

यमुना से थोड़ी ही दूर लेकिन उनकी कुटी के पास ही महर्षि शमीक का गुरुकुल था। उस युग में जबकि जाति-वंश, कुलीन-अकुलीन की विभाजक रेखाओं से समाज बँटा हुआ था, उस समय भी उनके गुरुकुल में ‘जाति वंश सब एक समान-मानव मात्र एक समान’ के अनुसार ही आचरण होता था। अध्ययन, अध्यापन, तप एवं भक्ति यही जीवन था महर्षि का। लोक मर्यादाओं एवं वेद आज्ञाओं का महर्षि निष्ठापूर्वक पालन करते थे।
    
त्रिकाल सन्ध्यावन्दन, गायत्री जप, नियमित यज्ञ, एकादशी आदि पर्वों पर व्रत करना महर्षि शमीक कभी नहीं भूलते थे। समय के साथ उनके शरीर को जरा अवस्था ने घेर लिया। महर्षि व्यास जब उनसे मिले थे, वह पर्याप्त वृद्ध हो चुके थे। उनके सिर के बाल पूरी तरह से श्वेत हो चुके थे। मुख पर यतिं्कचित झुर्रियाँ आ चुकी थीं, परन्तु उनके नेत्रों में अनोखी प्रदीप्ति थी और वाणी में मधुरता एवं ओज का अनूठा सम्मिश्रण था।

प्रातःकाल जिस समय भगवान वेदव्यास महर्षि शमीक से मिले थे। वह सन्ध्या, यज्ञ आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर गो-सेवा कर रहे थे। आश्रम में रहने वाली गायों की सेवा कार्य में महर्षि शमीक स्वयं लगते थे। हालाँकि उनके साथ आश्रम के अंतेवासी भी कार्यरत होते थे, परन्तु आचार्य शमीक का उत्साह देखते ही बनता था। आश्रम में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारियों एवं अन्य आचार्यगणों के मना करने पर भी उस गुरुकुल के कुलपति आचार्य शमीक अन्य सभी छोटे-बड़़े कार्यों को स्वयं करते थे।
    
प्रातःबेला में वेदव्यास जब आचार्य शमीक के गुरुकुल पहुँचे तो कुलपति शमीक अपने सेवा कार्यों में लगे हुए थे। ज्यों ही उन्होंने ऋषि व्यास को देखा, े लगभग दौड़ते हुए ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। महर्षि व्यास ने उन्हें झटपट उठाकर छाती से लगा लिया। वह महर्षि व्यास का हाथ थामकर उन्हें पास ही के कदम्ब वृक्ष के पास ले गये। आश्रम के ब्रह्मचारियों ने वहाँ पहले से ही दमसिन बिछा रखे थे। दोनों महर्षि वहाँ बैठकर तत्त्वचर्चा करने लग गये। कुछ ही पलों में गुरुकुल के एक आचार्य दो ब्रह्मचारियों के साथ प्रातराश लेकर आ गये।
    
प्रातराश को वहीं पास में रखकर वह आचार्य, ब्रह्मचारियों के साथ हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उन्हें इस तरह कुछ देर खड़े हुए देख महर्षि व्यास ने उनसे प्रश्न किया- ‘‘तुम्हें कुछ कहना है वत्स?’’ ‘‘हाँ भगवन्! यदि आप अनुमति दें तो।’’ आचार्य के साथ ही वे दोनों ब्रह्मचारी बोल पड़े। ‘‘कहो! वत्स कहो-क्या कहना है?’’ भगवान व्यास के अनुमति देने के बाद वे आचार्य अपने ब्रह्मचारियों के साथ कहने लगे- ‘‘भगवन्! हमारे कुलपति आचार्य शमीक अब दीर्घायु हो चुके हैं। अब हम सबके होते हुए क्या उन्हें इस तरह से आश्रम के छोटे-छोटे कार्यों को करते हुए थकना चाहिए। आप उन्हें समझाएँ कि वे स्वयं सेवाकार्य न करके यदि हम सबको अपना मार्गदर्शन दें तो ठीक होगा।’’
    
जब ये आश्रमवासी महर्षि व्यास से अपनी बात कह रहे थे तो ऋषि शमीक मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इनके कथन की समाप्ति पर व्यास ने ऋषि शमीक के मुख की ओर देखा। उनकी आँखों में प्रश्न की रेखा थी। शमीक समझ गये और कहले लगे- ‘‘भगवन! आप तो शास्त्रों के रचनाकार हैं। लोक मान्यता एवं वेद वचन के मर्मज्ञ विद्वान हैं। क्या हम भगवद्भक्तों को लोक एवं वेद की अवज्ञा करनी चाहिए?’’ आचार्य शमीक के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान व्यास ने उनसे एक नया प्रश्न किया- ‘‘आचार्य आप तो भक्ति की परम भावदशा को पा चुके हैं। आप सभी विधि-निषेध से परे हैं। ऐसे में भला आपको ये लघु मर्यादाएँ कहाँ बाँध सकती हैं?’’ महर्षि व्यास के प्रश्न के उत्तर में गम्भीर होते हुए आचार्य शमीक कहने लगे- ‘‘जब तक शरीर है तब तक मर्यादाओं का रक्षण अनिवार्य है और फिर भक्त को ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिए, जिससे भगवान की पावन महिमा को ठेस पहुँचे।’’
    
अपनी स्मृतियों में सँजोयी इस कथा को कहते हुए व्यास जी ने कहा- ‘‘भक्त शमीक की कथा सचमुच ही इस सूत्र की जीवन्त व्याख्या है।’’ इस कथा को सुनकर सभी ने भगवान व्यास को साधुवाद दिया और बोले- ‘‘सचमुच ही शास्त्र का रक्षण भक्त का कर्त्तव्य है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५३

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