सोमवार, 31 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २५)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

हिमालय के श्वेतशिखरों पर भगवान सूर्य अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्ण राशि उड़ेलने लगे थे। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से हिमालय का यह सम्पूर्ण प्रान्त स्वर्णिम आभा से भर रहा था। थोड़ी दूर पर ही स्थित हिम झील का जल भी इस आभा को अपने में समेट रहा था। यहाँ पर उपस्थित ऋषियों एवं देवों के समुदाय ने अपने प्रातःकर्म पूरे कर लिये थे। अभी कुछ ही देर पहले उन्होंने भगवान भुवनभास्कर से सम्पूर्ण जगती के लिए ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की याचना की थी। ‘‘निर्मल बुद्धि, निर्मल भावनाओं से जन्म पाती है’’- ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महर्षि क्रतु से कह रहे थे। आज न जाने क्यों उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था। ‘‘भावनाएँ दूषित हों तो बुद्धि एवं कर्म सभी दूषित हो जाते हैं।’’
    
ऐसा लग रहा था कि प्रह्लाद की पावन भगवद्भक्ति का मधुर गीत अभी भी उनके अंतःस्रोत से झर रहा था। ‘‘परम भगवद्भक्त होते हुए भी प्रह्लाद ने कितना सौम्य व सदाचारपूर्ण जीवन जिया था। सभी विधि-निषेधों से परे होते हुए भी उन्होंने सभी विधि-निषेधों को माना। लोक और वेद को उन्होंने अपने आचरण से महिमामण्डित किया।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस अंतर्वाणी को देवर्षि नारद अपने अंतःकरण में जैसे सुन रहे थे। वे किंचित हँसते हुए बोले-‘‘यदि ऋषि समुदाय की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के इस वचन का ऋषि समुदाय एवं योगित्य वर्ग ने ‘अहोभाग्य’ कहकर स्वागत किया।
‘लोकेवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥ ११॥’
    
देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह कथा सूत्र प्रकट हुआ। इसे प्रकट करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘भक्त लोक और वेद के अनुकूल आचरण करता है। इसके विरोधी आचरण के प्रति वह उदासीन रहता है।’’ देवर्षि की बात के सूत्र को पकड़ते हुए महर्षि देवल बोल पड़े- ‘‘लोक और वेद की मर्यादाओं की अवहेलना तो उद्धत अहं करता है। भक्त तो सर्वथा अहं शून्य और विनम्र होता है। उससे तो कभी किसी तरह से मर्यादाओं की अवहेलना होती ही नहीं।’’ ‘‘सत्य यही है’’- कहते हुए वेदज्ञान को सम्पादित करने वाले, पुराणों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास को यमुना तीर पर कुटी बनाकर तपश्चर्या करने वाले भक्तवर शमीक की याद आ गयी। ऋषि शमीक हस्तिनापुर से थोड़ी दूर यमुना किनारे कुटिया बनाकर रहते थे। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे-ऋषि शमीक। वे अपने आराध्य को कण-कण में देखने के अभ्यासी थे। सृष्टि का जड़ चेतन उनकी दृष्टि में उनके आराध्य का प्रतिरूप था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५२


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