बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 27) 18 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 अनुष्ठान के दिनों में पांच तप-संयम साधने पड़ते हैं— [1] उपवास [2] ब्रह्मचर्य [3] अपनी सेवा अपने हाथ से [4] भूमिशयन [5] चमड़े का प्रयोग त्याग। अनुष्ठान के दिनों चमड़े के जूते आदि का प्रयोग न किया जाय। प्लास्टिक, रबड़, कपड़ा आदि की बनी वस्तुएं आजकल चमड़े के बजाय हर स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। वही किया जाय। भूमि शयन सर्वोत्तम है। सीलन, कीड़े आदि का भय हो तो तख्त पर सोया जा सकता है। हजामत, कपड़े धोना जैसी दैनिक जीवन की शारीरिक आवश्यकताएं नौकरों से न करायें, स्वयं करें। भोजन अपने हाथ से बना सकना सम्भव न हो तो स्त्री, माता, बहिन आदि उन्हीं अति निकटवर्ती स्वजनों के हाथ का बनाया स्वीकार करें, जिनके साथ आत्मीयता का आदान-प्रदान चलता है।

🔵 बाजार से पका हुआ तो नहीं ही खरीदें। ब्रह्मचर्य अनुष्ठान के दिनों में आवश्यक है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी पाला जाना चाहिए। कामुक कुदृष्टि पर नियन्त्रण रखा जाय। सम्पर्क में आने वाली नारियों को माता, बहिन या पुत्रीवत् पवित्र भाव से देखा जाय। यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में नारियों पर लागू होती है। पांचवीं तपश्चर्या भोजन की है। यह उपवास काल है। उपवास कई स्तर के होते हैं— [1] छाछ, दूध आदि पेय पदार्थों पर रहना [2] शाक, फल के सहारे काम चलाना [3] नमक, शकर का त्याग अर्थात् अस्वाद [4] एक समय आहार [5] दो खाद्य पदार्थों पर अनुष्ठान की अवधि काटना।

🔴 अनुष्ठान के यही मोटे नियम हैं। इसके अतिरिक्त जो तरह-तरह की बातें कही जाती हैं और परस्पर विरोधी नियम बताये जाते हैं उन पर ध्यान न दिया जाय।

🔵 अनुष्ठान में कोई भूल हो जाने पर, त्रुटि रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका न करनी चाहिए फिर भी उन दिनों कोई विघ्न उत्पन्न न होने पाये इसके लिए संरक्षण और ज्ञात-अज्ञात में रही हुई त्रुटियों का परिमार्जन करने के लिए अनुष्ठान साधना के लिए कोई समर्थ संरक्षक नियुक्त कर लेना चाहिए। यह सेवा शांतिकुंज हरिद्वार से भी ली जाती है। अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति का परिचय तथा समय लिख भेजने से संरक्षण, परिमार्जन सर्वथा निस्वार्थ भाव से होता रहता है। यह व्यवस्था करने पर साधना की सफलता और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 11) 18 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम
🔴 जीवन एक सुव्यवस्थित तथ्य है। वह न तो अस्त-व्यस्त है और न कभी कुछ करने, कभी न करने जैसा मनमौजीपन। पशु-पक्षी तक एक नियमित प्रकृति व्यवस्था के अनुरूप जीवनयापन करते हैं। फिर मनुष्य तो सृष्टि का मुकुटमणि है। उसके ऊपर मात्र शरीर निर्वाह का ही नहीं, कर्तव्यों और उत्तरदायित्व के परिपालन का अनुशासन भी है। उसे मानवी उदारता के अनुरूप मर्यादायें पालनी और वर्जनायें छोड़नी पड़ती हैं। इतना ही नहीं, वह पुण्य परमार्थ भी विशेष पुरुषार्थ के रूप में अपनाना पड़ता है, जिसके लिये स्रष्टा ने अपना अजस्र अनुदान देते हुए आशा एवं अपेक्षा रखी है। इतना सब बन पड़ने पर ही उसे लक्ष्य की प्राप्ति होती है जिसे ईश्वर की प्राप्ति या महानता की उपलब्धि कहा जाता है।          

🔵 जीवन साधना नकद धर्म है। इसके प्रतिफल प्राप्त करने के लिये लम्बे समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। ‘‘इस हाथ दें, उस हाथ लें’’ का नकद सौदा इस मार्ग पर चलते हुए हर कदम पर फलित होता रहता है। एक कदम आगे बढ़ने पर मंजिल की दूरी उतनी फुट कम होती है, साथ ही जो पिछड़ापन था, वह पीछे छूटता हैं। इसी प्रकार जीवन साधना यदि तथ्यपूर्ण, तर्कसंगत और विवेकपूर्ण स्तर पर की गई है तो इसका प्रतिफल दो रूप में हाथों-हाथ मिलता चलता है। एक संचित पशु प्रवृत्तियों का अभ्यास छूटता है, वातावरण की गन्दगी से ऊपर चढ़े कषाय-कल्मष घटते हैं।

🔴 दूसरा लाभ यह होता है कि नरपशु से नरदेव बनने के लिये जो प्रगति करनी चाहिये उसकी व्यवस्था सही रूप से बन पड़ती है। स्वयं को अनुभव होता है कि व्यक्तित्त्व निरन्तर उच्चस्तरीय बन रहा है। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की दोनों ही उपलब्धियाँ निरन्तर हस्तगत हो रही हैं। यही है वह उपलब्धि, जिसे जीवन की सार्थकता, सफलता एवं मनुष्य में देवत्व का प्रत्यक्ष अवतरण कहते हैं। तत्त्वज्ञान की भाषा में इसी को ईश्वरप्राप्ति, भव बन्धनों से मुक्ति, परमसिद्धि अथवा स्वर्ग सोपान में प्रविष्टि कहा जाता है। इन सहज उपलब्धियों से वंचित इसलिये रहना पड़ता है कि न तो जीवन साधना का दर्शन ठीक तरह समझा जाता है और न जानकारी के अभाव में सही प्रयोग का अभ्यास बन पड़ता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 16 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 10) 17 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 तीसरा चरण है- आराधना इसे अभ्यर्थना, अर्चन भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसी को पुण्य परमार्थ-लोकमंगल जन-कल्याण आदि भी कहते हैं। यह संसार विराट ब्रह्म का साकार स्वरूप है। इसमें निवास करने वाले प्राणियों और पदार्थों का, परिस्थितियों का सुनियोजन करने में संलग्न रहना आराधना है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य प्रकारान्तर से सभी का ऋणी है। इसकी भरपाई करने के लिये उसे परमार्थपरायण होना ही चाहिये।          

🔵 साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार आधार सर्वतोमुखी प्रगति के लिये आवश्यक माने गये हैं। जीवन साधना में स्वाध्याय की, संयमशीलता की और लोकमंगल के लिये निरन्तर समयदान, अंशदान लगाते रहने की आवश्यकता पड़ती है। सेवा कार्यों के लिये समयदान, श्रमदान अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। इसके बिना पुण्य संचय की बात बनती ही नहीं। संयम तो अपने शरीर, मन और स्वभाव में स्वयं भी साधा जा सकता है, पर सेवाधर्म अपनाने के लिये समयदान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता पड़ती है। उपार्जित आजीविका का सारा भाग पेट परिवार के लिये ही खर्च नहीं करते रहना चाहिये, वरन् उसका एक महत्त्वपूर्ण अंश लोकमंगल के लिये भी नियमित और निश्चित रूप से निकालते रहना चाहिये।

🔴 उपासना, साधना और आराधना को; चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करने की प्रक्रिया को नित्य कार्य में नित्य नियम में सम्मिलित रखना चाहिये। उनमें से किसी एक को यदाकदा कर लेने से काम नहीं चलता। भोजन, श्रम और शयन-ये तीनों ही नित्य करने पड़ते हैं। इनमें से किसी को यदाकदा न्यूनाधिक मात्रा में मनमर्जी से कर लिया जाया करे, तो उस अस्तव्यस्तता के रहते न तो स्वास्थ्य ठीक रह सकता है और न व्यवस्थित उपक्रम चल सकता है। फिर किसी प्रयोजन में सफल हो सकना तो बन ही किस प्रकार पड़े?   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मेरी कीमत क्या होगी?

🔵 दुनिया के कट्टर और खूँखार बादशाहों में तैमूरलंग का भी नाम आता है व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षा, अहंकार और जवाहरात की तृष्णा से पीड़ित तैमूर ने एक बार विशाल भू-भाग को देखकर बगदाद में उसने एक लाख मरे हुए व्यक्तियों की खोपड़ियों का पहाड़ खड़ा कराया था। इसी बात से उसकी क्रूरता का पता चल जाता है।

🔴 एक समय की बात है। बहुत से गुलाम पकड़कर उसके सामने लाये गये। तुर्किस्तान का विख्यात कवि अहमदी भी दुर्भाग्य से पकड़ा गया। जब वह तैमूर के सामने उपस्थित हुआ, तो एक विद्रूप- सी हँसी हँसते हुए उसने दो गुलामों की ओर इशारा करते हुए पूछा- "सुना है कि कवि बड़े पारखी होते है, बता सकते हो इनकी कीमत क्या होगी?”

🔵 “इनमें से कोई भी 4 हजार अशर्फियों से कम कीमत का नहीं है।” अहमदी ने सरल किन्तु स्पष्ट उत्तर दिया।

🔴 ”मेरी कीमत क्या होगी?”तैमूर ने अभिमान से पूछा।

🔵 ”यही कोई 24 अशर्फी।” निश्चिंत भाव से अहमदी ने उत्तर दिया।

🔴 तैमूर क्रोध से आगबबूला हो गया। चिल्लाकर बोला-बदमाश! इतने में तो मेरी सदरी (उसके पहनने का वस्त्र) भी नहीं बन सकती, तू यह कैसे कह सकता है कि मेरा मूल्य कुल 24 अशर्फी है।”

🔵 अहमदी ने बिना किसी आवेश या उत्तेजना के उत्तर दिया-बस वह कीमत उसी सदरी की है, आपकी तो कुछ नहीं। जो मनुष्य पीड़ितों की सेवा नहीं कर सकता, बड़ा होकर छोटों की रक्षा नहीं कर सकता, असहायों की, अनाथों की जो सेवा नहीं कर सकता, मनुष्य से बढ़कर जिसे अहमियत प्यारी हो उस इनसान का मूल्य चार कौड़ी भी नहीं, उससे अच्छे तो यह गुलाम ही है, जो किसी के काम तो आते हैं।”

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1988

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 26) 17 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम
🔴 पुरश्चरणों में तर्पण, मार्जन, न्यास, कवच, कीलक, अर्गल आदि के कितने ही विशिष्ट विधान हैं। अनुष्ठानों में इनमें से किसी की भी आवश्यकता नहीं है। जप, हवन के उपरांत ब्रह्मभोज ही पूर्णाहुति का अन्तिम चरण पूरा करने के लिए आवश्यक होता है। यह कार्य ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराने के साथ पूरा होता है। सच्चे ब्राह्मण ढूंढ़ पाना अति कठिन है। जो है वे परान्न खाने को तैयार नहीं होते। कन्याओं को मातृशक्ति का प्रतीक मानकर भाव-पवित्रता का संवर्धन करने के लिए भोजन कराया जा सकता है। पर उसमें भी यही व्यवधान आता है।

🔵 स्वाभिमानी अभिभावक इसके लिए तैयार नहीं होते। ढूंढ़ निकाली भी जायें तो दान की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने पर उसका परिणाम भी कुछ उत्साहवर्धक नहीं दीखता। इन परिस्थितियों में ब्रह्मभोज का सही स्वरूप ब्रह्मदान ही सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् सद्ज्ञान का दान। यह युग निर्माण द्वारा पूरा हो सकता है। एक-एक आहुति पर एक नया पैसा ब्रह्मदान के लिए निकाला जाय। 240 आहुतियां 24 हजार के अनुष्ठान के लिए देनी है तो 240 पैसे का प्रसार साहित्य भी सत्पात्रों को वितरण करना चाहिए। इससे सद्ज्ञान का बीजारोपण अनेक अन्तःकरणों में होता है और उसका सत्परिणाम पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों को ही समान रूप से मिलता है।

🔴 अनुष्ठान में अधिक अनुशासन पालन करना पड़ता है। जप का समय, संख्या, दैनिक क्रम एक साथ बनाकर चलना पड़ता है। अनिवार्य कारण आ पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा उपासना का निर्धारित क्रम आदि से अन्त तक एक रस ही चलते रहना चाहिए। उसमें उलट-पुलट अनिवार्य कारण होने पर ही करना चाहिए और वह भी न्यूनतम मात्रा में।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 20) 17 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 अमेरिका का हार्टफोर्ड कनेक्टिकल हॉल दर्शकों से खचाखच भरा था। 19 नवम्बर 1901 के दिन घूंसेबाज़ी का एक अनोखा मैच था। प्रसिद्ध अमेरिकी घूंसेबाज टेरी मेकगवर्न का एक नये प्रतिस्पर्धी के साथ मुकाबला था अब तक 6 खिलाड़ी उसे हराने के प्रयत्न में स्वयं ही मात खा चुके थे। टेरी के प्रशंसक आज पुनः उसकी विजय की आशा ही नहीं दृढ़ विश्वास लेकर आये थे। यह स्वाभाविक भी था—घूंसेबाज़ी में उसकी कुशलता और निपुणता देखते ही बनती थी। प्रतिस्पर्धी पर वह बड़ी फुर्ती एवं निर्ममता के साथ घूंसे चलता इसलिए ‘टेरिबल टेरी’ के नाम से वह जनता में विख्यात था। 1889 टेरी की उम्र जब केवल 19 वर्ष की थी तत्कालीन लाइटवेट चैम्पियन ‘पेडलरपामर’ को केवल 75 सेकेंडों में धराशायी कर दिया। उसके बाद 1900 में जॉर्ज डिक्सन को हराकर विश्व फेदरवेट चैम्पियन का पद भी हासिल कर लिया। तब से इस पद से हटाने के लिए प्रतिस्पर्धी निरन्तर प्रयत्नशील थे।

🔴 लम्बी प्रतिक्षा के बाद रिंग में मदमस्त हाथी के सामने खड़े एक दुबले पतले अनजान व्यक्ति कार्बेट को देख दर्शकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। कई सहृदय व्यक्ति कार्बेट के प्रति सहानुभूति दर्शाने लगे कि ‘क्यों बेकार में यह अभागा अपनी जान देने आ गया।’ ऐसे कितने ही उद्गार चारों ओर सुने जा सकते थे। इन सब बातों से अनभिज्ञ कार्बेट के चेहरे पर दृढ़ विश्वास झलक रहा था।

🔵 मैच शुरू हुआ। टेरी ने अपनी आदत के अनुसार प्रारम्भ में घूंसों की बौछार शुरू कर दी। उत्साह-उमंग और चुस्ती-स्फूर्ति से भरा हुआ कार्बेट टेरी का हर वार बचाये जा रहा था। एक ओर टेरी की अन्धाधुन्ध घूंसों की बौछार और दूसरी ओर कार्बेट की गजब की स्फूर्ति। स्थिति यह थी कि कोई नया दर्शक यही समझता कि कार्बेट चैम्पियन है और टेरी नौसिखिया। ऐसी स्थिति में टेरी जैसे मंजे खिलाड़ी का आत्मविश्वास डगमगा गया वह बौखला उठा। अब टेरी इस प्रयास में था कि किसी भी तरह कार्बेट को एक घूंसा लगाकर अपना खोया विश्वास पुनः प्राप्त कर ले। लेकिन यह सम्भव न हो सका इसी बीच पहला राउण्ड समाप्त हो गया। दूसरे राउण्ड के शुरू होते ही कार्बेट की दाहिनी मुट्ठी का जबर्दस्त घूंसा टेरी के जबड़े पर पड़ा। वह ऐसा गिरा कि फिर वह उठ नहीं सका। रेफरी की गिनती समाप्त हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 9

जिह्वा ही नहीं, हर इंद्रिय का सदुपयोग करें

🔴 मित्रो! ये जिह्वा का संकेत है, जो हम बार- बार पानी पीने के नाम पर, पवित्रीकरण के नाम पर, आचमन करने के नाम पर आपको सिखाते हैं और कहते हैं कि जीभ को धोइए, जीभ को साफ कीजिए। जिह्वा को आप ठीक कर लें तो आपका मंत्र सफल हो जाएगा। तब राम नाम भी सफल हो अता है, गायत्री मंत्र भी सफल हो सकता है और जो भी आप चाहे सफल हो सकता है।

🔵 यह आत्मसंशोधन की प्रक्रिया है। जीभ का तो मैंने आपको एक उदाहरण दिया है। इसके लंबे में कहाँ तक जाऊँ कि आपको सारी की सारी इंद्रियों का वर्णन करूँ और उनके संशोधन की प्रक्रिया बताऊँ कि आप अमुक इंद्रिय का संशोधन कीजिए। आँखों का संशोधन कीजिए। आँखों में जो आपके शैतान बैठा रहता है, जो छाया के रूप में प्रत्येक लड़की को आपको वेश्या दिखाता है। स्कूल पाने कौन जाती है वेश्या। ये कौन बैठी है वेश्या! सड़क पर कौन जाती है? गंगाजी पर कौन नहा रही है? सब वेश्या। श्री साहब! दुनिया में कोई सती, साध्वी, बेटी, माँ, बहन कोई है?

🔴 नहीं साहब! दुनिया में कोई बहन नहीं होती, कोई बेटी नहीं होती। जितनी भी रेलगाड़ियों में चल रही हैं, जितनी भी गंगाजी में नहाती हैं जो स्कूल जा रही हैं, ये सब वेश्या हैं। नहीं बेटे, ये वेश्या कैसे हो सकती हैं। तेरी भी तो कन्या होगी? तेरी भी तो लड़की स्कूल जा रही होगी। वह भी फिर वेश्या है क्या? नहीं साहब! हमारी लड़की तो वेश्या नहीं है। बाकी सब वेश्या हैं। ये कैसे हो सकता हैं? बेटे, यह तेरे आँखों का राक्षस, आँखों का शैतान, आँखों का पशु और आँखों का पिशाच तेरे दिल दिमाग में छाया हुआ है। यही तुझे यह दृश्य दिखाता है। इसका संशोधन कर, फिर देख तुझे हर लड़की में, हर नारी में अपनी बेटी, अपनी बहन, और अपनी माँ की छवि दिखाई देगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/pravaachanpart4/aadhiyatamekprakarkasamar.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 74)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 षोडश संस्कारों को शिक्षा— इसी एक महीने की अवधि में सोलह संस्कार कराने का विधान सीखने का अभ्यास भी प्रत्येक कथा वाचक को करा दिया जायगा, ताकि वह पुंसवन, नामकरण, अन्न प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत,  विवाह, वानप्रस्थ एवं जन्म दिन, पर्व-त्यौहार आदि का विधान जान कर उन शुभ कार्यों को भी विधिवत् करा सकें। कारण कि इन आयोजनों के द्वारा भी व्यक्ति-निर्माण, परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है। इन अवसरों पर जो प्रवचन किये जाते हैं, संस्कारों की प्रत्येक क्रिया का जो मर्म समझाया जाता है, उससे निश्चय ही उस भावनापूर्ण वातावरण में भाग लेने वालों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। अपनी संस्कार पद्धति में प्रत्येक संस्कार के साथ सम्बन्धित समस्याओं का विवेचन तथा कर्तव्यों का उद्बोधन ऐसे अच्छे ढंग से सम्बन्धित कर दिया गया है कि यह षोडश संस्कार भी युग-निर्माण की आवश्यकता को प्रभावशाली ढंग से पूरा करने में सहायक हो सकते हैं। होली, दिवाली आदि पर्व-त्यौहारों को भी यदि अपनी पद्धति से मिला-जुला कर मनाया जा सके तो उससे भी नैतिक, सामाजिक एवं बौद्धिक क्रान्ति की आवश्यकता पूरी हो सकती है।

🔵 उपरोक्त शिक्षण भी इस एक महीने की गीता प्रवचन शिक्षा के साथ ही जोड़ दिया गया है। आशा यह की जानी चाहिए कि मनोयोग पूर्वक जो भी इस एक महीने की शिक्षा को प्राप्त करेगा, वह युग-निर्माण योजना का एक प्रभावशाली कार्यकर्त्ता बनकर निकलेगा और जन-नेतृत्व की आज की महती आवश्यकता को पूरा करने में बहुत हद तक योग देगा।

🔴 जिन्हें प्रचारक का कार्य करना नहीं है, अपने कार्य में व्यस्त हैं और बाहर जा सकने की सुविधा नहीं है वे स्वान्तः सुखाय भगवान के इस महान् ज्ञान की उपलब्धि के लिए भी मथुरा आ सकते हैं और गीता की चमत्कारी रचना के रहस्यों को समझते हुए यह जान सकते हैं कि इस महान ज्ञान द्वारा मनुष्य की वैयक्तिक एवं सामूहिक समस्याओं का हल किस प्रकार हो सकता है? इस पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए गीता कैसी दिव्य विभूति सिद्ध हो सकती है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 25)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴  ‘‘जब तक तुम्हारे स्थूल शरीर की उपयोगिता रहेगी तभी तक वह काम करेगा। इसके उपरांत इसे छोड़कर सूक्ष्म शरीर में चला जाना होगा। तब साधनाएँ भिन्न होंगी, क्षमताएँ बढ़ी-चढ़ी होंगी। विशिष्ट व्यक्तियों से संपर्क रहेगा। बड़े काम इसी प्रकार हो सकेंगे।’’

🔵 गुरुदेव ने कहा-‘‘ उचित समय आने पर तुम्हारा परिचय देवात्मा हिमालय क्षेत्र से कराना होगा। गोमुख से पहले संत महापुरुष स्थूल शरीर समेत निवास करते हैं। इस क्षेत्र में भी कई प्रकार की कठिनाइयाँ हैं।  इनके बीच निर्वाह करने का अभ्यास करने के लिए, एक-एक साल वहाँ निवास करने का क्रम बना देने की योजनाएँ बनाई हैं। इसके अतिरिक्त हिमालय का हृदय जिसे अध्यात्म का ध्रुव केंद्र कहते हैं, उसमें चार-चार दिन ठहरना होगा, हम साथ रहेंगे। स्थूल शरीर जैसी स्थिति सूक्ष्म शरीर की बनाते रहेंगे। वहाँ कौन रहता है, किस स्थिति में रहता है, तुम्हें कैसे रहना होगा, यह भी तुम्हें विदित हो जाएगा। दोनों शरीरों का, दोनों क्षेत्रों का अनुभव क्रमशः बढ़ते रहने में तुम इस स्थिति में पहुँच जाओगे, जिसमें ऋषि अपने निर्धारित संकल्पों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं। संक्षेप में यही है तुम्हें चार बार हिमालय बुलाने का उद्देश्य। इसके लिए जो अभ्यास करना पड़ेगा, जो परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ेगी, यह उद्देश्य भी इस बुलावे का है। तुम्हारी यहाँ पुरश्चरण साधना में इस विशिष्ट प्रयोग से कोई विघ्न न पड़ेगा।

🔴 सूक्ष्म शरीरधारी उसी क्षेत्र में इन दिनों निवास करते हैं। पिछले हिम युग के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं हैं। जहाँ धरती का स्वर्ग था, वहाँ का वातावरण अब देवताओं के उपयुक्त नहीं रहा, इसलिए वे अंतरिक्ष में रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/marg.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 25)


🌞  हिमालय में प्रवेश

मील का पत्थर

🔵 सोचता हूं मील का पत्थर अपने आप में कितना तुच्छ है। उसकी कीमत, योग्यता, सामर्थ्य, विद्या, बुद्धि सभी उपहासास्पद है। पर यह अपने एक निश्चित और नियत कर्त्तव्य को लेकर यथा स्थान जम गया है। हटने की सोचता तक नहीं। उसे एक छोटी सी बात मालूम है धरासूं इतने मील इतने फर्लांग है। बस, केवल इतने से ज्ञान को लेकर वह जन सेवा के पथ पर अड़ गया है उस पत्थर के टुकड़े की, नगण्य और तुच्छ की—यह निष्ठा अन्ततः कितनी उपयोगी सिद्ध हो रही है। मुझ जैसे अगणित पथिक उससे मार्ग दर्शन पाते हैं और अपनी परेशानी का समाधान करते हैं।

🔴 जब यह जरा सा पत्थर का टुकड़ा मार्ग दर्शन कर सकता है, जब मिट्टी का जरा सा एक दो पैसे मूल्य का दीपक प्रकाश देकर रात्रि के खतरों से दूसरों की जीवन रक्षा कर सकता है, तो क्या सेवाभावी मनुष्य को इसलिये चुप ही बैठना चाहिये कि उसकी विद्या कम है, बुद्धि कम, सामर्थ्य कम है, योग्यता कम है? कमी हर किसी में है। पर हममें से प्रत्येक अपने क्षेत्र में—अपने से कम जानकारी में, कम स्थिति के लोगों में बहुत कुछ कर सकता है। ‘अमुक योग्यता मिलती तो अमुक कार्य करता’ ऐसी शेखचिल्ली कल्पनाएं करते रहने की अपेक्षा क्या यह उचित नहीं कि अपनी जो योग्यता है उसी को लेकर अपने से पिछड़े हुए लोगों को आगे बढ़ाने का मार्ग दर्शन का काम कर दें। मील का पत्थर सिर्फ धतासूं और गंगोत्री का अन्तर मात्र जानता है, उतना ही बता सकता है पर उसकी उतनी सेवा भी क्या कम महत्व की है। उसके अभाव में उत्तरकाशी से भटवाड़ी तक परेशानी रही और कल गौमुख दर्शन का जो सौभाग्य मिलने वाला है उसकी सुखद कल्पना में उन पत्थरों का अभाव बुरी तरह खटक रहा है।

🔵 हममें से कितने ऐसे हैं जो मील के पत्थरों से अधिक जन सेवा कर सकते हैं। पर आत्मविश्वास, निष्ठा और जो कुछ है उसी को लेकर अपने उपयुक्त क्षेत्र में अड़ जाने की निष्ठा हो तभी तो हमारी उपयोगिता को सार्थकता होने का अवसर मिले।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 15 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 9) 16 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 शरीर पोषण के लिये तीन अनिवार्य साधनों की आवश्यकता होती है-१ आहार, (२) जल और (३) वायु। ठीक इसी प्रकार आत्मिक प्रगति की आवश्यकता पूरी करने के लिये तीन माध्यम अपनाने होते हैं- १ उपासना, (२) साधना और (३) आराधना। इन शब्दों का और भी अधिक स्पष्टीकरण इस प्रकार समझना चाहिये।         

🔵 उपासना का अर्थ है- निकट बैठना। किसके? ईश्वर के। ईश्वर निराकार है। इसकी प्रतिमा या छवि तो ध्यान-धारणा की सुविधा के लिये विनिर्मित की जाती है। मानवी अन्त:करण के साथ उसकी घनिष्ठता उत्कृष्ट चिन्तन के आदर्शवादी भाव संवेदना के रूप में ही होती है। यही भक्ति का, ईश्वर सान्निध्य का, ईश्वर दर्शन का वास्तविक रूप है। यदि साकार रूप में उसका चिन्तन करना हो तो किसी कल्पित प्रतिमा में इन्हीं दिव्य संवेदनाओं के होने की मान्यता और उसके साथ अविच्छिन्न जुड़े होने के रूप में भी किया जा सकता है। ऐसे महामानव जिन्होंने आदर्शों का परिपालन और लोकमंगल के लिये समर्पित होने के रूप में अपने जीवन का उत्सर्ग किया, उन्हें भी प्रतीक माना जा सकता है? राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी आदि को भगवान् का अंशावतार कहा जा सकता है। उन्हें इष्ट मानकर उनके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस निमित्त किया गया पूजा प्रयास उपासना कहा जा जायेगा।  

🔴 दूसरा चरण है-साधना जिसका पूरा नाम है जीवन साधना। इसे चरित्र निर्माण भी कहा जा सकता हैं। चिन्तन में भाव-संवेदनाओं का समावेश तो उपासना क्षेत्र में चला जाता है, पर शरीरचर्या की धारा-विधा जीवन साधना में आती है। इसमें आहार-विहार रहन-सहन संयम, कर्तव्यों का परिपालन, सद्गुणों का अभिवर्द्धन दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन आदि आते हैं। संयमशील, अनुशासित और सुव्यवस्थित क्रिया-कलाप अपनाना जीवन साधना कहा जायेगा। जिस प्रकार जंगली पशु को सरकस का प्रशिक्षित कलाकार बनाया जाता है। जिस प्रकार किसान ऊबड़-खाबड़ जमीन को समतल करके उर्वर बनाता है, जिस प्रकार माली सुनियोजित ढंग से अपना उद्यान लगाता है और सुरम्य बनाता है।

🔵 उसी प्रकार जीवन का वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने लगना जीवन साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है। यह बन पड़ने पर ही आत्मा में परमात्मा का अवतरण सम्भव होता है। धुले हुए कपड़े की ही रँगाई ठीक तरह होती है। चरित्रवान व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में भगवद् भक्त बनते हैं। दैवी वरदान ऐसे ही लोगों पर बरसते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, तुष्टि, तृप्ति, शान्ति जैसी दिव्य विभूतियों से मात्र चरित्रवान ही सम्पन्न होते हैं उनमें सद्भावना, शालीनता, सुसंस्कारिता के सभी लक्षण उभरे हुए दीखते हैं। सामान्य स्थिति में रहते हुए भी ऐसे ही लोग महामानव, देवमानव बनते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 त्याग और प्रेम

🔵 एक दिन नारद जी भगवान के लोक को जा रहे थे। रास्ते में एक संतानहीन दुखी मनुष्य मिला। उसने कहा-नाराज मुझे आशीर्वाद दे दो तो मेरे सन्तान हो जाय। नारद जी ने कहा-भगवान के पास जा रहा हूँ। उनकी जैसी इच्छा होगी लौटते हुए बताऊँगा।

🔴 नारद ने भगवान से उस संतानहीन व्यक्ति की बात पूछी तो उनने उत्तर दिया कि उसके पूर्व कर्म ऐसे हैं कि अभी सात जन्म उसके सन्तान और भी नहीं होगी। नारद जी चुप हो गये।

🔵 इतने में एक दूसरे महात्मा उधर से निकले, उस व्यक्ति ने उनसे भी प्रार्थना की। उनने आशीर्वाद दिया और दसवें महीने उसके पुत्र उत्पन्न हो गया।

🔴 एक दो साल बाद जब नारद जी उधर से लौटे तो उनने कहा-भगवान ने कहा है-तुम्हारे अभी सात जन्म संतान होने का योग नहीं है।

🔵 इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा। उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारद जी के चरणों में डाला और कहा-एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है।

🔴 नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वे झूठ बोले। मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा कर देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती सो तो किया नहीं, उलटे मुझे झूठा और उस दूसरे महात्मा से भी तुच्छ सिद्ध कराया। नारद कुपित होते हुए विष्णु लोक में पहुँचे और कटु शब्दों में भगवान की भर्त्सना की।

🔵 भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और इसका उत्तर कुछ दिन में देने का वायदा किया। नारद वहीं ठहर गये। एक दिन भगवान ने कहा-नारद लक्ष्मी बीमार हैं-उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए। तुम जाकर माँग लाओ। नारद कटोरा लिये जगह-जगह घूमते फिरे पर किसी ने न दिया। अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे किया। नारद ने उसे ले जाकर भगवान के सामने रख दिया।

🔴 भगवान ने उत्तर दिया-नारद ! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए कलेजा दे सकता है उसके लिए मैं भी अपना विधान बदल सकता हूँ। तुम्हारी अपेक्षा उसे श्रेय देने का भी क्या कारण है सो तुम समझो। जब कलेजे की जरूरत पड़ी तब तुमसे यह न बन पड़ा कि अपना ही कलेजा निकाल कर दे देते। तुम भी तो भक्त थे। तुम दूसरों से माँगते फिरे और उसने बिना आगा पीछे सोचे तुरन्त अपना कलेजा दे दिया। त्याग और प्रेम के आधार पर ही मैं अपने भक्तों पर कृपा करता हूँ और उसी अनुपात से उन्हें श्रेय देता हूँ।” नारद चुपचाप सुनते रहे। उनका क्रोध शान्त हो गया और लज्जा से सिर झुका लिया।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961 पृष्ठ 41

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 25) 16 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 साधारण स्तर का जीवनक्रम अपनाकर की गई उपासना नित्य नियम है। अनुष्ठान का स्तर विशेष है—उसके साथ अनेकों प्रतिबन्ध, नियम, विधान जुड़े रहते हैं। अतएव उसका प्रतिफल भी विशेष होता है। पुरश्चरण का विशेष विधि-विधान है। उसमें अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक मन्त्रों एवं कृत्यों का प्रयोग करना पड़ता है। वह कर सकना उसे प्रयोजन के लिए, प्रशिक्षित संस्कृतज्ञों के लिए ही सम्भव है। साधारणतया अनुष्ठानों का ही प्रचलन है सर्वसाधारण के लिए वे ही सरल है।

🔵 अनुष्ठान तीन स्तर के हैं। लघु, चौबीस हजार जप का 9 दिन में सम्पन्न होने वाला। मध्यम, सवालक्ष जप का 40 दिन में होने वाला। उच्च, 24 लाख जप का—1 वर्ष में होने वाला। लघु में 27 माला, मध्यम में 33 और उच्च में 66 माला नित्य जपनी होती हैं। औसत एक घंटे में 10-11 माला जप होता है। इस हिसाब से लघु और मध्यम में प्रायः तीन घंटे और उच्च में छह घंटे नित्य लगते हैं। यह क्रम दो या तीन बार में भी थोड़ा-थोड़ा करके पूरा हो सकता है। यों प्रातःकाल का ही समय सर्वोत्तम है। शरीर, वस्त्र, तथा उपकरणों की शुद्धता, षट्कर्म, पंचोपचार, जप, ध्यान, सूर्यार्घदान—यही उपक्रम है। पूजा वेदी पर छोटा जलकलश और अगरबत्ती रखकर (जल, अग्नि की साक्षी मानी जाती है), चित्र, प्रतिमा का पूजन, जल, अक्षत, चन्दन, पुष्प, नैवेद्य से किया जाता है। आवाहन, विसर्जन के लिए आरम्भ और अन्त में गायत्री मंत्र सहित नमस्कार किया जाता है।

🔴 जप के साथ हवन जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में जब हर प्रकार की सुविधा थी तब जप का दशांश हवन किया जाता था। आज की स्थिति में शतांश पर्याप्त है। चौबीस हजार के लिए 240, सवा लक्ष के लिए 1250, चौबीस लक्ष के लिए 24 हजार आहुतियां देनी चाहिए, यह एक परम्परा है। स्थिति के अनुरूप आहुतियों की संख्या न्यूनाधिक भी हो सकती हैं। पर होनी अवश्य चाहिए। अनुष्ठान में जप और हवन दोनों का ही समन्वय है। गायत्री माता और यज्ञ पिता का अविच्छिन्न युग्म है। दो विशिष्ट साधनाओं में दोनों को साथ रखकर मिलाना होता है। हवन हर दिन भी हो सकता है और अन्तिम दिन भी। हर दिन न करना हो तो जितनी माला हों उतनी आहुतियां। अन्तिम दिन करना हो तो समूचे जप का शतांश। यज्ञवेदी पर कई व्यक्ति बैठते हैं तो सम्मिलित आहुतियों की गणना होती है। जैसे हवन पर 5 व्यक्ति बैठे हों तो उनके द्वारा दी गई 100 आहुतियां 500 मानी जायेंगी। 240 आहुतियों के लिए 6 व्यक्ति एक साथ बैठकर हवन करें तो 40 बार आहुतियां प्रदान से ही वह संख्या पूरी हो जायगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 19) 16 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 अमेरिका के इतिहास में अब्राहीम लिंकन का नाम सदा अमर रहेगा। यों तो वहां राष्ट्रपति कई हुए हैं पर जिस आदर और सम्मान के साथ लिंकन का नाम लिया जाता है, उतना अन्य किसी का नहीं। इसका कारण है उनकी आन्तरिक महानता। लिंकन के पिता जंगल से लकड़ियां काटकर परिवार का गुजारा चलाते थे। किसी तरह काम चलाऊ अक्षर ज्ञान जितनी शिक्षा उन्हें पिता से मिल पायी पैसे की तंगी के कारण उन्हें विद्यालय में प्रवेश लेने से वंचित रहना पड़ा। पर बालक के मन में पढ़ने की गहरी अभिरुचि थी। लैम्प पोस्ट के उजाले में वे पढ़ते रहे तथा अपनी ज्ञान वृद्धि करते रहे। प्रतिकूलताओं के आंगन में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा निखारी और आगे चलकर राजनीति में प्रवेश किया। कई बार हारे पर निराश नहीं हुए और अपनी आन्तरिक महानता के कारण वे राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर चुने गये।

🔴 शिक्षा एवं प्रतिभा के सम्बन्ध में अधिकांश व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों को अधिक महत्व देते तथा उन्हें ही सफलता का कारण मानते हैं। सोचते हैं कि यदि अच्छे घर में जन्म न हो, पढ़ने लिखने की सुविधाएं न मिलें, उपयुक्त परिस्थितियां लक्ष्य न रहें तब तो आदमी कुछ भी नहीं कर सकता। जबकि सच्चाई यह है कि अन्य क्षेत्रों में न्यूनाधिक परिस्थितियों का भले ही योगदान हो, विद्या और ज्ञान के क्षेत्र में उनका जरा भी वश नहीं चलता। अनुकूल परिस्थितियां होते हुए भी धनवानों के बच्चे अनपढ़ और गंवार रह जाते हैं तथा अनुकूलताएं व साधन न होते हुए भी कितने ही गरीब बच्चे विद्वान एवं ज्ञानी बन जाते हैं।

🔵 एक कहावत प्रसिद्ध है कि ‘‘लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा कभी एक साथ नहीं होती।’’ इस कहावत में सच्चाई का कितना अंश है यह तो  विवादास्पद हो सकता है पर यह उतना ही सुनिश्चित और ठोस सत्य है कि गरीब व्यक्ति भले ही धनवान न बने, ज्ञानवान तो बन ही सकता है। कालीदास, सूरदास, तुलसीदास से लेकर प्रेमचन्द्र, शरतचन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, जगन्नाथ दास रत्नाकर आदि कितने ही विद्वान एवं साहित्यकार हुए हैं जिनकी पूर्व और अन्त को आर्थिक स्थिति अत्यन्त सोचनीय बनी रही फिर भी अपने प्रयासों के बलबूते वे संसार को कुछ दे सकने में सफल रहे।

🔴 प्रतिकूलताओं का रोने रोते रहने की अपेक्षा यदि मनुष्य प्रयास करे तो किसी भी प्रकार की सफलता सम्पादित कर सकना कठिन नहीं है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, उपरोक्त उदाहरण इसी तथ्य की पुष्टि करते तथा हर मनुष्य को अपना भाग्य अपने हाथों बनाने की प्रेरणा देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 8

वाणी का सुनियोजन करिए

🔴 मित्रो! आपकी जिह्वा इस लायक है कि इससे जो भी आप मंत्र बोलेंगे, सही होते हुए चले जाएँगे और सार्थक होते चले जाएँगे, अगर आपने जिह्वा का ठीक उपयोग किया है, तब और आपने दूसरों को बिच्छू के से डंक चुभोए नहीं हैं, दूसरों का अपमान किया नहीं हैं। दूसरों को गिराने वाली सलाह दी नहीं है, दूसरों की हिम्मत तोड़ने वाली सलाह दी नहीं है। जो यह कहते है कि हम झूठ नहीं बोलते। अरे! झूठ तो नहीं बोलता, पर दूसरों का दिल तोड़ता है दुष्ट। हमें हर आदमी की हिम्मत बढ़ानी चाहिए और ऊँचा उठाना चाहिए। आप तो हर आदमी का 'मॉरल' गिरा रहे हैं उसे 'डिमारलाइज' कर रहे हैं। आपने कभी ऐसा किया है, कि किसी को ऊँचा उठाने की बात की हैं। आपने तो हमेशा अपनी स्त्री को गाली दी कि तू बड़ी पागल है, बेवकूफ है, जाहिल है। जब से घर में आई है सत्यानाश कर दिया है। जब से वह आपके घर आई, तब से हमेशा बेचारी की हिम्मत आप गिराते हुए चले गए। उसका थोड़ा- बहुत जो हौसला था, उसे आप गिराते हुए चले गए।

🔵 महाभारत में कर्ण और अर्जुन दोनों का जब मुकाबला हुआ तो श्रीकृष्ण भगवान ने शल्य को अपने साथ मिला लिया। उससे कहा कि तुम एक काम करते रहना, कर्ण की हिम्मत कम करते जाना। कर्ण जब लड़ने के लिए खड़ा हो तो कह देना कि अरे साहब! आप उनके सामने क्या है? कहाँ भगवान और अर्जुन और कहाँ आप सूत के बेटे, दासी के बेटे? भला आप क्या कर लेते हैं? देखिए अर्जुन सहित पाँचों पाण्डव संगठित हैं। वे मालिक हैं और आप नौकर हैं। आपका और उनका क्या मुकाबला? बेचारा कर्ण जब कभी आवेश में आता, तभी वह शल्य ऐसी फुलझड़ी छोड़ देता कि उसका खून ठंडा हो जाता। आपने भी हरेक का खून ठंडा किया है।

🔴 आपने झूठ बोलने से भी ज्यादा जुर्म किया है, एक बार आप झूठ बोल सकते थे। आपके झूठ में इतनी खराबी नहीं थी, जितनी कि आपने हर आदमी को जिसमें आपके बीबी बच्चे भी शामिल हो, आपने हरेक को नीचे गिराया। आपने किसी का उत्साह बढ़ाया, हिम्मत बढ़ाई? किसी की प्रशंसा की? नहीं, आपने जीभ से प्रशंसा नहीं की, हर वक्त निंदा की, इसकी निंदा की, उसकी निंदा की। आप निंदा ही करते रहे। मित्रो! हमारी जीभ लोगों का जी दुखाने वाली, टोंचने वाली नहीं होनी चाहिए। टोंचने वाली जीभ से जब भी हम बोलते हैं, कड़ुवे वचन बोलते हैं। क्या आप मीठे वचन कहकर वह काम नहीं करा सकते, जो आप कड़ुवे वचन बोलकर या गाली देकर कराना चाहते हैं, वह प्यार भरे शब्द, सहानुभूति भरे शब्द कहकर नहीं करा सकते? करा सकते है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/pravaachanpart4/aadhiyatamekprakarkasamar.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 73)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण
🔴 कथा-वाचक परायण के पश्चात् डेढ़-डेढ़ घण्टा प्रवचन किया करेंगे। प्रवचन सब श्लोकों का नहीं, वरन् जो विशेष मार्मिक होंगे, उन्हीं पर होगा। इस मार्मिक श्लोकों के सन्देश की पुष्टि तुलसीकृत रामायण की चौपाइयों से, पौराणिक धर्म-कथाओं से तथा ऐतिहासिक घटना, संस्मरणों से की जाया करेगी। इस शैली से वह कथा प्रत्येक स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित के लिए बहुत ही आकर्षक एवं समझने लायक बन जायगी। गीता को अन्तःकरण में उतारने और व्यवहारिक रूप में परिणत करने के लिए कथा-वाचक मार्ग-दर्शन करेंगे। लोगों को ऐसी प्रेरणा देंगे कि वे कथा सुनने मात्र से स्वर्ग जाने की मूढ़ कल्पना त्याग कर भगवान की शिक्षा को जीवन में उतारें और अर्जुन की तरह सच्चे भक्त कहाने के अधिकारी बनें।

🔵 साथ में रचनात्मक कार्य भी— कथा-वाचक केवल कथा-वाचक न होंगे। वे एक सप्ताह तक जहां भी रहेंगे, वहां संगठन, रचनात्मक कार्यक्रमों का नियोजन, जीवन-निर्माण के लिए परामर्श सामाजिक एवं बौद्धिक क्रान्ति की पृष्ठ भूमि आदि उद्देश्यों की पूर्ति में लगे रहेंगे। कथा तो तीन घण्टे हुआ करेगी। सारा दिन जो शेष रहेगा उसका उपयोग वे जन-सम्पर्क में करेंगे और व्यक्ति निर्माण, परिवार-निर्माण, समाज-निर्माण की प्रवृत्तियों को अग्रसर करने के लिए जो सम्भव हो सकेगा, उसमें पूरी तत्परता के साथ लगे रहेंगे। यह कथा एक प्रकार से युग-निर्माण शिक्षण-शिविरों का काम करेगी। सुनने मात्र से लोगों को सन्तुष्ट न रहने दिया जायगा, वरन् उन्हें कुछ करने के लिए भी प्रेरणा मिलेगी। विवाहों में अपव्यय रोकने, आदर्श विवाहों एवं जातीय संगठनों की व्यवस्था बनाने जैसे कितने ही रचनात्मक कार्यक्रमों का ढांचा खड़ा करने का प्रयत्न किया जायगा। इस प्रकार यह कथा, ‘कथा’ मात्र न रहकर नव-युग की ऊषा उत्पन्न करने का काम करेगी। आशा यह करनी चाहिए कि वहां नव-जागरण का वातावरण उत्पन्न होगा। इनका आयोजन ही इस उद्देश्य से किया गया है तो फिर वैसा ही प्रतिफल भी क्यों न होगा?

🔴 प्रशिक्षण के लिए शिविर— कथा-वाचक श्लोक की व्याख्या करे, किस श्लोक में साथ रामायण की किन चौपाइयों, किन दृष्टान्तों, अन्तर्कथाओं का खांचा मिलावें, इसकी सांगोपांग रूप-रेखा बना ली गई है। श्लोकों का पद्यानुवाद हो गया है। यह सब साहित्य तीन बड़ी पाठ्य-पुस्तकों में छापा भी जा रहा है। इसकी व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस वर्ष कार्तिक, पौष, फाल्गुन और बैसाख में एक-एक महीने के चार शिविर मथुरा में रखे गये हैं। कथा का क्रम, रचनात्मक कार्यों का ढंग, प्रवचन की शैली, कथा वाचक का आदर्श एवं उद्देश्य जैसे विषयों की शिक्षा के लिए यों एक महीने का समय बहुत ही कम है, पर लोगों की व्यस्तता को देखते हुए एक ‘स्वल्प कालीन शिक्षण’ की तरह अभी वैसी ही व्यवस्था बनाई गई है। जिन्हें अवकाश होगा वे उपरोक्त अभ्यास के लिए अधिक समय भी ठहर सकेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 24)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴 सहज शीत, ताप के मौसम में, जीवनोपयोगी सभी वस्तुएँ मिल जाती हैं, शरीर पर भी ऋतुओं का असह्य दबाव नहीं पड़ता, किंतु हिमालय क्षेत्र के असुविधाओं वाले प्रदेश में स्वल्प साधनों के सहारे कैसे रहा जा सकता है, यह भी एक कला है, साधना है। जिस प्रकार नट शरीर को साधकर अनेक प्रकार के कुतूहलों का अभ्यास कर लेते हैं, लगभग उसी प्रकार का वह अभ्यास है, जिसमें नितांत एकाकी रहना पड़ता है। पत्तियों और कंदों के सहारे निर्वाह करना पड़ता है और हिंस्र जीव-जंतुओं के बीच रहते हुए अपने प्राणों को बचाना पड़ता है।

🔵 जब तक स्थूल शरीर है, तभी तक यह झंझट है। सूक्ष्म शरीर में चले जाने पर वे आवश्यकताएँ समाप्त हो जाती हैं, जो स्थूल शरीर के साथ जुड़ी हुई हैं। सर्दी-गर्मी से बचाव, क्षुधा, पिपासा का निवारण, निद्रा और थकान का दबाव यह सब झंझट उस स्थिति में रहते हैं। पैरों से चलकर मनुष्य थोड़ी दूर जा पाता है, किंतु सूक्ष्म शरीर के लिए एक दिन में सैकड़ों योजनों की यात्रा सम्भव है। एक साथ, एक मुख से सहस्रों व्यक्तियों के अंतःकरणों तक अपना संदेश पहुँचाया जा सकता है। दूसरों की इतनी सहायता सूक्ष्म शरीर धारी कर सकते हैं, जो स्थूल शरीर रहते सम्भव नहीं। इसलिए सिद्ध पुरुष सूक्ष्म शरीर द्वारा काम करते हैं। उनकी साधनाएँ भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।

🔴 स्थूल शरीर धारियों की एक छोटी सीमा है। उनकी बहुत सारी शक्ति तो शरीर की आवश्यकताएँ जुटाने में दुर्बलता, रुग्णता, जीर्णता आदि के व्यवधानों से निपटने में खर्च हो जाती है, किंतु लाभ यह है कि प्रत्यक्ष दृश्यमान कार्य स्थूल शरीर से ही हो पाते हैं। इस स्तर के व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना, आदान-प्रदान इसी के सहारे सम्भव है। इसलिए जन-साधारण के साथ संपर्क साधे रहने के लिए प्रत्यक्ष शरीर से ही काम लेना पड़ता है। फिर वह जरा-जीर्ण हो जाने पर अशक्त हो जाता है और त्यागना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसके द्वारा आरम्भ किए गए काम अधूरे रह जाते हैं। इसलिए जिन्हें लम्बे समय तक ठहरना है और महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के अंतराल में प्रेरणाएँ एवं क्षमताएँ देकर बड़े काम कराते रहना है, उन्हें सूक्ष्म शरीर में ही प्रवेश करना पड़ता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/marg

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 24)

🌞  हिमालय में प्रवेश

लदी हुई बकरी

🔵 आज भोजवासा चट्टी पर आ पहुंचे। कल प्रातः गोमुख के लिए रवाना होना है। यहां यातायात नहीं है उत्तरकाशी और गंगोत्री के रास्ते में यात्री मिलते हैं, चट्टियों पर ठहरने वालों की भीड़ भी मिलती है पर यहां वैसा कुछ नहीं। आज कुल मिलाकर हम छह यात्री हैं। भोजन अपना अपना सभी साथ लाये हैं, यों कहने को तो भौजवासा की चट्टी है, यहां धर्मशाला भी है पर नीचे की चट्टियों जैसी सुविधा यहां कहां है?

🔴 सामने वाले पर्वत पर दृष्टि डाली तो ऐसा लगा मानों हिमगिरि स्वयं अपने हाथों भगवान् शंकर के ऊपर जल का अभिषेक करता हुआ पूजा कर रहा हो। दृश्य बड़ा ही अलौकिक था। बहुत ऊपर से एक पतली सी जलधारा नीचे गिर रही थी। नीचे प्रकृति के निर्मित बड़े शिवलिंग थे, धारा उन्हीं पर गिर रही थी। गिरते समय वह धारा छींटे छींटे हो जाती थीं। सूर्य की किरण उन छींटों पर पड़कर उन्हें सात रंगों के इन्द्रधनुष जैसे बना देती थी। लगता था साक्षात् शिव विराजमान है उनके शीश पर आकाश से गंगा गिर रही है और देवता सप्त रंग के पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं। दृश्य इतना मोहक था कि देखते- देखते मन नहीं अघाता था। उस अलौकिक दृश्य को तब तक वैसा देखता ही रहा जब तक अन्धेरे ने पटाक्षेप नहीं कर दिया।

🔵 सौंदर्य आत्मा की एक प्यास है पर वह कृत्रिमता की कीचड़ में उपलब्ध होना कहां सम्भव है? इन वन पर्वतों के चित्र बनाकर लोग अपने घरों में टांगते हैं और उसी से सन्तोष कर लेते हैं पर प्रकृति की गोदी में जो सौंदर्य का निर्झर बह रहा है उसकी ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता। यों इस सारे ही रास्ते में सौंदर्य बिखरा पड़ा था, हिमालय को सौंदर्य का सागर कहते हैं, उसमें स्नान करने से आत्मा में अन्त-प्रदेश में एक सिहरन सी उठती है। जी करता है इस अनन्य सौंदर्य राशि में अपने आप को खो क्यों न दिया जाय?

🔴 आज का दृश्य यों प्रकृति का एक चमत्कार ही था, पर अपनी भावना उसमें एक दिव्य झांकी का आनन्द ही लेती रही, मानो साक्षात् शिव के ही दर्शन हुए हों। इस आनन्द की अनुभूति में आज अन्तःकरण गदगद हुआ जा रहा है। काश, इस रसास्वादन को एक अंश में लिख सकना मेरे लिए सम्भव हुआ होता तो जो यहां नहीं हैं वे भी कितना सुख पाते और अपने भाग्य को सराहते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 14 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 8) 15 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 आत्मिक प्रगति का सार्वभौम उपाय एक ही है-क्रियाकृत्यों के माध्यम से आत्मशिक्षण। इसे प्रतीक पूजा भी कह सकते हैं। मनुष्य के मानस की बनावट ऐसी है कि वह किन्हीं जानकारियों से अवगत तो हो जाता है, पर उसे व्यवहार में उतारना क्रिया अभ्यास के बिना सम्भव नहीं होता। यह अभ्यास ही वे उपासना कृत्य है, जिन्हें योगाभ्यास, तपश्चर्या, जप, ध्यान, प्राणायाम, प्रतीक पूजा आदि के नाम से जाना जाता है। इनमें अङ्ग-संचालन मन का केन्द्रीकरण एवं उपचार सामग्री का प्रयोग ये तीनों ही आते हैं। अनेक धर्म सम्प्रदायों में पूजा विधान अलग-अलग प्रकार से हैं, तो भी उनका अभिप्राय और उद्देश्य एक ही है-आत्मशिक्षण भाव-संवेदनाओं का उन्नयन। यदि यह लक्ष्य जुड़ा हुआ न होता तो उसका स्वरूप मात्र चिह्न पूजा जैसा लकीर पीटने जैसा रह जाता है। निष्प्राण शरीर का मात्र आकार तो बना रहता है, पर वह कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होता। इसी प्रकार ऐसे पूजा-कृत्य जिसमें साधक की भाव-संवेदना के उन्नयन का उद्देश्य पूरा न होता हो आत्मशिक्षण और आत्मिक प्रगति का प्रयोजन पूरा न कर सकेंगे।          

🔵 इन दिनों यही चल रहा है। लोग मात्र पूजाकृत्यों के विधान भर किसी प्रकार पूरे करते हैं और साथ भाव-संवेदनाओं को जोड़ने का प्रयत्न नहीं करते, आवश्यकता तक नहीं समझते। फलत: उनमें संलग्न लोगों में से अधिकांश के जीवन में विकास के कोई लक्षण नहीं दीख पड़ते। कृत्यों से देवता को प्रसन्न करके उनसे मन चाहे वरदान माँगने की बात की कोई तुक नहीं। इसलिये उस बेतुकी प्रक्रिया का अभीष्ट परिणाम हो भी कैसे सकता है? एक ही देवता के दो भक्त परस्पर शत्रु भी हो सकते हैं। दोनों अपनी-अपनी मर्जी की याचना कर सकते हैं। ऐसी दशा में देवता असमंजस में फँस सकता है कि किसकी मनोकामना पूरी करें? किसकी न करें? फिर देवता पर भी रिश्वतखोर होने का चापलूसी पसन्द सामन्त जैसा स्तर होने का आरोप लगता है। कितने लोग हैं, जो पूजाकृत्य अपनाने के साथ इस गम्भीरता में उतरते हैं और यथार्थता को समझने का प्रयत्न करते हैं? अन्धी भेड़चाल अपनाने पर समय की बरबादी के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत हो भी नहीं सकता।  

🔴 हमें यथार्थता समझनी चाहिये और यह यथार्थवादी क्रम अपनाना चाहिये जिससे आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचा और उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई सर्वतोमुखी प्रगति का लाभ उठाया जा सके।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 24) 15 Jan

🌹 अशौच में प्रतिबंध

🔴 तिल को ताड़ बनाने की आवश्यकता नहीं है। कारण और निवारण का बुद्धिसंगत ताल-मेल विवेकपूर्वक बिठाने में ही औचित्य है। शरीर के कतिपय अंग द्रवमल विसर्जन करते रहते हैं। पसीना, मूत्र, नाक, आंख आदि के छिद्रों से निकलने वाले द्रव भी प्रायः उसी स्तर के हैं जैसा कि ऋतुस्राव। चोट लगने पर भी रक्त निकलता रहता है। फोड़े फूटने आदि से भी प्रायः वैसी ही स्थिति होती है। इन अवसरों पर स्वच्छता के आवश्यक नियमों का ध्यान रखा जाना चाहिए। बात का बतंगड़ बना देना अनावश्यक है।

🔵 प्रथा-प्रचलनों में कई आवश्यक हैं कई अनावश्यक। कइयों को कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और कइयों की उपेक्षा की जानी चाहिए। सूतक और अशुद्धि के प्रश्न को उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए जिससे कि प्रचलन कर्ताओं ने उसे आरम्भ किया था। उनका उद्देश्य उपासना जैसे आध्यात्मिक नित्यकर्म से किसी को विरत, वंचित करना नहीं वरन् यह था कि अशुद्धता सीमित रहे, उसे फैलने का अवसर न मिले। आज भी जहां अशौच का वातावरण है वहीं सूतक माना जाय और शरीर से किये जाने वाले कृत्यों पर ही कोई रोकथाम की जाय। मन से उपासना करने पर तो कोई स्थिति बाधक नहीं हो सकती। इसलिए नित्य की उपासना मानसिक रूप से जारी रखी जा सकती है। पूजा-उपकरणों का स्पर्श न करना हो तो न भी करे।

🔴 यदि सूतक या अशौच के दिनों में अनुष्ठान चल रहा हो तो उसे उतने दिन के लिए बीच में बन्द करके, निवृत्ति के बाद, जिस गणना से छोड़ा था, वहीं से फिर आरम्भ किया जा सकता है। बिना माला का मानसिक जप-ध्यान किसी भी स्थिति में करते रहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 18) 15 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 विशालकाय रेल इंजन से लेकर छोटी सुई तक बड़ी से बड़ी तथा छोटी से छोटी वस्तुओं के निर्माता जमशेद जी टाटा का बचपन घोर अभावों में बीता। वे नवसारी में जन्मे। पिता पुरोहित थे। आरम्भिक शिक्षा प्राप्ति के लिए जमशेद जी को एक सम्बन्धी का सहारा लेना पड़ा। विद्यार्थी काल में वे एक ऐसे कमरे में रहे जिसकी छत बारिश में हमेशा टपकती रहती। इतना पैसा नहीं था कि अधिक पैसे वाला कमरा किराये पर ले सकें। शिक्षा प्राप्ति के बाद एक कपड़े के कारखाने का उद्योग आरम्भ किया और उनकी परिश्रम शीलता व्यवहार कुशलता के बलबूते निरन्तर आगे बढ़ते गये।

🔴 सम्पन्नता ही नहीं प्रतिभा के क्षेत्र में भी सामान्य से असामान्य स्थिति में जा पहुंचने वालों की एक दास्तान है कि उन्होंने परिस्थितियों को कभी भी अधिक महत्व नहीं दिया। हमेशा अपनी आन्तरिक क्षमताओं पर भरोसा किया। उनका भली भांति नियोजन करके आगे बढ़ते गये। बहुमुखी प्रतिभा के धनी पत्रकार, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं समाज सेवी बैंजामिन फ्रेंकलिन प्रेस में टाइप धोने, मशीन सफाई करने, झाड़ू लगाने आदि का काम करते रहे पर उस काम को भी उन्होंने कभी छोटा नहीं माना और पूरे मनोयोग का परिचय देकर प्रेस का काम भी सीखते रहे।

🔵 पन्द्रह व्यक्तियों का बड़ा परिवार था। दस वर्ष की आयु से ही उन्होंने घर की अर्थ व्यवस्था में हाथ बटाने के लिए आगे आना पड़ा। प्रेस के कार्य में उन्होंने प्रवीणता प्राप्त कर ली पर विज्ञान में अधिक अभिरुचि होने के कारण सम्बन्धित पुस्तकों का खाली समय में अध्ययन करते रहे। जिज्ञासा और मनोयोग की परिणति ही सफलता है। उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा भी उभरती चली गयी। एक साथ कई क्षेत्रों में विशेषता हासिल करके उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिकूलताएं मानवी विकास में बाधक नहीं पुरुषार्थ एवं जीवन को निवारने का एक माध्यम भर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 7

अपने श्रम की कमाई खाएँ

🔴 मित्रो! ईमानदारी का कमाया हुआ धान्य, परिश्रम से कमाया हुआ धान्य हराम का धान्य नहीं हैं। ध्यान रखें, हराम की कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। जुए की कमाई, लॉटरी की कमाई, सट्टे की कमाई और बाप दादाओं की दी हुई कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। हमारे यहाँ प्राचीनकाल से ही श्राद्ध की परंपरा है। श्राद्ध का मतलब यह था कि जो कमाऊ बेटे होते थे, बाप -दादों की कमाई को श्राद्ध में दे देते थे, अच्छे काम में लगा देते थे, ताकि बाप की जीवात्मा, जिसने जिदंगी भर परिश्रम किया है, उसकी जीवात्मा को शांति मिले! हम तो अपने हाथ पाँव से कमाकर खाएँगे। ईमानदार बेटे यही करते थे ।। ईमानदार बाप यही करते थे कि अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए उसे इस लायक बनाकर छोड़ा करते थे कि अपने हाथ- पाँव की मशक्कत से वे कमाएँ खाएँ।

🔵 अपने हाथ की कमाई, पसीने की कमाई खा करके कोई आदमी बेईमान नहीं हो सकता, चोर नहीं हो सकता, दुराचारी नहीं हो सकता, व्यभिचारी नहीं हो सकता, कुमार्गगामी नहीं हो सकता। जो अपने हाथ से कमाएगा, उसे मालूम होगा कि खरच करना किसे कहते हैं। जो पसीना बहाकर कमाता है, वह पसीने से खरच करना भी जानता है। खरच करते समय उसको कसक आती है, दर्द आता है, लेकिन जिसे हराम का पैसा मिला है, बाप- दादों का पैसा मिला है, वह जुआ खेलेगा, शराब पीएगा और बुरे से बुरा कर्म करेगा। कौन करेगा पाप? किसको पड़ेगा पाप? बाप को? क्यों पड़ेगा? मैं इसे कमीना कहूँगा, जिसने कमा- कमाकर किसी को दिया नहीं। बेटे को दूँगा, सब जमा करके रख गया है दुष्ट कही का। वह सब बच्चों का सत्यानाश करेगा। मित्रो! हराम की कमाई एक और बेईमानी की कमाई दो, दोनों में कोई खास फर्क नहीं है, थोड़ा सा ही फर्क है। ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति हराम की और बेईमानी की कमाई नहीं खाते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 72)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 युग निर्माण योजना के प्रचार-कार्य का माध्यम गीता को ही रखा गया है। साधारण मनुष्यों द्वारा दी हुई शिक्षा में वह भावना एवं प्रेरणा कम ही होती है, जो भगवान की अमृत वाणी में विद्यमान है। अखण्ड-ज्योति में यह कार्यक्रम विस्तारपूर्वक छप चुका है। परिवार के सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को ऐसे प्रचारक— ऐसे कथा-वाचक के रूप में सुशिक्षित किया जा रहा है जो पेट पालने के लिए अन्ट-सन्ट किस्से दुहरा देने मात्र की लकीर न पीटते रहें, वरन् गीता के एक-एक श्लोक को सुनने वालों के अन्तःकरण में प्रविष्ट करके उन्हें मानवता का और कर्तव्य परायणता का महत्व समझने वाला बना सकें, उनके मन को देश, धर्म, समाज और संस्कृति के अधःपतन पर आंसू बहाने के लिए विवश कर सकें और साथ ही उनकी भुजाओं को कुछ कर गुजरने के लिए फड़का सकें। ऐसी ही कथा कहना और सुनना सार्थक हो सकता है। शुकदेवजी ने सात दिन परीक्षित को कथा सुनाई थी, वह कथा जीवन की धारा को ही पलट डालने वाली थी। तभी तो आज मरणासन्न समाज को ऐसी ही अमर-कथा सुनने और सुनाने की आवश्यकता है।

🔵 कार्यक्रम और रूपरेखा—ऐसी गीता कथा का एक विशेष ढांचा खड़ा किया गया है। भागवत सप्ताहों की तरह ठीक उसी श्रद्धा और सुसज्जा के साथ गीता की कथा जगह-जगह एक सप्ताह तक हो और अन्तिम दिन सामूहिक गायत्री यज्ञ रखा जाय। कन्या भोजन, यज्ञोपवीत आदि षोडश संस्कार, शोभा यात्रा (जुलूस), भजन, कीर्तन, प्रवचन आदि के कार्यक्रम रहें। यह उसकी मोटी रूपरेखा है।

🔴 गीता का छन्द-बद्ध पद्यानुवाद कर दिया गया है। जहां कथा होगी, वहां सुनने वाले दो भागों में विभक्त होकर बैठा करेंगे। प्रातः सायं डेढ़-डेढ़ घण्टा गीता पारायण हुआ करेगा। यह पारायण इस ढंग से होगा कि एक श्लोक का पद्यानुवाद मधुर स्वर में सम्मिलित रूप से, हो सके तो बाजे के साथ भी, पहले भाग के लोग कहेंगे। दूसरा श्लोक इसी प्रकार दूसरे भाग वाले कहेंगे। तीसरा श्लोक पहली पार्टी, चौथा दूसरी पार्टी। इस प्रकार पारायण क्रम एक घण्टा चलता रहेगा। भजन कीर्तन का आनन्द भी रहेगा और हर श्लोक का भावार्थ प्रत्येक सुनने वाला भली प्रकार समझ भी लेगा। इस आयोजन में भाग लेने वाले श्रोता मात्र ही न रहेंगे, वरन् गीता पारायण का श्रेय भी उन्हें मिलेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 23)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴  हमारा अनुभव यह रहा है कि जितनी उत्सुकता साधकों को सिद्ध पुरुष खोजने की होती है, उससे असंख्य गुनी उत्कंठा सिद्ध पुरुषों की सुपात्र साधकों के तलाश करने के निमित्त होती है। साधक सत्पात्र चाहिए। जिसने अपना चिंतन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत कर लिया हो, वही सच्चा साधक है। उसे मार्गदर्शक खोजने नहीं पड़ते, वरन् वे दौड़कर स्वयं उनके पास आते और उँगली पकड़कर आगे चलने का रास्ता बताते हैं। जहाँ वे लड़खड़ाते हैं वहाँ गोदी में उठाकर कंधे पर बिठाकर पार लगाते हैं। हमारे सम्बन्ध में यही हुआ है। घर बैठे पधारकर अधिक सामर्थ्यवान बनाने के लिए २४ वर्ष का गायत्री पुरश्चरण उन्होंने कराया एवं उसकी पूर्णाहुति में सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न कराया है। धर्मतंत्र से लोक शिक्षण के लिए एक लाख अपरिचित व्यक्तियों को परिचित ही नहीं, घनिष्ठ बनाकर कंधे से कंधा, कदम से कदम मिलाकर चलने योग्य बना दिया।

🔵 अपने प्रथम दर्शन में ही चौबीस महापुरश्चरण पूरे होने एवं चार बार एक-एक वर्ष के लिए हिमालय बुलाने की बात गुरुदेव ने कही।

🔴 हमें हिमालय पर बार-बार बुलाए जाने के कारण थे। एक यह जानना कि सुनसान प्रकृति के सान्निध्य में, प्राणियों के अभाव में आत्मा को एकाकीपन कहीं अखरता तो नहीं? दूसरे यह कि इस क्षेत्र में रहने वाले हिंसक पशुओं के साथ मित्रता बना सकने लायक आत्मीयता विकसित हुई या नहीं, तीसरे वह समूचा क्षेत्र देवात्मा है। उसमें ऋषियों ने मानवी काया में रहते हुए देवत्व उभारा और देव मानव के रूप में ऐसी भूमिकाएँ निभाई, जो साधन और सहयोग के अभाव में साधारण जनों के लिए कर सकना सम्भव नहीं थीं। उनसे हमारा प्रत्यक्षीकरण कराया जाना था।

🔵 उनका मूक निर्देश था कि अगले दिनों उपलब्ध आत्मबल का उपयोग हमें ऐसे ही प्रयोजन के लिए एक साथ करना है, जो ऋषियों ने समय-समय पर तात्कालिक समस्याओं के समाधान के निमित्त अपने प्रबल पुरुषार्थ से सम्पन्न किया है। यह समय ऐसा है जिसमें अगणित अभावों की एक साथ पूर्ति करनी है। साथ ही एक साथ चढ़ दौड़ी अनेकानेक विपत्तियों से जूझना है, यह दोनों ही कार्य इसी उत्तराखण्ड कुरुक्षेत्र में पिछले दिनों सम्पन्न हुए हैं। पुरातन देवताओं-ऋषियों में से कुछ आँशिक रूप से सफल हुए हैं, कुछ असफल भी रहे हैं। इस बार एकाकी वे सब प्रयत्न करने और समय की माँग को पूरा करना है।

🔴 इसके लिए जो मोर्चे बंदी करनी है, उसकी झलक-झाँकी समय रहते कर ली जाए, ताकि कंधों पर आने वाले उत्तरदायित्वों की पूर्व जानकारी रहे और पूर्वज किस प्रकार दाँव-पेंच अपना कर विजयश्री को वरण करते हैं, इस अनुभव से कुछ न कुछ सफलता मिले। यह तीनों ही प्रयोजन समझने, अपनाने और परीक्षा में उत्तीर्ण होने के निमित्त ही हमारी भावी हिमालय यात्राएँ होनी हैं, ऐसा उनका निर्देश था। आगे उन्होंने बताया-‘‘हम लोगों की तरह तुम्हें भी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से अति महत्त्वपूर्ण कार्य करने होंगे। इसका पूर्वाभ्यास करने के लिए यह सीखना होगा कि स्थूल शरीर से हिमालय के किस भाग में, कितने समय तक, किस प्रकार ठहरा जा सकता है और निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न रहा जा सकता है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 23)

 🌞  हिमालय में प्रवेश

लदी हुई बकरी

🔵 छोटा- सा जानवर बकरी इस पर्वतीय प्रदेश की तरणतारिणी कामधेनु कही जा सकती है। वह दूध देती है, ऊन देती है, बच्चे देती है, साथ ही वजन भी ढोती है। आज बड़े- बड़े बालों वाली बकरियों का एक झुण्ड रास्ते में मिला, लगभग सौ- सवा सौ होगी, सभी लदी हुई थीं। गुड़- चावल आटा लादकर वे गंगोत्री की ओर ले जा रही थीं। हर एक पर उसके कद और बल के अनुसार दस- पन्द्रह सेर वजन लदा हुआ था। माल असबाव की ढुलाई के लिए खच्चरो के अतिरिक्त इधर बकरियाँ ही साधन हैं। पहाडों की छोटी- छोटी पगडंडियों पर दूसरे जानवर या वाहन काम तो नहीं कर सकते। 

🔴 सोचता हूँ कि जीवन की समस्याएँ हल करने के लिए बड़े- बड़े विशाल साधनों पर जोर देने की कोई इतनी बड़ी आवश्यकता नहीं है, जितनी समझी जाती है, जब कि व्यक्ति साधारण उपकरणों से अपने निर्वाह के साधन जुटाकर शान्तिपूर्वक रह सकता हैं। सीमित औद्योगीकरण की बात दूसरी है, पर यदि वे बढ़ते ही रहे तो बकरियों तथा उनके पालने वाले जैसे लाखों की रोजी- रोटी छीनकर चन्द उद्योगपतियों की कोठियों में जमा हो सकती है। संसार में जो युद्ध की घटाएँ आज उमड़ रही हैं उसके मूल में भी इस उद्योग व्यवस्था के लिए मारकेट जुटाने, उपनिवेश बनाने की लालसा ही काम कर रही है। बकरियों की पंक्ति देखकर मेरे मन में यह भाव उत्पन्न हो रहा है कि व्यक्ति यदि छोटी सीमा में रहकर जीवन विकास की व्यवस्था जुटाए तो इसी प्रकार शान्तिपूर्वक रह सकता है, जिस प्रकार यह बकरियों वाले भले और भोले पहाड़ी  रहते हैं।

🔵 प्राचीनकाल में धन और सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना ही भारतीय समाज का आदर्श था। ऋषि- मुनि एक बहुत छोटी इकाई के रूप में आश्रमों और कुटियों में जीवन- यापन करते थे। ग्राम उससे कुछ बड़ी इकाई थे, सभी अपनी आवश्यकताएँ अपने क्षेत्र में, अपने समाज से पूरी करते थे और हिल- मिलकर सुखी जीवन बिताते थे, न इसमें भ्रष्टाचार की गुंजायश थी न बदमाशी की। आज उद्योगीकरण की घुड़दौड़ में छोटे गाँव उजड़ रहे है? बड़े शहर बस रहे हैं? गरीब पिस रहे हैं, अमीर पनप रहे हैं। विकराल राक्षस की तरह धड़धडाती हुई मशीन मनुष्य के स्वास्थ्य को, स्नेह सम्बन्धों को, सदाचार को भी पीसे डाल रही हैं। इस यन्त्रवाद, उद्योगवाद, पूँजीवाद की नींव पर जो कुछ खड़ा किया जा रहा है, उसका नाम विकास रखा गया है, पर यह अन्तत: विनाशकारी ही सिद्ध होगा।  

🔴 विचार असम्बद्ध होते जा रहे हैं, छोटी बात मस्तिष्क में बड़ा रूप धारण कर रही है, इसलिए इन पंक्तियों को यही समाप्त करना उचित है, फिर भी बकरियाँ भुलाये नहीं भूलतीं। वे हमारे प्राचीन भारतीय समाज रचना की एक स्मृति को ताजा करती हैं इस सभ्यता के युग में उन बेचारियों की उपयोगिता कौन मानेगा? पिछडे युग की निशानी कहकर उनका उपहास ही होगा, पर सत्य- सत्य ही रहेगा मानव जाति जब कभी शान्ति और संतोष के लक्ष्य पर पहुँचेगी, तब धन और सत्ता का विकेन्द्रीकरण अवश्य हो रहा होगा और लोग इसी तरह श्रम ओर सन्तोष से परिपूर्ण जीवन बिता रहे होंगे। जैसे बकरी वाले अपनी मैं- मैं करती हुई बकरियों के साथ जीवन बिताते है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 7) 14 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम 

🔴 गङ्गा, यमुना, सरस्वती के मिलन से तीर्थराज त्रिवेणी संगम बनता है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश देवाधिदेव हैं। इसी प्रकार सरस्वती, लक्ष्मी, काली, शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। मृत्यु लोक, पाताल और स्वर्ग ये तीन लोक हैं। गायत्री के तीन चरण हैं, जिन्हें वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता के नाम से जाना जाता है। जीवन सत्ता के भी तीन पक्ष हैं, जिन्हें चिन्तन, चरित्र और व्यवहार कहते हैं। इन्हीं को ईश्वर, जीव, प्रकृति कहा गया है। तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करना हो तो इन्हें आत्मा, शरीर और संसार कह सकते हैं। यह त्रिवर्ग ही हमें सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। उद्भव, अभिवर्द्धन और विलयन के रूप में प्रकृति की अनेकानेक हलचलें इसी आधार पर चलती रहती हैं।           

🔵 जीवन तीन भागों में बँटा हुआ है- (१) आत्मा, (२) शरीर और (३) पदार्थ सम्पर्क। शरीर को स्वस्थ और सुन्दर बनाने का प्रयत्न किया जाता है। आत्मा को परिष्कृत और सुसंस्कृत बनाया जाता है तथा संसार में से वैभव और विलास के सुविधा-साधन सँजोये जाते हैं। परिवार समेत समूचा सम्पर्क क्षेत्र भी इसी परिधि में आता है। जीवन साधना का समग्र रूप वह है जिसमें इन तीनों का स्तर ऐसा बना रहे, जिससे प्रगति और शान्ति की सुव्यवस्था बनी रहे।  

🔴 इन तीनों में प्रधान चेतना है, जिसे आत्मा भी कह सकते हैं। दृष्टिकोण इसी के स्तर पर विनिर्मित होता है। इच्छाओं, भावनाओं मान्यताओं का रुझान किस ओर हो, दिशाधारा और रीति-नीति क्या अपनाई जाय, इसका निर्णय अन्त:करण ही करता है। उसी के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव बनते हैं। किस दिशा में चला जाय? क्या किया जाय? इसके निमित्त संकल्प उठना और प्रयत्न बन पड़ना भी आत्मिक क्षेत्र का निर्धारण है। इसीलिये आत्मबल को जीवन की सर्वोपरि सम्पदा एवं सफलता माना गया है। इसी के आधार पर संयमजन्य स्वास्थ्य में प्रगति होती है। 

🔵 मन में ओजस्, तेजस् और वर्चस्कारी प्रतिभा चमकती है। बहुमुखी सम्पदायें इसी पर निर्भर हैं। इसलिये जीवन साधना का अर्थ आत्मिक प्रगति होता है। वह गिरती-उठती है, तो समूचा जीवन गिरने-उठने लगता है। इसलिये जीवन साधना को आत्मोत्कर्ष प्रधान मानना चाहिये। उसी के आधार पर शरीर व्यवस्था, साधन संचय और जन सम्पर्क का ढाँचा खड़ा करना चाहिये। ऐसा करने पर तीनों ही क्षेत्र सुव्यवस्थित बनते रहते हैं और जीवन को समग्र प्रगति, सफलता या सार्थकता के लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकता है।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 23) 14 Jan

🌹 अशौच में प्रतिबंध

🔴 जन्म-मरण के सूतकों के विषय में भी इसी दृष्टिकोण से विचार किया जाना चाहिए। पूजापरक कृत्यों में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखने का नियम है। इसी से उन दिनों नियमित पूजा-उपचार में प्रतिमा, उपकरण आदि का स्पर्श न करने की प्रथा चली होगी। उस प्रचलन का निर्वाह न करने पर भी मौन-मानसिक जप, ध्यान आदि व्यक्तिगत उपासना का नित्यकर्म करने में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं पड़ता।

🔵 महिलाओं के रजोदर्शन काल में भी कई प्रकार के प्रतिबन्ध हैं, वे अछूत की तरह रहती हैं। भोजन आदि नहीं पकाती। उपासनागृह में भी नहीं जातीं। इसका कारण मात्र अशुद्धि ही नहीं, यह भी है कि उन दिनों उन पर कठोर श्रम का दबाव न पड़े। अधिक विश्राम मिल सके। नस-नाड़ियों में कोमलता बढ़ जाने से उन दिनों अधिक कड़ी मेहनत न करने की व्यवस्था स्वास्थ्य के नियमों को ध्यान में रखते हुए बनी होगी। इन प्रचलनों को जहां माना जाता है वहां कारण को समझते हुए भी प्रतिबन्ध किस सीमा तक रहें इस पर विचार करना चाहिये। 

🔴 रुग्ण व्यक्ति प्रायः स्नान आदि के सामान्य नियमों का निर्वाह नहीं कर पाते और ज्वर, दस्त, खांसी आदि के कारण उनकी शारीरिक स्थिति में अपेक्षाकृत अधिक मलीनता रहती है। रोगी परिचर्या के नियमों से अवगत व्यक्ति जानते हैं कि रोगी की सेवा करने वालों या सम्पर्क में आने वालों को सतर्कता, स्वेच्छा के नियमों का अधिक ध्यान रखना पड़ता है। रोगी को भी दौड़-धूप से बचने और विश्राम करने की सुविधा दी जाती है। उसे कोई चाहे तो छूतछात भी कह सकते हैं। ऐसी ही स्थिति रजोदर्शन के दिनों में समझी जानी चाहिए और उसकी सावधानी बरतनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 6

 आत्मशोधन

🔴 मित्रो! हमारी हर चीज संशोधित और परिष्कृत होनी चाहिए, स्नान की हुई होनी चाहिए। न्यास में हम प्रत्येक इंद्रिय के परिशोधन की प्रक्रिया की ओर आपको इशारा करते और कहते हैं कि इन सब इंद्रियों को आप सही कीजिए, इंद्रियों को ठोक कीजिए। न्यास में हम आपको आँख से पानी लगाने के लिए कहते हैं मुँह से, वाणी से पानी लगाने के लिए कहते हैं पहले आप इनको धोइए। मंत्र का जप करने से पहले जीभ को धोकर लाइए। तो महाराज जी! जीभ का संशोधन पानी से होता है? नहीं बेटे, पानी से नहीं होता। पानी से इशारा करते हैं जिह्वा के संशोधन का, इंद्रियों के संशोधन का। जिह्वा का स्नान कहीं पानी पीकर हो सकता है? नहीं, असल में हमारा इशारा जिह्वा के प्राण की ओर है, जिसका शोधन करने के लिए अपने आहार और विहार दोनों का संशोधन करना पड़ेगा।

🔵 मित्रो! हमारी वाणी दो हिस्सों में बाँटी गई है- एक को 'रसना' कहते हैं, जो खाने के काम आती हैं और दूसरी को 'वाणी' का भाग कहते हैं, जो बोलने के काम आती है। खाने के काम से मतलब यह है कि हमारा आहार शुद्ध और पवित्र होना चाहिए ईमानदारी का कमाया हुआ होना चाहिए। गुरुजी! मैं तो अपने हाथ का बनाया हुआ खाता हूँ। नहीं बेटे, अपने हाथ से बनाता है कि पराये हाथ वह खाता है, यह इतना जरूरी नहीं है। ठीक है सफाई का ध्यान होना चाहिए, गंदे आदमी के हाथ का बनाया हुआ नहीं खाना चाहिए, ताकि गंदगी आपके शरीर में न जाए, लेकिन असल में जहाँ तक आहार का संबंध है, जिह्वा के संशोधन का संबंध है, उसका उद्देश्य यह है कि हमारी कमाई अनीति की नहीं होनी चाहिए, अभक्ष्य की नहीं होनी चाहिए।

🔴  आपने अनीति की कमाई नहीं खाई है, अभक्ष्य की कमाई नहीं खाई है, दूसरों को पीड़ा देकर आपने संग्रह नहीं किया है। दूसरों को कष्ट देकर, विश्वासघात करके आपने कोई धन का संग्रह नहीं किया है तो आपने चाहे अशोका होटल में बैठकर प्लेट में सफाई से खा लिया हो, चाहे पत्ते पर खा लिया हो, इससे कुछ बनता- बिगड़ता नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य  

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 17) 14 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये
🔵 दुनिया के घर घर में पी जाने वाली लिप्टन चाय के निर्माता की प्रगति की कहानी उन्हीं शब्दों में इस प्रकार है ‘‘मैंने अपना जीवन एक स्टेशनरी की दुकान में काम करने वाले एक नौकर के रूप में आरम्भ किया। उस समय मुझे पांच शिलिंग प्रतिदिन मिलते थे। परिवार का खर्च इससे मुश्किल से चलता था पर मैंने निश्चय कर रखा था जैसे भी होगा थोड़ी बचत अवश्य करेंगे। मेरा लक्ष्य स्वतन्त्र व्यवसाय करने का था। चाय का व्यवसाय मैंने बचत की न्यूनतम राशि से आरम्भ किया। ईमानदारी और श्रम शीलता का पल्ला मैंने कभी नहीं छोड़ा। फिजूलखर्ची से मुझे सख्त घृणा थी। जो काम दो डालर में हो सकता था। उसके लिए कभी भी दो डालर नहीं खर्च किये। यही मेरी सफलता की कहानी है।

🔴 हिन्दुस्तान में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है जो अपने आरम्भिक जीवन में अत्यन्त निर्धन और अभाव ग्रस्त रहे पर आगे चलकर परिश्रम, पुरुषार्थ व लगन के बल पर समृद्ध बने। शापुर जी बारोचा का नाम इनमें उल्लेखनीय हैं। बारोचा जब छः वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया। पिता की मृत्यु के चार दिन बाद ही बड़े भाई का भी देहान्त हो गया मां ने अपने पहले, पति का समान आदि बेचकर किसी तरह बच्चों का पालन पोषण किया। शापुराजी पढ़ने के साथ-साथ खाली समय में मेहनत मजदूरी करते मां के ऊपर आये आर्थिक दबाव को कम करने का प्रयास करते थे।

🔵 मैट्रिक पास करके उन्होंने रेलवे में नौकरी की, बाद में बैंक में नौकरी मिल गयी। थोड़े समय बाद वे नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र व्यवसाय के क्षेत्र में उतर गये। अपनी सूझ बूझ ईमानदारी एवं परिश्रम शीलता के कारण वे निरन्तर उन्नति करते गये। सम्पत्ति तो एकत्रित की पर लोकोपयोगी कार्यों में बिना किसी नाम अथवा यश के उद्देश्य से खर्च किया। उनके एक मित्र तथा प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी पं. गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि बरोचा जी मात्र एक सफल व्यवसायी ही नहीं थे वरन् एक उदार व्यक्ति भी थे। उन्होंने लगभग साठ लाख रुपया जनहित कार्यों में खर्च किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 71)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 गीता के माध्यम से जन-जागृति बौद्धिक क्रान्ति की—जो रूपरेखा युग-निर्माण योजना के अन्तर्गत तैयार की गई है, उसका आधार असाधारण महत्व से परिपूर्ण है। यह प्रक्रिया चल पड़ने से नव-निर्माण कार्य के लिए उपयुक्त जन-मानस तैयार हो सकता है। रूपरेखा नीचे देखिए और फिर उसे सफल बनाने के लिए सच्चे मन से प्रयत्न कीजिए।

🔵 मोह और अज्ञान में डूबे हुए अर्जुन को कठोर कर्तव्य में प्रवृत्त करने के लिए भगवान कृष्ण ने उसे गीता सुनाई और उसे सुनकर निराशा में डूबे हुए भ्रमग्रस्त धनञ्जय ने अपना विचार बदल दिया। कठोर कर्तव्य सभी को भयंकर लगता है, उसे अपनाने का साहस सहसा बन नहीं पड़ता, मनुष्य का स्वभाव किसी तरह काम चलाने और दिन पूरे करने का होता है, झंझट से बचे रहने को ही उसका जी करता है। उसी को वह ‘शान्ति’ मान बैठता है। पर प्रेरक विचारों का जादू तो देखिए—गीता के अमृत छिड़कने से अर्जुन का नया आत्म-बोध हुआ और उसने अपनी कुण्ठा, भीरुता और उदासी को छोड़ कर कठोर कर्तव्य को अपनाया।

🔴 आज हमारा समाज ठीक मोहग्रस्त अर्जुन की स्थिति में है। दीनता और दासता ने उसे गई-गुजरी स्थिति में पहुंचा दिया है। छुटकारा राजनैतिक गुलामी-भर से हुआ है। मानसिक दृष्टि से हम अभी भी गुलाम हैं। पश्चिम में से आई अनार्य संस्कृति के व्यामोह से हमारा कण-कण मूर्छित हुआ पड़ा है। अपना सब कुछ हमें तुच्छ दीखता है और बिरानी पत्तल का भात मोहन-भोग जैसा मधुर सूझ रहा है। सामाजिक, नैतिक, मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक, भावनात्मक सभी क्षेत्रों में कुण्ठाएं हमें घेरे खड़ी हैं। प्रगति की स्वर्णिम किरणों का विश्व के नागरिक आनन्द ले रहे हैं, पर हम अभी भी अवसाद की मूर्छा में पड़े इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। इस अवांछनीय स्थिति से हमें उबरना ही होगा, अन्यथा इस घुड़दौड़ की प्रगति में बहुत पिछड़ जाने पर हम कहीं के भी न रहेंगे।

🔵 समय की पुकार है कि हम जगें, उठें और आगे बढ़ें। इसके लिए जिस प्रेरणा और चेतना की आवश्यकता है, वह हमें गीता द्वारा ही उपलब्ध होगी। भगवान की वही सन्देश वाणी सुनकर हम मोहमुक्त होंगे और गाण्डीव टंकारते हुए, पांचजन्य बजाते हुए कठोर कर्तव्य के धर्म-क्षेत्र (कुरुक्षेत्र) में अपने पुरुषार्थ का परिचय दे सकने में सफल होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 22)

🌞 समर्थगुरु की प्राप्ति-एक अनुपम सुयोग

🔴 दयानंद ने गुरु विरजानन्द की इच्छानुसार अपने जीवन का उत्सर्ग किया था। विवेकानन्द अपनी सभी इच्छाएँ समाप्त करके गुरु को संतोष देने वाले कष्टसाध्य कार्य में प्रवृत्त हुए थे। इसी में सच्ची गुरु भक्ति और गुरु दक्षिणा है। हनुमान ने राम को अपना समर्पण करके प्रत्यक्षतः तो सब कुछ खोया ही था, पर परोक्षतः वे संत तुल्य ही बन गए थे और वह कार्य करने लगे थे, जो राम के ही बलबूते के थे। समुद्र छलाँगना, पर्वत उखाड़ना, लंका जलाना बेचारे हनुमान नहीं कर सकते थे। वे तो अपने सुग्रीव को बालि के अत्याचार तक से छुड़ाने में समर्थ नहीं हो सके थे। समर्पण ही था जिसने एकात्मता उत्पन्न कर दी। गंदे नाले में थोड़ा गंगा जल गिर पड़े, तो वह गंदगी बन जाएगा, यदि बहती हुई गंगा में थोड़ी गंदगी जा मिले, तो फिर उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। जो बचेगा मात्र गंगाजल ही होगा। जो स्वयं समर्थ नहीं हैं, वे सभी समर्थों के प्रति समर्पित होकर उन्हीं के समतुल्य बन गए हैं। ईंधन जब आग से लिपट जाता है, तो फिर उसकी हेय स्थिति नहीं रहती, वरन् अग्नि के समान प्रखरता आ जाती है, वह तद्रूप हो जाता है।

🔵 श्रद्धा का केन्द्र भगवान् है और प्राप्त भी उसी को करना पड़ता है, पर उस अदृश्य के साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिए किसी दृश्य प्रतीक का सहारा लेना आवश्यक होता है। इस कार्य को देव प्रतिमाओं के सहारे भी सम्पन्न किया जा सकता है और देहधारी गुरु यदि इस स्तर का है, तो उस आवश्यकता की पूर्ति करा सकता है।

🔴  हमारे यह मनोरथ अनायास ही पूरे हो गए। अनायास इसलिए कि उसके लिए पिछले जन्मों से पात्रता उत्पन्न करने की पृथक साधना आरम्भ कर दी गई है थी। कुण्डलिनी जागरण ईश्वर दर्शन स्वर्ग मुक्ति तो बहुत पीछे की वस्तु है। सबसे प्रथम दैवी अनुदानों को पा सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अन्यथा जो वजन न उठ सके, जो भोजन न पच सके वह उल्टे और भी बड़ी विपत्ति खड़ी करता है।

🔵 प्रथम मिलन के दिन समर्पण सम्पन्न हुआ और उसके सच्चे-झूठे होने की परीक्षा भी तत्काल ही चल पड़ी। दो बातें विशेष रूप से कही गई- ‘‘संसारी लोग क्या करते हैं और क्या कहते हैं, उसकी ओर से मुँह मोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर एकाकी साहस के बलबूते चलते रहना। दूसरा यह है कि अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने के लिए तपश्चर्या में जुट जाना। चौबीस वर्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण के साथ जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह करने का अनुशासन रखा। सामर्थ्य विकसित होते ही वह सब कुछ मिलेगा जो अध्यात्म मार्ग के साधकों को मिलता है, किंतु मिलेगा विशुद्ध परमार्थ के लिए। तुच्छ स्वार्थों की सिद्धि में उन दैवी अनुदानों को प्रयुक्त न किया जा सके।’’  वसंत पर्व का यह दिन, गुरु अनुशासन की अवधारणा ही हमारे लिए नया जन्म बन गया। याचकों की कमी नहीं, पर सत्पात्रों पर सब कुछ लुटा देने वाले सहृदयों की भी कमी नहीं। कृष्ण ने सुदामा पर सब कुछ लुटा दिया था। सद्गुरु की प्राप्ति हमारे जीवन का अनन्य एवं परम सौभाग्य रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 22)

🌞  हिमालय में प्रवेश

रोते पहाड़

🔵 आज रास्ते में ''रोते पहाड़'' मिले उनके पत्थर नरम थे, ऊपर किसी सोते का पानी रुका पड़ा था। पानी को निकलने के लिए जगह न मिली। नरम पत्थर उसे चूसने लगे, वह चूसा हुआ पानी जाता कहाँ? नीचे की ओर वह पहाड़ को गीला किये हुए था। जहाँ जगह थी वहाँ वह गीलापन धीरे- धीरे इकट्ठा होकर बूँदों के रूप में टपक रहा था। इन टपकती बूँदों को लोग अपनी भावना के अनुसार आँसू की बूंदें कहते हैं। जहाँ- तहाँ से मिट्टी उड़कर इस गीलेपन से चिपक जाती है, उसमें हरियाली के जीवाणु भी आ जाते हैं। इस चिपकी हुई मिट्टी पर एक हरीं मुलायम काई जैसी उग आती है। काई को पहाड़ में ''कीचड़'' कहते है। जब वह  रोता है तो आखें दुखती हैं। रोते हुए पहाड़ आज हम लोगों ने देखे, उनके आँसू भी कहीं से पोंछे। कीचड़ों को टटोल कर देखा। वह इतना ही कर सकते थे। पहाड़ तू क्यों रोता है? इसे कौन पूछता और क्यों वह इसका उत्तर देता? पर कल्पना तो अपनी जिद की पक्की है ही,मन पर्वत से बातें करने लगा। पर्वत राज! तुम इतनी वनश्री से लदे हो भाग- दौड की कोई चिन्ता भी तुम्हें नहीं है, बैठे- बैठे आनन्द के दिन गुजारते हो, तुम्हें किस बात की चिन्ता? तुम्हें रुलाई क्यों आती है? 

🔴 पत्थर का पहाड़ चुप खड़ा था; पर कल्पना का पर्वत अपनी मनोव्यथा कहने ही लगा। बोला मेरे दिल का दर्द तुम्हें क्या मालूम? मैं बड़ा ही ऊँचा हूँ वनश्री से लदा हूँ निश्चिन्त बैठा रहता हूँ। देखने को मेरे पास सब  कुछ है, पर निष्क्रिय- निश्चेष्ट जीवन भी क्या कोई जीवन है। जिसमे गति नही, संघर्ष नहीं, आशा नहीं, स्कूर्ति नहीं, प्रयल नहीं वह जीवित होते हुए भी मृतक के समान है। सक्रियता में ही आनन्द है। मौज के  छानने और आराम करने में तो केवल काहिल की मुर्दनी की नीरवता मात्र है। इसे अनजान ही आराम और आनन्द कह सकते हैं। इस दृष्टि से क्रीड़ापन में जो जितना खेल लेता है,वह अपने को उतना ही तरो- ताजा और प्रफुल्लित अनुभव करता है।

🔵 सृष्टि के सभी पुत्र प्रगति के पथ पर उल्लास भरे सैनिकों की तरह कदम पर कदमब ढ़ाते,मोर्चे पर मोर्चा पार करते चले जाते हैं। दूसरी ओर मैं हूँ जो सम्पदाएँ अपने पेट में छिपाए मौज की छान रहा हूँ। कल्पना बेटी तुम मुझे सेठ कह सकती हो, अमीर कह सकती हो भाग्यवान कह सकती हो पर हूँ तो मैं निष्क्रिय ही। संसार की सेवा में अपने पुरुषार्थ का परिचय देकर लोग अपना  नाम इतिहास में अमर कर रहे हैं कीर्तिवान् बन रहे हैं। अपने प्रयत्न का फल दूसरे को उठाते देखकर गर्व अनुभव कर रहे हैं; पर मैं हूँ जो अपना वैभव अपने तक ही समेटे बैठा हूँ। इस आत्मग्लानि से यदि रुलाई मुझे आती है, आँखो में आँसू बरसते और कीचड़ निकलते हैं तो उसमें अनुचित ही क्या है?  

🔴 मेरी नन्ही- सी कल्पना ने पर्वतराज से बातें कर ली समाधान भी पा लिया पर वह भी खिन्न ही थी। बहुत देर तक यही सोचती रही,कैसा अच्छा होता यदि इतना बड़ा पर्वत अपने टुकड़े- टुकड़े करके अनेकों भवनों, सड़कों, पुलों के बनाने में खप सका होता। तब भले वह इतना बड़ा न रहता, सम्भव है इस प्रयल से उसका अस्तिव भी समाप्त हो जाता लेकिन तब वह वस्तुत: धन्य हुआ होता वस्तुत: उसका बड़प्पन सार्थक हुआ होता। इन परिस्थितियों से वंचित रहने पर यदि पर्वतराज अपने को अभागा मानता है और अपने दुर्भाग्य को धिक्कारता हुआ सिर धुनकर रोता है; तो उसका यह रोना सकारण ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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