बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 27) 18 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 अनुष्ठान के दिनों में पांच तप-संयम साधने पड़ते हैं— [1] उपवास [2] ब्रह्मचर्य [3] अपनी सेवा अपने हाथ से [4] भूमिशयन [5] चमड़े का प्रयोग त्याग। अनुष्ठान के दिनों चमड़े के जूते आदि का प्रयोग न किया जाय। प्लास्टिक, रबड़, कपड़ा आदि की बनी वस्तुएं आजकल चमड़े के बजाय हर स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। वही किया जाय। भूमि शयन सर्वोत्तम है। सीलन, कीड़े आदि का भय हो तो तख्त पर सोया जा सकता है। हजामत, कपड़े धोना जैसी दैनिक जीवन की शारीरिक आवश्यकताएं नौकरों से न करायें, स्वयं करें। भोजन अपने हाथ से बना सकना सम्भव न हो तो स्त्री, माता, बहिन आदि उन्हीं अति निकटवर्ती स्वजनों के हाथ का बनाया स्वीकार करें, जिनके साथ आत्मीयता का आदान-प्रदान चलता है।

🔵 बाजार से पका हुआ तो नहीं ही खरीदें। ब्रह्मचर्य अनुष्ठान के दिनों में आवश्यक है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी पाला जाना चाहिए। कामुक कुदृष्टि पर नियन्त्रण रखा जाय। सम्पर्क में आने वाली नारियों को माता, बहिन या पुत्रीवत् पवित्र भाव से देखा जाय। यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में नारियों पर लागू होती है। पांचवीं तपश्चर्या भोजन की है। यह उपवास काल है। उपवास कई स्तर के होते हैं— [1] छाछ, दूध आदि पेय पदार्थों पर रहना [2] शाक, फल के सहारे काम चलाना [3] नमक, शकर का त्याग अर्थात् अस्वाद [4] एक समय आहार [5] दो खाद्य पदार्थों पर अनुष्ठान की अवधि काटना।

🔴 अनुष्ठान के यही मोटे नियम हैं। इसके अतिरिक्त जो तरह-तरह की बातें कही जाती हैं और परस्पर विरोधी नियम बताये जाते हैं उन पर ध्यान न दिया जाय।

🔵 अनुष्ठान में कोई भूल हो जाने पर, त्रुटि रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका न करनी चाहिए फिर भी उन दिनों कोई विघ्न उत्पन्न न होने पाये इसके लिए संरक्षण और ज्ञात-अज्ञात में रही हुई त्रुटियों का परिमार्जन करने के लिए अनुष्ठान साधना के लिए कोई समर्थ संरक्षक नियुक्त कर लेना चाहिए। यह सेवा शांतिकुंज हरिद्वार से भी ली जाती है। अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति का परिचय तथा समय लिख भेजने से संरक्षण, परिमार्जन सर्वथा निस्वार्थ भाव से होता रहता है। यह व्यवस्था करने पर साधना की सफलता और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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