बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 75)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 शाखाओं में, साप्ताहिक सत्संगों में गीता-कथा हुआ करे तो कितना अच्छा रहे। प्रतिदिन सायंकाल गीता के दो श्लोकों की व्याख्या का क्रम कहीं चलने लगे तो एक वर्ष में वह धर्मानुष्ठान विधिवत् पूरा हो सकता है। कुल 700 श्लोक हैं, दो श्लोक से 350 दिन में पूरे हो सकते हैं। बाहर के किसी को न सही अपने घर के लोगों को ही उसे नित्य सुनाया जाया करे तो परिवार-निर्माण की समस्या सुलझाने में महत्वपूर्ण योग मिल सकता है। इस प्रकार प्रचार कार्य के लिए बाहर न जा सकने वाले लोगों के लिए भी यह प्रशिक्षण बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।

🔵 गीता समारोहों की श्रृंखला— कुछ समय पूर्व जिस प्रकार गायत्री-यज्ञ होते थे, अब उसी उत्साह से यह ‘गीता कथा सप्ताहों’ के आयोजन जगह-जगह होने चाहिए। शाखाओं को उसकी तैयारी में अभी से लग जाना चाहिए।

🔴 इन गीता सप्ताहों के धर्मानुष्ठानों में बहुत स्वल्प व्यय होगा। अनुमानित व्यय इस प्रकार है—गीता प्रवचन कर्त्ता को 7 दिन का पारिश्रमिक 40 रु. उसका मार्ग व्यय 10 रु. अन्तिम दिन सामूहिक गायत्री यज्ञ का अनुमानित व्यय 30 रु. कन्या भोज 30 रु. प्रचार, मण्डप, रोशनी आदि विविध खर्च 40 रु. इसका कुछ व्यय 150 रु. बैठता है। इसमें किफायत की जाय तो 100 रु. भी हो सकता है और थोड़ा अधिक फैल-फूट कर किया जाय तो यह 200 रु. तक पहुंच सकता है। इतने महत्वपूर्ण आयोजन के लिए इतनी रकम कोई अधिक नहीं है और ऐसी भी नहीं है, जो छोटे गांवों में भी इकट्ठी न की जा सके। शाखाओं के वार्षिकोत्सव इसी रूप में होते रह सकते हैं। इसके लिए कोई तिथियां हर साल के लिये निश्चित भी रह सकती हैं ताकि उन दिनों अवकाश निकालने की बात सदस्यों के मन में पहले से ही बनी रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...