बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 10

दृष्टि बदले, अपने आपे को संशोधित करें

🔴 बेटे, इन आँखों से देखने की जिस चीज की जरूरत हैं, वह माइक्रोस्कोप तेरे पास होना चाहिए। क्या देखना चाहता है? गुरुजी! सब कुछ देखना चाहता हूँ। बेटे, इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। इसको देखने के लिए माइक्रोस्कोप के बढ़िया वाले लेंस चाहिए। कौन से बढ़िया वाले लेंस 'दिव्यं ददामि ते चक्षुः' तुझे अपनी आँखों में दिव्यचक्षु को फिट करना पड़ेगा। फिर देख कि तुझे भगवान दिखाई पड़ता है कि नहीं पड़ता। 'सीय राममय सब जग जानी' की अनुभूति होती है कि नहीं। फिर जर्रे- जर्रे में भगवान, पत्ते- पत्ते में भगवान तुझे दिखाई पड़ सकता है, अगर तेरी आँखों के लेंस सही कर दिए जाएँ तब। अगर लेंस यही रहें तो बेटे, फिर तुझे पाप के अलावा, शैतान के अलावा, हर जगह चालाकी, बेईमानी, हर जगह धूर्तता और दुष्टता के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ सकता।

🔵 मित्रो! अध्यात्म पर चलने के लिए आत्मसंशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। पूजा- उपासना के सारे कर्मकाण्ड, सारे के सारे क्रियाकृत्य आत्मसंशोधन की प्रक्रिया की ओर इशारा करते है। मैंने आपको जो समझाना था, यह सूत्र बता दिया। हमारा अध्यात्म यहीं से शुरू होता है। इसलिए यह जप नहीं हो सकता, भजन नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। केवल यहीं से अर्थात आत्मसंशोधन से हमारा अध्यात्म शुरू होता है। आत्मसंशोघन के बाद ही देवपूजन होता है। देवता बनकर ही देवता की पूजा की जाती है।

🌹 आज की बात समाप्त ।।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ।। ॐ शांति: ।।
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