रविवार, 15 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 9) 16 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 शरीर पोषण के लिये तीन अनिवार्य साधनों की आवश्यकता होती है-१ आहार, (२) जल और (३) वायु। ठीक इसी प्रकार आत्मिक प्रगति की आवश्यकता पूरी करने के लिये तीन माध्यम अपनाने होते हैं- १ उपासना, (२) साधना और (३) आराधना। इन शब्दों का और भी अधिक स्पष्टीकरण इस प्रकार समझना चाहिये।         

🔵 उपासना का अर्थ है- निकट बैठना। किसके? ईश्वर के। ईश्वर निराकार है। इसकी प्रतिमा या छवि तो ध्यान-धारणा की सुविधा के लिये विनिर्मित की जाती है। मानवी अन्त:करण के साथ उसकी घनिष्ठता उत्कृष्ट चिन्तन के आदर्शवादी भाव संवेदना के रूप में ही होती है। यही भक्ति का, ईश्वर सान्निध्य का, ईश्वर दर्शन का वास्तविक रूप है। यदि साकार रूप में उसका चिन्तन करना हो तो किसी कल्पित प्रतिमा में इन्हीं दिव्य संवेदनाओं के होने की मान्यता और उसके साथ अविच्छिन्न जुड़े होने के रूप में भी किया जा सकता है। ऐसे महामानव जिन्होंने आदर्शों का परिपालन और लोकमंगल के लिये समर्पित होने के रूप में अपने जीवन का उत्सर्ग किया, उन्हें भी प्रतीक माना जा सकता है? राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी आदि को भगवान् का अंशावतार कहा जा सकता है। उन्हें इष्ट मानकर उनके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस निमित्त किया गया पूजा प्रयास उपासना कहा जा जायेगा।  

🔴 दूसरा चरण है-साधना जिसका पूरा नाम है जीवन साधना। इसे चरित्र निर्माण भी कहा जा सकता हैं। चिन्तन में भाव-संवेदनाओं का समावेश तो उपासना क्षेत्र में चला जाता है, पर शरीरचर्या की धारा-विधा जीवन साधना में आती है। इसमें आहार-विहार रहन-सहन संयम, कर्तव्यों का परिपालन, सद्गुणों का अभिवर्द्धन दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन आदि आते हैं। संयमशील, अनुशासित और सुव्यवस्थित क्रिया-कलाप अपनाना जीवन साधना कहा जायेगा। जिस प्रकार जंगली पशु को सरकस का प्रशिक्षित कलाकार बनाया जाता है। जिस प्रकार किसान ऊबड़-खाबड़ जमीन को समतल करके उर्वर बनाता है, जिस प्रकार माली सुनियोजित ढंग से अपना उद्यान लगाता है और सुरम्य बनाता है।

🔵 उसी प्रकार जीवन का वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने लगना जीवन साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है। यह बन पड़ने पर ही आत्मा में परमात्मा का अवतरण सम्भव होता है। धुले हुए कपड़े की ही रँगाई ठीक तरह होती है। चरित्रवान व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में भगवद् भक्त बनते हैं। दैवी वरदान ऐसे ही लोगों पर बरसते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, तुष्टि, तृप्ति, शान्ति जैसी दिव्य विभूतियों से मात्र चरित्रवान ही सम्पन्न होते हैं उनमें सद्भावना, शालीनता, सुसंस्कारिता के सभी लक्षण उभरे हुए दीखते हैं। सामान्य स्थिति में रहते हुए भी ऐसे ही लोग महामानव, देवमानव बनते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Part 2)

🔵 Just begin to spend all you have of these two things to receive back 100 times of the same, number ONE. Number TWO, your mind is one ...