रविवार, 15 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 24)

🌞  हिमालय में प्रवेश

लदी हुई बकरी

🔵 आज भोजवासा चट्टी पर आ पहुंचे। कल प्रातः गोमुख के लिए रवाना होना है। यहां यातायात नहीं है उत्तरकाशी और गंगोत्री के रास्ते में यात्री मिलते हैं, चट्टियों पर ठहरने वालों की भीड़ भी मिलती है पर यहां वैसा कुछ नहीं। आज कुल मिलाकर हम छह यात्री हैं। भोजन अपना अपना सभी साथ लाये हैं, यों कहने को तो भौजवासा की चट्टी है, यहां धर्मशाला भी है पर नीचे की चट्टियों जैसी सुविधा यहां कहां है?

🔴 सामने वाले पर्वत पर दृष्टि डाली तो ऐसा लगा मानों हिमगिरि स्वयं अपने हाथों भगवान् शंकर के ऊपर जल का अभिषेक करता हुआ पूजा कर रहा हो। दृश्य बड़ा ही अलौकिक था। बहुत ऊपर से एक पतली सी जलधारा नीचे गिर रही थी। नीचे प्रकृति के निर्मित बड़े शिवलिंग थे, धारा उन्हीं पर गिर रही थी। गिरते समय वह धारा छींटे छींटे हो जाती थीं। सूर्य की किरण उन छींटों पर पड़कर उन्हें सात रंगों के इन्द्रधनुष जैसे बना देती थी। लगता था साक्षात् शिव विराजमान है उनके शीश पर आकाश से गंगा गिर रही है और देवता सप्त रंग के पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं। दृश्य इतना मोहक था कि देखते- देखते मन नहीं अघाता था। उस अलौकिक दृश्य को तब तक वैसा देखता ही रहा जब तक अन्धेरे ने पटाक्षेप नहीं कर दिया।

🔵 सौंदर्य आत्मा की एक प्यास है पर वह कृत्रिमता की कीचड़ में उपलब्ध होना कहां सम्भव है? इन वन पर्वतों के चित्र बनाकर लोग अपने घरों में टांगते हैं और उसी से सन्तोष कर लेते हैं पर प्रकृति की गोदी में जो सौंदर्य का निर्झर बह रहा है उसकी ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता। यों इस सारे ही रास्ते में सौंदर्य बिखरा पड़ा था, हिमालय को सौंदर्य का सागर कहते हैं, उसमें स्नान करने से आत्मा में अन्त-प्रदेश में एक सिहरन सी उठती है। जी करता है इस अनन्य सौंदर्य राशि में अपने आप को खो क्यों न दिया जाय?

🔴 आज का दृश्य यों प्रकृति का एक चमत्कार ही था, पर अपनी भावना उसमें एक दिव्य झांकी का आनन्द ही लेती रही, मानो साक्षात् शिव के ही दर्शन हुए हों। इस आनन्द की अनुभूति में आज अन्तःकरण गदगद हुआ जा रहा है। काश, इस रसास्वादन को एक अंश में लिख सकना मेरे लिए सम्भव हुआ होता तो जो यहां नहीं हैं वे भी कितना सुख पाते और अपने भाग्य को सराहते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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