शुक्रवार, 8 जून 2018

👉 बन्दा सिंह बहादुर का बलिदान

🔶 बन्दा सिंह बहादुर का जन्म 27, 1670 को ग्राम तच्छल किला, पु॰छ में श्री रामदेव के घर में हुआ। उनका बचपन का नाम लक्ष्मणदास था। युवावस्था में शिकार खेलते समय उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। इससे उसके पेट से एक शिशु निकला और तड़पकर वहीं मर गया। यह देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। अनेक साधुओं से योग साधना सीखी और फिर नान्देड़ में कुटिया बनाकर रहने लगे।

🔷 माधोदास ने श्री गुरु गोविन्द सिंह जी पर अपना जादू किया पर श्री गुरु गोविन्दसिंह जी पर इसका कोई असर न हुआ तब माधोदास ने  श्री गुरु गोविन्दसिंह जी की महिमा को जान लिया और नतमस्तक हो गया और विनती की कि मैं आपका बंदा बन चुका हूँ। आपकी प्रत्येक आज्ञा मेरे लिए अनुकरणीय है। फिर उसने कहा – मैं भटक गया था। अब मैं जान गया हूँ, मुझे जीवन चरित्रा से सन्त और कर्त्तव्य से सिपाही होना चाहिए। आपने मेरा मार्गदर्शन करके मुझे कृत्तार्थ किया है जिससे मैं अपना भविष्य उज्ज्वल करता हुआ अपनी प्रतिभा का परिचय दे पाउँगा।

🔶 श्री गुरु गोविन्द सिंह जी, माधे दास के जीवन में क्रान्ति देखकर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे गुरूदीक्षा देकर अमृतपान कराया। जिससे माधेदास केशधरी सिंह बन गया। पाँच प्यारों ने माधेदास का नाम परिवर्तित करके गुरूबख्श सिंह रख दिया। परन्तु वह अपने आप को गुरू गोबिन्द सिंह जी का बन्दा ही कहलाता रहा। इसी लिए इतिहास में वह बंदा बहादुर के नाम से प्रसिध  हुआ।

🔷 श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने  उसे पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर पंजाब के लिए रवाना के दिया रस्ते में उसने अपने दल का विस्तार करना सुरु कर दिया था और गुरु जी के साथ हुए अत्याचारों का बदलना लेने की लिए उत्सुक था दिहली के समीप सही खजाना लूटा और सेना को मजबूत किया ।

🔶 फिर बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये।  उन्होंने  श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर सरहिन्द के नवाब वजीरखान का वध किया। जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।

🔷 बाँदा बहादुर गुरु जी के छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब से बदला लेने के लिए उतावला था जेसा की गुरु जी के चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। बंदा सिंह बहादुर के पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और विश्वासघात से 17 दिसम्बर 1715 को उन्हें पकड़ लिया। उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्दकर, हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। इनमें बन्दा के वे 740 साथी भी थे, जो प्रारम्भ से ही उनके साथ थे। युद्ध में वीरगति पाए सिखों के सिर काटकर उन्हें भाले की नोक पर टाँगकर दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा सिंह बहादुर का माँस नोचा जाता रहा।

🔶 काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने को कहा; पर सबने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। दिल्ली में आज जहाँ हार्डिंग लाइब्रेरी है,वहाँ 7 मार्च 1716 से प्रतिदिन सौ वीरों की हत्या की जाने लगी। एक दरबारी मुहम्मद अमीन ने पूछा – तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है। बन्दा ने सीना फुलाकर सगर्व उत्तर दिया – मैं तो प्रजा के पीड़ितों को दण्ड देने के लिए परमपिता परमेश्वर के हाथ का शस्त्र था। क्या तुमने सुना नहीं कि जब संसार में दुष्टों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह मेरे जैसे किसी सेवक को धरती पर भेजता है।

🔷 बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते हैं ? बन्दा ने उत्तर दिया, मैं अब मौत से नहीं डरता ; क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है। यह सुनकर सब ओर सन्नाटा छा गया। भयभीत करने के लिए उनके पाँच वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में लेटाकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया।

🔶 इसके बाद 9 जून 1716 को बंदा सिंह बहादुर की महान कुर्बानी का भी समय आ गया। उनको पिंजरे में से निकालकर जमीन पर बैठाया गया तथा सिख धर्म को त्यागने या फिर मौत दोनों में से एक चुनने को कहा गया। बंदा सिंह ने धर्म त्यागना पर्वान ना किया और जंजीरों में बंधे उस सिंघ सुरमे के एक हाथ को खोला गया। बंदा सिंह बहादुर के चार साल के मासूम पुत्र को बंदा सिंह की गोद में बैठाया गया और बंदा सिंह के हाथ में छूरा पकड़ाकर उसको चार साल के अपने पुत्र को कत्ल करने को कहा गया।

🔷 बंदा सिंह ने कुछ भी ना किया और शांत बैठा रहा। फिर जालिमों ने छुरा पकड़कर उस चार साल के बेजुबान बच्चे की छाती में घुसा दिया। बंदा सिंह बहादुर अभी भी अड़ोल था। फिर तड़पते बच्चे की छाती को फाड़कर उसका धड़कता हुआ दिल बाहर निकाला गया और बच्चे के शरीर के टुकड़े कर दिये गये। इसके बाद बंदा सिंह के पुत्र का दिल बंदा सिंह के मुंह में डाल दिया गया ताकि बंदा सिंह घबरा जाए। परंतु जो सच्चे मन से एक बार सिर गुरू के आगे झुका दे, जिसे गुरबाणी का सच्चा रस प्राप्त हो जाए, जिसे प्रभु के भाणे की समझ आ जाए वह अड़ोलता की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। बंदा सिंह का सारा मुंह, चेहरा अपने पुत्र के खून से भर गया।

🔶 इसके बाद बंदा सिंह की दांयी आंख को गर्म चाकु के साथ निकाला गया तथा फिर बांयी आंख को भी निकाला गया। फिर बंदा सिंह के बांये पैर को काट दिया गया तथा उसके बाद दोनों हाथ काटकर शरीर से अलग कर दिये गये। कटे हुए हाथ-पैरों तथा आंखों से बंदा सिंह का खून चारों ओर बह रहा था लेकिन गुरू का सिख अभी भी शांत था और प्रभु को याद कर रहा था। फिर बंदा सिंह के शरीर के मांस को लोहे की लाल गर्म चिमटियों के साथ धिरे-धिरे उतारा गया। इसके पश्चात बंदा सिंह के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। वे सभी सिंघ सिखी के लिए कुर्बान हो गये लेकिन गुरू के सिंघों में से किसी ने भी अपना धर्म त्यागना कबूल न किया। बंदा सिंह बहादुर के जीवन से हमें गुरू पर भरोसा रखने की शिक्षा मिलती है। बंदा सिंह बहादुर ने गुरू के आगे अपना सिर इस प्रकार झुकाया था कि सिर एक बार झुकाने के बाद सिर कट जरूर गया लेकिन अपने गुरू को दाग ना लगने दिया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 June 2018


👉 आत्मचिंतन

🔶 मित्रो ! मन, लोभ, मोह के विचारों, वासना-तृष्णा के धमाचौकड़ी से खाली रहे तो मनुष्य प्रतिभावान, तेजस्वी एवं अग्रगामी महामानवों में गिना जा सकने योग्य तानाबाना बुन सकता है। ऐसे व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में भी, साधनों और सहयोगियों का अभाव होते हुए भी अपने व्यक्तिगत चुम्बकत्त्व द्वारा जो आवश्यक है उसे निखिल ब्रह्माण्ड में से अपने लिए खींच बुलाते हैं। ऐसे तेजस्वी व्यक्ति अपने बलबूते आगे बढ़ते हैं और बाँस की तरह झुरमुट बनाते हुए असाधारण ऊँचाई तक जा पहुँचते हैं। यह उनकी आन्तरिक जीवट का प्रतिफल है। इसी को कुण्डलिनी कहते हैं। इसके जाग्रत होने पर मनुष्य निर्भय और निश्चयी बन जाता और कठिनाई, समस्याओं और आक्रमणों के विरुद्ध इस प्रकार लोहा लेता है मानो उसे खेल के मैदान में कला-कौशल भर दिखाना है।

🔷 उत्तम साधक वही है जो दरिद्रता के साथ रहने को कहा जाय तो दरिद्रता के साथ रहे, किसी भी अभाव की वेदना उसे न हो और उसकी दैवी स्थिति के पूर्ण आन्तरिक आनन्द की क्रीड़ा में उससे कुछ भी बाधा न पड़े और वही फिर, वैभव के साथ रहने को कहा जाय तो वैभव के साथ रहे और अपने धन की आसक्ति या वासना में एक क्षण के लिये भी पतित न हो, या उन चीजों से भी आसक्त न हो जिनका वह उपयोग करता है, या उस भोग की दासता में न हो या धन की अधिकारिता द्वारा निर्मित अभ्यासों से दुर्बल की तरह आसक्त न हो।

🔶 एक लगनशील व्यक्ति अपने अनेक साथी-सहचर पैदा कर सकता है। जुआरी, शराबी, व्यभिचारी जब अपने कई साथी पैदा कर सकते हैं तो प्रबुद्ध व्यक्ति वैसा क्यों नहीं कर सकते? डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह जब एक बड़े क्षेत्र को आतंकित कर सकते हैं तो सही लोगों का संगठन क्या कुछ नहीं कर सकते? लगन की आग बड़ी प्रबल है। यह जिधर भी लगती है दावानल का रूप धारण करती है। युग निर्माता महापुरुष अकेले ही चले हैं, लोगों ने उनका विरोध-प्रतिरोध भी खूब किया फिर भी वे अपनी लगन के आधार पर अद्भुत सफलता प्राप्त कर सके-यही मार्ग हर लगनशील के लिए खुला पड़ा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 THE SUBTLE DETERMINATORS OF HUMAN PERSONALITY

🔶 The dominant influences in the formation of human personality are generally believed to be environment and enterprise. But this belief holds true only to a certain extent. It is a matter of common observation that children born and brought up in similar circumstances develop major mental and emotional differences later. This is primarily on account of the basic life-elements, which go to make the person of an offspring.

🔷 These subtle influences come down over many previous generations from both paternal and maternal sides. They combine to maintain the continuity of hereditary characteristics and also mutate in a strange way to spawn entirely new traits and identities, thereby taking evolution forward.

🔶 Scientists have been able to uncover the fundamental basis of life of not only human beings but of all the life forms belonging to animal and plant worlds. Since the second half of the 20th century, a great amount of research has been made in this direction and almost daily new findings are published. This rapid and profuse work is propelled by advances in electron microscopy and cybernetics in which information from different fields are collated and integrated into a composite whole.

🔷 All living organisms from the simplest amoeba to the most complex human body have been formed by the same life-chemical, the DNA or deoxyribonucleic acid. The DNA contains in chemically coded form - the blueprint of life, i.e., all the information needed to build, control and maintain a living organism. The DNA has extremely tiny spring-like structures, which can be seen through an electron microscope. The defined stretch of DNA is called genes. The genes have memory banks and they continually feed the body cells with instructions about the formation and functioning of body organs. This way co-ordination among the billions of body cells is achieved.

🔶 DNA is found in every living organism except in human RBC and certain types of viruses. An adult human body has 600 billion “energy packets” of DNA. In shape and chemical composition, all of these are similar whether in humans or animals or even in grass blades. The key to all of life’s diversity is hidden in DNA. The particular order of its constituent bases determines whether an organism is a human or a bird, fish, insect or vegetable. An Indian-American scientist Dr. Hargovind Khurana made path-breaking discoveries about the structure of RNA (ribonucleic acid) and was awarded the Nobel Prize in 1968.

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 3)

🔶 इस पाप-पुण्य की सूक्ष्म बात को छोड़ कर यदि साधारण सामाजिकता की स्थूल बात भी ले ली जाय तब भी मृतक भोज खाने की प्रथा उचित नहीं। अब आज के अर्थाभाव एवं महार्घता के समय में किसी के मरने पर मृतक भोज में इतना धन खर्च कर सकना कौन बुद्धिमानी की बात है। जहां कठिनता से नमक रोटी जुड़ती हो, वहां साधारण स्थिति का कोई व्यक्ति इतने रुपये किस प्रकार बचा कर रख सकता है कि शोक-संयोग आने पर वह घर से तत्काल निकाल कर मृतक-भोज आदि में खर्च कर सके।

🔷 निश्चय ही उसे इस प्रथा पिशाचिनी की भेंट-पूजा के लिये कर्ज लेना होता है और एक बार एक सामान्य आदमी के लम्बी रकम कर्ज लेने का अर्थ है अपने को आजीवन मूल तो दूर ब्याज के हाथ बेच देना। बच्चों के पालन पोषण और परिवार के संचालन के लिए आवश्यक कमाई का अधिकांश नियमित रूप से महाजन के हवाले करते रहना। अथवा अपनी जमीन-जायदाद, गहने, बर्तन बेचने के लिए मजबूर होना। मृतक-भोज की प्रथा ग्रस्त लोगों पर यह आर्थिक आपत्ति आये दिन ही रहती है, जिसको सभी प्रथा पालक देखते-सुनते ही रहते हैं।

🔶 खेद का विषय है कि किसी एक विषय में खुद तो लोग कुछ जानते नहीं, केवल आंख मीचे हुये लकीर पीटे चले आ रहे हैं और यदि कोई विचारशील व्यक्ति उनकी हित चिन्ता से कुछ बता कर सुधार करने का परामर्श देता है तो सुधार करना तो दूर उसकी बात भी ध्यान से नहीं सुनना चाहते। इसे समाज का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?जिन समाजों के सदस्य इस प्रकार के प्रतिगामी समाजों के सुधार के लिये उसके जागरूक तथा सम्पन्न व्यक्तियों को आगे निकल कर सामाजिक मूढ़ता के विरुद्ध सुधार का अभियान छेड़ ही देना चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84

👉 आत्मबल

🔶 महापुरुष की तपस्या, स्वार्थ-त्यागी का कष्ट सहन, साहसी का आत्म-विसर्जन, योगी का योगबल ज्ञानी का ज्ञान संचार और सन्तों की शुद्धि-साधुता आध्यात्मिक बल का निर्झर है। मूल प्रकृति शुद्धात्मा के अधीन है वही आद्य-प्रकृति असम्भव को भी सम्भव कर दिखाती है। मूक को वाचालता तथा पंगु को पर्वत चढ़ने की शक्ति देती है। समस्त जगत इसी शक्ति से निर्मित हुआ है।

🔷 हमारे पास बाहुबल नहीं है। समग्र सामग्री नहीं है शिक्षा नहीं है, न राज शक्ति ही है। तब किसके बूते पर हम उस कार्य साधन को उद्यत हुए हैं जो प्रबल और शिक्षित यूरोपीय जाति के लिए भी असाध्य जान पड़ता है। लेकिन यह तो सब को स्वीकार करना पड़ेगा कि केवल बाहुबल से किसी महान कार्य का होना असम्भव है। अतः बाहुबल से आत्मबल ही कार्य सिद्धि में अधिक क्षमता रखता है।

🔶 आत्मबल ही बाहुबल को तुच्छ प्रमाणित कर मनुष्य जाति को सिखाता चला रहा है कि यह जगत भगवान का राज्य है। अन्य स्थूल प्रकृति का खाली क्षेत्र नहीं। जिसका आत्मबल विकसित हो चुका है उसके जय की सामग्री आप ही आप सामने उपस्थित हो जाती है। सारी विश्व बाधाएं और विपत्तियाँ स्वयं टूटकर अनुकूल अवस्था को लाती हैं। कार्य का सामर्थ्य स्वयं प्रकट होकर तेजस्वी और वेग गतिवान होता है।

✍🏻 योगी अरविन्द घोष
📖 अखण्ड-ज्योति नवम्बर 1956 पृष्ठ 6

👉 गुरुगीता (भाग 127)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना

🔶 इस गुरू रहस्य कथा के अन्य आयाम प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव कहते हैं-

अनेन प्राणिनः सर्वे गुरूगीता जपेन तु। सर्वसिद्धिं प्रान्पुवन्ति भुक्तिं मुक्तिं न संशयः॥ १६६॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्म्यं सांख्यं मयोदितम्। गुरूगीतासमं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने॥ १६७॥
एको देव एकधर्म एकनिष्ठा परं तपः। गुरोः परतरं नान्यत् नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥ १६८॥
माता धन्या पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा। धन्या च वसुधा देवि गुरूभक्तिः सुदुर्लभा॥ १६९॥
शरीरमिन्द्रियं प्राणश्चार्थस्वजनबांधवाः। माता पिता कुलं देवि! गुरूरेव न संशयः॥ १७०॥

🔷 गुरूगीता के जप अनुष्ठान से सारे प्राणी सभी सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, भोग एवं मोक्ष पाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १६६॥ भगवान् सदाशिव पूरी दृढ़ता से माता पार्वती से कहते हैं- हे वरानने ! यह मेरे द्वारा प्रकाशित धर्मयुक्त ज्ञान है। यह सत्य ,सत्य और पूर्ण सत्य है कि गुरूगीता के समान अन्य कुछ भी नहीं है॥ १६७॥ एक ही देव है, एक ही धर्म है, एक ही निष्ठा और यही परम तप है कि गुरू से परे कोई भी तत्त्व नहीं है, गुरू से श्रेष्ठ कोई तत्त्व नहीं है, गुरू से अधिक कोई तत्त्व नहीं है॥ १६८॥ हे देवि! गुरूभक्त गुरुभक्त को धारण करने वाले माता- पिता, कुल एवम् वंश धन्य होते है, क्योंकि गुरुभक्त्ति अति दुर्लभ है। हे देवि! शरीर- इन्द्रिय, प्राण, धन, माता सभी सदगुण की चेतना का ही तो विस्तार है, इसमें कोई संशय नहीं है।

🔶 भगवान् सदाशिव के ये वचन अकाटय है। कोई भी व्यक्ति इन्हें अपने जीवन में परख सकता है। बस ,बात गुरुगीता की साधना करनें की है। युँ तो साधनाएँ बहुत है, हर एक का अपना महत्त्व है। सभी के अपने- अपने विधान एवं अपने सुफल है, लेकिन लेकिन इन सब की सीमाएँ भी है। प्रत्येक साधना अपना अभीष्ट पुरा करके चुक जाती है। परन्तु गुरुगीता का विस्तार व्यापक है, इससे काम्य अभीष्ट तो पुर्ण होते है, साथ ही वृत्तियाँ भी निर्मल होती है। अंत में सदगुरु एवम् परमात्मा दोनों की प्राप्ति होती है। यह बात इतनी खरी है कि जब कोई जहाँ चाहे इसे आजमा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 192

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 3)

🔶 यह हलका-फुलका धर्म कृत्य मानव-जीवन की एक साधारण-सी आवश्यकता है। जिस प्रकार मुण्डन अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, जनेऊ वानप्रस्थ आदि अन्य संस्कार होते हैं, वैसा ही विवाह भी एक साधारण-सा धर्मानुष्ठान है। उसमें संस्कार का कुछ बड़ा आयोजन रह सकता है, हर्ष उल्लास का छोटा-मोटा आयोजन भी रह सकता है, पर वह इतना खर्चीला और उलझन भरा कदापि न होना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से दोनों पक्षों का कचूमर ही निकल जाय। बारातियों की सर्वथा अनावश्यक भीड़ को इधर से उधर ठेले फिरने, उनके ठहराने, अनेक तरह की सुविधाएं जुटाने एवं कीमती प्रीति-भोजों का खर्चीला भार उठाने में किसका क्या लाभ होता है यह समझ में नहीं आता?

🔷 बाराती यह समझते हैं कि हमने अपना वक्त बर्बाद कर के और इतनी किल्लत उठाकर बेटे वाले पर अहसान किया। बेटे वाला बरात के लाने, ले जाने की कष्टसाध्य व्यवस्था जुटाता है। बेटी वाले का तो उनकी आव-भगत में कचूमर ही निकल जाता है। इस मूर्खतापूर्ण हंगामे का उस पवित्र धर्मानुष्ठान के साथ कोई तुक नहीं बैठता, फिर भी बरातों की दौड़ धूप चलती ही रहती है। अनावश्यक गाजे-बाजे, महंगी सवारियाँ, आतिशबाजी, फूल पट्टी आदि में ढेरों पैसा बर्बाद होता है। इस बर्बादी का भारत जैसे गरीब देश के गरीब लोगों पर आर्थिक दृष्टि से कितना बुरा असर पड़ता है इसे हर विचार-शील व्यक्ति आसानी से समझ सकता है।

🔶 इतने से ही काम चल जाता तब भी भुगता जाता। समस्या तो और भी भयानक तब सिद्ध होती है जब वरपक्ष की ओर से मोटी रकम दहेज के रूप में माँगी जाती है, उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाता है। नकदी, जेवर, सामान के रूप में यह माँग आमतौर से इतनी बड़ी होती है कि औसत आर्थिक स्थिति का कोई कन्या का पिता छाती पर पत्थर रखकर ही उसकी पूर्ति कर सकता है। जिन्हें दो-चार कन्याओं के लगातार विवाह करने पड़े हैं और जिनके पास कहीं से अनाप-शनाप आमदनी नहीं होती, वे जानते हैं कि दहेज किस पिशाच का नाम है और उस कोल्हू में पेले जाने पर लड़की के परिवार का तेल किस करुण क्रन्दन के साथ निकलता है। आज जो लड़के वाला बनकर दहेज माँगता है, कल उसे भी अपनी लड़की का विवाह करने पर उसी चक्की में पिसना पड़ता है। इस दुर्गति को जानते हुए भी न जाने क्यों हमारी आँखें नहीं खुलतीं और रोते कलपते उसी दुर्दशा के कुचक्र में पिलते- पिसते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.44

गुरुवार, 7 जून 2018

👉 परमार्थ के निमित्त

इक संत कहे मे इक अनकहे मे, वो सदा लाभ मे ही रहेगा जो संत कहे मे रहेगा

🔷 बहुत समय पहले की बात है वत्स एक गाँव मे दो परिवार रहते थे एक का मुखिया रामप्रकाश और दुसरे का मुखिया जेठामल था! एक बार गाँव मे बाहर से कोई संत आये और गाँव मे प्रवचन हुआ तो एक दिन संत श्री कह रहे थे की सच्चा और अच्छा जीवन त्याग और तपस्या मे है! आप जो भी कमाओ अथवा तो आपको जो भी मिले उस मेसे परमार्थ के लिये कुछ न कुछ भाग जरूर निकालना!

🔶 यदि आप साधना भी करते हो तो उस साधना मेंसे भी अपनी श्रध्दानुसार परमार्थ के लिये कुछ न कुछ जरूर निकालना ताकि आपके आगे का मार्ग बने और आप धर्म-पथ पे सहजता से चल सको!

🔷 बहूत समय बीत गया और एक दिन रामप्रकाश और जेठामल की एक कार दुर्घटना मे एक साथ मृत्यु हो गई संयोगवश दोनो का ही बीमा था तो दोनो के ही परिवारों को पाँच पाँच लाख रुपये मिले दोनो के ही घर मे चार चार सन्तानें थी तो जेठामल के परिवार ने सवा सवा लाख रुपया आपस मे बाट लिया और रामप्रकाश के परिवार ने उस पाँच लाख में से एक लाख परमार्थ के निमित्त निकाला और एक एक लाख आपस मे बाट लिये!

🔶 रामप्रकाश के पुत्र बड़े संस्कारी थे और उन्होंने परमार्थ का एक अलग ही डिब्बा बना लिया और रोज अपनी श्रद्धानुसार उसमें कुछ न कुछ डालते थे! फिर भाग्य ने ऐसी करवट बदली की एक समय वो आया की वो दाने दाने को मोहताज हो गये अर्थ न था पर वो सभी रोज साधना का कुछ भाग अपनी श्रद्धानुसार परमार्थ के लिये जरूर निकालते थे!

🔷 फिर भाग्य ने करवट बदली और एक दिन जेठामल और रामप्रकाश के घर मे सफाई का कार्य चल रहा था तो वहाँ उन्हे पाँच पाँच सोने की ईंटें मिली! और कुछ सालो बाद रामप्रकाश का परिवार एक बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया और उधर जेठामल का पुरा परिवार तबाही के सागर मे समा गया!

🔶 जब उन पाँच ईंटों का बँटवारा चल रहा था तो रामप्रकाश के परिवार वालों की बड़ी ईच्छा थी कई वर्ष हो गये परमार्थ के निमित्त कुछ निकला नही तो रामप्रकाश के परिवार ने एक ईंट परमार्थ के निमित्त निकाल दी और उधर जेठामल के परिवार वालों ने एक एक ईंट तो ले ली पर बची उस एक ईंट के चक्कर मे उनमें आपस मे विवाद हो गया और फिर चारों भाई आपस मे लड़ने लगे और विवाद इतना बड़ा की चारों कोर्ट कचहरियों के चक्कर मे उलझ गये और कई सालो तक वो आपस मे कोर्ट कचहरी मे लड़ते रहे और जो कुछ भी उनके पास था सब कुछ कोर्ट कचहरी के चक्कर मे चला गया!

🔷 यदि उन्होंने विवेक से काम लिया होता तो सबकुछ बर्बाद न होता! संत श्री ने तो दोनो को ही समझाया था की परमार्थ के निमित्त कुछ न कुछ निकालते रहना! पर एक संत के कहे मे रहा और दुसरा स्वार्थ के घेरे मे! आज यहाँ इंसान एक एक इंच जमीन के चक्कर मे अपनी अनमोल मानव देह को बर्बाद कर रहा है!

🔶 इसलिये नित्य प्रतिदिन अपनी श्रद्धानुसार चाहे धन चाहे तप चाहे जप अथवा तो कुछ भी परमार्थ के निमित्त कुछ न कुछ जरूर निकालते रहे ताकि तुम्हारा आगे का मार्ग प्रशस्त हो और ये बहुत जरूरी भी है क्योंकि इसी से भाग्य के पत्थर हटेंगे और आगे की राह खुलेगी!

🔷 परमार्थ के निमित्त निकाला हुआ कभी व्यर्थ नही जाता देर सवेर वो हमारे ही काम आता है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 June 2018


👉 विचारों को पवित्र रखो

🔷 “अपने विचारों को पवित्र रखो” धर्म का समस्त तत्व इसी एक वाक्य में छिपा हुआ है। अन्याय विधान तो धर्म की भूमिका और शब्दाडम्बर मात्र है। क्रोध, कटु भाषण, ईर्ष्या और लोभ से बचना यही तो धर्म प्राप्ति का मार्ग है। सदैव शुभ कर्म करने में प्रवृत्त रहो परोपकार को कार्यों में पूरी शक्ति और पूरा उत्साह लगाना यही तो कर्तव्य है। नेकी से बढ़कर न तो काई धर्म है और न बदी से बढ़कर कोई पाप। यह मत पूछो कि धर्म से क्या लाभ है? जिज्ञासुओं!

🔶 धर्म से उत्पन्न होने वाला सुख ही सच्चा सुख है। अन्य सुख तो विडम्बना मात्र हैं। यदि तुम एक क्षण भी व्यर्थ खोए बिना जीवन भर नेक काम करते रहो तो निश्चय ही एक दिन जन्म मरण की फंसी से छूट जाओगे। धर्म के पथ पर आरुढ़ होने में एक पल का भी विलम्ब मत लगाओ। आज से ही सेवा मार्ग को अपनालो, ऐसा न हो कि ‘कल करूंगा’ सोचते सोचते मृत्यु तुम्हारा गला दबाले और जनम जन्मान्तरों तक साथ रहने वाले धर्म रूपी अमर मित्र को प्राप्त करने से वंचित रह जाओ।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1955 पृष्ठ 1

👉 Maharshi Kanad

🔷 Maharshi Kanad, the founder of the Vaishashik School of Indian Philosophy was a renowned thinker and teacher of his times. He got the name ‘Kanad’ because of the ascetic practice of eating only the kanas (grains) of food. He used to collect the  small quantities of food grains left scattered in the fields after the farmers had reaped the ripe crop. This was the source of nourishment for him for the entire season. When the king of the land heard about this severe austerity of Maharshi’s life, he sent substantial gifts of wealth and food for the latter. Maharshi Kanad warmly welcomed the bearers of the gifts but politely refused to accept the royal gifts. He said-“I am very happy with my present mode of living.

🔶 I do not need anything more. You may kindly distribute all these gifts among the needy”. The king vainly tried twice again to arrange for some material help for this great seer-sage. Finally he himself went to the Maharshi with abundant material wealth and provisions and requested him to accept at least a part of the bounty. Kanad then explained to him with due respect- “I am an Acharya, the sole motive of whose life is the acquiring and sharing of knowledge. I need abundance of sadhana (devout endeavor towards spiritual enlightenment) rather than abundance of sadhans (materialistic resources) to fulfil my duties and achieve the goal of my life. So please do not bring any well or other materialistic bounties to me. Give a to those who really need it.”
  
🔷 The king returned, himself enriched with wisdom. He had now comprehended that true meaning of the word “Acharya” and understood that the glory of the title life lies in the sadhana and not in the accumulation of sadhans.

📖 From Pragya Puran 

👉 ईर्ष्या नहीं, स्पर्द्धा करो

🔷 दूसरों के दुःख से तो बहुत से लोग दुःखी होते हैं पर कुछ दुष्ट स्वभाव के ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों को सुखी देख कर भी दुःखी होते हैं। ऐसे लोगों को ईर्ष्यालु कहते हैं। स्वभाव का यह दुर्गुण विचारों को भी नष्ट करता है और शरीर को भी। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को सुखी, सम्पन्न या सफल मनोरथ देखकर मन ही मन जलते हैं और उनकी सम्पन्नता नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे मनुष्य व्यर्थ में शत्रुता मोल ले बैठते हैं और शरीर से रोग भी लगा लेते हैं। एक कहानी है कि एक बार कुछ लोग एक बहुत ही दुबले-पतले आदमी को पकड़ कर राजा भोज के पास लाये। राजा ने उससे उसकी इस दशा का कारण पूछा, तो उसने उत्तर दिया कि बाल्यावस्था में, मैं आपका सहपाठी था।

🔶 आपकी बुद्धिमत्ता और योग्यता आदि के कारण उस समय मैं आपसे ईर्ष्या करता था। आपके राजा होने के उपरान्त मेरी ईर्ष्या और भी बढ़ गई है, आपका वैभव, यश देखकर मेरे शरीर में आग लग जाती है। आपका दान, यश और वैभव आदि को देखकर मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। यही मेरी दुर्दशा का कारण है। तब राजा ने बढ़िया मकान, सेवा के लिए सेवक और धन देकर कहा कि तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करना और जिस चीज की आवश्यकता हो माँग लेना। कुछ दिनों के उपरान्त राजा ने उसे फिर से देखना चाहा तो उस समय भी उसकी दशा पहले जैसी थी। कारण पूछने पर उसने कहा, सब सुख सामग्री मेरे पास है केवल अधिकार नहीं है। राजा ने उसे एक उच्च पद पर नियुक्त करके उसकी यह कामना भी पूरी करदी। पर इससे भी उसकी संतुष्टि नहीं हुई। अन्त में जागीरें तक दी गईं पर वह ज्यों का त्यों रोगी और दुर्बल बना रहा। अन्त में उसने कहा कि मैं आपके सिंहासन पर बैठूँगा। राजा ने समझ लिया कि इस ईर्ष्या के कारण यह अवश्य मर जायेगा, और अन्त में हुआ भी यही वह ईर्ष्या के कारण कुढ़-कुढ़ कर मर गया!

🔷 ईर्ष्यालु मनुष्य सदा दूसरों की प्रतिष्ठा या वैभव आदि को नष्ट करने में लगा रहता है। वह दूसरों की बातचीत का गलत अर्थ निकाला करता है और दूसरे के कार्यों का अभिप्राय उसकी समझ में बुरा और दुष्ट होता है। वह दूसरों का अपकार करने का अवसर ढूंढ़ा करता है। ऐसा व्यक्ति कितना भयानक घातक और बुरा होता है बतलाने की आवश्यकता नहीं है। इससे सदा बचना चाहिये। हाँ, ईर्ष्या का एक सात्विक रूप भी होता है उसे स्पर्द्धा कहते हैं और जो बहुत ही श्रेष्ठ और लाभदायक होती है। अपने गुणों के साथ अपने से श्रेष्ठ किसी गुणी के गुणों का मिलान करने और अपने आपको उसके समान गुणी बनाने की इच्छा का नाम स्पर्द्धा है।

🔶 ईर्ष्या की भाँति इसमें दूसरों के गुणों या वैभव आदि के ह्रास का दुष्टभाव, मन पर नहीं पड़ता, बल्कि साधु उपायों से उनके समकक्ष बनने की सात्विक और प्रशंसनीय कामना होती है। इससे मनुष्य की आत्मा अविकारमय होकर उन्नत होती है। उसके गुणी ओर यशस्वी होने में उत्तेजना मिलती है। ऐसे मनुष्यों का लक्ष्य सदा महान पुरुषों पर ही रहता है और स्वयं उसके महान बनने में अधिक विलम्ब नहीं लगता। उसके उद्देश्य साफ और महत्वपूर्ण होते हैं और संसार में उसके यश, वैभव और प्रतिष्ठा का अच्छा विस्तार होता है।

📖 अखण्ड-ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 2)

🔷 इस मान्यता में कोई तथ्य नहीं कि घर में बहुत लोगों के भोजन करने से सूतक दूर होता और घर पवित्र होता है। कई बार इसी मान्यता के कारण बहुत से भाई किसी एक भाई के घर जाकर और खाकर पवित्र करते हैं। यदि ऐसा ही हो तो एक बड़े भोज का दण्ड देने के बजाय किसी ऐसी वस्तु की व्यवस्था की जा सकती है जिसमें किसी गरीब आदमी का बहुत कुछ खर्च न हो। ऐसी वस्तुओं से शक्कर या गुड़, शरबत जैसी वस्तुओं तक सीमित रहा जा सकता है।

🔶 पुण्य पर प्रभाव पड़ने के कारण ही अच्छे और सच्चे सन्त महात्मा किसी का दान लेने अथवा अन्न खाने से यथासम्भव बचा करते हैं दान लेना और दान रूप अन्न को खाना पचाना सबके वश की बात नहीं है। इन दोनों चीजों का प्रभाव मनुष्य की आत्मा पर अवश्य पड़ता है वह सुनिश्चित तथ्य एवं सत्य है। किन्तु इसका प्रभाव इतने परोक्ष एवं सूक्ष्म रूप से पड़ता है कि साधारण विवेक का व्यक्ति उसे देख जान नहीं पाता। उसका पता तब चल पाता है जब सारे संस्कार विकृत हो जाते हैं और मनुष्य अपने आचरण में एक बड़ा और विपरीत परिवर्तन पाता है। किन्तु तब तक प्रभाव इतना गहरा हो चुका होता है कि उसको मिटा सकना टेढ़ी खीर बन जाता है। यही कारण है कि बुद्धिमान लोग दान रूप अन्न को समझ बूझकर ही खाते हैं।

🔷 यह व्यवस्था तो उस अन्न की है जिसमें देने अथवा खिलाने वाले की आत्मिक श्रद्धा तथा प्रसन्नता रहा करती है। इसके विपरीत जिन अन्य भोजन अथवा अन्न दान में देने वाले की श्रद्धा भक्ति तो दूर उल्टे पीड़ा पूर्ण आहें जुड़ी रहती हैं उसके भयंकर प्रभाव का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता और निश्चय ही मृतक भोज का दण्ड भुगतने वाले की आत्मा के आंसू उसमें सम्मिलित रहते हैं। भले ही मजबूरन कोई प्रथा-पालन की विवशता में मृतक भोज दें और कितनी ही प्रसन्नता क्यों न दिखाये और खाने वालों को धन्यवाद देकर आभार प्रकट करे, पर वास्तविकता यही होती है कि यह सारा शिष्टाचार ऊपरी होता है भोज देने वाला मन ही मन रोया करता होगा। एक तो जिसका कोई स्वजन मर गया हो दूसरे उसे ऊपर से अपनी सामर्थ्य के बाहर मृतक भोज जैसे आर्थिक दण्ड को भुगतना पड़े और तब जब किसी की मृत्यु में उसका कोई अपराध नहीं, कोई हाथ नहीं, तो वह रोयेगा नहीं क्या हंसेगा, खुश होगा? वह न सही उसकी मूक आत्मा अवश्य ही इसके लिये समाज को कोसेगी। इसलिये, इस प्रकार मृत्यु-भोज का अन्न किसी भी खाने वाले के लिये हितकर नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83

👉 गुरुगीता (भाग 126)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना
🔷 गुरूगीता की मंत्र साधना सर्वसंकट हारिणी है। जिसने भी गुरूगीता का पाठ अनुष्ठान किया, उन सभी के अनुभव आश्चर्यकारी रहे हैं। गुरूगीता की मंत्र माला, गुरूतत्त्व का बोध, शिष्य प्रबोध एवं तत्त्व चर्चा के साथ अनेकों मांत्रिक रहस्य भी हैं। जो इन रहस्यों को जानकर उनका प्रयोग करना सीख जाता है, वह कभी भी दुस्तर संकट के जाल में नहीं उलझता, कु्रर ग्रहों की पीड़ाएँ उसे कभी नहीं सतातीं। दुःख और दुर्भाग्य उसे छू तक नहीं पाते। गुरू चेतना है ही सारे आश्चर्यों ,चमत्कारों व अलौकिक शक्तियों का घनीभूत पुञ्ज। बात बस केवल अनुभव की है। अब तक ये अनुभव अनेकों ने किए हैं और अनगिनत अभी कर सकते हैं। अनुभवी साधकों के मध्य यह बहुत ही सुप्रचलित वाक्य है कि जब गुरूगीता है, तब भला अन्य शास्त्रों व साधनाओं के विस्तार से क्या लाभ?

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इस साधना रहस्य के कई गूढ़ संकेत किए गए हैं। इसमें बताया गया है कि समुद्र में जिस तरह से जल, दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से घड़े में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है। गुरूगीता की साधना से जीवात्माएँ जिस एकता का अनुभव करती हैं, वह उन्हें दिन- रात आनन्द में विभोर रखती है और वह जीवन मुक्ति का आनन्द उठाता है। ऐसी महनीय विभूतियों की जो भाव- भक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, उसे भोग एवं मोक्ष मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 190

बुधवार, 6 जून 2018

👉 सोना पाने का अधिकारी

🔶 एक बार तीन व्यक्ति गरीबी से तंग आकर धन कमाने के लिये परदेश को रवाना हुए। बहुत दिनों तक वे इधर-उधर भटकते रहे, किन्तु कोई ऐसा उपाय न मिला जो धन कमाते। हताश होकर वे कुबेर देवता को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगे। उनकी उग्र तपस्या से कुबेर देवता प्रसन्न हुए, और उनकी पात्रता के अनुसार फल देने के लिए एक साधु का वेश बनाकर उन व्यक्तियों के पास पहुँचे।

🔷 साधु वेश धारी कुवेर ने उनसे पूछा कि तुम लोग क्यों तप कर रहे हो? उन्होंने कहा-धन के लिये। साधु ने कहा- अच्छा, बेटा, मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताता हूँ जिससे तुम लोग मनचाहा धन प्राप्त कर सकते हो। सामने जो झरना बह रहा है, वह वरुण देवता का बना हुआ है। इसमें यदि गंगोत्री से लाकर थोड़ा सा गंगा जल डाल दो तो इसका सारा पानी सोने का हो जायेगा। यदि तुम लोग गंगोत्री गंगा जल ले आओ तो आसानी से मन चाहा सोना पा सकते हो।

🔶 वे तीनों व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि गंगोत्री वहाँ से पास ही थी, शाम तक लौट कर वापिस आया जा सकता था। वे लोग अपने अपने घड़े लेकर गंगाजल लेने के लिए चल दिये। रास्ता न तो बहुत कठिन था और न दूर, कुछ ही घंटों में वे लोग वहाँ पहुँच गये और घड़े भर कर वापिस लौटने लगे।

🔷 उनमें से दो के मन में यह विचार उठने लगे कि मैं पहले पहुँच जाऊं और पहले अपना गंगा जल डाल दूँ, इस प्रकार उस सारे झरने पर मेरा ही अधिकार हो जायेगा। पहला और दूसरा दोनों ही गुप्त रूप से ऐसा सोच रहे थे, इसलिये उन्हें बहुत जल्दी थी- वे बहुत तेजी से चलने लगे। तीसरा व्यक्ति उदार हृदय था-उसके मन में किसी प्रकार की आशंका न थी, वह धीरे-धीरे चल रहा था।

🔶 रास्ते में कई मनुष्य ऐसे मिले जो प्यास के मारे चिल्ला रहे थे। आगे दौड़ने वाले उन दोनों ने प्यासे आदमियों को पुकार तो सुनी, किन्तु उस पर कोई ध्यान न दिया, जल्दी सोना पाने की धुन में उन्हें दूसरों का कुछ ख्याल न था। तीसरा साथी जो पीछे-पीछे आ रहा था। उसने एक प्यास के मारे चिल्लाते हुए वृद्ध मनुष्य को रास्ते में पड़ा पाया, उसने तुरन्त ही अपने घड़े में से उसे पानी पिला दिया। आगे चला तो एक स्त्री अपने बालक को गोद में लिए रास्ते में रोती हुई मिली, पूछने पर उसने बताया कि प्यास के मारे मेरा और मेरे बच्चे का दम निकला जा रहा है, उसने उस स्त्री और उसके बच्चे को भी पानी पिलाया। जब झरना थोड़ी दूर रह गया तो उसने रास्ते में एक कुत्ते को पड़ा देखा तो प्यास से छटपटा रहा था, उसने देखा कि यदि कुछ ही देर और उसे पानी न मिलेगा तो जरूर ही उसके प्राण निकल जायेंगे। उसने बचा हुआ सारा गंगाजल उस कुत्ते को पिला दिया और खाली घड़ा लेकर झरने की तरफ चल दिया।

🔷 वह सोच रहा था कि तेज चलने वाले मेरे दोनों साथी झरने पर पहुँच गये होंगे और झरना सोने का हो चुका होगा। पर जब वह वहाँ पहुँचा तो देखा उसके साथी वहाँ तक नहीं पहुँचे और झरना भी वैसा ही बह रहा है। साथी कहाँ गये इस चिन्ता में वह इधर-उधर घूमने लगा। इतने में वही साधु उस के पास आया और कहने लगा-बेटा, मैं ही कुबेर हूँ। तुम लोगों की परीक्षा लेने आया था। रास्ते में जो वृद्ध पुरुष, स्त्री, कुत्ता मिले थे वे और कोई नहीं थे, मैंने ही अपने रूप बना लिये थे और तुम लोगों का हृदय जाँच रहा था। तुम्हारे दोनों साथी अपनी स्वार्थ बुद्धि के कारण पत्थर हो गये हैं और देखो वहाँ पड़े हुए हैं। तुम अपना घड़ा मुझे दो। उस घड़े में एक दो बूँद जो गंगाजल था वह साधु ने झरने में डाला, वह सारा सोना का हो गया। साधु ने कहा-बेटा जितना चाहिये सोना ले जाओ। तुम्हीं सोना पाने के वास्तविक अधिकारी हो, इसलिए तुम्हें ही वह संपदा मैं दे रहा हूँ। उन स्वार्थ बुद्धियों को अपना फल भोगने दो।
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 June 2018


👉 शान्त विचारों की शक्ति (अन्तिम भाग)

🔶 जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति के संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। आधे मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन तो कार्य करता है पर अचेतन मन उस की सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य के शीघ्रता से थकावट आ जाती है और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

🔷 जिस प्रकार शाँत विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्ति यों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं। एकान्त में हर किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं।

🔶 किसी व्यक्ति के प्रति नित्य प्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसे कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर−दूर के लोगों को प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 7

👉 Sadhana

🔶 Swami Vivekanand was taking a stroll along the banks of the Ganga near Vellur Matha one evening. Sister Nivedita, Sharatchandra Chakravarti and a few others were also accompanying him. While walking, some of them started discussing about the Divine (India) Culture. Swamiji said, “The  Divine Culture represents a harmonious blend of sadhana (purity and strength of character) and samvedana (loving kindness and compassion).

🔷 Lack of either would strike at the very roots of the structure and aim of our culture. Sadhana without samvedana leads to arrogance. And, samvedana sans sadhana proves to be nothing more than sentimental effervescence. A balanced cultivation of both generates what is essential for the expression of divinity in humanity.

📖 From Pragya Puran 

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 1)

🔶 यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।

🔷 किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है।
समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।

🔶 जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82

👉 गुरुगीता (भाग 125)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी
🔶 ऐसा ही अनुभव दक्षिण भारत में कृष्ण नदी के किनारे बसे गाँव त्र्यंगम के निवासी मुरली कृष्णन को हुआ। मुरली कृष्णन जन्म से ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा सामान्य ही हो पायी थी। परिवार में गरीबी थी, उस पर शत्रुओं का आतंक। पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। घर में अकेली माँ और दो बहनें थीं, जिन पर गाँव के जमीदार की कुदृष्टि थी। असहाय, अकेलापन, न कोई मार्गदर्शन और न कोई राह बताने वाला। कहाँ जायें, किसके पास जायें। जो राह मिली भी, वे दुष्कर थी। किसी ने उन्हें किसी ज्योतिषी के पास जाने को कहा, किसी ने तांत्रिकों के पते बताए। मुरली कृष्णन की माँ काफी समय तक इधर- उधर भटकती फिरीं। परन्तु मिला कुछ नहीं उलटे घर की हालत और बिगड़ती गई और शत्रुओं का आतंक बढ़ता गया।

🔷 एक दिन शाम के समय मुरली कृष्णन ने अपनी माँ से कहा- माँ भगवान् सद्गुरू हैं, वे सभी का मार्गदर्शन करते हैं- क्यों न हम उन्हीं की शरण में जायें? प्रभु जो चाहेंगे- वही अच्छा होगा। ऐसा निश्चय करके मुरली कृष्णन ने पूर्णिमा की तिथि से गायत्री महामंत्र के जप के साथ गुरूगीता के पाठ का निश्चय किया। नियमित सन्ध्योपासना, अल्पाहार, अस्वादव्रत के साथ मुरली कृष्णन की साधना चलने लेगी। गायत्री महामंत्र के जप की ग्यारह मालाएँ पूरी करने में उसे लगभग एक घण्टे का समय लगता। पूजा के विधान सहित गुरूगीता के पाठ में भी लगातार एक घण्टा लग जाता।

🔶 इस क्रम से प्रातः सायं उसकी साधना चलने लगी। प्रारम्भ में तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। शत्रु और शत्रुता ज्यों के त्यों बने रहे। लेकिन तीन महीने के बाद गुरूगीता की पाठ- साधना के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगी। लोगों की बढ़ती उपेक्षा कम होने लगी। गाँव के कई प्रभावी लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए । माँ की मेहनत एवं पुरखों के खेती में आय से घर का सामान्य खर्च चलने लगा। आतंक की छाया, शान्ति की शीतलता में बदलने लगा। अब तक मुरली कृष्णन का मन भी साधना में रमने लगा।

🔷 साधना के तीन वर्ष पूरे होते- होते न केवल स्थितियों में सुखद परिवर्तन हुआ, बल्कि मनः स्थितियों में भी आध्यात्मिक भाव उभरने लगा। अन्तश्चेतना में भगवान् सदाशिव एवं जगदम्बा पार्वती की झलकियाँ मिलने लगी। एक दिन ध्यान की गहनता में उसने स्वयं को भगवान् भोलेनाथ के समीप पाया। उसने अनुभव किया कि प्रभु स्वयं उसे स्वीकार करते हुए कह रहे हैं, वत्स ! मैं ही वह गुरूतत्त्व हूँ जो जगती पर भिन्न- भिन्न नाम रूपों में प्रकट होता है। भगवान् की यह वाणी सुनकर मुरली कृष्णन के अन्तस् से बस यह स्वर निकले- मुझे अपना लें प्रभु ! और उसे लगा- भगवान् कह रहे हैं कि गुरूगीता को जो अपनाता है, उसे मैं स्वभावतः अपना लेता हूँ। प्रभु का यह आश्वासन प्रत्येक साधक के साथ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 188

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 2)

🔶 हिन्दू समाज में विवाहों का आरम्भ आज जिस ढंग से, जिस विचारधारा के साथ आरम्भ किया जाता है, उसे अत्यन्त निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। उपयुक्त जोड़ी ढूँढ़ने से लेकर दोनों कुटुम्बों में परस्पर अगाध स्नेह सहानुभूति रहने तक जो उल्लासपूर्ण वातावरण रहना चाहिए और दो आत्माओं के आत्मसमर्पण यज्ञ की जो परम पवित्र धार्मिक सद्भावना पूर्ण परिस्थितियाँ रहनी चाहिए, उनका कहीं ढूँढ़े भी दर्शन नहीं होता। सच तो यह है कि सब कुछ इससे विपरीत होता है। छोटे-छोटे अबोध बालकों को गृहस्थ निर्माण का भार वहन करने के लिए विवाह वेदी पर प्रस्तुत कर दिया जाता है।

🔷 युवावस्था आने से पूर्व विवाह करना, अबोध बालकों का बाल विवाह भी भला कोई विवाह है। उसे तो एक श्रेष्ठ परम्परा का थोथा प्रदर्शन मात्र कहा जा सकता है। इसी प्रकार अनमेल विवाह भर्त्सना के योग्य है। अधेड़ एवं बूढ़े आदमी यदि अपनी बेटी, पोतियों की आयु की बच्चियों से विवाह करें तो उसमें क्या तो नैतिकता मानी जायगी और क्या मानवता एवं क्या सामाजिकता? कई-कई बच्चे होते हुए भी पुरुष एक के बाद दूसरे कई-कई विवाह करते चले जायें, पर स्त्री यदि अल्पायु में भी विधवा हो जाय तो उसे उस प्रकार की सुविधा न मिले। इस तरह के पक्षपात एवं अन्याय युक्त कानून जिस समाज में प्रचलित हों और उसके लोग इस अनीति का समर्थन भी करते हों, तो उसे अपने को धर्मवान कहलाने का भला क्या अधिकार हो सकता है?

🔶 आज जिस ढंग से, जिस आडम्बर, अहंकार और तामसी वातावरण में विवाह-शादियाँ होती हैं, उन्हें देखकर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि यह दो आत्माओं के आत्म-समर्पण के लिए आयोजित सर्वमेध यज्ञ का धर्मानुष्ठान है। उन दिनों तमोगुण की ही घटायें छाई रहती हैं। अश्लील गीत, गन्दे नाच, ओछे मखौल, पान, बीड़ी, भाँग शराब की धूम, देखकर उसकी संगति यज्ञ से कैसे बिठाई जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.44

👉 बुरे विचारों का निवारण

🔷 जीव पूर्व जन्मों में अनेक प्रकार के शुभ अशुभ कार्य कर चुका होता है और भले बुरे दोनों ही प्रकार के संस्कार उसके गुप्त मन पर अंकित रहते हैं, तदनुसार दोनों प्रकार के विचार मन में उठा करते हैं। ऐसे मनुष्य मिलना कठिन है, जिनके मन में कभी बुरे विचार उत्पन्न ही न होते हों। बुरे विचार उठें, तो निराश न होना चाहिए, वरन् उन्हें काबू में करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि विवेक का बल हो, तो बुरे विचारों के अनुसार कार्य नहीं होने पाता और वे मन में उत्पन्न होकर वहीं नष्ट हो जाते हैं। किन्तु यदि विवेक निर्बल हो और इन्द्रियों की लालसा बढ़ी हुई हो, तो उस कुसंग के साथ वे बुरे विचार बढ़ जाते हैं और छोटे से बड़ा रूप धारण कर लेते हैं।

🔶 तरंग स्वयं बहुत छोटी वस्तु है, पर संगति से समुद्र बन जाती है। इसी प्रकार एक छोटा सा बुरा विचार यदि अनियंत्रित होकर कुसंग में पड़ जाय, तो समुद्र हो सकता है और मनुष्य को अपने में डुबा कर नष्ट कर सकता है। बुरे विचारों को बाह्य परिस्थितियाँ भी बड़ा सहारा देती हैं। बुरे स्थान, दृश्य, साहित्य, चित्र और जीव यह सभी कुविचारों को उत्तेजित करने में सहायक होते हैं।

🔷 जो मनुष्य अपने जीवन को ऊंचा उठाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि सतर्कतापूर्वक ‘आत्मनिरीक्षण’ करते रहें, जब कोई बुरा विचार उत्पन्न हो रहा हो, तो उसे तुरन्त ही यहाँ से हटा कर उसके स्थान पर शुभ संकल्प आरोपित करना चाहिए। जिस प्रकार बिच्छू के कपड़े पर चढ़ते ही उसे हटाने का अविलम्ब प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार बुरे विचार को मन में उत्पन्न होते ही हटा देना चाहिए, तभी हम जीवन लक्ष तक पहुँच सकेंगे।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 20

👉 गुरुगीता (भाग 124)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔷 गुरूगीता के विगत क्रम में कुछ ऐसे ही मांत्रिक महत्त्व की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि गुरूपुत्र सब तरह से वरण के योग्य है गुरूगीता के महामंत्र संसार के मलों को धोकर भवपाशों से छुटकारा दिलाते हैं। जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। वह जहाँ भी रहता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। यही नहीं वहाँ पर सभी देवशक्तियाँ निवास करती हैं। गुरूगीता का पाठ करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष प्रत्येक अवस्था में विशुद्ध होता है, किसी भी अवस्था मे उसका दर्शन कल्याणकारी है।

🔶 इस तत्त्वकथा का विस्तार करते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। भिन्ने कुम्भे यथाकाशः तथात्मा परमात्मनि॥ १६२॥
तथैव ज्ञानी जीवात्मा परमात्मनि लीयते। ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ॥ १६३॥
एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्त्तते बुधः। तस्य सर्वप्रयत्नेन भावभक्तिं करोति यः॥१६४॥
सर्वसंदेहरहितो मुक्तो भवति पार्वति। भुक्तिमुक्तिद्वयं तस्य जिह्वाग्रे च सरस्वती॥१६५॥

🔷 समुद्र में जिस तरह से जल ,दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से बाह्याकाश में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में मिल जाती है॥ १६२॥ इसी तरह से ज्ञानी जीवात्माएँ परमात्मा चेतना में लीनता का अनुभव करती हैं। इस एकता के कारण ही ज्ञानी दिन- रात आनन्द में निमज्जित रहता है॥ १६३॥ इस तरह सक ज्ञानी सदा जीवन मुक्त होकर वास करता है, जो साधक प्रयत्नपूर्वक उसकी भावभक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर मुक्त होता है। उसे भोग एवं मोक्ष दोनों ही मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है॥ १६४- १६५॥

🔶 भगवान् सदाशिव के इन वचनों में न केवल गुरूगीता के पाठ का महत्त्व है, बल्कि पाठ करने वाले को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है। जो गुरूगीता की शरण में है, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। बस सद्गुरू की मूर्ति, चित्र के सामने पंचोपचार पूजन के पश्चात् पाठ करने की आवश्यकता है। इस पाठ से सभी संकटों का नाश होता है। आपत्तियाँ दूर होती हैं। सद्गुरू की कृपा मिलती है एवं चित्त में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश होता है। यह कथन केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ की गहनता समायी है। जो भी गुरूगीता की साधना करते हैं, अथवा करेंगे, उन्हें इसकी अनुभूति होने में कोई सन्देह नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 187

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (अन्तिम भाग)

🔷 इसाइयों से अपने को सुरक्षित समझने वाले बौद्ध, सिक्ख, पारसी, मुसलमान और यहूदी आदि को इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि भारत की धर्म-निरपेक्षता तथा हिन्दुओं की उपेक्षापूर्ण धार्मिक सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाते हुए यदि ईसाई मिशनरी इसी तेजी से हिन्दुओं को अपने जाल में फंसाने में सफल होते रहे तो शीघ्र ही उनकी जनसंख्या भारत में बहुत अधिक हो जायगी और तब ऐसी स्थिति में भारत के सारे गैर ईसाई उनकी तुलना में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।

🔶 क्या ईसाइयों का यह बहुमत तब शक्ति पाकर सम्पूर्ण भारत को ईसाई देखने के लिए व्यग्र पोप, पादरियों तथा प्रचारकों को अल्पसंख्यक गैर ईसाइयों को अपने में आत्मसात् करने के प्रपंचों के लिए साहस, अवसर तथा प्रोत्साहन नहीं देगा? इसलिए भारत की धर्म-निरपेक्ष नीति, धार्मिक सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय स्वरूप को सुरक्षित रखने और लोकतन्त्र की गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि भारत के सारे गैर ईसाई जन-समुदाय एक साथ होकर ईसाइयों के इस बढ़ते हुए धार्मिक साम्राज्य को रोकने का प्रयत्न करें।

🔷 हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षडयन्त्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और गैर ईसाई मिशनरियों की अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने में अपना नैतिक समर्थन देकर हिन्दुओं की हिमायत को आगे बढ़ें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बन्धुत्व तथा सच्चे लोकतन्त्र की रक्षा हो सकेगी, अन्यथा पुनः आजादी को खतरा की सम्भावना हो सकती है।

🔶 यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य देशों की सरकारें तथा संस्थायें भारत में मिशनरियों को एजेन्ट रूप में भेज कर ईसाइयत को बढ़ावा दे रही हैं और एक प्रकार से वे धर्म का आधार लेकर उन देशों का साम्राज्य ही भारत में स्थापित करने का प्रयत्न कर ही हैं। विदेशों के इस धर्मधारी साम्राज्यवाद से बचाव हेतु सम्पूर्ण गैर ईसाइयों को एक मंच पर आकर ईसाइयों के मलीन मन्तव्यों को सफल होने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 36

👉 शान्त विचारों की शक्ति (भाग 2)

🔷 हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे−धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसी हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कामों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

🔶 जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे करने के लिए बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करे तो वह इसका कारण अपने आप में ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उससे आत्म विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीक्ष्ण हो जाती है और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

🔷 शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश की शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिये वैयक्तिक इच्छाओं का नियंत्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती है, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतना ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शाँत विचारों का अन्त कर देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 June 2018

रविवार, 3 जून 2018

👉 उपदेश का सही मर्म

👉 गुड़-गुड़ कहने से मुंह मीठा नहीं होता।

🔶 सच ही है उपदेश का मर्म वही समझता है जो उसे धारण करना जानता हैं वाणी के साथ आचरण का अंग बन जाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और इसे धारण करने वाला ही सच्चा ज्ञानी है। लेकिन आज के समय में तो सिर्फ पढ़ा जाता हैं अमल नहीं किया जाता।

🔷 यह उस समय की बात है जब कौरव और पांडव गुरु द्रोणाचार्य जी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। एक दिन गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों को एक सबक दिया- ‘सत्यम वद‘ मतलब सत्य बोलो। उन्होंने सभी शिष्यों से कहा की इस पाठ को भली भांति याद कर लें, क्योंकि उनसे यह पाठ कल पूछा जाएगा। अध्यापन काल समाप्त होने के बाद सभी शिष्य अपने-अपने कक्षों में जाकर पाठ याद करने लगे।

🔶 अगले दिन पून: जब सभी शिष्य एकत्रित हुए तो गुरु द्रोण ने सबको बारी-बारी से खड़ा कर पाठ सुनाने के लिए कहा। सभी ने गुरु द्रोण के सामने एक दिन पहले दिया गया शब्द दोहरा दिया, लेकिन युधिष्ठर चुप रहे। गुरु के पूछने पर उन्होंने कहा की वे इस पाठ को याद नहीं कर पाये हैं।

🔷 इस प्रकार 15 दिन  बीत गए, लेकिन युधिष्ठर को पाठ याद नहीं हुआ। 16 वें दिन उन्होंने गुरु द्रोण से कहा की उन्हें पाठ याद हो गया हैं और वे उसे सुनाना चाहते हैं। द्रोण की आज्ञा पाकर उन्होंने ‘सत्यम वद‘ बोलकर सुना दिया। गुरु ने कहा-युधिष्ठर, पाठ तो केवल दो शब्दों का था। इसे याद करने में तुम्हें इतने दिन क्यों लगें?

🔶 युधिष्ठर बोले- गुरुदेव, इस पाठ के दो शब्दों को याद करके सुना देना कठिन नहीं था,  लेकिन जब तक में स्वयं आचरण में इसे धारण नहीं करता, तब तक कैसे कहता की मुझे पाठ याद हो गया है।

🔷 मित्रों इसी तरह कितने सारे लोग है, लगभग सभी ने भगवद गीता - कुरान पढ़ी होगी, लेकिन युधिष्ठिर की तरह नहीं केवल ऊपर से पढ़ी होगी, शब्द-शब्द पढ़े होंगे।

🔶 जरा सोचिये अगर आज के लोगों ने सच में गीता - कुरान को पढ़ा होता तो आज जो हमारे मानव समाज की स्थिति हैं क्या ऐसी होती। सभी धर्म में यही हो रहा हैं, सभी लोगों ने धर्म को ऊपर-ऊपर पढ़ा हैं, लेकिन उसे जाना नहीं। और जब तक आप किसी चीज़ को जान नहीं लेते तब तक आपका उसे पढ़ना व्यर्थ हैं।

🔷 आप ही सोचिये गीता-कुरान इन सब में लिखा हुआ होता हैं की इनको पढ़ने पर मोक्ष प्राप्त होता हैं। लेकिन लग भग सभी लोग गीता-कुरान पढ़ते हैं फिर उन्हें मोक्ष क्यों नहीं होता, सीधी सी बात हैं क्यूंकि वो सिर्फ पढ़ते हैं, अमल नहीं करते उन बातों पर, अपने जीवन में नहीं ढालते उन बातों को जो की गीता-कुरान में बताई जाती।

🔶 तो मित्रों हमारा निवेदन हैं की आप जो भी पढ़ें, उसे सिर्फ पढ़ने तक ही सिमित न रहने दें उसे अपने जीवन में उतारें, उसे अमल करें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 June 2018


👉 शान्त विचारों की शक्ति (भाग 2)

🔶 गम्भीर परिस्थितियों में मन का शाँत रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी शक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शाँत विचारों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्ति यों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है।

🔷 शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे−धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेग पूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिये शान्त होने की आवश्यकता होती है और दूसरा कार्य दृश्य जगत में होता है।

🔶 शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्य जनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचा और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभचिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रबल करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ
7

👉 THE SUBTLE DETERMINATORS OF HUMAN PERSONALITY

🔶 The dominant influences in the formation of human personality are generally believed to be environment and enterprise. But this belief holds true only to a certain extent. It is a matter of common observation that children born and brought up in similar circumstances develop major mental and emotional differences later. This is primarily on account of the basic life-elements, which go to make the person of an offspring.

🔷 These subtle influences come down over many previous generations from both paternal and maternal sides. They combine to maintain the continuity of hereditary characteristics and also mutate in a strange way to spawn entirely new traits and identities, thereby taking evolution forward.

🔶 Scientists have been able to uncover the fundamental basis of life of not only human beings but of all the life forms belonging to animal and plant worlds. Since the second half of the 20th century, a great amount of research has been made in this direction and almost daily new findings are published. This rapid and profuse work is propelled by advances in electron microscopy and cybernetics in which information from different fields are collated and integrated into a composite whole.

🔷 All living organisms from the simplest amoeba to the most complex human body have been formed by the same life-chemical, the DNA or deoxyribonucleic acid. The DNA contains in chemically coded form - the blueprint of life, i.e., all the information needed to build, control and maintain a living organism. The DNA has extremely tiny spring-like structures, which can be seen through an electron microscope. The defined stretch of DNA is called genes. The genes have memory banks and they continually feed the body cells with instructions about the formation and functioning of body organs. This way co-ordination among the billions of body cells is achieved.

🔶 DNA is found in every living organism except in human RBC and certain types of viruses. An adult human body has 600 billion “energy packets” of DNA. In shape and chemical composition, all of these are similar whether in humans or animals or even in grass blades. The key to all of life’s diversity is hidden in DNA. The particular order of its constituent bases determines whether an organism is a human or a bird, fish, insect or vegetable. An Indian-American scientist Dr. Hargovind Khurana made path-breaking discoveries about the structure of RNA (ribonucleic acid) and was awarded the Nobel Prize in 1968.

📖 From Akhand Jyoti Apr 2002

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 3)

🔶 ईसाई पादरियों तथा मिशनरियों का ऐसा ज्वलन्त आह्वान और भयानक विचार न केवल भारत के हिन्दुओं अपितु सारी गैर ईसाई जनसंख्या की आंखें खेल देने को एक खुली चुनौती है। अपने धर्म की रक्षा तथा भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए क्या यह आवश्यक प्रतीत नहीं होता कि गैर-ईसाई जनता विदेशी मिशनरियों के अनुचित इरादों को असम्भव बना देने के लिए आवाज उठाए। यदि भारत की ईसाई जनसंख्या यों ही विदेशी मिशनरियों की गतिविधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देख कर प्रमाद में ही पड़ी ही तो यह असम्भव बात न होगी कि ईसाई ‘ईसाई भारत’ के अपने ध्येय के बहुत कुछ समीप जा पहुंचें और तब तक क्या हिन्दू, क्या मुसलमान और क्या सिक्ख सभी धर्मों के मिट जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

🔷 यह बात सही है कि ईसाई मिशनरियों को हिन्दुओं की अपेक्षा अन्य धर्म वालों पर अपना प्रपंच चलाना आसान नहीं पड़ता। वे मुख्यतः हिन्दुओं को ईसाई बनाने में जुटे हुए हैं, इसके दो मुख्य कारण हैं—पहला, अति धर्म-सहिष्णुता, वे धर्म-बन्धुओं के बीच इसी अति के दोष से ईसाइयत का प्रचार सहन करते जा रहे हैं। दूसरा यह कि गैर ईसाई अहिन्दुओं की धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण ईसाई मिशनरियों को उनके बीच जाल बिछाने का अधिक अधिक अवसर नहीं मिलता अहिन्दू गैर ईसाइयों की रूढ़िवादिता उन्हें अपने बीच धंसने का साहस नहीं करने देती। किन्तु इसका यह अर्थ लगाना गलत होगा कि अहिन्दू गैर ईसाई ईसाइयों के धार्मिक षडयन्त्र से सुरक्षित है और यदि वे ऐसा सोचते हैं तो गहरी भूल करते हैं। अहिन्दू गैर ईसाइयों को भी इस षडयन्त्र की, जो ईसाइयों के बीच प्रचार-प्रपंच चला रखा है, उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि हिन्दुओं पर किया गया आघात परीक्षा रूप में उन पर भी एक आघात है।

🔶 कैथोलिक ईसाई पत्रों के कथनों से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भारत के गैर ईसाई समुदाय से ईसाई मिशनरियों को ईर्ष्या है और वे उनकी विशाल जनसंख्या को फूटी आंखों भी नहीं देख पा रहे हैं। वे सम्पूर्ण भारत के गैर ईसाइयों को ईसाई बनाकर ‘ईसाई-भारत’ का स्वप्न देखते हैं और उसके लिए हर उचित-अनुचित उपाय करते जा रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 35

👉 गुरुगीता (भाग 123)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों के मनन से शिष्य का त्राण होता है। इसका विधानपूर्वक पाठ करने से साधक के अस्तित्त्व में मंत्रयोग की सम्पूर्ण प्रक्रियाएँ घटित होती हैं। और फिर प्रारम्भ हो जाती है- अन्तस् के रूपान्तरण की आध्यात्मिक प्रक्रिया। यह सच उनको सहज में समझ आने योग्य है, जो मंत्र के वैज्ञानिक महत्त्व से परिचित हैं। मंत्र में प्रधान महत्त्व शब्दों के गुँथे होने की रीति का है। इसके अर्थ की भावना श्रेयस्कर तो है, पर इसके बिना भी मंत्र अपना चमत्कार दिखाए बिना नहीं रहते। वैसे यदि मंत्र रटन के साथ अर्थ चिन्तन जुड़ जाए, तो सोने में सुगन्ध वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। हालाँकि ऐसा न होने पर भी अकेली मंत्ररटन अपने चमत्कारों की सुनहरी चमक को बरकरार रखती है।

🔷 मंत्रों को रटने या मन ही मन उच्चारित करने से इसके सूक्ष्म कम्पन न केवल देह, प्राण व स्न्नायुमण्डल की प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं, बल्कि अस्तित्व की गहनता भी इनसे प्रेरित व परिवर्तित होती है। यह ऐसा अनुभव है, जो उन सभी को प्राप्त होता है, जो मंत्र के साधक हैं। इस साधना की प्रगाढ़ता में चित्त की वृतियाँ मंत्र की चेतना में विलीन होने लगती हैं और फिर क्रमिक रूप से चित्त मंत्र तदाकार होता है। बाद में यह तादात्म्य मंत्र के अधिदेवता से होते हुए मंत्र की सामर्थ्य के अनुसार परमात्म चेतना से हो जाता है। शाबर, डामर आदि क्षुद्र मंत्रों की बात छोड़ दे, तो गायत्री महामंत्र के साथ इस प्रक्रिया को घटित होते हुए अनुभव किया जा सकता है।

🔶 गुरूगीता- माला मंत्र है। माला मंत्रों का पाठ किए जाने की परम्परा है। इस पाठ करने से साधक के अन्तरतम में पहले गुरूतत्व की अनुभूति होती है। जिन्हें अभी तक गुरू की प्राप्ति नहीं हुई है, वे इसकी साधना से अपने सद्गुरू को पहचान सकते हैं, पा सकते हैं। जिन्हें सद्गुरू तो मिले हैं, परन्तु जो अभी अपनी देह में नहीं हैं, गुरूगीता की पाठ साधना उन्हें उनके गुरू से संवाद सुलभ करा सकती है। विधानपूर्वक यदि सहस्त्र पाठ भी हो सके, तो भी ऐसा करने वाले साधक की चेतना सूक्ष्म संकेत अवतरित होने लगती है। साधना सतत बनी रहे ,, तो साधक न केवल गुरूतत्त्व का साक्षाकार करता है, बल्कि उसे गुरूतत्त्व एवं परमात्मतत्त्व की एकरसता का भी बोध होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 186

👉 देवी संपति

🔶 यज्ञ (तन, मन, धन, लोकहित के लिये कार्य करना) तप (यज्ञ कर्म के लिये चित्त और इन्द्रियों को रोकना) दान, सत्संग, धार्मिक ग्रंथों का पठन पाठन, महात्माओं के दर्शन करने की इच्छा रखना, मन में सदैव शुभ और पवित्र विचारों को उठाते रहना, अपने कर्त्तव्य को सच्चाई और ईमानदारी से करना, अनाथ, गरीब, अपाहिजों पर दया करना और उनकी सहायता करना, विद्यादान अतिथि सेवा और मन का प्रसन्न होना आदि सभी उत्तम कर्म ईश्वर प्राप्ति के साधन हैं। गीता के 16वे अध्याय में भगवान ने इन्हीं गुणों को विस्तार के साथ देवी सम्पत्ति के नाम से कहा है और अर्जुन को बताया है कि दैवी सम्पत्ति से मोक्ष मिलता है।

🔷 भक्ति का अर्थ है सेवा। सर्वेश्वर सर्वाधार प्रभु सब प्रकार समर्थ और हमेशा तृप्त हैं, उन्हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्यकता नहीं है। फिर उनकी सेवा का क्या मतलब और ढंग होना चाहिए? वास्तव में मन, वाणी और कर्म से प्राणी मात्र की सेवा और विशेष रूप से मनुष्य जाति की सेवा करना ही भगवान की भक्ति है। भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है। भक्त की सभी बुरी आदतों में इतनी शीघ्रतापूर्वक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जिसे देखकर सब आश्चर्यचकित हो जाते हैं। छल, कपट, स्वार्थ, ईर्ष्या आदि दोषों का नाश होकर उनके स्थान में सरलता, निष्कपटता, उदारता, प्रेम आदि शुभ गुण आने लगते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे अन्तःकरण पवित्र होने लगता है, जो एक मात्र प्रभु दर्शन का मन्दिर है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 20

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन

🔶 समाज का निर्माण परिवार से होता है और परिवार का विवाह से। हर नया विवाह एक नये समाज की रचना करता है। जिस प्रकार छोटी-छोटी कड़ियों को मिलाकर एक जंजीर बनती है, उसी तरह इन छोटे-छोटे परिवारों का समूह ही समाज कहलाता है। यदि सभ्य, सुविकसित, सुसंस्कृत समाज का निर्माण करना हो तो उसके लिए परिवारों के निर्माण पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में यह आवश्यक है, कि विवाह का शुभारम्भ श्रीगणेश ऐसे वातावरण में हो, जो अन्त तक मंगलमय परिणाम ही उत्पन्न करता है। कहते है कि अच्छी शुरुआत में सफलता की आधी सम्भावना सन्निहित रहती है। जिसका आरम्भ ही दुर्बुद्धि एवं दुर्भावना के साथ होगा उसका विकास भी असन्तोष और संघर्षों के बीच होगा और यह क्रम अन्ततः उसे असफल ही बना देगा।

🔷 आज के अधिकाँश विवाह आगे चल कर असफल ही सिद्ध होते हैं। ऐसे कम ही जोड़े निकलेंगे जो एक मन दो शरीर बन कर रहते हों। परस्पर द्वेष दुर्भाव भरे हुए वे किसी तरह अपनी गाड़ी तो घसीटते रहते हैं, पर उसमें भीतर ही भीतर असन्तोष एवं अविश्वास की आग सुलगती रहती है। ऐसे असफल गृहस्थों की शृंखला सभ्य समाज की, सुविकसित एवं सुसंस्कृत समाज की रचना में भला क्या सहायक बन सकती है? आज यही विषम परिस्थिति चारों ओर फैली हुई है ।

🔶 समाज निर्माण की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। हर कोई जानता है कि व्यक्ति और समाज का उज्ज्वल भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि समाज में श्रेष्ठ परम्पराएं प्रचलित हों। कोई मनस्वी व्यक्ति अपनी प्रतिभा से समाज का वातावरण बदलते हुये भी सफल होते हैं, पर अधिकतर होता यह है कि समाज की जैसी भी स्थिति एवं परम्परा होती है, उसी के अनुरूप व्यक्तियों का बनना और ढलना जारी रहता है। तदनुसार ही उस देश, समाज या जाति का उत्थान एवं पतन होता रहता है। यदि हमें नये समाज का निर्माण वस्तुतः करना हो, तो उसके मूल विवाद पर अत्यधिक ध्यान देना होगा। उसमें जो विषमता विशृंखलता एवं विकृति उत्पन्न हो गई है, उसे सुधारना होगा। इसके बिना समाज निर्माण, मानव प्रगति एवं विश्व शान्ति के सपने साकार न हो सकेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 43
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.43

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 2)

🔶 भारत में पादरियों का धर्म प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षडयन्त्र है जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, अब उपेक्षावश और तीव्र तथा प्रबल हो गया है। ईसाई पादरियों के इस धर्म प्रचार का क्या उद्देश्य है? यह समय-समय पर किये उनके कथनों, लेखों तथा वक्तव्यों से सहज ही पता लग जाता है।

🔷 ‘‘लाइट आफ लाइफ’ केथोलिक पत्रिका के 1964 के जुलाई अंक में ईसाई नवयुवकों को परामर्श देते हुए निर्देश किया गया—‘‘ईसाई छात्रों तथा स्नातकों का यह कर्तव्य है कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिये पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखा करें और इस विषय में वे धर्म निरपेक्ष नीति वाली पत्र-पत्रिकाओं का लाभ उठा सकते हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे शुरू-शुरू में ही अपने लेखों में ईसाइयत का प्रचार करने लगें। अच्छा तो यह होगा कि पहले वे सामान्य लेख लिख कर आगे चल कर के पत्रों में खुलकर ईसाई विचारधारा का प्रचार करें।’’

🔶 यह क्या है? ईसाई नवयुवकों को धर्मनिरपेक्ष पत्र-पत्रिकाओं में घुसने और उनके माध्यम से भारत में ईसाइयत फैलाने के लिए खुला प्रोत्साहन तथा आह्वान है। इसे धर्मनिरपेक्षता का अनुचित लाभ उठाने के लिए एक षडयन्त्र के सिवाय और क्या कहा जायगा? जहां धर्मनिरपेक्षता की नीति भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी को एक समान तथा सामान्य राष्ट्रीय विचारधारा में लाने का प्रयत्न कर रही है, वहां विदेशी मिशनरी ईसाई नवयुवकों की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर उन्हें अपने षडयन्त्र का सहायक अस्त्र बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या भारत के राष्ट्रीय हित में यह सहन करने योग्य बात है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 34

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 3 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...