शुक्रवार, 8 जून 2018

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 3)

🔶 यह हलका-फुलका धर्म कृत्य मानव-जीवन की एक साधारण-सी आवश्यकता है। जिस प्रकार मुण्डन अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, जनेऊ वानप्रस्थ आदि अन्य संस्कार होते हैं, वैसा ही विवाह भी एक साधारण-सा धर्मानुष्ठान है। उसमें संस्कार का कुछ बड़ा आयोजन रह सकता है, हर्ष उल्लास का छोटा-मोटा आयोजन भी रह सकता है, पर वह इतना खर्चीला और उलझन भरा कदापि न होना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से दोनों पक्षों का कचूमर ही निकल जाय। बारातियों की सर्वथा अनावश्यक भीड़ को इधर से उधर ठेले फिरने, उनके ठहराने, अनेक तरह की सुविधाएं जुटाने एवं कीमती प्रीति-भोजों का खर्चीला भार उठाने में किसका क्या लाभ होता है यह समझ में नहीं आता?

🔷 बाराती यह समझते हैं कि हमने अपना वक्त बर्बाद कर के और इतनी किल्लत उठाकर बेटे वाले पर अहसान किया। बेटे वाला बरात के लाने, ले जाने की कष्टसाध्य व्यवस्था जुटाता है। बेटी वाले का तो उनकी आव-भगत में कचूमर ही निकल जाता है। इस मूर्खतापूर्ण हंगामे का उस पवित्र धर्मानुष्ठान के साथ कोई तुक नहीं बैठता, फिर भी बरातों की दौड़ धूप चलती ही रहती है। अनावश्यक गाजे-बाजे, महंगी सवारियाँ, आतिशबाजी, फूल पट्टी आदि में ढेरों पैसा बर्बाद होता है। इस बर्बादी का भारत जैसे गरीब देश के गरीब लोगों पर आर्थिक दृष्टि से कितना बुरा असर पड़ता है इसे हर विचार-शील व्यक्ति आसानी से समझ सकता है।

🔶 इतने से ही काम चल जाता तब भी भुगता जाता। समस्या तो और भी भयानक तब सिद्ध होती है जब वरपक्ष की ओर से मोटी रकम दहेज के रूप में माँगी जाती है, उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाता है। नकदी, जेवर, सामान के रूप में यह माँग आमतौर से इतनी बड़ी होती है कि औसत आर्थिक स्थिति का कोई कन्या का पिता छाती पर पत्थर रखकर ही उसकी पूर्ति कर सकता है। जिन्हें दो-चार कन्याओं के लगातार विवाह करने पड़े हैं और जिनके पास कहीं से अनाप-शनाप आमदनी नहीं होती, वे जानते हैं कि दहेज किस पिशाच का नाम है और उस कोल्हू में पेले जाने पर लड़की के परिवार का तेल किस करुण क्रन्दन के साथ निकलता है। आज जो लड़के वाला बनकर दहेज माँगता है, कल उसे भी अपनी लड़की का विवाह करने पर उसी चक्की में पिसना पड़ता है। इस दुर्गति को जानते हुए भी न जाने क्यों हमारी आँखें नहीं खुलतीं और रोते कलपते उसी दुर्दशा के कुचक्र में पिलते- पिसते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.44