शुक्रवार, 8 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 3)

🔶 इस पाप-पुण्य की सूक्ष्म बात को छोड़ कर यदि साधारण सामाजिकता की स्थूल बात भी ले ली जाय तब भी मृतक भोज खाने की प्रथा उचित नहीं। अब आज के अर्थाभाव एवं महार्घता के समय में किसी के मरने पर मृतक भोज में इतना धन खर्च कर सकना कौन बुद्धिमानी की बात है। जहां कठिनता से नमक रोटी जुड़ती हो, वहां साधारण स्थिति का कोई व्यक्ति इतने रुपये किस प्रकार बचा कर रख सकता है कि शोक-संयोग आने पर वह घर से तत्काल निकाल कर मृतक-भोज आदि में खर्च कर सके।

🔷 निश्चय ही उसे इस प्रथा पिशाचिनी की भेंट-पूजा के लिये कर्ज लेना होता है और एक बार एक सामान्य आदमी के लम्बी रकम कर्ज लेने का अर्थ है अपने को आजीवन मूल तो दूर ब्याज के हाथ बेच देना। बच्चों के पालन पोषण और परिवार के संचालन के लिए आवश्यक कमाई का अधिकांश नियमित रूप से महाजन के हवाले करते रहना। अथवा अपनी जमीन-जायदाद, गहने, बर्तन बेचने के लिए मजबूर होना। मृतक-भोज की प्रथा ग्रस्त लोगों पर यह आर्थिक आपत्ति आये दिन ही रहती है, जिसको सभी प्रथा पालक देखते-सुनते ही रहते हैं।

🔶 खेद का विषय है कि किसी एक विषय में खुद तो लोग कुछ जानते नहीं, केवल आंख मीचे हुये लकीर पीटे चले आ रहे हैं और यदि कोई विचारशील व्यक्ति उनकी हित चिन्ता से कुछ बता कर सुधार करने का परामर्श देता है तो सुधार करना तो दूर उसकी बात भी ध्यान से नहीं सुनना चाहते। इसे समाज का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?जिन समाजों के सदस्य इस प्रकार के प्रतिगामी समाजों के सुधार के लिये उसके जागरूक तथा सम्पन्न व्यक्तियों को आगे निकल कर सामाजिक मूढ़ता के विरुद्ध सुधार का अभियान छेड़ ही देना चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...