बुधवार, 26 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 36)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 गंदगी स्वास्थ्य की दृष्टि से अतीव हानिकारक है। उसे बीमारी का संदेशवाहक कह सकते हैं। जहाँ गंदगी रहेगी वहाँ बीमारी जरूर पहुँचेगी। गंदगी से बीमारी को बहुत प्यार है। फूलों को तलाश करती हुई तितली जिस प्रकार फूल पर जा पहुँचती है, उसी तरह जहाँ गंदगी फल-फूल रही होगी वहाँ बीमारी भी खोज, तलाश करती हुई जरूर पहुँच जाएगी। बीमारी भी गंदगी पैदा करती है यह ठीक है, पर यह निश्चित है कि जो गंदे हैं वे स्वस्थ न रह सकेंगे। मनुष्य की मूल प्रकृति गंदगी के विरुद्ध है, इसलिए किसी व्यक्ति या पदार्थ को गंदा देखते हैं तो अनायास ही घृणा उत्पन्न होती है, वहाँ से दूर हटने का जी करता है। अस्तु जिन्हें मनुष्यता का ज्ञान है, उन्हें गंदगी हटाने का स्वभाव अपनी प्रकृति में अनिवार्यतः जोड़ देना चाहिए।

🔵 हर हालत में हर व्यक्ति को स्वच्छता के लिए स्नान आवश्यक मानना चाहिए। चेचक जैसे रोगों में मजबूरी उत्पन्न हो जाए तो बात दूसरी है, नहीं तो बीमारों को भी चिकित्सक के परामर्श से स्वच्छता का कोई न कोई रास्ता जरूर निकालते रहना चाहिए।
 
🔴 मुँह की सफाई बहुत ध्यान देने योग्य है। जीभ पर मैल की एक पर्त जमने लगती है और दाँतों की झिरी में अन्न के कण छिपे रहकर सड़न पैदा करते हैं। सबेरे कुल्ला करते समय दाँतों को भली प्रकार साफ करना चाहिए। जितने बार कुछ खाया जाए उतने ही बार कुल्ला करना चाहिए और रात को सोते समय तो जरूर ही मुँह की सफाई कर लेनी चाहिए। इससे दाँत अधिक दिन टिकेंगे, मुँह में बदबू न आएगी और लोगों को पास बैठने पर दूर हटने की आवश्यकता न पड़ेगी।

🔵 कपड़े जो शरीर को छूते हैं, उन्हें विशेष ध्यान देकर साबुन से रोज धोना चाहिए। बनियान, अंडरवियर, धोती, पायजामा आदि पसीना सोखते रहते हैं और रोज साबुन तथा धूप की अपेक्षा करते हैं। कोट जैसे कपड़े जिनका पसीने से सम्पर्क नहीं होता, नित्य धोने से छूट पा सकते हैं। भारी बिस्तरों को धोना तो कठिन पड़ेगा, पर शरीर छूने वाली चादरें जल्दी-जल्दी बदलते रहना चाहिए और बिस्तर को कड़ी धूप में हर रोज सुखाना चाहिए।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.49

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २६

🌹  खिलाड़ी भावना अपनाओ
🔵 आपके विषय में, आपकी योजनाओं के विषय में,, आपके उद्देश्यों के विषय में अन्य लोग जो कुछ विचार करते हैं, उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। अगर वे आपको कल्पनाओं के पीछे दौडऩे वाला उन्मुक्त अथवा स्वप्न देखने वाला कहें तो उसकी परवाह मत करो। तुम अपने व्यक्तित्व पर श्रद्धा को बनाए रहेा। किसी मनुष्य के कहने से,, किसी आपत्ति के आने से अपने आत्मविश्वास को डगमगाने मत दो। आत्मश्रद्धा को कायम रखोगे और आगे बढ़ते रहोगे तो जल्दी या देर में संसार आपको रास्ता देगा ही। 

🔴 आगे भी प्रगति के प्रयास तो जारी रखें ही जाएँ पर वह सब खिलाड़ी भावना से ही किया जाए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 26

🌹  The Spirit of Sportsmanship

🔵 If you wish to do something extraordinary, do not pay attention to what others think of your goals and plans. If they see you as an unrealistic dreamer, ignore it. Have faith in yourself. Do not let your faith waver because of someone's words or an adverse condition. If you keep going, you will ultimately find a way to proceed.

🔴 Keep applying your efforts, but do it with a spirit of sportsmanship: do not give up, even upon losing.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 26 July 2017


मंगलवार, 25 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 July

🔴 शक्तिशाली आत्म संकेत में अद्भुत शक्ति है। जिन विचारों के संपर्क में हम रहते हैं, जिनमें पुनः पुनः रमण करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। ये संकेत हमारे मानसिक संस्थान के एक अंग बन जाते हैं। प्रकाशमय विचार धारा से कंटकाकीर्ण और अन्धकारमय पथ भी आलोकित हो उठता है। जब आप दृढ़ता से कहते हैं, ‘मैं बलवान हूँ, दृढ़ संकल्प हूँ, गौरवशाली हूँ।” तो इन विचारों से हमारा आत्म विश्वास जागृत हो उठता है। हम साहस और पौरुष से भर जाते हैं और आत्म गौरव को समझने लगते हैं। हमारी शक्तियाँ वैसा ही काम करती हैं जैसी हम उन्हें आज्ञा देते हैं।

🔵 आत्म विश्वास पाने के लिए सफलता जादू जैसा प्रभाव डालती है। एक सफलता से मनुष्य दूसरी सफलता के लिए प्रेरणा पाता है। आप पहले एक साधारण कार्य चुन लीजिए और दृढ़ता से उसे पूर्ण कीजिए। जब यह पूर्ण हो जाय, तो अधिक बड़ा काम हाथ में लीजिए। इसे पूरा करके ही छोड़िए। तत्पश्चात् अधिक बड़े और दीर्घकालीन अपेक्षाकृत कष्ट साध्य कार्य हाथ में लीजिए और अपनी समस्त शक्ति से उसे पूर्ण कीजिए।

🔴 आपका मन कर्त्तव्य से, कठोर मेहनत से दूर भागेगा, उस कार्य को बीच में ही छोड़ने की ओर प्रवृत्त होगा। इस पलायन प्रवृत्ति से आपको सावधान रहना होगा। मन से लगातार लड़ना चाहिए और जब यह निश्चित मार्ग से च्युत होना चाहे, तुरन्त सावधानी से कार्य लेना चाहिए। कभी आपको आलस्य आयेगा, अपना कार्य मध्य ही में छोड़ देने को जी करेगा, लालच मार्ग में दिखलाई देंगे लेकिन आप छोटे लाभ के लिए बड़े फायदे को मत छोड़िए। भूल कर भी चञ्चल मन के कहने में मत आइए, प्रत्युत विवेक को जागृत कर उसके संरक्षण में अपने आपको रखिए। जाग्रत समय में मन को निरन्तर कार्य में लगाये रखिए। जब तक जागते हैं किसी उत्तम कार्य में अपने आपको संलग्न रखें, तत्पश्चात् सोयें। सुप्तावस्था में भी आप मन की चञ्चलता से दूर रह सकेंगे। धीरे धीरे धैर्य पूर्वक अभ्यास से मन चंचलता दूर होती है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २५

🌹  आप अपने मित्र भी हो और शत्रु भी

🔵 इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार- बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो क्योंकि समय अनन्त है। बार- बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढ़ाओ। निरन्तर कर्तव्य करते रहो, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे।

🔴 सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिड़ाओ क्योंकि यथार्थ में भी इतनी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषरोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी तुम्हें द़:ख नहीं पहुँचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली बुरी स्थितियाँ सामने हैं वह तुम्हारी ही पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जावेंगे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 25

🌹  You are Your Own Friend and Enemy

🔵 Do not dwell on repeated failures. You have plenty of time before you. Start afresh and keep performing your duties properly;
success will be yours in due time.

🔴 Do not beg others for help, because in reality, no one has the capacity to truly help you. Likewise, do not blame others when you are depressed as no one has the capacity to cause you pain. You are your own friend and enemy. Every situation you find yourself in, whether good or bad, is of your own creation. Change your outlook towards a situation, and right away the fear surrounding it will vanish.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

सोमवार, 24 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 25 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2017


👉 मदद और दया सबसे बड़ा धर्म

🔵 कहा जाता है दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। मदद एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरुरत हर इंसान को पड़ती है, चाहे आप बूढ़े हों, बच्चे हों या जवान; सभी के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब हमें दूसरों की मदद की जरुरत पड़ती है।

🔴 आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

🔵 किशोर नाम का एक लड़का था जो बहुत गरीब था। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद जंगल से लकड़ियाँ काट के लाता और उन्हें जंगल में बेचा करता। एक दिन किशोर सर पे लकड़ियों का गट्ठर लिए जंगल से गुजर रहा था।

🔴 अचानक उसने रास्ते में एक बूढ़े इंसान को देखा जो बहुत दुर्बल था उसको देखकर लगा कि जैसे उसने काफी दिनों खाना नहीं खाया है। किशोर का दिल पिघल गया, लेकिन वो क्या करता उसके पास खुद खाने को नहीं था वो उस बूढ़े व्यक्ति का पेट कैसे भरता? यही सोचकर दुःखी मन से किशोर आगे बढ़ गया।

🔵 आगे कुछ दूर चलने के बाद किशोर को एक औरत दिखाई दी जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था क्यूंकि जंगल में कहीं पानी नहीं था। बच्चे की हालत देखकर किशोर से रहा नहीं गया लेकिन क्या करता बेचारा उसके खुद के पास जंगल में पानी नहीं था। दुःखी मन से वो फिर आगे चल दिया। कुछ दूर जाकर किशोर को एक व्यक्ति दिखाई दिया जो तम्बू लगाने के लिए लकड़ियों की तलाश में था।

🔴 किशोर ने उसे लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में उसने किशोर को कुछ खाना और पानी दिया। किशोर के मन में कुछ ख्याल आया और वो खाना, पानी लेकर वापस जंगल की ओर दौड़ा। और जाकर बूढ़े व्यक्ति को खाना खिलाया और उस औरत के बच्चे को भी पानी पीने को दिया। ऐसा करके किशोर बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।

🔵 इसके कुछ दिन बाद किशोर एक दिन एक पहाड़ी पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था अचानक उसका पैर फिसला और वो नीचे आ गिरा। उसके पैर में बुरी तरह चोट लग गयी और वो दर्द से चिल्लाने लगा। तभी वही बूढ़ा व्यक्ति भागा हुआ आया और उसने किशोर को उठाया। जब उस औरत को पता चला तो वो भी आई और उसने अपनी साड़ी का चीर फाड़ कर उसके पैर पे पट्टी कर दी। किशोर अब बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।

🔴 मित्रों दूसरों की मदद करके भी हम असल में खुद की ही मदद कर रहे होते हैं। जब हम दूसरों की मदद करेंगे तभी जरुरत पढ़ने पर कोई दूसरा हमारी भी मदद करेगा। तो आज इस कहानी को पढ़ते हुए एक वादा करिये की रोज किसी की मदद जरूर करेंगे, रोज नहीं तो कम से कम सप्ताह एक बार , नहीं तो महीने में एक बार।

🔵 जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये, आप किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा सकते हैं या किसी प्यासे को पानी पिला सकते हैं या किसी हताश इंसान को सलाह दे सकते हैं या किसी को खाना खिला सकते हैं। यकीन मानिये ऐसा करते हुए आपको बहुत ख़ुशी मिलेगी और लोग भी आपकी मदद जरूर करेंगे।

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 35)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 जब हम किसी से मिलें या हमसे कोई मिले, तो प्रसन्नता व्यक्त की जानी चाहिए। मुस्कराते हुए अभिवादन करना चाहिए और बिठाने-बैठने कुशल समाचार पूछने और साधारण शिष्टाचार बरतने के बाद आने का कारण पूछना, बताना चाहिए । यदि सहयोग किया जा सकता हो तो वैसा करना चाहिए अन्यथा अपने परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए सहयोग न कर सकने का दुःख व्यक्त करना चाहिए। इसी प्रकार यदि दूसरा कोई सहयोग नहीं कर सका है तो भी उसका समय लेने और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में ही देना चाहिए। रूखा, कर्कश, उपेक्षापूर्ण अथवा झल्लाहट, तिरस्कार भरा उत्तर देना ढीठ और गँवार को भी शोभा देता है। हमें अपने को इस पंक्ति में खड़ा नहीं करना चाहिए।

🔵 बड़े जो व्यवहार करेंगे, बच्चे वैसा ही अनुकरण सीखेंगे। यदि हमें अपने बच्चों को अशिष्ट, उद्दंड बनाना हो तो ही हमें असभ्य व्यवहार की आदत बनाए रहनी चाहिए अन्यथा औचित्य इसी में है कि आवेश, उत्तेजना, उबल पड़ना, क्रोध में तमतमा जाना, अशिष्ट वचन बोलना और असत्य व्यवहार करने का दोष अपने अंदर यदि स्वल्प मात्रा में हो तो भी उसे हटाने के लिए सख्ती के साथ अपने स्वभाव के साथ संघर्ष करें और तभी चैन लें, जब अपने में सज्जनता की प्रवृत्ति का समुचित समावेश हो जाए।
 
🔴 हम अपनी और दूसरों की दृष्टि में सज्जनता और शालीनता से परिपूर्ण एक श्रेष्ठ मनुष्य की तरह अपना आचरण और व्यक्तित्व बना सकें तो समझना चाहिए कि मनुष्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। उसके आगे के कदम नैतिकता, सेवा, उदारता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के हैं। इसमें भी पहली एक अति आवश्यक शर्त यह है कि हम सज्जनता की सामान्य परिभाषा समझें और अपनाएँ, जिसके अंतर्गत मधुर भाषण और विनम्र, शिष्ट एवं मृदु व्यवहार अनिवार्य हो जाता है। अस्वच्छता मनुष्य की आंतरिक और गई-गुजरी स्थिति का परिचय देती है।

🔵 गंदा आदमी यह प्रकट करता है कि उसे अवांछनीयता हटाने और उत्कृष्टता बनाए रखने में कोई रुचि नहीं है। लापरवाह, आलसी और प्रमादी ही गंदे देखे गए हैं जो अवांछनीयता से समझौता करके उसे गले से लगाए रह सकता है, वही गंदा भी रह सकता है। गंदगी देखने में सबको बुरी लगती है और उस व्यक्ति के प्रति सहज ही घृणा भाव उत्पन्न करती है। गंदे को कौन अपने समीप बिठाना चाहेगा? दुर्गंध से किसे अपनी नाक, मलीनता से किसे अपनी आँखें और हेय प्रवृत्ति को देखकर कौन मनोदशा क्षुब्ध करना चाहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 7)

🔵 देवताओं की शिक्षाओं और प्रेरणाओं को मूर्तिमान करने के लिए ही अपने हिन्दू समाज में प्रतीक-पूजा की व्यवस्था की गई है। जितने भी देवताओं के प्रतीक हैं, उन सबके पीछे कोई न कोई संकेत भरा पड़ा है, प्रेरणाएँ और दिशाएँ भरी पड़ी हैं। अभी भगवान शंकर का उदाहरण दे रहा था मैं आपको और यह कह रहा था कि सारे विश्व का कल्याण करने वाले शंकर जी की पूजा और भक्ति के पीछे जिन सिद्धान्तों का समावेश है हमको उन्हें सीखना चाहिए था, जानना चाहिए था और अपने जीवन में उतारना चाहिए था। लेकिन हम उन सब बातों को भूलते चले गए और केवल चिन्ह-पूजा तक सीमाबद्ध रह गए।

🔴 विश्व-कल्याण की भावना को हम भूल गए। जिसे ‘शिव’ शब्द के अर्थों में बताया गया है। ‘शिव’ माने कल्याण। कल्याण की दृष्टि रखकर के हमको कदम उठाने चाहिए और हर क्रिया-कलाप एवं सोचने के तरीके का निर्माण करना चाहिए। यह शिव शब्द का अर्थ होता है। कल्याण हमारा कहाँ है? सुख हमारा कहाँ है? लाभ नहीं, वरन् कल्याण हमारा कहाँ है? कल्याण को देखने की अगर हमारी दृष्टि पैदा हो जाए तो यह कह सकते हैं कि हमने भगवान् शिव के नाम का अर्थ जान लिया। ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप तो किया, लेकिन ‘शिव’ शब्द का मतलब क्यों नहीं समझा। मतलब समझना चाहिए था और तब जप करना चाहिए था, लेकिन हम मतलब को छोड़ते चले जा रहे हैं और ब्रह्म रूप को पकड़ते चले जा रहे हैं। इससे काम बनने वाला नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 July

🔴 मानव जाति अनेक प्रकार के अत्याचार, दम्भ, छल, द्वेष, घृणा, वैर आदि से परिपूर्ण है। इसका कारण मन, वाणी और शरीर की एकता न होना है। चूँकि एकता न होने के कारण मनुष्य मन से कुछ सोचता है वाणी से कुछ कहता है और शरीर से कुछ करता है। यह कैसी विचित्र विडम्बना है। यह मनुष्य के पतन की पराकाष्ठा है। इसका उपाय केवल सत्य है। सत्य का अनुकरण करने से ही इनसे छुटकारा मिल सकता है। सत्य को अपनाने के पश्चात् हम जो कुछ मन में सोचेंगे उसे ही वाणी से कहेंगे तथा शरीर से करेंगे। इस प्रकार तीनों में एकता उत्पन्न हो जायगी। मन वाणी तथा शरीर की एकता के साथ मानव कर्त्तव्य ही सत्य है।

🔵 वर्तमान भूत पर आधारित है और भविष्यत् वर्तमान पर। हमने पहले जो कुछ अच्छा बुरा किया उसका परिणाम वर्तमान में अनुभव कर रहे हैं और वर्तमान में जो कुछ कर रहे हैं उसका परिणाम भविष्य में प्राप्त होगा। अच्छे या बुरे किये गये कर्मों का फल तो अवश्य मिलेगा ही, क्रिया निष्फल तो जाती नहीं। यदि भावी परिणाम नहीं सोचें तो वर्तमान तो एक क्षण मात्र ही है। परवर्ती क्षण ही तो भविष्यत् है जो क्षणान्तर में वर्तमान होने वाला है और वर्तमान का क्षण भूत हो जाने वाला है अतः उन दोनों से उदासीन रहा नहीं जा सकता। जैसा भी हम बनना चाहते हैं उसके योग्य प्रवृत्ति इस समय करनी होगी

🔴 अपने हृदय में यह बात अच्छी तरह स्थिर कीजिए कि आप योग्य हैं, प्रतिभाशाली हैं, शक्ति वान हैं। अपने उद्देश्य की ओर वीरता और धैर्य पूर्वक पाँव उठा रहे हैं। परमेश्वर ने कूट कूट कर आपमें अद्भुत योग्यताएँ भरी हैं। आत्म संकेत दिया करें। शान्त चित्त से मन में पुनः पुनः इस प्रकार के विचारों को प्रचुरता से स्थान दें कि “मैं बलवान हूँ। दृढ़ संकल्प हूँ। सब कुछ करने में समर्थ हूँ। मैं जिन पदार्थों की आशा−अभिलाषा करता हूँ, वह अवश्य प्राप्त करूंगा। मैं दृढ़ता से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मुझ में मानसिक धैर्य है। मेरा मानसिक संस्थान आत्म−विश्वास से परिपूर्ण है। मैं धैर्य पूर्वक अपने उद्देश्य की ओर पाँव उठा रहा हूँ। मैं विघ्न बाबाओं से विचलित नहीं होता हूँ।”
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २४

🌹  आत्मविश्वास जागृत करो

🔵 जब निराशा और असफलता को अपने चारों ओर मंडराते देखो तो समझो कि तुम्हारा चित्त स्थिर नहीं, तुम अपने ऊपर विश्वास नहीं करते।

🔴 वर्तमान दशा से छुटकारा नहीं हो सकता जब तक कि अपने पुराने सड़े गले विचारों को बदल नडालेा। जब तक यह विश्वास न हो जाए कि तुम अपने अनुकूल चाहे जैसी अवस्था निर्माण कर सकते हो तब तक तुम्हारे पैर उन्नति की ओर बढ़ नहीं सकते। अगर आगे भी न संभलोगे तो हो सकता है कि दिव्य तेज किसी दिन बिलकुल ही क्षीण हो जाए। यदि तुम अपनी वर्तमान अप्रिय अवस्था से छुटकारा पाना चाहते हो तो अपनी मानसिक निर्बलता को दूर भगाओ। अपने अंदर आत्मविश्वास जागृत करो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 24

🌹  Awaken Your Self-Confidence

🔵 When you find yourself in adverse situations and you feel that nothing is under your control, take it as a sign that you lack self-confidence.

🔴 Until you change your mindset, you cannot be rid of these adverse situations. You cannot create favorable conditions until you believe that you are fully capable of doing so. If you do not change your thinking now, the divinity in you will diminish. Tell yourself that the divinity within you is working in your favor, and replace your mental weakness with this ' awakened self-confidence.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 July 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 July 2017

👉 बाड़े की कील

 🔵 बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आप खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.”

🔴 पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी. पर धीरे-धीरे कीलों  की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक  काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना temper नहीं loose किया.

🔵 जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.”

🔴 लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी.

🔵 तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.

🔵 इसलिए अगली बार अपना temper loose करने से पहले सोचिये कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं!!

रविवार, 23 जुलाई 2017

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २३

🌹  आत्मशक्ति पर विश्वास रखो   

🔵 क्या करें, परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं हैं, कोई हमारी सहायता नहीं करता,, कोई मौका नहीं मिलता आदि शिकायतें निरर्थक हैं। अपने दोषों को दूसरों पर थोपने के लिए इस प्रकार की बातें अपनी दिल जमाई के लिए की जाती हैं। लोग कभी प्रारब्ध को मानते हैं, कभी देवी देवताओं के सामने नाक रगड़ते हैं। इन सबका कारण है अपने ऊपर विश्वास का न होना।

🔴 दूसरों को सुखी देखकर हम परमात्मा के न्याय पर उंगली उठाने लगते हैं। पर यह नहीं देखते कि जिस परिश्रम से इन सुखी लोगों ने अपने काम पूरे किये हैं, क्या वह हमारे अंदर है! ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता उसने वह आत्मशक्ति सबको मुक्त हाथों से प्रदान की है जिसके आधार पर उन्नति की जा सके।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 23

🌹  Believe in the Strength of Your Soul
🔵 It is useless to complain that circumstances are not favorable, or that no one helps you, or that there are no opportunities for you. People say things like this only to blame their misfortune on others or cover their own personal shortcomings. Some people even blame such things on their fate or luck, and beg for better fortune from various deities. This is all because they lack confidence in themselves.

🔴 We often fall prey to jealousy and fail to consider that others have achieved happiness because of their own hard work. God does not play, favorites. He has given everyone the opportunity and the strength of soul to make progress.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रतिष्ठित टेंपल्टन फाउंडेशन की पुरस्कार समिति के प्रथम भारतीय जज होंगे डॉ. चिन्मय पण्ड्या

🔴 आध्यात्मिक क्षेत्र के नोबल पुरस्कार माने जाने वाले टेंपल्टन पुरस्कार जांच समिति के प्रथम भारतीय जज होने का गौरव देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या को मिला है। उनके चयन होने पर अखिल विश्व गायत्री परिवार व देश-विदेश के सामाजिक व आध्यात्मिक संस्थानों के प्रमुखों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक बड़ी उपलब्धि बताया।

🔵 डॉ. चिन्मय को इस आशय का एक पत्र टेंपल्टन फाउण्डेशन के अध्यक्ष हिथर टेंपल्टन डिल ने भेजकर अनुरोध किया है कि वे इस पद को संभालने के साथ इस क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं एवं लोगों का मार्गदर्शन करें। पत्र में बताया गया है कि 1972 में स्थापित यह फांउडेशन प्रत्येक वर्ष विभिन्न देशों में सेउन चयनित व्यक्ति को यह पुरस्कार देता है, जिन्होंने व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से, जीवन के आध्यात्मिक आयाम की पुष्टि करने के लिए असाधारण योगदान दिया हो। उल्लेखनीय है कि भारत के तीन व्यक्तियों को अब तक यह पुरस्कार मिला है, जिनमें पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारतरत्न मदर टेरेसा एवं प्रख्यात दार्शनिक पांडुरंग शास्त्री आठवले हैं।

🔴 डॉ. चिन्मय पण्ड्या का कार्यकाल अक्टूबर 2017 से आगामी तीन वर्ष के लिए होगा। वे इस पद पर रहते हुए देश-विदेश में आध्यात्मिक व सामाजिक क्षेत्रों में कार्य कर रहे जांच समिति द्वारा नामित व्यक्तियों में से किसी एक का चयन करेंगे। अपने चयन पर डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि यह सम्मान केवल मेरा ही नहीं है, वरन् उन प्रत्येक भारतीयों के लिए है, जो इस क्षेत्र से जुड़े हैं। डॉ. चिन्मय ने अपने चयन को युगऋषि पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी की विशेष अनुकंपा मानते हुए कहा कि जज के रूप में नामित होना गायत्री परिवार व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के लिए ही नहीं, वरन् पूरे देश के लिए गौरव की बात है।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 23 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 July 2017


👉 मैं क्या करूँ देव

🔴 एक बार एक शिष्य में आपने गुरुदेव से कहा की - हॆ देव एक डर हमेशा रहता है! की माया बड़ी ठगनी है विशवामित्र जी का तप एक अप्सरा के आकर्षण मे चला गया तो राजा भरत जैसै महान सन्त एक हिरण के मोह मे ऐसे फँसे की उन्हे हिरण की योनि मे जन्म लेना पड़ा और तो और देवर्षि नारद तक को माया ने आकर्षित कर लिया और वो बच न पाये हॆ नाथ बस यही डर हमेशा बना रहता है की कही कामदेव की प्रबल सेना मुझे आप से अलग न कर दे हॆ नाथ आप ही बताओ की मैं क्या करूँ?

🔵 गुरुदेव कुछ देर मौन रहे फिर बोले
हॆ वत्स चलो मेरे साथ और बिल्कुल सावधान होकर चलना, देखना और फिर दोनो नगर पहुँचे और एक घर मे गये जहाँ एक माँ की गोद मे छोटा सा बच्चा बैठा था गुरुदेव ने उस बच्चे के आगे कुछ स्वर्ण मुद्रायें डाली पर वो बच्चा गोद से न उतरा फिर आकर्षक खिलोने रखे पर वो गोद से न उतरा फिर गुरुदेव ने उस बच्चे को लिया तो वो बच्चा जोर जोर से रोने लगा फिर ऋषिवर ने उस बच्चे को वापिस माँ की गोद मे बिठाया तो वो बस अपनी माँ से चिपक कर रोने लगा!

🔴 गुरुदेव फिर आगे बढे फिर एक माँ की गोद मे एक बालक बैठा था गुरुदेव ने उस बच्चे के सामने स्वर्ण मुद्रा और खिलौने डाले तो वो बच्चा खिलौने की तरफ़ बढ़ा और उन खिलौनों को अपने हाथों मे ले लिया पर जैसै ही उसकी माँ उठकर जाने लगी तो उसने उन खिलौनों को वही छोड़कर अपनी माँ की तरफ़ भागा और उस माँ ने उसे अपनी गोद मे उठा लिया!

🔵 फिर गुरुदेव आश्रम पहुँचे और शिष्य से कहने लगे हॆ वत्स जब तक बच्चा अबोध है वो न खिलौनों को महत्व देगा न स्वर्ण मुद्रा को और वो बस अपनी माँ की गोद मे ही रहना चाहेगा!

🔴 दुसरा वो जिसने खिलौने तो ले रखे है पर जैसै ही उसे तनिक भी आभास हुआ की माँ जा रही है तो उसने उन खिलौनों का त्याग कर दिया और अपनी माँ के पास चला गया!

🔵 इसलिये हॆ वत्स माँ और सद्गुरु  के सामने अबोध बना रहना और त्यागी बनना! हॆ वत्स वस्तुतः होता क्या है जब तक बच्चा अबोध होता है तब तक माँ से दुर नही होना चाहता फिर जैसै जैसै वो बड़ा होता है तो सबसे पहले वो खिलौनों के आकर्षण मे आ जाता है फिर रिश्तों के आकर्षण मे चला जाता है फिर दौलत के आकर्षण मे चला जाता है और फिर इस तरह से आकर्षण बदलता रहता है कभी किसी के प्रति तो कभी किसी के प्रति और फिर वो धीरे धीरे आकर्षण के दलदल मे फंसता ही चला जाता है !

🔴 शिष्य ने गुरुदेव से पूछा की  - हॆ गुरुदेव इससे कैसे बचे ?

🔵 गुरुदेव नें कहा - हॆ वत्स माँ और सद्गुरु के सामने अबोध बन, त्यागी बन और प्रेमी बन और हॆ वत्स सद्गुरु के चरणों मे जब प्रीति बढ़ती है तो फिर आकर्षण सिर्फ ईष्ट मे आ जाता है सद्गुरु उसके जीवन मे किसी और आकर्षण को टिकने न देंगे!

🔴 आकर्षण अल्पकालिन है और प्रेम अजर और अमर है, आकर्षण सहज है और प्रेम मुश्किल और निःस्वार्थ, निष्काम और निष्कपट प्रेम बहुत ही दुर्लभ है क्योंकि प्रेम त्याग मांगता है देने का नाम प्रेम है और लेने का नाम स्वार्थ और जहाँ स्वार्थ हावी हो जाता है वहाँ से प्रेम चला जाता है!

🔵 आकर्षण किसी के भी प्रति आ सकता है आकर्षण से मोह का जन्म होता है और मोह से आसक्ति का उदय होता है और आसक्ति किसी के भी प्रति आ सकती है और एक बात अच्छी तरह से याद रखना की इष्ट के सिवा किसी और मे आसक्ति कभी मत आने देना नही तो अंततः परिणाम बड़े दर्दनाक होंगे! जब आकर्षण आने लगे तो सद्गुरु के दरबार मे चले जाना इष्ट मे एकनिष्ठ हो जाना!

🔴 एक बात हमेशा याद रखना की प्रेम गली बहुत सकडि है जहाँ दो के लिये जगह नही है जैसै एक म्यान मे दो तलवारें एक साथ नही आ सकती है वैसे ही एक जीवन मे दो से प्रेम नही हो सकता है! हाँ चयन के लिये तुम पुरी तरह से स्वतंत्र हो चाहो तो ईश्वर को चुन लो और चाहो तो नश्वर को चुन लो!

🔵 हॆ वत्स ये कभी न भुलना की सारे मिट्टी के खिलौने नश्वर है और केवल श्री हरि ही नित्य है और श्री हरि और गुरु के दरबार मे अबोध बने रहना नही तो अहम, मोह और अन्य दुर्गुणों को आने मे समय न लगेगा!

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 34)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 किसके भीतर क्या है, इसका परिचय उसके व्यवहार से जाना जा सकता है। जो शराब पीकर और लहसुन खाकर आया होगा, उसके मुख से बदबू आ रही होगी। इसी प्रकार जिसके भीतर दुर्भावनाएँ, अहंकार और दुष्टता का ओछापन भरा होगा, वह दूसरों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करेगा। उसकी वाणी से कर्कशता और असभ्यता टपकेगी। दूसरे से इस तरह बोलेगा जिससे उसे नीचा दिखाने, चिढ़ाने, तिरस्कृत करने और मूर्ख सिद्ध करने का भाव टपके। ऐसे लोग किसी पर अपने बड़प्पन की छाप छोड़ सकते, उलटे घृणास्पद और द्वेषभाजन बनते चले जाते हैं। कटुवचन मर्मभेदी होते हैं, वे जिस पद छोड़ें जाते हैं, उसे तिलमिला देते हैं और सदा के लिए शत्रु बना लेते हैं। कटुभाषी निरंतर अपने शत्रुओं की संख्या बढ़ाता और मित्रों की घटाता चला जाता है।

🔵 दूसरों के साथ असज्जनता और अशिष्टता का बरताव करके कई लोग सोचते हैं, इससे उनके बड़प्पन की छाप पड़ेगी, पर होता बिलकुल उल्टा है। तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करने वाला व्यक्ति घमंडी और ओछा समझा जाता है। किसी के मन में उसके प्रति आदर नहीं रह जाता। उद्धत स्वभाव के व्यक्ति अपना दोष आप भले ही न समझें, दूसरे लोग उन्हें उथला, हल्का मानते हैं और उदासीनता, उपेक्षा का व्यवहार करते हैं। समय पड़ने पर ऐसा व्यक्ति किसी को अपना सच्चा मित्र नहीं बना पाता और आड़े वक्त कोई उसके काम नहीं आता। सच तो यह है कि मुसीबत के वक्त वे सब लोग प्रसन्न होते हैं, जिनको कभी तिरस्कार सहना पड़ा था। ऐसे अवसर पर वे बदला लेने और कठिनाई बढ़ाने की ही बात सोचते हैं।
 
🔴 हमें संसार में रहना है तो सही व्यवहार करना भी सीखना चाहिए। सेवा-सहायता करना तो आगे की बात है, पर इतनी सज्जनता तो हर व्यक्ति में होनी चाहिए कि जिससे वास्ता पड़े उससे नम्रता, सद्भावना के साथ मीठे वचन बोलें, थोड़ी-सी देर तक कभी किसी से मिलने का अवसर आए, तब शिष्टाचार बरतें। इसमें न तो पैसा व्यय होता है, न समय। जितने समय में कटुवचन बोले जाते हैं, अभद्र व्यवहार किया जाता है, उससे कम समय में मीठे वचन और शिष्ट तरीके से भी व्यवहार किया जा सकता है। उद्धत स्वभाव दूसरों पर बुरी छाप छोड़ता है और उसका परिणाम कभी-कभी बुरा ही निकलता है। अकारण अपने शत्रु बढ़ाने चलना, बुद्धिमानी की बात नहीं। इस प्रकार के स्वभाव का व्यक्ति अंततः घाटे में रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.47

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8

👉 Lose Not Your Heart Day 22

🌹  The Combination of Contemplation and Character
🔵 Instead of looking for faults in others, discover your own faults. There is nothing to be gained by finding faults in others. You are only responsible for the mental and physical weaknesses of your own person. One-fourth of the circumstances you receive are a result of your own past actions. Nevertheless, three- fourths of the situations life gives you are a result of your current outlook and the effectiveness with which you are fulfilling your duties. If you take up the task of correcting yourself, you can solve many of your own mental and physical problems.

🔴 No one is impressed by those who talk a great deal and accomplish very little. Those who have incorporated contemplation and character into their lives, however, can influence many people. Such people are the ones who make a difference in their environment

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 22 July 2017


शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

👉 पिछले 10 सालों से सड़कों के गड्ढों की मरम्मत कर रहें है यह साइंटिस्ट

🔵 मॉनसून के सीजन में शायद ही कोई सड़क गड्ढों से मुक्त रहती है। इस वजह से कई लोग दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। कुछ लोग निगम में शिकायत करते तो हैं, लेकिन ज्यादातर समय कोई कार्रवाही नहीं होती है। हममें से भी ज्यादातर इससे आगे कुछ और नहीं करते हैं, लेकिन एक साइंटिस्ट पिछले 10 वर्षों से चुपचाप गड्ढों की मरम्मत करने में लगे हुए हैं। राज सिंह नामक इस वैज्ञानिक ने एक जिम्मेदार नागरिक होने का उदाहरण तय किया है।

🔴 केंद्र सरकार के साथ काम करने वाले राज सिंह दिल्ली के रहने वाले हैं। वह अहमदाबाद में प्लाज़्मा रिसर्च सेंटर में कार्यरत हैं। उनका मानना है कि सड़कों पर गड्ढे ड्राइवरों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इनकी मरम्मत से दुर्घटना की संभावना को कम किया जा सकता है। राज की कार का बैक सीट प्लास्टिक बैगों से भरा हुआ है, जिसमें मरम्मत के सामान रखे होते हैं। जहां कहीं भी उन्हें सड़कों पर गड्ढे दिखते हैं, वह फौरन गाड़ी रोक कर सड़कों की मरम्मत में लग जाते हैं।

🔵 राज सुबह के 6 से 8 बजे के बीच ही गड्ढों की मरम्मत करने का काम करते हैं, जब सड़कों पर ट्रैफिक कम होता है। कभी-कभी उन्हें काम करता देख लोग भी मदद करने आते हैं। उनका मानना है कि अगर हर एक नागरिक पूरी जिम्मेदारी के साथ यह काम करे तो बेस्ट ऐंड क्लीन सिटी का खिताब हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता है। राज इसके साथ ही पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने में भी ऐक्टिव रहते हैं।

🔴 साइंटिस्ट राज ने बताया, 'देश के प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान चला रहे हैं। यह मेरी तरफ से छोटा सा योगदान है। बारिश की वजह से सड़कों पर कई सारे गड्ढे बन जाते हैं। निगम इन सभी गड्ढों को नहीं भर सकता है। ऐसे में एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैं गड्ढों की मरम्मत करता हूं, जिससे ट्रैफिक की समस्या होने के साथ ही ऐक्सिडेंट भी रुकते हैं।'

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 33)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 जिन्हें मानव जन्म के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियाँ निबाहनी हों, उनके लिए करने को तो बहुत कुछ पड़ा है, पर वह सब बन तभी पड़ेगा जब निजी जीवन में संतोष और सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसे लोकमंगल के कार्यों के लिए समुचित उत्साह अंतःकरण में उमंगता हो। जिम्मेदारियाँ निबाहने का, सुसंस्कारिता के लक्ष्य तक पहुँचने वाला यही राजमार्ग है।

🔵 सुसंस्कारिता का चौथा चरण है- बहादुरी दैनिक जीवन में अनेकानेक उलझनें आती रहती हैं। उन सबसे निपटने के लिए आवश्यक साहस होना आवश्यक है, अन्यथा हड़बड़ी में समाधान का कोई सही उपाय तक नहीं सूझ पड़ेगा। आगे बढ़ने और ऊँचा उठने की प्रतिस्पर्द्धाओं में सम्मिलित होना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव की गहराई तक घुसे, जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कारों से भी, निरंतर वह महाभारत लड़ने का कृत्य करना पड़ता है, जिसमें गीताकार ने अर्जुन को प्रशंसा एवं भर्त्सना की नीति अपनाते हुए प्रवृत्त होने के लिए उद्धत किया है। अपने को निखारने, उबारने और उछालने के लिए अदम्य साहस का सहारा लिए बिना कोई मार्ग नहीं। समाज में अवांछनीय तत्त्वों की, अंधविश्वासों, कुप्रचलनों और अनाचारों की कमी नहीं है।
 
🔴 उनके साथ समझौता संभव नहीं, जो चल रहा है, उसे चलने देना सहन नहीं हो सकता। उसके विरुद्ध असहयोग, विरोध की नीति अपनाए बिना और कोई चारा नहीं। इसके लिए सज्जन प्रकृति के लोगों को संगठित भी तो करना होता है। यह सभी बहादुरी के चिह्न है, इन्हें भी सुसंस्कारिता का महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है।

🔵 सभ्यता के सर्वतोमुखी क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए जागरूकता, पराक्रम, प्रयत्न अपनाए जाने की आवश्यकता है, वहीं सुसंस्कारिता को भी बढ़ाने और अपनाने के लिए, भरपूर प्रयत्न करते रहने की भी अनिवार्य आवश्यकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.45

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 5)

🔵 भगवान शंकर मरघट में निवास करते हैं। मरघट में क्यों रहते हैं? इसका मतलब कि हमें जिंदगी के साथ मौत को भी याद रखना पड़ेगा। सब चीजें याद हैं, पर मौत को हम भूल गए। अपना फायदा, नुकसान, जवानी, खाना-पीना सब कुछ याद है, पर मौत जरा भी याद नहीं है? मौत की बात भी अगर याद रही होती तो हमारे काम करने और सोचने के तरीके कुछ अलग तरह के रहे होते। वे ऐसे न होते जैसे कि इस समय आपके हैं। अगर यह ख्याल बना रहे कि आज हम जिंदा हैं, पर कल हमें मरना ही पड़ेगा; आज मरे हैं, पर कल जिंदा रहना ही पड़ेगा तो यह स्मृति सदा बनी रहती कि हमको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?

🔴 हमारे लिए मरघट और घर दोनों एक ही होने चाहिए। समझना चाहिए कि आज का घर कल मरघट होने वाला है और आज का मरघट कल घर होने वाला है। आज की जिंदगी कल मौत में बदलने वाली है तो कल की मौत नई जिंदगी में बदलने वाली है। मौत और जिंदगी रात और दिन के तरीके से खेल है, फिर मरने के लिए डरने से क्या फायदा? यह नसीहतें हैं जो शंकर भगवान मरघट में रहकर के हमको सिखाते हैं।

🔵 भगवान शंकर न जाने क्या-क्या सिखाते हैं? उनके शरीर को देखा जाए तो मालूम पड़ेगा कि उस पर भस्म लगी हुई है और गले में मुण्डों की माला पड़ी है। अगर सही ढंग से जीवन जीना आता होता तो हमने शंकर जी की भस्म का महत्त्व समझा होता। पूजा करने के बाद हम हवन करते और उसकी भस्म मस्तक पर लगाते हैं। इसका अर्थ है ‘भस्मांतक œ शरीरम्’—यह शरीर खाक होने वाला है। यह शरीर मिट्टी और धूल है, जो हवा में उड़ने वाला है। जिस शरीर पर हम लोगों को अहंकार और घमंड है, वह कल लोगों के पैरों तले कुचलने वाला है और हवा के धुर्रे की तरीके से आसमान में उड़ने वाला है। शंकर भगवान की यह फिलॉसफी अगर हमने सीखी होती तो मजा आ जाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं नारी हूँ (अन्तिम भाग)

🔴 मैं खड्गधारिणी काली हूँ, पाखण्डों का वध करने के लिए। मैं दश प्रहरणधारिणी दुर्गा हूँ, संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए। मैं लक्ष्मी हूँ - संसार को सुशोभन बनाने के लिए। मैं सरस्वती हूँ - जगत में विद्या वितरण के लिए। मैं धरणी हूँ - सहिष्णुता के गुण से। आकाश हूँ - सबकी आश्रयदायिनी होने से। वायु हूँ - सबकी जीवनदायिनी होने से और जल हूँ सबको रससिक्त करने वाली - दूसरों को अपना बनाने वाली होने से। मैं ज्योति हूँ - प्रकाश के कारण और मैं माटी हूँ - क्योंकि मैं माँ हूँ।

🔵 मेरे धर्म के विषय में मतभेद मतान्तर नहीं है। मेरा धर्म है नारीत्व, मातृत्व। मुझ में जातिभेद जनित कोई चिन्ह नहीं है। सम्पूर्ण नारी जाति मेरी जाति है।

🔴 मैं सबसे अधिक छोटा बनना जानती हूँ परन्तु मैं बड़ी स्वाभिमानी हूँ। मेरे भय से त्रिभुवन काँपता है। मैं जो चाहती हूँ, वही पाती हूँ, तो भी मेरा मान जगत प्रसिद्ध है।

🔵 पुरुष कामुक है इसलिए वह अपने ही समान मानकर मुझको कामिनी कहता है। पुरुष दुर्बल है, सहज ही विभक्त हो जाता है, इसी से मुझे दारा कहता है। मैं सभी सहती हूँ, क्योंकि मैं सहना जानती हूँ। मैं मनुष्य को गोद में खिलाकर मनुष्य बनाती हूँ। उसके शरीर की धूलि से अपना शरीर मैला करती हूँ, इसलिए कि मैं यह सब सह सकती हूँ।

🔴 रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं। इनमें मेरा ही गान हुआ है। यही कारण है जगत को और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रन्थ समर्थ नहीं हुआ। मैं दूसरी भाषा सीखती हूँ, परन्तु बोलती हूँ अपनी ही भाषा और मेरी सन्तान इसलिए उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है।

🔵 मुझको क्या पहचान लिया है ? नहीं पहचाना, तो फिर पहचान लो। मैं नारी हूँ, इक्कीसवीं सदी में अपना प्रभुत्व लेकर आ रही हूँ।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 Lose Not Your Heart Day 21

🌹  The Importance of Hard Work and Desire

🔵 The desire to achieve something is an immensely powerful force. It can drive a person to work a hundred times harder than his normal capacity. You might be surprised at what I have achieved; from writing so much literature to bringing this revolution and creating so many ashrams how did all of this happen? This is the result of hard work and a desire to achieve.

🔴 If i had not applied myself to hard work, I might have remained the type of person for whom it is difficult even to make his own living. I would have accumulated money for my own petty entertainment by whatever means possible, but i would never have been able to accomplish such a Himalayan task.d you will retain your mental equilibrium.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 21 July 2017


गुरुवार, 20 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 32)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 सुसंस्कारिता का तीसरा पक्ष है- जिम्मेदारी मनुष्य अनेकानेक जिम्मेदारियों से बँधा हुआ है। यों गैर जिम्मेदार लोग कुछ भी कर गुजरते हैं, किसी भी दिशा में चल पड़ते हैं। अपने किन्हीं भी उत्तरदायित्वों से निर्लज्जतापूर्वक इंकार कर सकते हैं, पर जिम्मेदार लोगों को ही अपने अनेक उत्तरदायित्वों का सही रीति से, सही समय पर निर्वाह करना पड़ता है। स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की, जीवन सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की, लोक परलोक को उत्कृष्ट बनाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी जो निभाना चाहते हैं, वे ही संतोष, यश और आरोग्य का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

🔵 पारिवारिक जिम्मेदारियाँ समझने वाले आश्रितों को स्वावलम्बी, सद्गुणी बनाने में निरत रहते हैं और संतान बढ़ाने के अवसर आने पर फूँक- फूँ क कर कदम रखते हैं। हजार बार सोचते- समझते हैं और विचार करते हैं कि अभ्यागत को बुलाने के लिए उपयुक्त सामग्री, आश्रितों और असमर्थों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में संकीर्ण स्वार्थपरता उन्हें बाधा नहीं डालती।

🔴 पेट और प्रजनन तक ही मनुष्य की सीमा नहीं है। धर्म और संस्कृति के प्रति, विश्व मानवता के प्रति, मनुष्य के सामाजिक एवं सार्वभौम उत्तरदायित्व जुड़े हैं, यहाँ तक कि अन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रति भी। उन सभी के संबंध में दायित्वों एवं कर्तव्यों के निर्वाह की चिंता हर किसी को रहनी चाहिए। यह कार्य तभी संभव है, जब अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया जाए। औसत व्यावहारिक स्तर का निर्वाह स्वेच्छापूर्वक स्वीकार किया जाए।

🔵 यह लोभ, मोह, अहंकार का, वासना, तृष्णा और संकीर्ण स्वार्थपरता का घटाटोप ऊपर छाया होगा, तो फिर नासमझ बच्चों का मन, न तो उस स्तर का सोचेगा और न सयानों से लोकमंगल के लिए कुछ निकालते बन पड़ेगा। आवश्यकताएँ तो कोई थोड़े श्रम, समय में पूरी कर सकता है, पर वैभव जन्य भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ तो ऐसी हैं जिन्हें पूरी कर सकना रावण, हिरण्यकश्यपु, सिकंदर आदि तक के लिए संभव नहीं हुआ, फिर सामान्य स्तर के लोगों की तो बात ही क्या है? वे हविश की जलती चिताओं वाली कशमकश में आजीवन विचरण करते रहते हैं। भूत- पलीत की तरह डरते- डराते समय गुजारते और अन्ततः असंतोष तथा पाप की चट्टानों ही सिर पसर लादकर विदा होते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.44

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.7

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 5)

🔵 शंकर जी का विवाह हुआ तो लोगों ने कहा कि किसी बड़े आदमी को बुलाओ, देवताओं को बुलाओ। उन्होंने कहा नहीं, हमारी बारात में तो भूत-पलीत ही चलेंगे। रामायण का छंद है—‘तनु क्षीन कोउ अति पीत पावन कोउ अपावन तनु धरे।’ शंकर जी ने भूत-पलीतों का, पिछड़ों का भी ध्यान रखा और अपनी बारात में ले गये। आपको भी इनको साथ लेकर चलना है।

🔴 शंकर जी के भक्तों! अगर आप इन्हें साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर आपको सोचने में मुश्किल पड़ेगी, समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और फिर जिस आनन्द में और खुशहाली में शंकर के भक्त रहते हैं, आप रह नहीं पाएँगे। जिन शंकर जी के चरणों में आप बैठे हुए हैं, उनसे क्या कुछ सीखेंगे नहीं? पूजा ही करते रहेंगे आप! यह सब चीजें सीखने के लिए ही हैं। भगवान् को कोई खास पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती।

🔵 शंकर भगवान की सवारी क्या थी? बैल। वह बैल पर सवार होते हैं। बैल उसे कहते हैं, जो मेहनतकश होता है, परिश्रमी होता है। जिस आदमी को मेहनत करनी आती है वह चाहे भारत में हो, इंग्लैण्ड, फ्रांस या कहीं का भी रहने वाला क्यों न हो—वह भगवान की सवारी बन सकता है। भगवान सिर्फ उनकी सहायता किया करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं। बैल हमारे यहाँ शक्ति का प्रतीक है, हिम्मत का प्रतीक है।

🔴 आपको हिम्मत से काम लेना पड़ेगा और अपनी मेहनत तथा पसीने के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, अपनी अक्ल के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, आपके उन्नति के द्वार और कोई नहीं खोल सकता, स्वयं खोलना होगा। भैंसे के ऊपर कौन सवार होता है—देखा आपने शनीचर। भैंसा वह होता है जो काम करने से जी चुराता है। बैल-हमेशा से शंकर जी का बड़ा प्यारा रहा है। वह उस पर सवार रहे हैं, उसको पुचकारते हैं, खिलाते-पिलाते, नहलाते-धुलाते, और अच्छा रखते हैं। हमको और आपको बैल बनना चाहिए, यह शंकर जी की शिक्षा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं नारी हूँ (भाग 2)

🔴 गर्वित पुरुष जब सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्र प्राणियों की अपेक्षा और भी अधिक हिंस्र हो जाता है, कठोरता के साथ मिलते मिलते उसकी कोमल वृत्तियाँ जब सूख जाती हैं। जब वह राक्षसी वृत्तियों का सहारा लेकर जगत को चूर चूर कर डालने के लिए उतारू हो जाता है। तब उस शुष्क मरुभूमि में जल की सुशीतल धारा कौन बहाती है ? मैं ही, उसकी सहधर्मिणी ही। उसको, अपने पास बैठाकर अपना अपनत्व उसमें मिलाकर मैं उसे कोमल करती हूँ। मेरी शक्ति अप्रतिहत है। प्रयोग करने की कला जानने पर वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।

🔵 बाहर के जगत में मेरे कर्तव्य का विस्तार होते हुए भी मैं अपने घर को नहीं भूलती। वह मेरे पिता, पति, भाई और पुत्र की आश्रय भूमि हैं उन्हें यहाँ मेरी सुशीतल छाया नहीं मिलेगी, तो वे विश्रान्ति कहाँ पाएंगे। उनका समूचा अस्तित्व मेरी गोद में अनायास समा जाता है। यही कारण है कि मेरी कर्मभूमि उनकी कर्मभूमि से कहाँ विशाल है। पुरुष जिस काम को नहीं कर सकता, उसको मैं अनायास ही कर सकती हूँ प्रमाण, पुरुष के अभाव में संसार चल सकता है परन्तु मेरे अभाव में अचल हो जाता है सब रहने पर भी कुछ नहीं रहता।

🔴 मैं पढ़ती हूँ, सन्तान को शिक्षा देने के लिए , पति के थके मन को शान्ति देने के लिए। मेरा ज्ञान मानव जीवन में विवेक का प्रकाश फैलाने के लिए है। मैं गाना बजाना सीखती हूँ - शौकीनों की लालसा पूर्ण करने के लिए नहीं, नर हृदय को कोमल बनाकर उसमें पूर्णता लाने के लिए, पुरुष की सोयी संवेदना जगाने के लिए। मैं स्वयं नहीं नाचती, वरन् जगत को नचाती हूँ।

🔵 मैं सीखती हूँ - सिखाने के लिए। शिक्षा के क्षेत्र में मेरा जन्मगत अधिकार है। मैं गुलाम नहीं पैदा करती। मैं प्रकट करती हूँ आदर्श, सृजन करती हूँ मानव, महामानव। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, दयानन्द, विवेकानन्द, अरविन्द सब मेरी ही देन है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 Lose Not Your Heart Day 20

🌹  Do Not Stray

🔵 The desire to survive can quickly give way to the desire for wealth, fame, and material success, each of which is so powerful that an ordinary person can be easily swept away. Only those with their sights set on higher ideals can remain firm against the tide.

🔴 When you feel lost, remember when determination first took root in your heart. Make sure that your commitment to your cause is not ebbing away.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 20 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 July 2017


👉 खुशी की वजह.....

🔴 मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जाकर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।

🔵 अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जबकि आप खुद भी रोती हो।

🔴 उसने जवाब दिया भाई साहब इसके पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उनके जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इसकी पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।

🔵 जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।

🔴 इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।

🔵 मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।

🔴 अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।

🔵 वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिसकी दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।

🔴 थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उसके पीछे पीछे चल रहा था।

🔵 बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धोकर स्कूल चल दिया। मै भी उसके पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उसके टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जाकर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इसके घर पर भी खबर दे चुका हूँ।

🔴 खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।

🔵 सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।

🔴 वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।

🔵 अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह  बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगातार रो रही थी, और मैने फौरन उसके टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।

🔴 उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट लेलो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

🔵 आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगाकर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका।

🔴 मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किसके लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इसलिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

🔵 तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे ? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं।

🔴 टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उनके बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।

🔵 क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकालकर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।
🔴 आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना !!!!

बुधवार, 19 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 31)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उस अनुभवी किसान की गतिविधियों जैसी हैं, जिनके अनुसार खेत जोतने, बीज बोने खाद- पानी देने, रखवाली करने में आरंभिक हानि उठाने और कष्ट सहने को शिरोधार्य किया जाता है। दूरदर्शिता उसे बताती है कि इसका प्रतिफल उसे समयानुसार मिलने ही वाला है। एक बीज के दाने के बदले सौ दाने उगने ही वाले हैं और समय पर उस प्रयास के प्रतिफल कोठे भरे धन धान्य के रूप में मिलने ही वाले हैं। संयम और सत्कार्य ऐसे ही बुद्धिमत्ता है। पुण्य परमार्थ में भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाली संभावनाएँ सन्निहित है।

🔵 संयम का प्रतिफल वैभव और पौरुष के रूप में दृष्टिगत होने वाली है। दूरबीन के सहारे दूर तक की वस्तुओं को देखा जा सकता है। और उस जानकारी के आधार पर अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय लिया जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में इसी को तृतीय नेत्र खुलना भी कहते हैं, जिसके आधार पर विपत्तियों से बचना और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का सृजन संभव हो सकता है।

🔴 सुसंस्कारिता का दूसरा चिह्न है- ईमानदारी कथनी और करनी को एक- सा रखना ईमानदारी है। आदान- प्रदान में प्रामाणिकता को इसी सिद्धांत के सहारे अक्षुण्ण रखा जाता है। विश्वसनीयता इसी आधार पर बनती है। सहयोग और सद्भाव अर्जित करने के लिए ईमानदारी ही प्रमुख आधार है। इसे अपने व्यवसाय में अपनाकर कितनों ने छोटी स्थिति से उठकर बड़े बनने में सफलता पाई है। बड़े उत्तरदायित्वों को उपलब्ध करने और उसका निर्वाह करने में ईमानदार ही सफल होते हैं।

🔵 इस सद्गुण को सुसंस्कारिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष माना गया है। उसे अपनाने वाले ईमानदारी और परिश्रम की कमाई से ही अपना काम चला लेते हैं। उनकी गरीबी भी ऐसी शानदार होती है, जिस पर अमीरी के भंडार को निछावर किया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.43

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.7

👉 मैं नारी हूँ (भाग 1)

🔴 मैं नारी हूँ। मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूँ और अपने पुत्र की जननी हूँ। मुझ सा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत् मेरा कर्मक्षेत्र है, मैं स्वाधीन हूँ, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ। मैं जगत में किसी से नहीं डरती। मैं महाशक्ति की अंश हूँ। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है।

🔵 मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु उच्छृंखल नहीं हूँ। मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूँ, परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं केवल कहती ही नहीं करती भी हूँ। मैं काम न करूं, तो संसार अचल हो जाए। सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती। जो कर्म करने का अभिमान करते हैं, उनके हाथ थक जाते हैं।

🔴 मेरा कर्मक्षेत्र बहुत बड़ा है। वह घर के बाहर है और घर के अन्दर भी। घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं। मैं जिधर देखती हूँ, उधर ही अपना अप्रतिहत कर्तव्य पाती हूँ। मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है, क्योंकि मैं वैसा सुअवसर किसी को देती ही नहीं। पुरुष मेरी बात सुनने के लिए बाध्य है - आखिर मैं गृहस्वामिनी जो हूँ। मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता है। इसलिए पति के सन्देह का तो कोई कारण ही नहीं है और पुत्र, वह तो मरा है ही, उसी के लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं। इन दोनों को , पति को और पुत्र को अपने वश में करके मैं जगत् में अजेय हूँ। डर किसको कहते हैं, मैं नहीं जानती। मैं पाप से घृणा करती हूँ। अतएव डर मेरे पास नहीं आता। मैं भय को नहीं देखती इसी से कोई दिखाने की चेष्टा नहीं करता।

🔵 संसार में मुझसे बड़ा और कौन है ? मैं तो किसी को भी नहीं देखती और जगत में मुझसे बढ़कर छोटा भी कौन है ? उसको भी तो कहीं नहीं खोज पाती। पुरुष दम्भ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूँ, मैं किसी की परवाह नहीं करता। वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कंपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है, क्योंकि मैं उसकी माँ हूं। उसके रुद्र रूप को देखकर हजारों लाखों काँपते हैं, परन्तु मेरे अंगुली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है। मैं उसकी माँ - केवल असहाय बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ। जिसके स्तनों का दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उसका मातृत्व के इशारे पर सिर झुकाकर चलने के लिए वह बाध्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 July

🔴 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔵 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

🔴 सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 4)

🔵 भगवान शंकर के मस्तिष्क के ऊपर चन्द्रमा लगा हुआ है। चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, जो बताता है कि हमारे मस्तिष्क को संतुलित होना चाहिए, ठंडा होना चाहिए, बलिष्ठ होना चाहिए। हम पर मुसीबतें आती हैं, संकट के, कठिनाई के दिन आते हैं। हर हालत में हमें अपनी हिम्मत बना करके रखनी चाहिए कि हम हर मुसीबत का सामना करेंगे। इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है। जो घबरा जाते हैं, उनका मस्तिष्क संतुलित नहीं रहता, गर्म हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिमाग ठंडा है, वही सही ढंग से सोच सकता है और सही काम कर सकता है पर जिसका दिमाग गरम हो जाता है, असंतुलित हो जाता है, तो वह काम करता है जो नहीं करना चाहिए और वह सोचता है कि जो नहीं सोचना चाहिए।

🔴 मुसीबत के वक्त आज जब घटाएँ चारों ओर से हमारी ओर घुमड़ती हुई आ रही हैं, तब सबसे जरूरी बात है हम शंकर भगवान के चरणों में जाएँ। आरती उतारने के बाद मस्तक झुकाएँ और यह कहें कि आपके मस्तक पर शांति का प्रतीक, संतुलन का प्रतीक, विभेद का प्रतीक चन्द्रमा लटक रहा है। क्या आप हमको धीरज देंगे नहीं? संतुलन देंगे नहीं? क्या शांति नहीं देंगे? हिम्मत नहीं देंगे? क्या आप इतनी भी कृपा नहीं कर सकते? अगर हमने यह प्रार्थना की होती तो मजा आ जाता, फिर हम शांति ले करके आते और शंकर जी के भक्तों के तरीके से रहते।

🔵 शंकर भगवान के गले में पड़े हुए हैं काले साँप और मुण्डों की माला। काले विषधरों का इस्तेमाल इस तरीके से किया है, उन्होंने कि उनके लिए ये फायदेमन्द हो गए, उपयोगी हो गए और काटने भी नहीं पाए। शंकर जी इस शिक्षा को हर शंकर-भक्त को अपनी फिलॉसफी में सम्मिलित करना ही चाहिए कि विषैले लोगों से किस तरीके से ‘डील’ करना चाहिए, किस तरीके से उन्हें गले से लगाना चाहिए और किस तरीके से उनसे फायदा उठाना चाहिए?

🔴 शंकर जी के गले पर पड़ी मुण्डों की माला भी यह कह रही है कि जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं, सजाने-सँवारने के लिए रंग-पावडर पोतते हैं, वह मुण्डों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है। चमड़ी, जिसे ऊपर से सुनहरी चीजों से रंग दिया गया है और जिस बाहरी टुकड़े के रंग को हम देखते हैं, उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है, उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है। हड्डियों की मुण्डमाला की यह शिक्षा है, नसीहत है मित्रो! जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठकर सीखनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १९

🌹  पुरूषार्थ की शक्ति 

🔵 सुधारवादी तत्वों की स्थिति और भी उपहासास्पद है। धर्म, अध्यात्म, समाज एवं राजनीतिक क्षेत्रों में सुधार एवं उत्थान के नारे जोर- शोर से लगाये जाते हैं। पर उन क्षेत्रों में जो हो रहा है, जो लोग कर रहे हैं, उसमें कथनी और करनी के बीच जमीन आसमान जैसा अंतर देखा जा सकता है। एंसी दशा में उज्जवल भविष्य की आशा धूमिल ही होती चली जा रही है।

🔴 क्या हम सब ऐसे ही समय की प्रतिक्षा में,, ऐसे ही हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें। अपने को असहाय,, असमर्थ अनुभव करते रहें और स्थिति बदलने के लिए किसी दूसरे पर आशा लगाये बैठे रहें। मानवी पुरुषार्थ कहता है ऐसा नहीं होना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 19

🌹  The Power of Valor

🔵 Contemporary reformers are practically laughable. These false preachers shout down from rooftops that they will bring about religious, social, and political change. However, the differences between their words and actions are glaring. In these situations any sense of hope seems dimmed.

🔴 We do not need to wait quietly for a bright future, nor do we need to feel helpless and dependent on others to usher it in. We have the power to create it ourselves.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 19 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 July 2017


मंगलवार, 18 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 18

🌹  The Call of Time

🔵 Courage calls to us. The current era and its responsibilities call to us. We cannot ignore them. To uplift ourselves and our society, we will endure paths that are filled with thorns. We will not worry about what others say or do; we will be guided only by our own conscience.

🔴 Let those who wander aimlessly in the darkness do so, but we will take refuge in the light of our wisdom and move forward. We will not look for support from others. We will always be guided by our soul and our conscience, and we will have the courage to carry out our tasks as wise people should.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १८

🌹  पौरूष की पुकार 

🔵 साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, युग ने,, कर्तव्य ने,, उत्तरदायित्व ने,, विवेक ने,, पौरूष ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी न की जा सकेगी। आत्म निर्माण के लिए,, नव निर्माण के लिए हम काँटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी चिंता कौन करे। अपनी आत्मा ही मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त है। 

🔴 लोग अंधेरे में भटकते है, भटकते रहें । हम अपने विवेक के प्रकाश का अवलंबन कर स्वत: आगे बढ़ेंगे। कौन विरोध करता है, कौन समर्थन? इसकी गणना कौन करे । अपनी अंतरात्मा,, अपना साहस अपने साथ है और वही करेंगे, जो करना अपने जैसे सजग व्यक्तियों के लिए उचित और उपयुक्त है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...