सोमवार, 24 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 July

🔴 मानव जाति अनेक प्रकार के अत्याचार, दम्भ, छल, द्वेष, घृणा, वैर आदि से परिपूर्ण है। इसका कारण मन, वाणी और शरीर की एकता न होना है। चूँकि एकता न होने के कारण मनुष्य मन से कुछ सोचता है वाणी से कुछ कहता है और शरीर से कुछ करता है। यह कैसी विचित्र विडम्बना है। यह मनुष्य के पतन की पराकाष्ठा है। इसका उपाय केवल सत्य है। सत्य का अनुकरण करने से ही इनसे छुटकारा मिल सकता है। सत्य को अपनाने के पश्चात् हम जो कुछ मन में सोचेंगे उसे ही वाणी से कहेंगे तथा शरीर से करेंगे। इस प्रकार तीनों में एकता उत्पन्न हो जायगी। मन वाणी तथा शरीर की एकता के साथ मानव कर्त्तव्य ही सत्य है।

🔵 वर्तमान भूत पर आधारित है और भविष्यत् वर्तमान पर। हमने पहले जो कुछ अच्छा बुरा किया उसका परिणाम वर्तमान में अनुभव कर रहे हैं और वर्तमान में जो कुछ कर रहे हैं उसका परिणाम भविष्य में प्राप्त होगा। अच्छे या बुरे किये गये कर्मों का फल तो अवश्य मिलेगा ही, क्रिया निष्फल तो जाती नहीं। यदि भावी परिणाम नहीं सोचें तो वर्तमान तो एक क्षण मात्र ही है। परवर्ती क्षण ही तो भविष्यत् है जो क्षणान्तर में वर्तमान होने वाला है और वर्तमान का क्षण भूत हो जाने वाला है अतः उन दोनों से उदासीन रहा नहीं जा सकता। जैसा भी हम बनना चाहते हैं उसके योग्य प्रवृत्ति इस समय करनी होगी

🔴 अपने हृदय में यह बात अच्छी तरह स्थिर कीजिए कि आप योग्य हैं, प्रतिभाशाली हैं, शक्ति वान हैं। अपने उद्देश्य की ओर वीरता और धैर्य पूर्वक पाँव उठा रहे हैं। परमेश्वर ने कूट कूट कर आपमें अद्भुत योग्यताएँ भरी हैं। आत्म संकेत दिया करें। शान्त चित्त से मन में पुनः पुनः इस प्रकार के विचारों को प्रचुरता से स्थान दें कि “मैं बलवान हूँ। दृढ़ संकल्प हूँ। सब कुछ करने में समर्थ हूँ। मैं जिन पदार्थों की आशा−अभिलाषा करता हूँ, वह अवश्य प्राप्त करूंगा। मैं दृढ़ता से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मुझ में मानसिक धैर्य है। मेरा मानसिक संस्थान आत्म−विश्वास से परिपूर्ण है। मैं धैर्य पूर्वक अपने उद्देश्य की ओर पाँव उठा रहा हूँ। मैं विघ्न बाबाओं से विचलित नहीं होता हूँ।”
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

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