सोमवार, 24 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 35)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 जब हम किसी से मिलें या हमसे कोई मिले, तो प्रसन्नता व्यक्त की जानी चाहिए। मुस्कराते हुए अभिवादन करना चाहिए और बिठाने-बैठने कुशल समाचार पूछने और साधारण शिष्टाचार बरतने के बाद आने का कारण पूछना, बताना चाहिए । यदि सहयोग किया जा सकता हो तो वैसा करना चाहिए अन्यथा अपने परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए सहयोग न कर सकने का दुःख व्यक्त करना चाहिए। इसी प्रकार यदि दूसरा कोई सहयोग नहीं कर सका है तो भी उसका समय लेने और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में ही देना चाहिए। रूखा, कर्कश, उपेक्षापूर्ण अथवा झल्लाहट, तिरस्कार भरा उत्तर देना ढीठ और गँवार को भी शोभा देता है। हमें अपने को इस पंक्ति में खड़ा नहीं करना चाहिए।

🔵 बड़े जो व्यवहार करेंगे, बच्चे वैसा ही अनुकरण सीखेंगे। यदि हमें अपने बच्चों को अशिष्ट, उद्दंड बनाना हो तो ही हमें असभ्य व्यवहार की आदत बनाए रहनी चाहिए अन्यथा औचित्य इसी में है कि आवेश, उत्तेजना, उबल पड़ना, क्रोध में तमतमा जाना, अशिष्ट वचन बोलना और असत्य व्यवहार करने का दोष अपने अंदर यदि स्वल्प मात्रा में हो तो भी उसे हटाने के लिए सख्ती के साथ अपने स्वभाव के साथ संघर्ष करें और तभी चैन लें, जब अपने में सज्जनता की प्रवृत्ति का समुचित समावेश हो जाए।
 
🔴 हम अपनी और दूसरों की दृष्टि में सज्जनता और शालीनता से परिपूर्ण एक श्रेष्ठ मनुष्य की तरह अपना आचरण और व्यक्तित्व बना सकें तो समझना चाहिए कि मनुष्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। उसके आगे के कदम नैतिकता, सेवा, उदारता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के हैं। इसमें भी पहली एक अति आवश्यक शर्त यह है कि हम सज्जनता की सामान्य परिभाषा समझें और अपनाएँ, जिसके अंतर्गत मधुर भाषण और विनम्र, शिष्ट एवं मृदु व्यवहार अनिवार्य हो जाता है। अस्वच्छता मनुष्य की आंतरिक और गई-गुजरी स्थिति का परिचय देती है।

🔵 गंदा आदमी यह प्रकट करता है कि उसे अवांछनीयता हटाने और उत्कृष्टता बनाए रखने में कोई रुचि नहीं है। लापरवाह, आलसी और प्रमादी ही गंदे देखे गए हैं जो अवांछनीयता से समझौता करके उसे गले से लगाए रह सकता है, वही गंदा भी रह सकता है। गंदगी देखने में सबको बुरी लगती है और उस व्यक्ति के प्रति सहज ही घृणा भाव उत्पन्न करती है। गंदे को कौन अपने समीप बिठाना चाहेगा? दुर्गंध से किसे अपनी नाक, मलीनता से किसे अपनी आँखें और हेय प्रवृत्ति को देखकर कौन मनोदशा क्षुब्ध करना चाहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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