सोमवार, 24 जुलाई 2017

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 7)

🔵 देवताओं की शिक्षाओं और प्रेरणाओं को मूर्तिमान करने के लिए ही अपने हिन्दू समाज में प्रतीक-पूजा की व्यवस्था की गई है। जितने भी देवताओं के प्रतीक हैं, उन सबके पीछे कोई न कोई संकेत भरा पड़ा है, प्रेरणाएँ और दिशाएँ भरी पड़ी हैं। अभी भगवान शंकर का उदाहरण दे रहा था मैं आपको और यह कह रहा था कि सारे विश्व का कल्याण करने वाले शंकर जी की पूजा और भक्ति के पीछे जिन सिद्धान्तों का समावेश है हमको उन्हें सीखना चाहिए था, जानना चाहिए था और अपने जीवन में उतारना चाहिए था। लेकिन हम उन सब बातों को भूलते चले गए और केवल चिन्ह-पूजा तक सीमाबद्ध रह गए।

🔴 विश्व-कल्याण की भावना को हम भूल गए। जिसे ‘शिव’ शब्द के अर्थों में बताया गया है। ‘शिव’ माने कल्याण। कल्याण की दृष्टि रखकर के हमको कदम उठाने चाहिए और हर क्रिया-कलाप एवं सोचने के तरीके का निर्माण करना चाहिए। यह शिव शब्द का अर्थ होता है। कल्याण हमारा कहाँ है? सुख हमारा कहाँ है? लाभ नहीं, वरन् कल्याण हमारा कहाँ है? कल्याण को देखने की अगर हमारी दृष्टि पैदा हो जाए तो यह कह सकते हैं कि हमने भगवान् शिव के नाम का अर्थ जान लिया। ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप तो किया, लेकिन ‘शिव’ शब्द का मतलब क्यों नहीं समझा। मतलब समझना चाहिए था और तब जप करना चाहिए था, लेकिन हम मतलब को छोड़ते चले जा रहे हैं और ब्रह्म रूप को पकड़ते चले जा रहे हैं। इससे काम बनने वाला नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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