शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

👉 मैं नारी हूँ (अन्तिम भाग)

🔴 मैं खड्गधारिणी काली हूँ, पाखण्डों का वध करने के लिए। मैं दश प्रहरणधारिणी दुर्गा हूँ, संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए। मैं लक्ष्मी हूँ - संसार को सुशोभन बनाने के लिए। मैं सरस्वती हूँ - जगत में विद्या वितरण के लिए। मैं धरणी हूँ - सहिष्णुता के गुण से। आकाश हूँ - सबकी आश्रयदायिनी होने से। वायु हूँ - सबकी जीवनदायिनी होने से और जल हूँ सबको रससिक्त करने वाली - दूसरों को अपना बनाने वाली होने से। मैं ज्योति हूँ - प्रकाश के कारण और मैं माटी हूँ - क्योंकि मैं माँ हूँ।

🔵 मेरे धर्म के विषय में मतभेद मतान्तर नहीं है। मेरा धर्म है नारीत्व, मातृत्व। मुझ में जातिभेद जनित कोई चिन्ह नहीं है। सम्पूर्ण नारी जाति मेरी जाति है।

🔴 मैं सबसे अधिक छोटा बनना जानती हूँ परन्तु मैं बड़ी स्वाभिमानी हूँ। मेरे भय से त्रिभुवन काँपता है। मैं जो चाहती हूँ, वही पाती हूँ, तो भी मेरा मान जगत प्रसिद्ध है।

🔵 पुरुष कामुक है इसलिए वह अपने ही समान मानकर मुझको कामिनी कहता है। पुरुष दुर्बल है, सहज ही विभक्त हो जाता है, इसी से मुझे दारा कहता है। मैं सभी सहती हूँ, क्योंकि मैं सहना जानती हूँ। मैं मनुष्य को गोद में खिलाकर मनुष्य बनाती हूँ। उसके शरीर की धूलि से अपना शरीर मैला करती हूँ, इसलिए कि मैं यह सब सह सकती हूँ।

🔴 रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं। इनमें मेरा ही गान हुआ है। यही कारण है जगत को और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रन्थ समर्थ नहीं हुआ। मैं दूसरी भाषा सीखती हूँ, परन्तु बोलती हूँ अपनी ही भाषा और मेरी सन्तान इसलिए उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है।

🔵 मुझको क्या पहचान लिया है ? नहीं पहचाना, तो फिर पहचान लो। मैं नारी हूँ, इक्कीसवीं सदी में अपना प्रभुत्व लेकर आ रही हूँ।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Aug 2017

🔴 आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किय...