बुधवार, 10 मई 2017

👉 बदल दी जीवन की दिशा

🔵  मैं एक नास्तिक प्रकृति का व्यक्ति था। मुझे धर्म में कोई आस्था नहीं थी। मैं शांतिकुंज एवं गुरुदेव के नाम को भी नहीं जानता था। मेरा जीवन बहुत ही विचित्र किस्म का था। मैं शराब छोड़कर सभी चीजों का सेवन करता था। मांसाहार भी करता था। एक दिन अचानक एक व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो गाड़ियों के ट्राँसपोर्ट का व्यवसाय करता था। उनका नाम वीरेन्द्र सिंह था। वह चेन स्मोकर था। एक दिन मैं उसके पास बैठा था। स्मोंकिंग की वजह से उनके मुँह में छाले पड़ गए थे। लेकिन मैंने देखा कि उनके दोनों नेत्रों के बीच से प्रकाश निकल रहा है। मैं देखकर आश्चर्य से भर गया। मैंने पूछा तुम्हारी आँखों से क्या निकल रहा है? तो उसने कहा कि मैं तुमको यहाँ नहीं, बाद में बताऊँगा। बाद में उसने बताया कि मेरे गुरुदेव है श्रीराम शर्मा आचार्य जी। मैं उनका शिष्य हूँ। उसकी बातों से मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। धीरे- धीरे मुझे वह गुरुदेव के बारे में बताने लगा। मुझे मिशन की जानकारी हो गई। वह मुझे प्रत्येक कार्यक्रम में बुलाता था। उस समय मेरे क्षेत्र में आचार्य जी के मिशन का कोई प्रचार नहीं था।

🔴 १९९२ की बात है। शान्तिकुञ्ज की टोली मेरे क्षेत्र में आई थी। वीरेन्द्र सिंह जी बहुत परेशान थे। उन्होंने मुझसे कहा- भाई साहब शान्तिकुञ्ज से लोग आए हैं, कार्यक्रम कराना है। आप सहयोग करें। मैं सहर्ष तैयार हो गया। मैंने जगह आदि की व्यवस्था कर दी। कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। जिस दिन पूर्णाहुति थी, टोली में आए भाई बोले- डॉ० साहब कुछ दक्षिणा दीजिए। उनकी बातों को सुनकर मैंने सोचा कि ये लोग भी शायद ठगने खाने वाले हैं, पता नहीं क्या माँग रहें हैं।

🔵 मैंने कहा- मेरे पास कुछ नहीं है देने के लिए तो वे बोले- आपके पास बहुत कुछ है, कुछ तो दीजिए मैंने सोचा शायद उनको पता है कि मेरे पास रुपया पैसा है। तो मैंने कहा- बोलिए क्या चाहिए? तो वे बोले अपनी कोई बुराई दीजिए उनकी बातों से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि अजीब लोग हैं, दक्षिणा में बुराई लेते हैं। उन्होंने कहा- आप माँस छोड़ दीजिए, मैंने कहा- यह मेरे बस का नहीं है। उन्होंने कहा कि आप इसकी चिन्ता मत कीजिए। आप केवल संकल्प लीजिए। आपकी बुराई अपने- आप छूट जाएगी। उनने जबर्दस्ती मुझे अक्षत पुष्प दे दिए।

🔴 उसके पश्चात् मैंने गायत्री माता को प्रणाम किया, किन्तु उनके बगल में गुरुजी- माताजी के चित्रों को देखकर मैं बहुत हँसा कि ये कैसे भगवान? ये मेरी क्या बुराई छुड़ाएँगें? मैंने केवल गायत्री माँ को प्रणाम किया। गुरुजी- माताजी को प्रणाम भी नहीं किया। सोचा साधारण वेष- भूषा में ये मेरे ही जैसे सामान्य व्यक्ति हैं। मुझे बिल्कुल श्रद्धा नहीं हुई। इस प्रकार कार्यक्रम समाप्त हुआ। १५ दिन बीत जाने के बाद माँसाहार की ओर से मेरा मन हटने लगा और धीरे- धीरे मेरे सारे दुव्यर्सन दूर हो गए।

🔵 १९९३ के लखनऊ अश्वमेध यज्ञ में मैंने माताजी से दीक्षा ली। तीन महीने का समयदान भी दिया। आज मेरा पूरा परिवार गुरुकार्य में संलग्न है। शताब्दी वर्ष ही मेरा रिटायरमेन्ट हो चुका है। जबकि मेरा पेन्शन, प्रोविडेन्ट फंड आदि का कार्य बाकी है। लेकिन मैं यहाँ चला आया हूँ, चूँकि मेरे लिए गुरुकार्य से बढ़कर कोई कार्य नहीं है। गुरुकृपा से मेरे जीवन के सारे दुर्गुण दूर हो गए। मैं एक अच्छा इन्सान बन सका।

🌹  डॉ० के० के० खरे प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/dd

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 98)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 यहाँ सभी सत्रों में आने वालों की स्वास्थ्य परीक्षा की जाती है। उसी के अनुरूप उन्हें साधना करने का निर्देश दिया जाता है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर इस प्रकार शोध करने वाली विश्व की यह पहली एवं स्वयं में अनुपम प्रयोगशाला है।

🔵 इसके अतिरिक्त भी सामयिक प्रगति के लिए जनसाधारण को जो प्रोत्साहन दिए जाने हैं उनकी अनेक शिक्षाएँ यहाँ दी जाती हैं। अगले दिनों और भी बड़े काम हाथ में लिए जाने हैं।

🔴 गायत्री परिवार के लाखों व्यक्ति उत्तराखण्ड की यात्रा करने के लिए जाते समय शान्तिकुञ्ज के दर्शन करते हुए यहाँ की रज मस्तक पर लगाते हुए तीर्थयात्रा आरम्भ करते हैं। बच्चों के अन्नप्राशन, नामकरण, मुंडन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार यहाँ आकर कराते हैं क्योंकि परिजन इसे सिद्ध पीठ मानते हैं। पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण कराने का भी यहाँ प्रबंध है। जन्म-दिन विवाह-दिन मनाने हर वर्ष प्रमुख परिजन यहाँ आते हैं। बिना दहेज की शादियाँ हर वर्ष यहाँ व तपोभूमि, मथुरा में होती हैं। इससे परिजनों को सुविधा भी बहुत रहती है और, इस खर्चीली कुरीति से भी पीछा छूटता है।

🔵  जब पिछली बार हम हिमालय गए थे और हरिद्वार जाने और शान्तिकुञ्ज  रहकर ऋषियों की कार्य पद्धति को पुनर्जीवन देने का काम हमें सौंपा गया था, तब यह असमंजस था कि इतना बड़ा कार्य हाथ में लेने में न केवल विपुल धन की आवश्यकता है, वरन् इसमें कार्यकर्ता भी उच्च श्रेणी के चाहिए। वे कहाँ मिलेंगे? सभी संस्थाओं के पास वेतन भोगी हैं। वे भी चिह्न पूजा करते हैं। हमें ऐसे जीवनदानी कहाँ से मिलेंगे, पर आश्चर्य है कि शान्तिकुञ्ज में-ब्रह्मवर्चस् में इन दिनों रहने वाले कार्यकर्ता ऐसे हैं, जो अपनी बड़ी-बड़ी पोस्टों से स्वेच्छा से त्याग पत्र देकर आए हैं। सभी ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के हैं अथवा प्रखर प्रतिभा सम्पन्न हैं। इनमें से कुछ तो मिशन के चौके में भोजन करते हैं। कुछ उसकी लागत भी अपनी जमा धनराशि के ब्याज से चुकाते रहते हैं। कुछ के पास पेंशन आदि का प्रबंध भी है। भावावेश में आने जाने वालों का क्रम चलता रहता है, पर जो मिशन के सूत्र संचालक के मूलभूत उद्देश्य को समझते हैं, वे स्थायी बनकर टिकते हैं। खुशी की बात है कि ऐसे भावनाशील नैष्ठिक परिजन सतत आते व संस्था से जुड़ते चले जा रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.5

👉 नवसृजन का पावन यज्ञ

🔵 नवसृजन की जो चिनगारी हिमालय की ऋषिसत्ताओं ने देवपुरुष परमपूज्य गुरुदेव को सौंपी थी, वह अब महाज्वाला का रूप ले चुकी है। युगपरिवर्तन के हवनकुण्ड में इसकी लपटें प्रबल से प्रबलतर-प्रबलतम हो रही हैं। महाकाल की नित-नवीन प्रेरणाएँ नवसृजन के विविध आयामों को प्रकट कर रही हैं। इसी प्रेरणा से विवश एवं वशीभूत होकर युगतीर्थ-शान्तिकुञ्ज ने एक नए भूखण्ड को क्रय किया और अब इन दिनों नए सिरे से नए निर्माण के नए निर्धारण हो रहे हैं। नवनिर्माण के प्रयासों में ऐसी हलचलें हो रही हैं, जिनमें चिरपुरातन को चिरनवीन के साथ जोड़ा जा सके। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन के साथ उनका समुचित प्रशिक्षण एवं प्रसार हो।

🔴 युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया यही है कि व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को समुन्नत बनाने की इस पुण्य प्रक्रिया की व्यापक प्रतिष्ठा की जाए, जिसे अपनाकर हमारे महान् पूर्वज जीवनयापन करते हुए इस पुण्यभूमि को चिरकाल तक स्वर्गादपि गरीयसी बनाए रहे। अतीत के उसी महान गौरव को वापस लाने के इस भगीरथ प्रयत्न को एक शब्द में नवसृजन का पावन यज्ञ कह सकते हैं। इस महायज्ञ की संचालक दैवीचेतना की प्रौढ़ता दिनों-दिन तीव्र होती जा रही है। जहाँ कहीं भी चेतना में जाग्रति का अंश है, वहाँ इसमें सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रण की पुकार स्पष्ट सुनी जा रही है।
  
🔵 आस्थावान् निष्क्रिय रह नहीं सकते। निष्ठा की परिणति अपनी आहुति नवसृजन के पावन यज्ञ में समर्पित करने के रूप में होकर ही रहती है। श्रद्धा का परिचय प्रत्यक्ष करुणा के रूप में मिलता है। करुणा की अन्तःसंवेदनाएँ पीड़ा और पतन की आग बुझाने के लिए अपनी सामर्थ्य को प्रस्तुत किए बिना रह नहीं सकतीं। यही चिह्न है, जिसकी कसौटी पर व्यक्ति की आन्तरिक गरिमा का यथार्थ परिचय प्राप्त होता है। आध्यात्मिक, आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना करने वाले तो संकीर्ण स्वार्थपरता के दल-दल में फँसे भी बैठे रह सकते हैं, पर जिनकी अन्तरात्मा में दैवी-आलोक का वस्तुतः अवतरण होगा, वे लोककल्याण के लिए समर्पित हुए बिना नहीं रहेंगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 65

👉 Intercession & its Significance. (Part 1)

🔴 The progress of a man has nothing to do with its outside development. Actually it is associated with how is the internal scenario of a man. Roots happen to be inside the earth and are not visible and a tree with small roots cannot grow much. The expansion you see of a man is actually not of its body or not due to its body, not of his money, not of his brain rather it is the expansion of his internal scenario/ inner-consciousness.  It is very likely that a man with a low level of inner-consciousness must be a shrewd & wicked one. No man from outside can be of any help even willingly to a man whose inner-consciousness has not been up to mark.
                                 
🔵 Very this secret has been unveiled in four legs of GAYATRI mantra that firstly our inner-consciousness must develop. The meaning of UPASANA (intercession), I have told you- be seated nearby, seated nearby whom? We are influenced by anyone, we sit nearby. We tend to misbehave when we sit nearby misbehaving people. Our children turn worthless and ridiculous. Neighbor’s children, worthless children become successful in misleading our innocent boys to show them cinemas, make them habitual of smoking and after some days make our boy the most useless and confused boy. Effect of company! Yes, a company compulsorily leaves its impressions in the mind. Bad companionship may leave impression so may leave a good one.

🌹  to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 समय का सदुपयोग करें (अंतिम भाग)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 निर्धारित समय में हेर-फेर करते रहने वाले बहुधा लज्जा एवं आत्मग्लानि के भागी बनते हैं। किसी को बुलाकर समय पर न मिलना, समाजों, सभाओं, गोष्ठियों अथवा आयोजनों के अवसर पर समय से पूर्व अथवा पश्चात् पहुंचना, किसी मित्र से मिलने जाने का समय देकर उसका पालन न करना आदि की शिथिलता सभ्यता की परिधि में नहीं मानी जा सकती है। देर-सवेर कक्षा अथवा कार्यालय पहुंचने वाला विद्यार्थी तथा कर्मचारी भर्त्सना का भागी बनता है। ‘लेट लतीफ’ लोगों की ट्रेन छूटती, परीक्षा चूकती, लाभ डूबता डाक रुक जाती, बाजार उठ जाता, संयोग निकल जाते और अवसर चूक जाते हैं। इतना ही नहीं व्यावसायिक क्षेत्र में तो जरा-सी देर दिवाला तक निकाल देती हैं। समय पर बाजार न पहुंचने पर माल दूसरे लोग खरीद ले जाते हैं। देर हो जाने से बैंक बन्द हो जाता है और भुगतान रुक जाता है। समय चुकते ही माल पड़ा रहता है। असामयिक लेन-देन तथा खरीद-फरोख्त किसी भी व्यवसायी को पनपने नहीं देती।

🔵 समय का पालन मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संयम है। समय पर काम करने वालों के शरीर चुस्त, मन नीरोग तथा इन्द्रियां तेजस्वी बनी रहती हैं। निर्धारण के विपरीत काम करने से मन, बुद्धि तथा शरीर काम तो करते हैं किन्तु अनुत्साहपूर्वक। इससे कार्य में दक्षता तो नहीं ही आती है, साथ ही शक्तियों का भी क्षय होता है। किसी काम को करने के ठीक समय पर शरीर उसी काम के योग्य यन्त्र जैसा बन जाता है। ऐसे समय में यदि उससे दूसरा काम लिया जाता है, तो वह काम लकड़ी काटने वाली मशीन से कपड़े काटने जैसा ही होगा।

🔴 क्रम एवं समय से न काम करने वालों का शरीर-यन्त्र अस्त-व्यस्त प्रयोग के कारण शीघ्र ही निर्बल हो जाता है और कुछ ही समय में वह किसी कार्य के योग्य नहीं रहता। समय-संयम सफलता की निश्चित कुन्जी है। इसे प्राप्त करना प्रत्येक बुद्धिमान का मानवीय कर्त्तव्य है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2017


👉 किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी

🔵 आजकल सारी दुनिया असाधारण संक्रमण प्रक्रिया से गुजर रही है। राजनैतिक, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में संकटग्रस्त स्थिति के बारे में रोज ही पढ़ा जाता है। पिछले महायुद्धों और आने वाले सम्भावित युद्धों के बारे सोचकर हर एक का मन सशंकित है। विवेकवान और दिव्यदर्शी जानते हैं कि जिन महान् परिवर्तनों के बीच से हम आजकल गुजर रहे हैं, वैसा मानव जीवन के पूर्व इतिहास में कभी नहीं हुआ। इतिहास के विराट् ज्ञान में इसकी कोई मिसाल नहीं दिखाई देती। हो सकता है कि हर कोई उन विषयों को कुछ भी महत्त्व न दे, जिनके बारे में रोज सुना, देखा और अनुभव किया जाता है, लेकिन इन सबका व्यापक लेखा-जोखा करने पर विचारशीलों के मन में यह अनुभूति सघन हो जाती है कि हम एक महान् क्रान्ति में से गुजर रहे हैं, जिससे सारे मानव समाज का ढाँचा पलटना अवश्यम्भावी है। यह एक बहुत बड़ी बात है कि हम सब इस महापरिवर्तन के समय मौजूद हैं।

🔴 ऐसे में समय का तकाजा यही है कि हम अपनी समस्याओं पर इस दृष्टिकोण से विचार करें। दुनिया भर में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन अवश्य होंगे। यह बात सुनिश्चित तौर पर कही जा सकती है कि दुनिया के जिस पुराने ढाँचे के आधार पर चलकर सारा संसार पिछले वर्षों मुसीबत में फँसता रहा है, उसे बदलना ही होगा। यदि हम वर्तमान समस्याओं को सुलझाने, युद्धों को टालने, शान्ति और सुशासन स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहते हैं, तो हमें इस दुनिया की नयी रचना करनी होगी। नवयुग का सूत्रपात ही एकमात्र हल है।
  
🔵 यह अनुभूति स्पष्ट है कि आज जो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर संकट उभरा है, उसकी जड़ें गहरी हैं। उसे मनोवैज्ञानिक कहिए या आध्यात्मिक, उसका सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। इससे अधिक एवं व्यापक उसकी व्याख्या सम्भव नहीं है। आज दुनिया एक गहरी आत्मिक उथल-पुथल से गुजर रही है। सम्प्रदायों के संकुचित अर्थों में नहीं, न ही पोथियों के पन्नों में कैद शब्दों के सीमित दायरे में इस सत्य को समझा जा सकता है। यह तो समस्त मानवीय चेतना का तीव्र मंथन है, जो व्यक्ति ही नहीं, राष्ट्रों की परिधि से भी व्यापक है। इसकी परिणति मानवता के आमूलचूल परिवर्तन के रूप में होगी।

🔴 यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, साथ ही एक महान् चुनौती भी। हममें से प्रत्येक के सामने इसे स्वीकार करने के सिवाय और कोई चारा नहीं। यह हम सबको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हम बड़ी-बड़ी घटनाओं के अति निकट खड़े हैं। एक के बाद एक तीव्र वेग से आने वाली वे घटनाएँ कष्ट में मुसीबत में फँसा सकती हैं। परन्तु इस सबके बदले हमें एक नवीन और सुन्दर भविष्य आगत के रूप में देखना चाहिए। हिमालय के दिव्यक्षेत्र से आध्यात्मिक धाराएँ पुनः सक्रिय रूप में प्रवाहित हो चली हैं। इनके कल-कल निनाद में सतत यही ध्वनि गूँजती है-‘‘किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी। समय रहते चेतें और स्वयं को तैयार करें।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 64

सोमवार, 8 मई 2017

👉 गुरुदेव भी रो पड़े

🔵 मध्य प्रदेश में यज्ञ चल रहा था। गुरुदेव के साथ मैं भी वहाँ गया हुआ था। एक दिन एक हॉल में तीन- चार सौ बहिनें उनके साथ बैठी थीं। बातचीत के साथ- साथ हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। गुरुदेव बात- बात में हँसाते जाते थे। सभी बहिनें उनकी बातों पर हँस रही थीं। एक बहिन उन सबमें गुमसुम बैठी थी। उसे हँसी नहीं आ रही थी। उसे दुखी देख गुरुदेव ने पास बुलाया और पूछा- बेटी तुझे क्या दुःख है?

🔴 वहाँ बैठी सभी बहिनें सज- धज कर आई थीं, अच्छे- अच्छे कपड़े- जेवर पहने हुए थीं और वह लड़की सिर्फ सफेद धोती पहनी थी। गुरुदेव की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया, केवल सिर झुका लिया। गुरुदेव ने फिर दुलारते हुए पूछा- बेटी क्या कष्ट है तुझे, तू हँस भी नहीं रही है। उसे निरुत्तर देख गुरुदेव उसे अलग ले गए। मैं भी उनके साथ चला गया। मैं हमेशा उनकी हरेक बातचीत सुनने का प्रयास करता। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता था।

🔵 अलग ले जाकर उन्होंने उससे पूछा- बेटी बता तुझे क्या दु:ख है? तेरे सारे दु:ख दूर कर दूँगा। उसने लम्बी साँस ली। फिर बोली- गुरुदेव, मुझे कोई दु:ख नहीं है। उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आईं। गुरुदेव के बहुत दबाव डालने पर उसने बताया कि उसकी शादी बहुत बचपन में ही हो गई थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका है। और अब वह स्वनिर्भर जीवन जी रही है। एक विद्यालय में शिक्षिका है और अपना सब काम स्वयं करती है।

🔴 विधवा होने का दु:ख तो वह झेल ही रही थी मगर समाज की बेरुखी से वह बुरी तरह टूट चुकी थी। वह कह रही थी ‘‘मैं 100 अखण्ड ज्योति मँगाती हूँ। उसे लेकर सुबह किसी के घर जाती हूँ तो सभी मुझसे नाराज होते हैं कि तू विधवा है। सुबह- सुबह आकर मुँह दिखला दिया, न जाने आज का दिन कैसा बीतेगा। सब गाली भी देते हैं, मैं चुप होकर सुन लेती हूँ और वापस चली आती हूँ। शाम को अखण्ड ज्योति बाँटने जाती हूँ, तब भी वे यही कहते हैं कि शाम को आकर मुँह दिखला दिया। कल से हमारे घर मत आया कर।’’ वह सिसकते हुए कह रही थी- जहाँ जाती, वहीं सब मुझसे नफरत करते हैं। पत्रिका बाँटने घरों में न जाऊँ तो उनके पैसे अपने वेतन से भरने पड़ते हैं। अपने खर्च में कटौती करनी पड़ती है। समाज की इस नफरत को लेकर जीने की इच्छा नहीं होती। कभी- कभी सोचती हूँ कि आत्महत्या कर लूँ, पर आप कहते हैं आत्महत्या पाप है। मगर मैं जीऊँ तो कैसे?

🔵 बोलते- बोलते वह फूट- फूट कर रोने लगी। उसके साथ- साथ गुरुदेव भी रोने लगे। मेरे भी आँसू नहीं रुक रहे थे। गुरुदेव ने उससे कहा- चल बेटी मेरे साथ चल। फिर हॉल में सबके बीच आकर वे कहने लगे ‘‘बेटी मैं अपनी बात नहीं कहता, वेद की बात कहता हूँ। तू तो पवित्र गंगा जैसा जीवन जीती है। श्रम करती है, लोक मंगल का कार्य करती है, ब्रह्मचर्य से रहती है। तू साक्षात् गंगा है। जो तेरे दर्शन करेगा- सीधे स्वर्ग को जाएगा और जो यह सब बैठी हैं शृंगार करती हैं, फैशन करती हैं, बच्चे पैदा करती हंै, देश के सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ पैदा करती हैं- जो भी इनके दर्शन करेगा, सीधे नरक को जाएगा।’’

🔴 गुरुदेव को इतना क्रोधित होते मैंने कभी नहीं देखा था। वे कह रहे थे ‘‘जो दुखी है उसको और दु:ख देना पाप है। जो यह कहता है कि विधवा को देखने से पाप लगता है वह सबसे बड़ा पापी है। बेटी! तू तो शुद्ध और पवित्र है। उनकी इस बात पर वहाँ बैठी सभी बहिनों ने गर्दन नीची कर ली। थोड़ी देर बाद गुस्सा ठण्डा होने पर उन्होंने उनसे कहा- कहो बेटियों, आपको क्या कहना है? इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी शान्त होकर बैठी रहीं। थोड़ी देर बाद जब उठकर जाने लगीं तो मैंने दरवाजे तक जाकर उनसे कहा- बहनों, गुरुदेव की बातों का बुरा नहीं मानना, वे गुस्से में हैं। लेकिन उनकी बातों पर विचार करना। वे लज्जित होकर बोलीं- भाई साहब, गुरुदेव की बातों का बुरा क्यों मानेंगे। उन्होंने तो सही बात कही है। विधवा तो शुद्ध पवित्र जीवन जीती है। आज उन्होंने हमारी आँखें खोल दीं। आज से हम जब भी किसी विधवा का दर्शन करेंगे, उसमें गंगा माता का दर्शन करेंगे और उसे कोई कष्ट हो, तो उसकी मदद करेंगे। हम दूसरों को भी बताएँगे कि विधवा का दर्शन करने से पाप नहीं होता।

🔵 वे कह रही थीं कि गुरुदेव ने हमारी आँखें खोल दीं। हम सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे गुरु हमें मिले। ऐसे गुरु हों तो देश में फैला हुआ अज्ञान शीघ्र ही दूर हो जाए। वह दुखी बहिन भी वहीं खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उसके मुख पर सन्तोष के भाव थे। दु:ख के बादल छँट चुके थे। हल्की सी धूप झिलमिला रही थी।
  
🌹  पं. लीलापत शर्मा की यादोंके झरोख, मथुरा (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/gw

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 97)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 युग शिल्पी विद्यालय के माध्यम से सुगम संगीत की शिक्षा हजारों व्यक्ति प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने यहाँ ढपली जैसे छोटे से माध्यम द्वारा संगीत विद्यालय चलाकर युग गायक तैयार कर रहे हैं।

🔵  पृथ्वी अन्तर्ग्रही वातावरण से प्रभावित होती है। उसकी जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हर पाँच वर्ष पीछे ज्योतिष गणित को सुधारने की आवश्यकता होती है। आर्यभट्ट की इस विधा को नूतन जीवन प्रदान करने के लिए प्राचीनकाल के उपकरणों वाली समग्र वेधशाला विनिर्मित की गई है और नेपच्यून प्लेटो, यूरेनस ग्रहों के वेध समेत हर वर्ष दृश्य गणित पंचांग प्रकाशित होता है। यह अपने ढंग का एक अनोखा प्रयोग है।

🔴 अब प्रकाश चित्र विज्ञान का नया कार्य हाथ में लिया गया है। अब तक सभी संस्थानों में प्रोजेक्टर पहुँचाए गए थे। उन्हीं से काम चल रहा था। अब वीडियो क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। इनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनाई जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों, मूर्धन्यों, नेताओं के दृश्य प्रवचन टेप कराकर उनकी छवि समेत संदेश घर-घर पहुँचाए जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों का उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है, जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है।

🔵 शान्तिकुञ्ज मिशन का सबसे महत्त्वपूर्ण सृजन है ‘‘ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान।’’ इस बहुमूल्य प्रयोगशाला द्वारा अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने के लिए बहुमूल्य यंत्र उपकरणों वाली प्रयोगशाला बनाई गई है। कार्यकर्ताओं में आधुनिक आयुर्विज्ञान एवं पुरातन आयुर्वेद विधा के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। विज्ञान की अन्य विधाओं में निष्णात उत्साही कार्यकर्ता हैं, जिनकी रुचि अध्यात्म परक है। इसमें विशेष रूप से यज्ञ विज्ञान पर शोध की जा रही है। इस आधार पर यज्ञ विज्ञान की शारीरिक, मानसिक रोगों की निवृत्ति में, पशुओं और वनस्पतियों के लिए लाभदायक सिद्ध करने में, वायुमण्डल और वातावरण के संशोधन में इसकी उपयोगिता जाँची जा रही है, जो अब तक बहुत ही उत्साहवर्धक सिद्ध हुई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2017


👉 गुरु नानक की सज्जनोचित उदारता

🔵 सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु- गुरु नानक प्रारंभ से ही बडे उदार और दयावान् थे। किसी को कष्ट देना तो वे जानते ही न थे। संतों की सेवा और उनके सत्संग में उन्हें बडा आनंद आता था। जब कभी भी उन्हें इसका अवसर मिलता था तो उसका लाभ अवश्य उठाते थे। उनके इन्हीं गुणों ने उन्हें एक उच्च कोटि का महात्मा बना दिया। उन्होंने अपना सारा जीवन लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने मे लगा दिया।

🔴 एक अच्छे ज्ञानी और संत होने पर भी गुरु नानक ने अपने आवश्यक कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोडा। उन्हें जो भी काम दिया जाता था उसे करने में कभी संकोच नहीं करते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें खेती का काम करने के लिए नियुक्त किया। गुरु नानक ने उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने हाथ से खेती का सारा काम करके बडी अच्छी फसल तैयार की। पकने तक फसल की रखवाली करने का काम भी उन्हें सौंपा गया और वे फसल की रखवाली भी करने लगे।

🔵 एक बार कुछ गाएँ आकर फसल खाने लगीं नानक ने उन्हें डाँटा, फटकारा और ललकारा लेकिन गायों ने एक न सुनी और वे सारा खेत खा गई। पिता को पता चला तो वे नानक से बडे नाराज हुए-बोले "तूनै गायों को भगाया क्यों नहीं" नानक ने कहा-"मैंने तो उन्हें बहुत मना किया, डाँटा-ललकारा भी, लेकिन वे इतनी भूखी थीं कि मानी ही नहीं।" पिता ने और डाँटा और कहा-"बेवकूफ अगर वे ललकारने से नहीं भागी तो चार-चार डंडे क्यों नहीं जड दिए" नानक ने तुरंत उदास होकर उत्तर दिया- भला मैं भूखी गौ माताओं को डंडे से मारने का पाप कैसे करता, वे बेचारी खुद तो खेती करती नहीं। आदमियों के ही सहारे रहती हैं। हमारी खेती में भगवान् ने उनका भी अंश रखा होगा तभी तो आकर खा गई।

🔴 पिता ने नानक की अटपटी बातों में एक सार देखा और फिर उसके बाद कुछ नहीं कहा।

🔵 एक बार गुरु नानक खेत रखाते हुए एक पेड की छाया में लेटे हुए थे। लेटे-लेटे उनकी आँख लग गई। तभी  ऊपर से गाँव का एक परिचित व्यक्ति निकला। वह क्या देखता है कि गुरु नानक सो रहे है और उनके सिर पर एक सर्प फन फैलाए पास ही जड़ पर बैठा है। वह इस कौतुक को देखने के लिये थोडा आगे बढ़ा तो आहट पाकर सर्प चला गया। उस आदमी ने नानक को जगाया और सर्प वाली बात नहीं बतलाई, लेकिन इतना जरूर कहा बेटा! ऐसी वैसी जगह बेखबर मत सो जाया करो।

🔴 उस व्यक्ति ने इस पिषय में सुन रक्खा था कि जिसके सिर पर सर्प फन की छाया कर देता है, वह बडा भाग्यवान् और भविष्य में बडा़ आदमी होता है। उसने यह घटना नानक के पिता को बतलाकर कहा- ''भाई अपने लड़के से ऐसे-वैसे काम न लिया करो। यह बडा नक्षत्री आदमी है। संसार में बडा यश पायेगा। इसे किसी अच्छे काम में लगाओ।''

🔵 नानक के पिता ने उन्हें रुपये दिए और कहा- 'तू बडा़ नक्षत्री बतलाया जाता है। आ कुछ कार-रोजगार करके धन कमा तो जानूँ कि तू नक्षत्री है। भाग्यवान् होगा तो खूब दौलत कमाकर बड़ा आदमी बन जायेगा। गुरुनानक पैसा लेकर रोजगार करने चले तो रास्ते में सबसे पहले उनकी भेंट भूखे-नंगे भिखमगों से हो गई। नानक को उनकी दशा पर बड़ी दया आई और उन्होंने उन गरीबों को भोजन कराया और कपड़े मोल ले दिए। जो कुछ पैसा बचा उसे लेकर आगे बढे तो अनेक साधु-संतों का साक्षात्कार हो गया। उन्होंने उनका सत्संग किया और उनकी बातों तथा शिक्षण में बडा सार पाया। नानक ने बहुत समय तक जी भर उनका सत्संग किया और सारा पैसा उनकी सेवा में खर्च कर दिया। जब नानक सत्संग का लाभ उठाकर घर लौटे तो बिल्कुल खाली हाथ थे।

🔴 पिता ने पूछा- 'बता क्या रोजगार किया! लाभ की आशा है या नहीं ?'' नानक ने बडे विश्वास से और हर्ष के साथ उत्तर दिया-रोजगार तो मैंने किया जिसका अवसर जल्दी-जल्दी किसी को मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो दुर्भाग्य से उसका साहस नहीं पडता। जहाँ तक लाभ की बात है, सो तो लोक से परलोक तक और जन्म से जन्मांतर तक लाभ ही लाभ है।

🔵 पिता की कुछ समझ में नहीं आया बोले- साफ-साफ बतला क्या कमाई की, और ला कमाई कहाँ है ?" नानक ने सारी घटना बतला दी तो पिता ने हताश होकर कहा-राम जाने तू कैसा नक्षत्री है, नानक के इन्हीं गुणों ने उन्हें एक विख्यात संत बनाकर संसार से तार दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 159, 160

👉 प्रज्ञावतार की पुण्य-वेला

🔵 अन्धकार जब गहराता चला जाए, तो इसकी सघनतम स्थिति के अतिसमीप ही प्रभातकाल की ब्रह्मवेला भी जुड़ी रहती है। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है और वह सार्थक भी होता है। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती है, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता है, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती है, लपलपाने लगती है। मरण की वेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती है और वह असामान्य रूप से लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगता है। सभी जानते हैं कि मृत्यु की वेला समीप आ गयी। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी के पर निकलने लगते हैं।

🔴 उपर्युक्त उदाहरण आज की युग-सन्धि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनों असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही है। उसे समाप्त होना ही है, मात्र उसका अंतिम चरण ‘‘हताशा की स्थिति में एक उग्र रूप और’’-इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानों के सामने चुनौती बनकर पहुँचती और उन्हें अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब है जब अन्याय के असुर की दुरभिसंधियाँ देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अन्याय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्ततः उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की संभावनाएँ प्रशस्त बनाए रखता है।
  
🔵 किन्तु यदा-कदा परिस्थितियाँ ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम-पराभव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने है। युग परिवर्तन की इस पुण्य-वेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 62

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 25)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 सुख-शान्ति, सन्तोष, सफलता एवं स्वास्थ्य आदि के पारितोषिक असामयिक जीवन-क्रम वालों से कोसों दूर रहा करते हैं। जिन्दगी जीने के लिए मिली है खो डालने के लिये नहीं। समय-सम्मत व्यवस्था के अभाव में इस परम दुर्लभ मानव-जीवन को न तो ठीक से किया जा सकता है और न इसका कोई लाभ ही उठाया जा सकता है। यह सम्भव तभी हो सकता है जब जीवन का प्रत्येक क्षण किसी निश्चित कर्त्तव्य के लिये निर्धारित एवं जागरुक हों।

🔵 असमय सोने-जागने, खाने-पीने और काम करने वाले आजीवन आरोग्य के दर्शन नहीं कर सकते। वे सदा सर्वदा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आध्यात्मिक किसी न किसी व्याधि से पीड़ित रहेंगे। उनकी शक्ति में से कुछ को तो उनकी अव्यवस्था नष्ट कर देगी और शेष का व्याधियां शोषण कर लेंगी।

🔴 समय-संयम के साथ अपना हर काम करने वाले मनुष्यों का जीवन कभी असफल नहीं हो सकता है। भले ही परिस्थितिवश वे संसार में कोई अनुकरणीय कार्य न भी कर पायें, तब भी उनका जीवन असफल नहीं कहा जा सकता। सुख-शांति पूर्वक एक प्रिय जिन्दगी जी लेना स्वयं ही एक बड़ी सफलता है। सफलता का मान-दंड कोई बड़ा काम ही नहीं है, उनका सच्चा मानदण्ड है—जीने की कला जो सन्तोषपूर्वक जिन्दगी को कथनीयता के साथ जी सका है, वह निःसन्देह अपने जीवन में सफल हुआ है। एक छोर से दूसरे छोर तक जिसका जीवन एक व्यवस्थित कार्यक्रम की तरह स्निग्ध गति से न चल कर ऊबड़-खाबड़ गिरता-पड़ता और उलझता सुलझता चलता है, उसके जीवन को असफल मान लेना ही न्याय-संगत होगा।

🔵 समय पर हर काम करने वालों की सारी शक्तियां उपभोग में आने पर भी अक्षय बनी रहती हैं। समय पर काम करने का अभ्यास एक सजग प्रहरी की तरह ही होता है, जो किसी भी परिस्थिति में मनुष्य को अपने कर्त्तव्य का विस्मरण नहीं होने देता। समय आते ही सिद्ध किया हुआ अभ्यास उसे निश्चित कार्य की याद दिला देता है और प्रेरणापूर्वक उसमें लगा भी देता है? समय आते ही उक्त कार्य योग्य शक्तियों में जागरण एवं सक्रियता आ जाती है, जिससे मनुष्य निरालस्य रूप से अपने काम से लगकर उसे निर्धारित समय में ही पूरा कर लेता है। कार्य एवं कर्त्तव्यों की पूर्णता ही जीवन की पूर्णता है, जो कि बिना समय, संयम, एवं व्यवस्थित और क्रियाशीलता के प्राप्त नहीं हो सकती।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 7 मई 2017

👉 शरणागति से मिला आरोग्य

🔵 एक बार विचित्र तरीके से मेरे गले में कुछ समस्या उत्पन्न हुई। ऐसा लगता था मानो गले में काँटे जैसा कुछ चुभ रहा है। डॉक्टर को दिखाया। कुछ समझ में नहीं आया तो डॉक्टर ने गरम पानी से गरारा करने की सलाह दी। एहतीयात के तौर पर कुछ दवा भी दी। इन सब से कोई लाभ न होते देख मैंने बड़े डॉक्टर से दिखाने की सोची। एक डॉक्टर का पता चला कि वे पूरे एशिया में छठे स्थान पर माने जाते हैं।

🔴 उनके पास गया। उन्होंने पूरी गम्भीरता के साथ मेरी तकलीफें सुनीं। खून, थूक- खखार की जाँच करवाई। मशीन से गले की जाँच की। इतनी जाँच- पड़ताल के बाद उन्होंने बताया कोई बीमारी नहीं है। संदेह की कोई गुँजाइश नहीं रह गई थी। लेकिन मेरी तकलीफ का क्या करूँ ,, जो सोते- जागते हर क्षण याद दिला रही थी कि कुछ तो अवश्य ही है। धीरे- धीरे तकलीफ इतनी बढ़ गई कि खाना खाने और पानी पीने में भी तकलीफ होने लगी। आखिरकार हार कर दूसरे डॉक्टरों के पास गई। जिनके पास भी जाती, जाँच के बाद सब यही बताते कि कोई बीमारी नहीं है। टी.एम.एच, डॉ.भटनागर, फिर परसूडीह के चिकित्सक अनिल कुमार ठाकुर सबने देखा- जाँचा, गले की चुभन दूर करने के लिए सभी ने कोई- न कोई नुस्खे दिए, पर मुश्किल दूर न हो सकी।

🔵 कहड़गोड़ा में दिखाया। वहाँ बताया गया, कटक में एक बहुत बड़े डॉक्टर हैं डॉ. सनातन रथ- वहाँ दिखाइए। उनके क्लीनिक और डायग्रोस्टिक सेन्टर में गया। वहाँ डॉक्टर ने कुरेद- कुरेद कर काफी सवाल पूछे। इसी दौरान मुझे याद आया कि मुझे दोनों स्तनों में अक्सर दर्द रहता है, जिस पर पहले बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन डॉक्टर के पूछने पर मैंने बताया। उन्होंने संभावना जताई कि संभव है इसी के प्रभाव से गले की समस्या आ रही हो। उन्होंने कहा- कैन्सर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कई तरह की जाँच करवाई गई, लेकिन रोग का निदान नहीं हो सका। इस बीच मेरी हालत और खराब होती गई। कमजोरी के कारण गले की चुभन इतनी अधिक बढ़ गई कि खाना पीना भी बन्द होने की नौबत आ गई।

🔴 जीवन का अन्त बहुत नजदीक दिखाई देने लगा। इन्हीं दिनों आध्यात्मिकता की ओर मेरा कुछ रुझान होने लगा। पड़ोस में एक भाई गायत्री परिवार के थे। कभी- कभार उनसे कुछ पुस्तकें मिल जाया करती थीं। पढ़कर आकर्षण अनुभव करती थी। अचानक तबीयत के बिगड़ जाने से ऐसा आभास होने लगा कि जिन्दगी के इतने दिन काट लिए, लेकिन परलोक के बारे में कुछ सोचा ही नहीं। कहते हैं, दीक्षा से सद्गुरु का मार्गदर्शन मिलता है, जिससे मृत्यु के बाद सद्गति मिलती है, आत्मा को भटकना नहीं पड़ता। कुछ इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। पड़ोस के वे सज्जन गुरु भाई के नाते कभी- कभार हाल- चाल पूछ लिया करते थे। एक दिन शक्तिपीठ से लौटते समय मेरे पति से भेंट हुई तो उन्होंने साधारण तौर पर कुशल समाचार पूछे। पति ने मेरी हालत बताई तो उन्होंने कहा- ऐसी समस्याओं में एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेदिक दवाएँ अधिक कारगर होती हैं। उन्होंने मुसालनी में डॉ.एम.एन.पाण्डेय (आयुर्वेदिक चिकित्सक) के यहाँ दिखाने की सलाह दी। वैसे भी इसके अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं था। इतने दिनों से इस अजीब रोग के इलाज के पीछे इतने पैसे बहा चुके थे कि अब अधिक सामर्थ्य भी नहीं रह गई थी। कैन्सर की सम्भावना जानने के बाद से ही मैं सोच रही थी कि वैलूर में चेकअप करवा लूँ। वहाँ की काफी प्रसिद्धि सुन रखी थी। लेकिन पैसे के अभाव में वैसा सम्भव नहीं था। डॉ. पाण्डेय से ही दिखाना तय हुआ।

🔵 डॉ. पाण्डेय ने केस हिस्ट्री पढ़कर और यह सुनकर कि मैं पैसे के अभाव में वैलूर न जा सकी, वहाँ जाने के लिए खर्च स्वयं देने की पेशकश की और तात्कालिक तौर पर कुछ दवाएँ दीं। बोले जब तक अच्छी तरह चेकअप नहीं हो जाता तब तक इन्हें लेते रहिए। उन्होंने दवा की कीमत भी नहीं ली। अभी इलाज शुरू ही हुआ था कि अचानक एक दिन घर में आग लग गई। इलाज भी बन्द हो गया। अब डॉक्टर के यहाँ जाती भी कैसे! एक बार दवा मुफ्त में दे दी तो दुबारा कैसे माँगी जाय- इस पशोपेश में कई दिन गुजर गए। वैलूर जाने की बात भी अधर में रह गई। दीक्षा के बाद से मैं नियमित साधना करने लगी थी। एक दिन साधना के बाद यों ही अनमनी- सी बैठकर मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रही थी। अचानक ध्यान आया कि आजकल पहले जैसा दर्द और गले की चुभन अनुभव नहीं हो रही। पता नहीं वह बीमारी अपने आप कैसे छूट गई और आज तक में ठीक हूँ। ऐसा मात्र गुरुकृपा से सम्भव हुआ है।
  
🌹  विभा देवी परसूडीह, टाटानगर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/sharna

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2017


👉 ऐसी सीख न दीजिए

🔵 सुप्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस के बुद्धिमान् शिष्य चाँग-होचाँग एक बार देश भ्रमण के लिए निकले। प्रजा की भलाई के लिए सामाजिक अध्ययन और उपयुक्त वातावरण का शोध इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य था।

🔴 घूमते-घूमते चाँग ताईवान पहुँचे। एक युवक माली कुँए से जल निकाल रहा था, बाल्टी पानी निकालने और फिर ढोकर हेर पौधे तक पहुँचाने में उसे बहुत अधिक परिश्रम करना पड रहा था तो भी काफी काम बाकी पड़ा था। चाँग को उस पर बडी दया आई। काफी देर सोचते रहे कोई ऐसा उपाय नहीं है क्या, जिससे माली का परिश्रम हलका किया जा सके।

🔵 विचार करे तो सैकडो़ वर्षों की सडी़-गली परंपराएँ रीति-रिवाज भी सगे-संबंधी की तरह चिपके कष्ट देते रहते हैं, पर विचार की एक छोटी-सी चिनगारी भी उन्नतियों के राजमहल खड़ी कर सकती है। चाँग ने सोचा यदि लकडी़ की एक घिर्री बनाकर उसमें रस्सी लपेटकर खड़े-खड़े ही खींचने का प्रबध हो जाए और यहीं से प्रत्येक वृक्ष तक के लिए नाली खोद ली जाए, तो माली का यथेष्ट श्रम बच सकता है। इतने ही परिश्रम में वह पहले से अधिक काम कर सकता है।

🔴 माली ने इस योजना के लाभ समझे और उसे मान लिया। ढेंकलीनुमा व्यवस्था हो गई। माली वहीं खडा-खड़ा पानी निकाल कर पौधे सींचने लगा।

🔵 समय तो बचा, पर माली ने देखा उसके चलने-फिरने-झुकने-लचकने के कई व्यायाम अब नहीं रहे इसलिए शरीर के कुछ अंग शिथिल रहने लगे हैं, तो भी उसे इस बात का संतोष था कि तब से कुछ काम अधिक हो जाने से शरीर का हर अवयव का कुछ-न-कुछ तो क्रियाशील हो ही जाता है इसलिए स्वास्थ्य में गिरावट की कोइ विशेष चिंता नहीं हुई।

🔴 चाँग आगे बढ़ गए। बहुत दूर तक घूम चुकने के बाद वे फिर से उसी रास्ते वापस लौटे तो उनके मस्तिष्क में एक और बात याद आई कि यदि कुएँ में भाप से चलने वाली गशीन डाल दी जाए तो परिश्रम भी बिलकुल कम हो जाए और वृक्षों को जल भी खूब मिलने लगे। माली ने वह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। भाप का इंजन लग गया, माली को चैन हो गया।

🔵 काफी दिन बीतने के बाद एक दिन चाँग की इच्छा उस बाग को देखने की हुई, उसने सोचा था बगीचा अब लहलहा रहा होगा, पर वहाँ जाकर देखा तो स्तब्ध रह गया। पूछने पर पता चला, माली बीमार रहता है, इसलिये समय बे समय ही पानी मिल पाता है, इसी से पेड-पौधे मुरझा रहे हैं।

🔴 चाँग माली को देखने उसके घर गए। सचमुच माली बीमार था। उसके हाथ सूख गए थे, टाँगे कमजोर हो गई थीं, पेट दो रोटी से ज्यादा नहीं पचा सकता था, माली का मुँह पीला पड गया था।

🔵 चाँग ने हँसकर पूछा- कहो भाई, अभी भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है क्या तो कोई और तरकीब सोचें। पास खडी मालिन ने कहा-श्रीमान् जी, और तरकीब लडाने की अपेक्षा तो आप इन्हें ऐसी सीख दीजिए कि पहले की तरह फिर से अपने हाथ से ही काम करने लगें। ढेंकली का आराम ही इनकी बीमारी का कारण है। चाँग अपने एकांगी चिंतन पर बहुत पछताए, उन्होंने सोचा मनुष्य यांत्रिक और बिना परिश्रम के जीवन के आकर्षण में न पडता तो वह क्यों अस्वस्थ होता, क्यों रोगी ? उसने माली से अपनी स्त्री की ही राय मान लेने की सीख दी और वही से वापस चला आया। माली अपनी पूर्व जीवन पद्धति में आकर पुन: स्वस्थ हो गया पर उसकी छूत आज की पीढ़ी को लग गई, जो मशीनों से काम लेकर स्वयं आराम से बैठा केवल कलम घिसना चाहता है। माली की तरह वह न तो उत्पादन बढा पाता है न बीमारी हटा पाता है। केवल मशीनें बढ़ रही है और मनुष्य उसमें निरंतर दबता पिसता चला जा रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 157, 158

👉 वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

🔵 राष्ट्रजागरण की बात बहुत लोगों द्वारा, बहुत अवसरों पर, बहुत बार दुहराई जाती है; आकर्षक नारे दिए जाते हैं, समस्याओं का समाधान करने के लुभावने वादे किए जाते हैं-फिर भी राष्ट्र जाग्रत् नहीं है। दरअसल सक्रियता-जाग्रति की पर्याय नहीं। सक्रिय मनुष्य में मनुष्यता का अभाव बेहतर खटकता है। इसी तरह राष्ट्र की विविध गतिविधियों के बीच राष्ट्रीय भावना का अभाव बराबर अनुभव हो रहा है और उसके निवारण के उपाय सफलीभूत न होने से हर राष्ट्रप्रेमी का अन्तःकरण चीत्कार कर रहा है। राष्ट्रीय-चरित्र, राष्ट्रीय-गौरव, राष्ट्रीय-मर्यादा, राष्ट्रीय-आत्मीयता, राष्ट्रीय-समृद्धि आदि की वृद्धि और उत्कर्ष की बात क्या की जाए-उसका कोई न्यूनतम स्वरूप भी निर्धारित न हो सकना चिन्तनीय बात है।

🔴 ऐसा लगता है कि राष्ट्र सचमुच सोया पड़ा है, सामान्य निद्रा में नहीं-मूर्च्छा जैसी गहन स्थिति में। उसे चैतन्य, जाग्रत्, सतेज बनाने के लिए विशेष प्रयास किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। पर प्रयास करे कौन? राष्ट्रीय-चेतना को कौन उभारे? उसे कैसे विकसित करें? घूम-फिरकर हमारी आदत कुछ दलों और उनकी सरकार की ओर देखने की पड़ गयी है। पर यह बड़ी भारी भ्रान्ति है। जब सरकार विदेशी थी तो उसने सोए राष्ट्र का उपयोग अपने स्वार्थ में करने के लिए उसे उसी स्थिति में रखना पसन्द किया और आज जब वह आन्तरिक है, तो वह भी उसी सुप्त समाज का एक अंग है। सोया हुआ अंग सोये हुए को कैसे जगा सकता है? जिनकी दृष्टि स्वयं में सीमित है, उनसे विस्तृत दृष्टिकोण की कामना कैसे करें?
  
🔵 राष्ट्रजागरण का महान् कार्य तो जाग्रत् अन्तःकरण वाले व्यक्तियों का है। प्रचलित मान्यताओं के परे जिनका मस्तिष्क सोच सकता है, ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रीय चेतना जाग्रत् कर सकते हैं। जिनके जीवन की गतिविधियाँ किन्हीं अंशों में स्वार्थ की सीमा के बाहर सक्रिय हैं, व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामूहिक हितचिन्तन जिनके स्वभाव में है तथा उसके अनुरूप जीवनप्रक्रिया चलाने के जो थोड़े-बहुत अभ्यस्त हैं, वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैं। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थायी लाभप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा दें सकें, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा समर्थ व्यक्तित्त्वों का यह कार्य है।

🔴 ऐसे व्यक्तियों को प्राचीनकाल में ‘पुरोहित’ कहते थे। पुरोहित शब्द से से भी यही भाव निकलता है कि जो सामने का लाभ नहीं-आगे का-दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था बना सकें। हीन स्वार्थों के स्थान पर महत् स्वार्थों की सीढ़ियों पर चलते हुए ‘परमार्थ’ तक लोगों को गति दे सकें-वही पुरोहित में ‘चिन्तक और साधक’ दोनों गुण आवश्यक हैं। जो चिन्तन-विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन-पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बनकर रहे, वही पुरोहित है। अपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ व्यक्तिगत हित के साथ-साथ समाजहित की जो कल्पना कर सके, ऐसे व्यक्ति इस वर्ग में आ सकते हैं। राष्ट्रजागरण का कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान् व्यक्तित्वों का है। ये संगठित होकर स्वयं को इस महान् प्रयोजन के लिए समर्पित कर सकें तो यह महान् राष्ट्र विश्वमंच पर पुनः सिंहनाद कर सकता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 60

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 24)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 इसी प्रकार बहुत से अध्ययनशील व्यक्ति अपना समय तो खराब नहीं करते किन्तु उनका अध्ययन क्रम निश्चित एवं निर्धारित नहीं होता। वे कभी किसी एक विषय के ग्रन्थ को पढ़ते और पूरा किये बिना ही दूसरा शुरू कर देते हैं। कभी-कभी एक ग्रन्थ को कल के लिये अधूरा छोड़कर उसके लिये निश्चित समय पर दूसरा ग्रन्थ प्रारम्भ कर देते हैं। बहुधा यह भी देखने में आता है कि अनियमित अध्ययनशील पुस्तकों के समय में समाचार-पत्र और समाचार-पत्रों के समय में साहित्यिक पत्रिकायें पढ़ रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि वे अपना समय बिन पढ़े व्यय नहीं करते किन्तु उस कार्य में क्रम को स्थान नहीं देते। इस कमी के कारण अध्ययन से जितना लाभ होना चाहिये उतना नहीं हो पाता।

🔵 कार्यालयों में लिखा-पढ़ी का काम करने वाले अनेक परिश्रमी बाबू लोग अपनी इसी असामयिकता के कारण अच्छे कर्मचारियों की सूची में नहीं आ पाते वे पूरे समय काम में जुटे रहते हैं और कभी-कभी निर्धारित समय से अधिक समय तक भी। तब भी वे अपने उच्च अधिकारी की प्रियपात्रों की सूची में नहीं आ पाते। क्रम के साथ काम तथा फाइलों को उपयुक्त समय में न देने से उनका आवश्यक काम कभी-कभी पड़ा रहता है और गौण काम पूरा हो जाता है। इसी अव्यवस्था के कारण वे बहुत से तात्कालिक कामों को भूल जाते हैं इसलिये उनकी कार्य कुशलता के अंग कम हो जाते हैं। पत्र लिखने के समय फाइलों का अध्ययन और फाइल पढ़ने के समय टाइप पर बैठ जाने से न तो उनका कोई काम समय पर हो पाता है और कुशलतापूर्वक इस प्रकार असमय पूरा हुआ उनका काम अधूरे की श्रेणी में ही गिना जाता है। क्रम एवं सामयिकता से करने पर काम भी कुशलतापूर्वक होता है और आवश्यकता से अधिक समय भी नहीं लगता।

🔴 इस प्रकार के अव्यवस्थित कार्यकर्त्ता समय की पाबन्दी को एक बन्धन मानते हैं। उनकी अक्रमिक बुद्धि का तर्क होता है कि समय के साथ अपने को अथवा अपने काम को बांध देने से मनुष्य उसका इतना अभ्यस्त हो जाता है कि यदि कभी संयोग, विवशता अथवा परिस्थितिवश उसे व्यवधान स्वीकार करना पड़ता है तो उसे बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है। प्रातःकाल पढ़ने अथवा व्यायाम करने वाले को यदि दो-चार दिन के लिए बाहर यात्रा पर जाना पड़ जाये तो निर्धारित कार्यक्रम में व्यवधान पड़ जाने से उसकी अभ्यस्त वृत्तियां विद्रोह करेंगी, जिससे यात्रा अथवा प्रवास के समय पर उसे बड़ी भ्रान्ति, क्लान्ति एवं व्यग्रता रहेगी।

🔵 समय पर भोजन के अभ्यस्त ब्याह-शादियों, मंगलोत्सवों अथवा शोक सम्भोगों के अवसरों पर या तो भूखों रहते हैं अथवा खाने से बीमार हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 6 मई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 7 May 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 May 2017


👉 सीमित से असीम जीवन की ओर

🔵 शंकराचार्य जी अपनी माता की इकलौती संतान थे। माता ने सतान प्राप्ति के लिये शिव की घोर तपस्या की। तपस्या के फलस्वरूप जो संतान मिली-उसका नाम शंकर रखा।

🔴 साधारण स्त्रियों की तरह वे भी यही स्वप्न देखा करतीं थी कि कुछ ही दिनों में जब हमारा शंकर और बड़ा हो जायेगा तो उसका ब्याह करुँगी। बहू घर में आयेगी। हमारा घर भी कुछ ही दिनों में नाती पोतों से भरा-पूरा हो जायेगा। बहू की सेवाओं से हमें भी तृप्ति मिलेगी। जीवन की अंतिम घडियाँ सुख-शांति और वैभवपूर्ण ढ़ंग से समाप्त होंगी। ज्यो-ज्यों शकर बडे होते जाते, माता का वह स्वप्न और भी तीव्र होता जाता।

🔵 जन्म-जात प्रतिभा-संपन्न शंकर का ध्यान जप, तप, पूजा-पाठ और दूसरे की सेवा, सहायता में ही अधिक लगता था। ज्ञानार्जन करना और इस प्रसाद को दूसरों तक वितरित करने की एक आकांक्षा हृदय के एक कोने से धीरे-धीरे प्रदीप्त हो रही थी। समाज की दयनीय दशा देखकर, उन्हे तरस आ रहा था। समाज को एक प्रखर, सच्चे और एकनिष्ठ सेवक की उन्हें आवश्यकता प्रतीत हो रही थी। ऐसे विषम समय में वे अपनी प्रतिभा को सांसारिक माया-जाल मे फँसाकर नष्ट नहीं करना चाहते थे।

🔴 उधर माता बच्चे की ऐसी प्रवृति को देखकर खिन्न हो रही थी। वे अपने किशोर शंकर को यही समझाया करती थीं कि वह घर गृहस्थी सँभाले, आजीविका कमाए और विवाह कर ले।

🔵 किशोर शंकर को माता के प्रति अगाध निष्ठा थी। वे उनका पूरा सम्मान करते थे और सेवा-सुश्रूषा में रंच मात्र भी न्यूनता नहीं आने देते थे। फिर भी अंतरात्मा यह स्वीकार न कर रही थी कि मोहग्रस्त व्यक्ति यदि अविवेकपूर्ण किसी बात का आग्रह कर रहा हो तो भी उसे स्वीकार ही कर लिया जाए। माता की ममता का मूल्य बहुत है, पर विश्व-माता मानवता की सेवा करने का मूल्य उससे भी अधिक है। विवेक ने- "बडे के लिए छोटे का त्याग" उचित बतलाया है। अंतरात्मा ने ईश्वर की अतरंग प्रेरणा का अनुभव किया और उसी को ईश्वर का निर्देश मानकर शंकर ने विश्व-सेवा करने का निश्चय किया।

🔴 माता को कष्ट न हो, स्वीवृति भी मिल जाए। ऐसा कौन-सा उपाय हो सकता है-यही उनके मस्तिष्क में गूँजने लगा। सोचते-सोचते एक विचित्र उपाय सूझा। एक दिन माता पुत्र दोनों नदी मे स्नान करने साथ-साथ गए। माता तो किनारे पर ही खडी रही, पर बेटा उछलते-कूदते गहरे पानी तक चला गया। वहाँ उसने अपने उपाय का प्रयोग किया। अचानक चिल्लाया-बचाओ। कोई बचाओ 'मुझे मगर पकड़े लिए जा रहा है। बेटे की चीत्कार सुनकर माता घबडा गई। किकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में उन्हें कोई उपाय ही न सूझ रहा था। बेटे ने माता से कहा- 'माता मेरे बचने का एक ही उपाय अब शेष है। तुम मुझे भगवान् शंकर को अर्पित कर दो। वही मेरी प्राण रक्षा कर सकते है'' मर जाने से जीवित रहने का मूल्य अधिक है। भले ही लड़का संन्यासी बनकर रहेगा-यह निर्णय करते माता को देर न लगी। उन्होंने भगवान् शंकर की प्रार्थना की कि- मेरा बेटा मगर के मुख से निकल जाए तो उसे आपको समर्पित कर दूँगी। इतना कहते ही बेटे की आंतरिक प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वह धीरे-धीरे किनारे पर आ गया।

🔵 इस प्रकार विश्व-सेवा के प्रेम और मानवता की सेवा की सच्ची निष्ठा ने ममता और मोह पर विजय पाई। यह युवक शंकर-संन्यासी शंकराचार्य के रूप में धर्म एवं संस्कृति की महान् सेवा में प्रवृत हुए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 154, 155

👉 युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह

🔵 वसन्त में परिवर्तन के प्रवाह की मर्मर ध्वनि सुनायी देती है। एक गहन-गम्भीर अन्तर्नाद गूँजता है। इसकी छुअन भर से समूची प्रकृति अपने सड़े-गले, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को उतारकर,वासन्ती परिधान पहनकर सजने-सँवरने लगती है। परिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह पतझड़ को रंग-विरंगी कोपलों एवं सुरभित-सुगन्धित फलों में बदल देता है। कँपकपा देने वाली बर्फीली-सर्दीली हवाएँ वसन्ती ब्यार का रूप ले लेती हैं। अब तो प्राकृतिक परिवर्तन के इसी पर्व को दैवीचेतना ने युगपरिवर्तन के महापर्व का गौरव दिया है।

🔴 युगपरिवर्तन के वासन्ती प्रवाह का रहस्यमय उद्गम तब हुआ, जब परमपूज्य गुरुदेव को उनके महान् गुरु ने भगीरथी तपश्चर्या का उद्बोधन, आह्वान प्रस्तुत किया और उस निर्देश को शिरोधार्य करने के लिए गुरुदेव तत्क्षण उद्यत हो गए। वे एकनिष्ठ भाव से समग्र श्रद्धा नियोजित करके युग परिवर्तन के प्रवाह को जगती पर लाने के लिए उसी प्रकार तत्पर रहे, जिस प्रकार गंगाप्रवाह के अवतरण का लक्ष्य लेकर भगीरथ ने कठोर तप-साधना की अग्नि परीक्षा में प्रवेश किया था। निश्चित रूप से यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल एवं तेजस्वी बनाने जैसा था। जिसके आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त हो सकीं। अपनी इसी तप-साधना के बल पर उन्होंने युगपरिवर्तन की प्रचण्ड धाराओं को दु्रतगति से प्रवाहित कर सकने में अलौकिक सफलता प्राप्त की।
  
🔵 युगपरिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह न केवल प्रकृति एवं पर्यावरण, बल्कि मानवीय जीवन के हर पहलू को आमूल-चूल बदल डालने के लिए उतारू है। यही कारण है कि इन्सानी जिन्दगी के हर छोर पर दरकन और दरारें पड़ चुकी हैं। सब तरफ पुरानेपन के ध्वंस और महानाश की चीत्कारों और हाहाकार की आर्त गूँज है। पर इसी के साथ नवसृजन की कोमल किलकारियाँ हैं एवं नवचेतना के अंकुरण का मधुर संगीत भी है, ये स्वर अभी कितने ही मन्द क्यों न हों, किन्तु जिनके पास तनिक-सा भी अन्तर्ज्ञान है, वे इन्हें सहज ही सुन-समझ सकते हैं।

🔴 राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की संकटग्रस्त स्थिति की चर्चा सर्वत्र है, पर प्राकृतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विपदाएँ ही कहाँ कम हैं? सच तो यह है कि हर तरफ पुरानापन टूटकर नवसृजन हो रहा है। अकेला व्यक्ति या कोई एक परिवार अथवा फिर कोई एक देश या समाज नहीं, बल्कि पूरे का पूरा युग परिवर्तित हो रहा है। इस युगपरिवर्तन के अनेक पहलू हैं, अगणित आयाम हैं और साथ ही हैं, इसके विविध मोर्चों पर जुझारू संघर्ष के लिए समर्थ युगसैनिकों के लिए वीरोचित आह्वान। यह संदेश। आमंत्रण!! आह्वान!!! शब्दों की सतह पर नहीं, भावों की गहराइयों में ही सुना और समझा जा सकता है।

🔵 इसे धारण करने के लिए हम सावधान हो जाएँ। युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह हम तक पहुँचे यह कामना करते हुए बैठे न रहें। वह तो सदा से समर्थ है और अपना काम करेगा ही। हम तो कामना करें इस प्रवाह की वासन्ती ज्वाला की, वासन्ती शौर्य के शोलों की, जिसके तेज से अनीति एवं अवांछनीयताएँ जलकर भस्म हो जाएँ। युग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो और नवयुग मुस्करा उठे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 58

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 23)

🌹 समय-संयम सफलता की कुञ्जी है
🔴 अनेक लोग ऐसे होते हैं जो वक्त का महत्व तो स्वीकार कर लेते हैं किन्तु उसके पालन पर ध्यान नहीं देते। समय खराब न करने पर भी वे कोई कम निर्धारित वक्त पर करना आवश्यक नहीं समझते। इस वक्त इस काम पर जुटे हुए हैं तो उस वक्त उस कम पर। दूसरे दिन उनका यह क्रम टूट जाता है और वे इस वक्त उस काम को और उस वक्त इस काम को करने लग जाते हैं।

🔵 इस प्रकार की अनियमितता बहुधा विद्यार्थी, अध्ययनशील तथा लिखा-पढ़ी का काम करने वाले भी किया करते हैं। अशिक्षित, अज्ञानी जीवन में अव्यवस्था हो तो एक बात भी है पर शिक्षा के प्रकाश में आगे बढ़ने वाले को अव्यवस्थित होना वस्तुतः खेदजनक है। अनियमित विद्यार्थी कभी प्रभात में गणित करते हैं तो कभी अंग्रेजी पढ़ते हैं। इसी प्रकार अंग्रेजी व हिन्दी विषय कभी प्रातः व सायं के वक्त घेर कर गणित को दोपहर के लिये रख देते हैं। कभी भूगोल के समय में इतिहास और इतिहास के समय में नागरिक शास्त्र लेकर बैठ जाते हैं। इसके अतिरिक्त उनके लेखन एवं पठन का समय तो परस्पर बदलता ही रहता है पढ़ने तथा खेलने व मनोरंजन के समय भी बदलते रहते हैं। इस प्रकार वे पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने में समय तो देते हैं किन्तु उनके समय में न तो कोई क्रम होता है और न नियमितता।

🔴 कभी-कभी उनका यह समय घटता-बढ़ता भी रहता है। जिस दिन गणित में अधिक मन लग गया तो अंग्रेजी का समय भी उसे दे दिया। कभी रुचि की अधिकता से इंग्लिश गणित का समय ले जाती है। इस प्रकार वे अपना अध्ययन कार्य तो करते रहते हैं किन्तु किसी निश्चित समय-सारिणी के अनुसार विषयों में गति, योग्यता एवं आवश्यकता के अनुसार ही समय देकर बनाई गई समय-सारिणी का पालन करने वाले विद्यार्थी अनियमित विद्यार्थियों से कहीं अधिक श्रम एवं समय के सदुपयोग का लाभ उठाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 95)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 इसके अतिरिक्त चल प्रज्ञापीठों की योजना बनी। एक कार्यकर्ता एक संस्था चला सकता है। यह चल गाड़ियाँ हैं। इन्हें कार्यकर्ता अपने नगर तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में धकेलकर ले जाते हैं। पुस्तकों के अतिरिक्त आवश्यक सामान भी उसकी कोठी में भरा रहता है। यह चल पुस्तकालय अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक रहे इसलिए वे दो वर्ष में बारह हजार की संख्या में बन गए। स्थिर प्रज्ञा पीठों और चल पज्ञा संस्थानों के माध्यम से हर दिन प्रायः एक लाख व्यक्ति इनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

🔵 इसके अतिरिक्त उपरोक्त हर संस्था का वार्षिकोत्सव करने का निश्चय किया गया, जिसमें उस क्षेत्र के न्यूनतम एक हजार कार्यकर्ता एकत्रित हों। चार दिन सम्मेलन चले। नए वर्ष का संदेश सुनाने के लिए हरिद्वार से प्रचारक मंडलियाँ कन्याओं की टोलियों के समान ही भेजने का प्रबंध किया गया, जिनमें ४ गायक और १ वक्ता भेजे गए। पाँच प्रचारकों की टोली के लिए जीवन गाड़ियों का प्रबंध करना पड़ा ताकि कार्यकर्त्ताओं के बिस्तर, कपड़े, संगीत, उपकरण, लाउडस्पीकर आदि सभी सामान भली प्रकार जा सके। ड्राइवर भी अपना ही कार्यकर्ता होता है, ताकि वह भी छठे प्रकार का काम देख सके। अब हर प्रचारक को जीप व कार ड्राइविंग सिखाने की व्यवस्था की गई है, ताकि इस प्रयोजन के लिए बाहर के आदमी न तलाशने पड़ें। 

🔴 मथुरा रहकर महत्त्वपूर्ण साहित्य लिखा जा चुका था। हरिद्वार आकर प्रज्ञा पुराण का मूल उपनिषद् पक्ष संस्कृत व कथा टीका सहित हिन्दी में १८ खण्डों में लिखने का निश्चय किया गया। पाँच खण्ड प्रकाशित भी हो चुके। इसके अतिरिक्त एक फोल्डर आठ पेज का नित्य लिखने का निश्चय किया गया। जिनके माध्यम से सभी ऋषियों की कार्य पद्धति से सभी प्रज्ञापुत्रों को अवगत कराया जा सके और उन्हें करने में संलग्न होने की प्रेरणा मिल सके। अब तक इस प्रकार ४०० फोल्डर लिखे जा चुके हैं। उनको भारत की अन्य भाषाओं में अनुवाद कराने का प्रबंध चल पड़ा व देश के कोने-कोने में यह साहित्य पहुँचा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.4

👉 आसुरी प्रगति

🔴 संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसमें कोई दोष न हो अथवा जिससे कभी गलती न हुई हो। अतएव किसी की गलती देखकर बौखलाओ मत और न उसका बुरा चाहो।

🔵 दूसरों को सीख देना मत सीखो। अपनी सीख मान कर उसके अनुसार बन जाना सीखो। जो सिखाते हैं, खुद नहीं सीखते, सीख के अनुसार नहीं चलते, वे अपने आप को और जगत को भी धोखा देते हैं।

🔴 सच्ची कमाई है, उत्तम से उत्तम सद्गुणों का संग्रह। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी सद्गुण से संपन्न है, परन्तु आत्मगौरव का गुण मनुष्यों के लिए प्रभु की सबसे बड़ी देन है। इस गुण से विभूषित प्रत्येक प्राणी को, संसार के समस्त जीवों को अपनी आत्मा की भाँति ही देखना चाहिए। सदैव उसकी ऐसी धारणा रहे कि उसके मन, वचन एवं कर्म किसी से भी जगत के किसी जीव को क्लेश न हो। ऐसी प्रकृति वाला अंत में परब्रह्म को पाता है।

🔵 यह विचार छोड़ दो कि धमकाए बिना अथवा बिना छल-कपट के तुम्हारे मित्र, साथी, स्त्री-बच्चे या नौकर-चाकर बिगड़ जाएँगे। सच्ची बात तो इससे बिलकुल उलटी है। प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, त्याग और निश्छल सत्य के व्यवहार से ही तुम किसी को अपना बना सकते हो।

🔴 प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, सक्रिय हित, त्याग और निश्छल सत्य के व्यवहार से ही तुम किसी को अपना बना सकते हो। तुम्हारा ऐसा व्यवहार होगा तो लोगों के हृदय में बड़ा मधुर और प्रिय स्थान तुम्हारे लिये सुरक्षित हो जायगा। तुम भी सुखी होओगे और तुम्हारे संपर्क में जो आ जावेंगे, उनको भी सुख शाँति मिलेगी।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-जुलाई 1947 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/July/v1.4

👉 अनजानी बीमारी से बचाई गयी बालिका

🔵 मेरी बेटी वंदना को अचानक बेहोशी का दौरा पड़ने लगा। इस बीमारी की शुरुआत तब हुई, जब वह ननिहाल में थी। वहीं पर इलाज शुरू हुआ। एक एक कर कई डॉक्टरों की दवाएँ चलीं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

🔴 दो- तीन महीने बीतते- बीतते बीमारी बहुत बढ़ गई। अब बेहोशी के बाद पैरों में असहनीय दर्द की शिकायत भी रहने लगी और धीरे- धीरे चलना- फिरना भी कठिन हो गया। ऐसी हालत में वंदना को औरंगाबाद लाकर डॉ. गुंजन सिन्हा को दिखाया गया, लेकिन उनका इलाज भी कोई काम नहीं आया।

🔵 उन्हीं दिनों घर पर आए एक रिश्तेदार ने राँची के प्रसिद्ध डॉक्टर के.के. सिंह को दिखाने की सलाह दी। इन्हें एशिया के अन्य देशों से भी कन्सल्टेन्ट के रूप में बुलाया जाता है। डॉ. सिंह ने भी कई तरह की जाँच करवाई, लेकिन किसी भी जाँच की रिपोर्ट से बीमारी पकड़ में नहीं आई।

🔴 बेहोशी के दौरे अब और भी जल्दी- जल्दी आने लगे। इस लम्बी चिकित्सा प्रक्रिया से थककर मेरी बच्ची जीवन के प्रति कुछ निराश- सी हो चली थी। दिन भर गुम- सुम सी बैठी रहती थी। अकेले में ‘गायत्री माता- गायत्री माता’ बुदबुदाया करती थी। एक ही रट लगाए रहती- मुझे गायत्री मन्दिर ले चलो।

🔵 गायत्री मन्दिर के पास हमारी थोड़ी- सी जमीन थी। उसमें घर बनाने की तैयारी चल रही थी। हमने उसे दिलासा दे रखी थी कि भूमि पूजन के दिन गायत्री मन्दिर ले चलेंगे। निर्धारित तिथि को हम सब भूमि पूजन के लिए घर से चले। वंदना भी हमारे साथ थी। गायत्री मन्दिर जाने के नाम पर वह बहुत खुश थी। साइट पर पहुँचते ही उसने कहा- अब चलो गायत्री मंदिर। हमने कहा- पूजा हो जाने दो, हम सब साथ- साथ चलेंगे। लेकिन वह जिद करने लगी कि अभी चलो। भूमि पूजन में व्यवधान होते देखकर मैंने उसे जोर से डाँट दिया। वह रो- रोकर बेहोश हो गई।

🔴 हम सभी घबरा उठे। भूमिपूजन को बीच में ही रोककर उसे गायत्री मंदिर ले जाकर माँ गायत्री की मूर्ति के आगे लिटा दिया गया। कुछ मिनटों बाद ही उसे होश आ गया। वह आँखें मलते हुए उठ बैठी। स्वयं को मन्दिर में पाकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह एक ही झटके में गायत्री माता की मूर्ति के पास पहुँची और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी। थोड़ी देर बाद हम लोग भूमि पूजन के लिए वापस चल पड़े। वंदना तो उछलती- कूदती इस प्रकार आगे भागी जा रही थी मानो उसे पंख लग गए हों।

🔵 उसी दिन से उसका दौरा पड़ना हमेशा के लिए बन्द हो गया। माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा से आज वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
  
🌹 आशा देवी औरंगाबाद (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/asa

शुक्रवार, 5 मई 2017

👉 जीवन दान मिला

🔵  दिनांक 2 दिसम्बर 2000 को मैं बीमार पड़ा। टाटा मेन अस्पताल में मुझे उपचार हेतु भर्ती किया गया। लगभग बारह दिनों तक इलाज चला किन्तु हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ता चली गई। मेरे पुत्र सुनील कुमार ने टाटा मेन अस्पताल के डॉक्टरों से लड़- झगड़ कर मेरी छुट्टी करा ली। 14 दिसम्बर को टाटा के एक प्रसिद्ध डॉक्टर ए.के.दत्ता को दिखाया। डॉक्टर दत्ता ने खून और पेशाब की जाँच कराने के बाद बताया कि मेरी जिन्दगी मात्र सात दिनों की है। मेरी किडनी बिल्कुल खराब हो गयी है। मुझे तुरन्त वैलूर ले जाना होगा। मेरा लड़का घबरा गया। वैलूर का रेलवे टिकट बनवाया परन्तु बर्थ नहीं मिली। वह घबरा कर गायत्री शक्तिपीठ टाटानगर गया। वहाँ श्री कमल देव भगत को सारी बातें बताई। कमलदेव भगत जी के अथक प्रयास से किसी तरह दो बर्थ मिलीं।

🔴 गायत्री परिवार के अनेक परिजनों को मेरी बीमारी की जानकारी श्री भगत जी द्वारा मिल गई थी। अगले दिन वैलूर जाने की गाड़ी शाम को 2:40 मिनट में थी। लगभग ग्यारह बजे दिन में कमलदेव भगत जी, परिव्राजक श्री मुन्ना पाण्डे के साथ मेरे निवास स्थान पर आए और मेरे सामने एक प्रस्ताव रखा कि शायद मेरे जीवन का यह अंतिम समय है; अतः मैं अपने- आपको पूज्य गुरुदेव को दान दे दूँ। पहले तो मैं समझा नहीं। फिर कमलदेव बाबू ने बताया कि अगर गुरुदेव आप से युग निर्माण का काम लेना चाहें तो वे आप को जीवनदान दे सकते हैं। चूँकि जीवन का वह समय गुरुदेव का अनुदान होगा, इसलिए वह समय आप सिर्फ युग निर्माण के कार्य में लगाएँगे। मैं उनकी बात से सहमत हो गया। तब परिव्राजक मुन्ना पांडे जी ने मुझे जीवन अर्पण का संकल्प कराया। मेरी हालत काफी बिगड़ चुकी थी। पेट में हमेशा भयंकर दर्द रहता था और उल्टी होती थी। एक महीने में मैंने अन्न का एक दाना नहीं खाया था। अपने से करवट बदलने की भी शक्ति शरीर में नहीं थी।

🔵 निश्चित समय पर हम लोग रेलवे स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पर गायत्री परिवार के सैकड़ों परिजन मुझे विदाई देने आए थे। स्टेशन पहुँचने तक मेरे पेट का दर्द आधा हो गया। मुख्य ट्रस्टी श्री दौलत राम चाचरा और ट्रस्टी श्री इन्दु भूषण झा जी मुझे सहारा देकर रेलगाड़ी के डिब्बे तक ले आए। पता नहीं मुझमें कहाँ से शक्ति आ गई कि मैं पैदल चल सका। श्री चाचरा साहब बार- बार मुझे हिम्मत देते रहे और कहते रहे कि आप पूज्य गुरुदेव पर विश्वास रखें और हिम्मत नहीं हारें। आप अवश्य ही गुरुदेव के आशीर्वाद से स्वस्थ होकर लौटेंगे तथा पुनः शक्तिपीठ में समय देंगे। ट्रेन में बैठते ही उल्टी बन्द हो गए।

🔴 18 तारीख को सायं पाँच बजे मुझे वैलूर अस्पताल के नेफरो वार्ड में भर्ती करा दिया गया। मेरी हालत देखकर वैलूर के डॉक्टर भी गंभीर हो गए। लगातार सात दिनों तक तरह- तरह की जाँच होती रही। इस बीच मुझे कोई दवा नहीं दी गए। सिर्फ भोजन की कमी को दूर करने के लिए एक सुई दी गई। नौवें दिन २६ तारीख को मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और मैं लाज में आ गया। लगभग पाँच दिनों के बाद डॉक्टर से मिलने और अंतिम रिपोर्ट प्राप्त करने का समय निश्चित हुआ। मेरी पत्नी श्रीमती सरोजिनी देवी मेरे साथ रहती थी। वह नित्य ब्रह्ममुहूर्त में होटल की छत पर जाकर चौबीस माला गायत्री महामंत्र का जप करती थी।

🔵  जिस दिन रिपोर्ट मिलने वाली थी, उस दिन मेरी पत्नी जप उपासना कर मेरे पास आई तो बड़ी प्रसन्न दिखाई पड़ी। प्रसन्नता का कारण पूछा तो कहने लगी- आज उपासना के समय पूज्य गुरुदेव और वंदनीया माता जी आए थे, उन्होंने ध्यान में दर्शन दिए। अचानक मेरे मुँह से निकल गया कि आज अंतिम रिपोर्ट मिलने वाली है। अतः ऋषियुग्म हम दोनों को आशीर्वाद देने आए थे। रिपोर्ट अवश्य ही अच्छी होगी। गुरुदेव का स्मरण कर हम दोनों की आँखें डबडबा गईं। दोपहर तीन बजे जब हम लोग डॉक्टर से मिलने गए तो मुझे देख कर डॉक्टर मुस्कुरा दिए। डॉक्टर के मुख से पहला वाक्य निकला मिस्टर भगत यु आर लक्की। आपकी किडनी बिलकुल ठीक है। आपको कोई बड़ी बीमारी नहीं है। सिर्फ पुराना इन्फेक्शन है। कुछ दिनों के इलाज से ठीक हो जाएगा। आज भी मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। गायत्री शक्तिपीठ टाटानगर के साहित्य केन्द्र में नियमित समय देता हूँ।
  
🌹 कामिनी मोहन भगत जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/ls

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 94)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 ‘‘गायत्री के मंत्र द्रष्टा विश्वामित्र थे। उन्होंने सप्त सरोवर नामक स्थान पर रहकर गायत्री की पारंगतता प्राप्त की थी, वही स्थान तुम्हारे लिए भी नियत है। उपयोगी स्थान तुम्हें सरलतापूर्वक मिल जाएगा। उसका नाम शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ रखना और उन सब कार्यों का बीजारोपण करना जिन्हें पुरातन काल के ऋषिगण स्थूल शरीर से करते रहे हैं। अब वे सूक्ष्म शरीर में हैं इसलिए अभीष्ट प्रयोजनों के लिए किसी शरीरधारी को माध्यम बनाने की आवश्यकता पड़ रही है। हमें भी तो ऐसी आवश्यकता पड़ी और तुम्हारे स्थूल शरीर को इसके लिए सत्पात्र देखकर सम्पर्क बनाया और अभीष्ट कार्यक्रमों में लगाया। यही इच्छा इन सभी ऋषियों की है। तुम उनकी परम्पराओं का नए सिरे से बीजारोपण करना। उन कार्यों में अपेक्षाकृत भारीपन रहेगा और कठिनाई भी अधिक रहेगी, किंतु साथ ही एक अतिरिक्त लाभ भी है कि हमारा ही नहीं, उन सबका भी संरक्षण और अनुदान तुम्हें मिलता रहेगा। इसलिए कोई कार्य रुकेगा नहीं।’’

🔵  जिन ऋषियों के छोड़े कार्य को हमें आगे बढ़ाना था, उनका संक्षिप्त विवरण बताते हुए उन्होंने कहा-विश्वामित्र परम्परा में गायत्री महामंत्र की शक्ति से जन-जन को अवगत कराना एवं एक सिद्ध पीठ-गायत्री तीर्थ का निर्माण करना है। व्यास परम्परा में आर्ष साहित्य के अलावा अन्यान्य पक्षों पर साहित्य सृजन एवं प्रज्ञा पुराण के १८ खण्डों को लिखने का, पतंजलि परम्परा में-योग साधना के तत्त्वज्ञान के विस्तार का, परशुराम परम्परा में अनीति उन्मूलन हेतु जन-मानस के परिष्कार के वातावरण निर्माण का तथा भागीरथी परम्परा में ज्ञान गंगा को जन-जन  तक पहुँचाने का दायित्व सौंपा गया। 

🔴 चरक परम्परा में वनौषधि पुनर्जीवन एवं वैज्ञानिक अनुसंधान, याज्ञवल्क्य परम्परा में यज्ञ से मनोविकारों के शमन द्वारा समग्र चिकित्सा पद्धति का निर्धारण, जमदग्नि परम्परा में साधना आरण्यक का निर्माण एवं संस्कारों का बीजारोपण, नारद परम्परा में सत्परामर्श-परिव्रज्या के माध्यम से धर्म चेतना का विस्तार, आर्यभट्ट परम्परा में धर्मतंत्र के माध्यम से राजतंत्र का मार्गदर्शन, शंकराचार्य परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का, पिप्पलाद परम्परा में आहार-कल्प के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य सम्वर्धन एवं सूत-शौनिक परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञा योजनों द्वारा लोक शिक्षण की रूपरेखा के सूत्र हमें बताए गए। अथर्ववेदीय विज्ञान परम्परा में कणाद ऋषि प्रणीत वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति के आधार पर ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की रूपरेखा बनी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3

👉 सत्य की अकूत शक्ति पर विश्वास कीजिए

🔴 जो अपनी आत्मा के आगे सच्चा हैं, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार आचरण करता है, जो बनावट, धोखेबाजी, चालाकी को तिलांजलि देकर ईमानदारी को अपनी जीवन नीति बनाए हुए है, वह इस दुनिया का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है। सत्य को अपनाने से मनुष्य शक्ति का पुंज बन जाता है। महात्मा कनफ्यूशियस कहा करते थे कि सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल हैं, परंतु वस्तुत: सत्य में अपार बल है। उसकी समता भौतिक सृष्टि से किसी भी बल से नहीं हो सकती।

🔵 स्मरण रखिए, झूठ आखिर झूठ ही है। वह आज नहीं तो कल जरूर खुल जाएगा। असत्य का जब भंडाफोड़ होता है, तो उससे मनुष्य की सारी प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। उसे अविश्वासी टुच्चा और ओछा आदमी समझा जाने लगता है। झूठ बोलने में तात्कालिक थोड़ा लाभ दिखाई पड़े तो भी आप उसकी ओर ललचाइए मत, क्योंकि उस थोड़े लाभ के बदले में अंतत: अनेक गुनी हानि होने की संभावना है।

🔴 आप अपने वचन और कार्यों द्वारा सच्चाई का परिचय दीजिए। सत्य उस चीज के समान है जो आज छोटा दीखता है, पर अंत में फल-फूल कर विशाल वृक्ष बन जाता है। जो ऊँचा, प्रतिष्ठायुक्त और सुख-शांति का जीवन बिताने के इच्छुक हों, उनका दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि हमारे वचन और कार्य सच्चाई से भरे हुए होंगे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति-जुलाई 1947 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/July/v1.1

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 6 May 2017


👉 अंधविश्वास का पर्दाफाश

🔵 सिक्ख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह एक महान् योद्धा होने के साथ बडे बुद्धिमान् व्यक्ति थे। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा बडी गहरी थी। वह धर्म के लिए ही जिए और धर्म के लिए ही मरे। धर्म के प्रति अडिग आस्थावान् होते हुए भी वे अंधविश्वासी जरा भी न थे और न अंधविश्वासियों को पसंद करते थे।

🔴 गुरु गोविंदसिंह का संगठन और शक्ति बढा़ने की चिता में रहते थे। उनकी इस चिंता से एक पंडित ने लाभ उठाने की सोची। वह गुरु गोविंदसिंह के पास आया और बोला-यदि आप सिक्खो की शक्ति बढाना चाहते हैं, तो दुर्गा देवी का यज्ञ कराइए। यज्ञ की अग्नि से देवी प्रकट होगी और वह सिक्खों को शक्ति का वरदान दे देगी। गुरु गोविंदसिंह यज्ञ करने को तैयार हो गये। उस पंडित ने यज्ञ कराना शुरू किया।

🔵 कई दिन तक यज्ञ होते रहने पर भी जब देवी प्रकट नही हुइ तो उन्होंने पंडित से कहा-" महाराज! देवी अभी तक प्रकट नहीं हुई।'' धूर्त पंडित ने कहा-देवी अभी प्रसन्न नहीं हुई है। वह प्रसन्नता के लिये बलिदान चाहती है। यदि आप किसी पुरुष का वलिदान दे सकें तो वह प्रसन्न होकर दर्शन दे देगी और बलिदानी व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🔴 देवी की प्रसन्नता के लिए नर बलि की बात सुनकर गुरु गोविंदसिंह उस पंडित की धूर्तता समझ गए। उन्होंने उस पडित को पकडकर कहा- 'बलि के लिए आपसे अच्छा आदमी कहाँ मिलेगा। आपका बलिदान पाकर देवी तो प्रसन्न हो ही जायेगी, आपको भी स्वर्ग मिल जायेगा। इस प्रकार हम दोनों का काम बन जाएगा। गुरु गोविंदसिंह का व्यवहार देखकर पंडित घबरा गया, गुरु गोविंदसिंह ने बलिदान दूसरे दिन के लिए स्थगित करके पंडित को एक रावटी में रख दिया।

🔵 पंडित घबराकर गुरु गोबिंदसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और गिडगिडाने लगा-'मुझे नहीं मालूम था कि बलिदान की बात मेरे सिर पर ही आ पडेगी, गुरु जी, मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। गुरु गोविंदसिंह ने कहा क्यों घबराते हो ? बलिदान से तो स्वर्ग मिलेगा, क्यों पंडित जी, बलिदान की बातें तभी तक अच्छी लगती हैं न जब तक वह दूसरों के लिए होती हैं? अपने सिर आते ही असलियत खुल गई न।''

🔴 पंडित बोला- इस बार क्षमा कर दीजिए महाराज। अब कभी ऐसी बातें नहीं करूँगा।'' गुरु गोविंदसिंह ने उसे छोड़ दिया और समझाया-इस प्रकार का अंध-विश्वास समाज में फैलाना ठीक नही। देवी अपने नाम पर किसी के प्राण लेकर प्रसन्न नहीं होती। वह प्रसन्न होती है अपने नाम पर किए गए अच्छे कामो से। '' बाद में गुरु गोविंदसिंह ने उसे रास्ते का खर्च देकर भगा दिया। गोविदसिंह ने सिक्खों को समझाया। किसी देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या करने से न तो पुण्य है और न शक्ति। धर्म के नाम पर किसी जीव का प्राण लेना घोर पाप है। शक्ति बढती आपस में प्रेम रखने से, धर्म का पालन करने से। शक्ति बढ़ती है-ईश्वर की उपासना करने से और उसके लिए त्याग-करने से। शक्ति बढ़ती है-अन्याय और अत्याचार का विरोध और निर्बल तथा असहायों की सहायता करने से। सभी लोग एक मति और एक गति होकर संगठित हो जाएँ और धर्म रक्षा में रणभूमि में अपने प्राणो की बलि दें। देवी इसी सार्थक बलिदान से प्रसन्न होगी और आज के इसी मार्ग से मुक्ति मिलेगी। अंध-विश्वास के आधार पर अपनी जान देने अथवा किसी दूसरे जीव की जान लेने से न तो देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और न सद्गति मिलती है।

🔵 गुरु गोविंदसिंह के इन सार वचनों को सभी सिक्खों ने हृदयगम किया। उस पर आचरण किया और अपने जीवन का कण-कण देश धर्म की रक्षा में लगाकर ऐतिहासिक यश प्राप्त किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 151, 152

👉 सत्कार्य के प्रति समर्पण

🔵 सत्कार्य के प्रति समर्पण ही तुम्हें धरती और धरती की आत्मा की रफ्तार के साथ चल सकने की सामर्थ्य देता है। निठल्ला होना तो मौसम की बहारों के लिए अजनबी बन जाना है और जीवन की उस शोभायात्रा से अलग-थलग हो जाना है, जो अनन्त को शानदार समर्पण करती हुई अपने समूचे ऐश्वर्य एवं आन-बान के साथ निकल रही है।

🔴 कार्य करते हुए तुम वह बाँसुरी बन जाते हो, जिसके हृदय से समय की साँस गुजरती है और संगीत में बदल जाती है। आखिर तुम में से कौन है, जो गूँगा और खामोश नरकुल बने रहना चाहेगा, उस वक्त, जब सारा संसार एक ही बाँसुरी के स्वरों में शामिल हो रहा है? तुमसे हमेशा कहा गया है कि कर्म एक अभिशाप है और श्रम है दुर्भाग्य। किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तुम कर्म करते हो, तब तुम धरती के प्राचीनतम स्वप्न के एक अंश को पूरा करते हो, जिसका दायित्व तुम्हें तभी सौंपा गया था, जब वह स्वप्न जन्मा था।
  
🔵 सत्कर्म में डूबे रहना ही सही अर्थों में जिन्दगी से प्यार करते रहना है। जिन्दगी को कर्म के माध्यम से प्यार करना ही उसके अन्तरंग रहस्यों को बारीकी से जान लेना है, किन्तु यदि तुम अपने कष्टों से घबराकर यह कहने लगे कि तुम्हारा जन्म एक विपत्ति है और हाड़-मांस की बनी काया का पोषण करना तुम्हारे माथे पर लिखा हुआ अभिशाप है, तो मेरा उत्तर यही है कि तुम्हारे माथे के पसीने के अलावा और कुछ नहीं है, जो उस लिखे हुए अभिशाप को धो सके।

🔴 तुमसे यह भी कहा गया होगा कि जीवन अंधकारमय है। मैं भी कहता हूँ कि जीवन सचमुच अंधकारमय है, यदि आकांक्षा न हो। सारी आकांक्षाएँ अन्धी हैं, यदि ज्ञान न हो। सारा ज्ञान व्यर्थ है, यदि कर्म न हो। सारा कर्म खोखला है, यदि प्रभु-प्रेम न हो। जब तुम प्रभु-प्रेम से प्रेरित होकर कर्म करते हो, तब तुम विश्व-मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करते हो, क्योंकि विश्वात्मा का साकार रूप ही तो यह विश्व है। प्रभु प्रेम से प्रेरित कर्म क्या होता है? यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है, मानो स्वयं प्रभु ही पहनने वाले हों उसे। यह इतने प्यार से भवन निर्माण करना है, मानों सर्वेश्वर स्वयं ही रहने वाले हों वहाँ। यह इतनी कोमलता से बीज बोना और इतने आनन्दित होकर फलों का संचय करना है, मानो स्वयं प्रभु ही खाने वाले हों वे फल। यह अपने हाथों किए गए प्रत्येक कर्म को अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है और ऐसा महसूस करना है, मनो समस्त निर्जीव सत्ताएँ तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हों।

🔵 पवन जो संवाद शाह बलूत से करता है, वह उसकी अपेक्षा अधिक मीठा नहीं हो सकता, जो वह घास के तिनकों से करता है। केवल वही व्यक्ति महान् है जो अपने कर्म से पवन के स्वरों को एक गीत में बदल देता है और अपने भगवत्प्रेम से उस गीत की मिठास को प्रगाढ़ कर देता है। प्रभु प्रेम को दृष्टिगोचर बना देना ही सत्कर्म है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 56

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 22)

🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए

🔴 समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिये कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायेगा जो निश्चय ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायेगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आज का काम आज नहीं करने दिया वह कल कब करने देयी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।

🔵 बासी काम, बासी भोजन की तरह ही अरुचिकर हो जाया करता है। फिर न तो उसे करने की इच्छा होती है और करने पर सुचारू रूप से नहीं हो पाता। कल के काम का दबाव बासी काम को एक बेगार बना देगा जो रो-झींककर ही किया जा सकेगा। ऐसा होने से अभ्यास बिगड़ता है। और उनका विकृत प्रभाव कल के नये काम पर भी पड़ता है। इस प्रकार स्थगनशीलता कर्त्तव्यों में मनुष्य की रुचि तथा दक्षता को नष्ट कर देती है। इन दोनों विशेषताओं से रहित कर्त्तव्य परिश्रम का भरपूर मूल्य पाकर भी अपेक्षित पुरस्कार एवं परितोषक नहीं ला पाते।

🔴 जीवन में सफलता के लिए जहां परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है वहां सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तब ही सम्पदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावतः परिश्रमी बन जाते हैं जब कि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का सम्वाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 4 मई 2017

👉 एक भयानक घटना टली

🔵 दिसम्बर २००८ की बात है। उन दिनों मैं नए वर्ष के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सदस्य बनाने में व्यस्त थी। उसी समय मेरे साथ एक भयानक किन्तु आश्चर्यजनक घटना घटी। मैं नया सिलेण्डर भरवाकर बाजार से लाई थी, शायद वह कहीं से लीकेज था। पास में रखे लैम्प से उसमें आग लग गई। मैंने बुझाने का बहुत प्रयास किया परन्तु लपटें बढ़ती ही गईं। किसी तरह रसोई से घसीट कर सिलेण्डर को मैं बरामदे तक ले आयी। आगे खुले स्थान पर ले जाना संभव न था, क्योंकि लपटें अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं। मैंने अपनी माँ को घर से बाहर ले जाकर बैठा दिया।

🔴 बाहर निकलकर पड़ोसियों से सहायता के लिए चिल्लाई। सारे पड़ोसी एकत्र होकर अपनी- अपनी राय देने लगे और अपनी तरह से आग बुझाने का प्रयास करने लगे, पर किसी को कोई भी कामयाबी नहीं मिली। किसी ने फायर ब्रिगेड को सूचना भी दे दी, लेकिन स्टेशन पास न होने के कारण शीघ्र सहायता न मिल सकी। मेरे सामने विषम परिस्थिति थी। सामने साक्षात् तबाही का दृश्य था। देखने वालों की भीड़ लगी थी। सभी त्राहि- त्राहि कर रहे थे। परन्तु सहानुभूति के अलावा किसी के पास कोई उपाय न था। मैं बहुत घबराई हुई थी। जाड़े की शाम जल्दी ही गहरा जाती है। सायं पाँच बजे का समय था, अँधेरा छाने लगा था। लपटें अपना उग्र रूप धारण करती जा रही थीं। सिलेण्डर पूरा भरा होने के कारण देर तक जलता रहा। मैंने भीड़ की ओर एक बार फिर देखा कि शायद कोई कुछ उपाय कर सके, परन्तु इस भौतिक संसार में इतनी सामर्थ्य कहाँ जो किसी का कष्ट हर ले।

🔵 कुछ ही पलों में एक भयानक दुर्घटना होने वाली थी, सभी विवश थे, उस भयानक स्थिति में सहसा मुझे गुरुदेव याद आये। मैं आर्त स्वर में रो पड़ी, गुरुदेव मेरी रक्षा करो, आप ही इस तबाही से मेरी रक्षा कर सकते हैं। गुरुदेव! यदि कुछ अनिष्ट हुआ तो मन टूट जाएगा, मैं इस समय आपका कार्य कर रही हूँ। उसमें व्यवधान आ जाएगा। इतना परिपक्व नहीं हूँ जो इतनी बड़ी घटना को सह सकूँ। गुरुदेव! क्षति मेरी नहीं आपकी होगी। लोग कहेंगे कि लोगों को गायत्री उपासना की सलाह देती हैं और कहती हैं गायत्री मंत्र सबका कल्याण करने वाला अनिष्ट निवारक मंत्र है। अपना ही अनिष्ट नहीं रोक पाई। इस घटना से बहुत लोगों की आस्था टूट जाएगी। लोग कहेंगे कि गायत्री उपासना में कोई शक्ति नहीं है। ज्यों- ज्यों लपटें बढ़ रही थीं मेरी प्रार्थना और आर्त होती जा रही थी। परन्तु गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा। जब गुरुदेव याद आ गए तो निश्चित है कि परोक्ष में वे साथ दे रहे हैं। मन में विश्वास जागा कि गुरुदेव आ गए, अब कोई अनिष्ट नहीं होगा।

🔴 बहनों ने कहा- सिलेण्डर से तेज आवाज होने लगी है, घर से बाहर निकल आओ, बस फटने ही वाला है। घर की छत उड़ जाएगी, दरवाजे दीवारें गिर जाएँगी। बड़ा भयानक विस्फोट होगा। सामान का नुकसान हो जाएगा कोई बात नहीं, जान तो बच जाएगी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह आभास हो रहा था कि मेरी करुण पुकार सुनकर मेरे गुरुदेव आ गए हैं अब कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे यही बात कही भी। भीड़ से कुछ लोग व्यंग्यात्मक हँसी हँसकर बोले- यह विज्ञान का सत्य है कि सिलेण्डर फटेगा तो दीवार दरवाजे टूट जाएँगे, भयानक हादसा होगा। विज्ञान के नियमों में कच्ची श्रद्धा न रखो, इसमें तुम्हारे गुरु क्या कर पायेंगे। मेरा मन शांत था जैसे सब कुछ सामान्य हो। सहसा मेरे मन में विचार आया- जैसे किसी ने आदेश दिया हो कि तुम गायत्री मंत्र का जप शुरू करो। मैंने तुरंत आँखें बंद करके जप शुरू कर दिया। मेरे इस क्रिया- कलाप को सभी देख रहे थे और यह कह रहे थे कि मानती नहीं है। अंधी श्रद्धा भक्ति इसको ले डूबेगी।

🔵 एक बुजुर्ग हितैषी बाहर ले जाने के लिए मेरा हाथ पकड़कर घसीटने लगे। मैंने कहा- मामा जी चिन्ता न करें मेरा मन शांत है। यहाँ पर अदृश्य में गुरुदेव उपस्थित हैं। अब मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पुनः आँखें बंद कर गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दिया। अभी ११ मंत्र ही हुए होंगे कि सिलेण्डर से साँय- साँय की तेज आवाज आने लगी। लोग चिल्लाने लगे कि अब सिलेण्डर फटने वाला है, ये बाहर निकल नहीं रही है। इसके बाद मैं भीड़ के कोलाहल से बेखबर, आँखें बंद किए, ध्यानावस्थित होकर मंत्र जप करती रही। एक भयानक धमाके के साथ सिलेण्डर फट गया। घर की दीवारें, छत व पृथ्वी हिल गई। साथ ही मैं भी डगमगा गई। मन मस्तिष्क को धमाके ने हिला दिया। सिलेण्डर फटने का दृश्य मैंने नहीं देखा, क्योंकि मैं आँखें बंद किए हुए थी। धमाके की आवाज सुनकर सभी रोने लगे। मेरी माँ का रोते- रोते बुरा हाल था, लोग समझ रहे थे कि मेरा अंत हो चुका है। धमाके से मेरी आँखें खुलीं तो देखा पूरा घर धूल से भर गया है। चारों तरफ धूल ही धूल थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने शरीर को स्पर्श किया कि कहीं मुझे चोट वगैरह तो नहीं आई! अपने को सुरक्षित पा मैं जोर से चिल्लाई- परेशान मत होओ मुझे कुछ नहीं हुआ। जब मैं घर से बाहर निकली तो मुझे सुरक्षित देख मेरी माँ मुझसे लिपट गई। सबकी आँखों में आँसू आ गए।

🔴 मेरा मन गुरु के प्रति कृतज्ञ हो उठा। लगभग १ घंटे तक चर्चा चलती रही। धमाके की आवाज सुनकर दूर- दूर के लोग भी एकत्रित हो गए। एक घंटे बाद जब घर की धूल बैठ गई तो कुछ लोगों के साथ घर के अन्दर गई। देखा टमाटर, संतरे, अंगूर, कपड़े सभी धमाके से छत पर चिपक गए थे। अलमारी से बरतन नीचे गिर गए थे। इधर- उधर बिखर गए थे। सारे घर में धूल ही धूल थी, सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला था। सबसे अधिक आश्चर्य तो लोगों को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि बरामदे में रखा सिलेण्डर धरती में १ फुट नीचे धँस गया, और उसके ऊपर का हिस्सा टूटकर मात्र १ से २ फुट की दूरी पर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें जान बूझकर समेट दिया हो। सिलेण्डर के पास रखी चारपाई, दरवाजे बॉक्स, सब सुरक्षित थे और कहीं भी कुछ नुकसान नहीं हुआ। छत दीवार सब सही सलामत थे, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रात्रि हो गई थी, घर को वैसी स्थिति में छोड़कर हम सब सो गए। दूसरे दिन जब सवेरा हुआ तो लोगों का जमावड़ा होने लगा। इस अद्भुत घटना को देखने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा। लोगों ने कई सिलेण्डर फटते देखे, जिसमें छत दीवारें, दरवाजों के काफी नुकसान हुए, सिलेण्डर को जमीन में धँसते किसी ने नहीं देखा था। सभी लोग कह रहे थे कि यह अद्भुत लीला तो सर्वोच्च सत्ता की ही हो सकती है, जो असंभव को संभव कर दे। यह तो विज्ञान को अध्यात्म की जबरदस्त चुनौती है। गुरु पर श्रद्धा विश्वास का फल देखकर सभी परम पूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चरणों में नतमस्तक हो गए। 
  
🌹 ममता सिंह रायबरेली (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bha.1

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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