शुक्रवार, 5 मई 2017

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 22)

🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए

🔴 समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिये कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायेगा जो निश्चय ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायेगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आज का काम आज नहीं करने दिया वह कल कब करने देयी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।

🔵 बासी काम, बासी भोजन की तरह ही अरुचिकर हो जाया करता है। फिर न तो उसे करने की इच्छा होती है और करने पर सुचारू रूप से नहीं हो पाता। कल के काम का दबाव बासी काम को एक बेगार बना देगा जो रो-झींककर ही किया जा सकेगा। ऐसा होने से अभ्यास बिगड़ता है। और उनका विकृत प्रभाव कल के नये काम पर भी पड़ता है। इस प्रकार स्थगनशीलता कर्त्तव्यों में मनुष्य की रुचि तथा दक्षता को नष्ट कर देती है। इन दोनों विशेषताओं से रहित कर्त्तव्य परिश्रम का भरपूर मूल्य पाकर भी अपेक्षित पुरस्कार एवं परितोषक नहीं ला पाते।

🔴 जीवन में सफलता के लिए जहां परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है वहां सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तब ही सम्पदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावतः परिश्रमी बन जाते हैं जब कि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का सम्वाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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