बुधवार, 27 जून 2018
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 4)
🔷 स्वर्ग में देवता रहते हैं। उनके पास दैत्यों की तुलना में वैभव की कमी होती है। आक्रमण के क्षेत्र में भी पहल उन्हीं की होती है। फिर भी गौरव देवत्व के हिस्से में ही रहा है। वन्दन, अभिनन्दन और अनुकरण भी उन्हीं का होता रहा है। इस क्षेत्र में प्रवेश करने में किसी को कठिनाई नहीं, अड़चन इतनी भर है कि कुसंस्कारिता के चक्रव्यूह से निकलने का प्रयत्न सच्चे मन से किया जाय। इसके लिए आदर्शों की गरिमा समझने की आवश्यकता है। यदि हनुमानों और अर्जुनों का उदाहरण सामने न रहा, कठिनाइयों की कीमत पर गौरव खरीदने का साहस न उभरा तो क्षणिक आवेश की बबूले जैसी दुर्गति होती फिरेगी।
🔶 संतुलित मस्तिष्क का प्रधान गुण है दूरदर्शी विवेकशीलता। इसके प्रकट होते ही मनुष्य तत्काल की सीमा को तोड़कर भविष्य पर दृष्टि डालता है। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी की तरह पूँजी लगाकर समयानुसार अधिक लाभ उपार्जन का लाभ दीख सकता है। बीज गलता तो है पर इसमें वह कुछ खोता नहीं। भूमि के साथ आत्मसात् होकर उसे देखते-देखते अंकुरित पल्लवित और फलित होने वाले विशाल वृक्ष का सुयोग मिलता है। दूरदर्शिता इससे कम में सन्तुष्ट नहीं होती। उसका अनादिकाल से एक ही परामर्श रहा है, महान के लिए तुच्छ को त्यागा जाय। कामना का भावना पर उत्सर्ग किया जाय। क्षुद्रता का महानता के पक्ष में विसर्जन किया जाय। भक्त को भगवान की प्राप्ति के लिए यही करना पड़ता है। महानता इससे कम में सधती नहीं।
🔷 जीवन का एक रूप है जिसमें ललक लिप्सा के लिए आदर्शों को गँवाना पड़ता है और महानता की ओर से मुँह मोड़ना पड़ता है। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वाँछित कामनाओं की पूर्ति भी हो सकेगी या नहीं जीवन का दूसरा रूप है महानता का, जिसमें महामानवों ने श्रद्धापूर्वक प्रवेश किया है और देवोपम गौरव और स्वर्ग जैसा सन्तोष सौजन्य का भरपूर रसास्वादन किया है। दोनों में से किसे चयन किया जाय। इसी के निर्धारण में उस सूझ-बूझ का परिचय मिलता है, जिसे मनोजयी, धीर-वीर अपनाते और असंख्यों के लिए अनुगमन की पथ रेखा विनिर्मित करते है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔶 संतुलित मस्तिष्क का प्रधान गुण है दूरदर्शी विवेकशीलता। इसके प्रकट होते ही मनुष्य तत्काल की सीमा को तोड़कर भविष्य पर दृष्टि डालता है। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी की तरह पूँजी लगाकर समयानुसार अधिक लाभ उपार्जन का लाभ दीख सकता है। बीज गलता तो है पर इसमें वह कुछ खोता नहीं। भूमि के साथ आत्मसात् होकर उसे देखते-देखते अंकुरित पल्लवित और फलित होने वाले विशाल वृक्ष का सुयोग मिलता है। दूरदर्शिता इससे कम में सन्तुष्ट नहीं होती। उसका अनादिकाल से एक ही परामर्श रहा है, महान के लिए तुच्छ को त्यागा जाय। कामना का भावना पर उत्सर्ग किया जाय। क्षुद्रता का महानता के पक्ष में विसर्जन किया जाय। भक्त को भगवान की प्राप्ति के लिए यही करना पड़ता है। महानता इससे कम में सधती नहीं।
🔷 जीवन का एक रूप है जिसमें ललक लिप्सा के लिए आदर्शों को गँवाना पड़ता है और महानता की ओर से मुँह मोड़ना पड़ता है। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वाँछित कामनाओं की पूर्ति भी हो सकेगी या नहीं जीवन का दूसरा रूप है महानता का, जिसमें महामानवों ने श्रद्धापूर्वक प्रवेश किया है और देवोपम गौरव और स्वर्ग जैसा सन्तोष सौजन्य का भरपूर रसास्वादन किया है। दोनों में से किसे चयन किया जाय। इसी के निर्धारण में उस सूझ-बूझ का परिचय मिलता है, जिसे मनोजयी, धीर-वीर अपनाते और असंख्यों के लिए अनुगमन की पथ रेखा विनिर्मित करते है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 Influence of Bioelectricity on Food Products - Part 1
🔷 Common man is hardly aware of the effect of “internal purity” of food on mind. In one of his books, Prof. Leadbeater, the founder member of Theosophical Society, speaks about the influence of subtle ingredients of food on human body. According to him, apart from the digestive matter, the food matter also carries with it certain subtle contents and our bodies absorb these as well.
🔶 We meticulously take care of the external, physical cleanliness of food, overlooking the fact, that its internal purity is much more necessary than its physical purity. Food products subtly absorb thoughts/traits of persons handling these for long periods. (Repeated right or wrong thinking becomes a part of habit, ultimately developing into a trait of the person.)
🔷 The imprints of these thoughts/traits on the edibles created by the bioelectric transmissions of associated persons are carried over to the mind of its consumer. The “internal purity” of food is maximally affected by the morality and mental state (at the time of cooking) of its cook.
📖 Akhand Jyoti – April 2004
🔶 We meticulously take care of the external, physical cleanliness of food, overlooking the fact, that its internal purity is much more necessary than its physical purity. Food products subtly absorb thoughts/traits of persons handling these for long periods. (Repeated right or wrong thinking becomes a part of habit, ultimately developing into a trait of the person.)
🔷 The imprints of these thoughts/traits on the edibles created by the bioelectric transmissions of associated persons are carried over to the mind of its consumer. The “internal purity” of food is maximally affected by the morality and mental state (at the time of cooking) of its cook.
📖 Akhand Jyoti – April 2004
👉 आत्म विश्लेषण और आत्मनिरीक्षण
🔷 आत्म विश्लेषण का अर्थ है प्रवृत्तियों के मूल कारण की तलाश करना। अर्थात् द्वेषपूर्ण भावनायें जिस आधार पर उठीं, उस आधार को ढूँढ़ना और उसे नष्ट करना। आत्म निरीक्षण का अर्थ है अपने विचारों और कार्यों की न्यायपूर्ण समीक्षा करना। बुराइयाँ पक्षपातपूर्ण विचार पद्धति के कारण ही उठती हैं। मनुष्य की यह सबसे बड़ी भूल है कि वह जिस वस्तु को चाहता है उसे किसी न किसी भूमिका के साथ टिका देता है। इसी को विचार और कार्यों का पक्षपात कहते हैं। जैसे बीड़ी, सिगरेट, या अन्य कोई मादक पदार्थ सेवन करने वालों की हमेशा यह दलील रहती है कि उससे उन्हें शान्ति मिलती है या मानसिक तनाव दूर होता है। कई तो यहाँ तक कहते हैं बीड़ी सिगरेट न पियें तो पाचन क्रिया ठीक प्रकार काम नहीं करती। पर यदि कठोरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि शराब, सिगरेट के पक्ष में जो दलीलें देते रहते हैं वे सर्वथा निस्सार हैं। यह तो मन बहलाव के लिए गढ़ी बातें हैं। वस्तुतः उनसे मानसिक परेशानियाँ तथा स्वास्थ्य और पाचन प्रणाली में शिथिलता ही आती है।
🔶 अपने गुण और दोष देखने में जब तक ईमानदारी और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है जब तक वह आत्म विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। झूठे प्रदर्शनों और स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण ही जीवन में परेशानियाँ आती हैं। सच्चाई की मस्ती ही अनुपम है। उसकी एक बार जो क्षणिक अनुभूति कर लेता है वह उसे जीवनपर्यन्त छोड़ता नहीं। सत्य मनुष्य को ऊँचा उठाता है, साधारण स्थिति से उठाकर परमात्मा के समीप पहुँचा देता है। सत् संस्कारों का बल, कुसंस्कारों की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक होता है किन्तु कुसंस्कारों में जो क्षणिक सुख और तृप्ति दिखाई देती है उसी के कारण लोग दुष्कर्मों की ओर बड़ी जल्दी खिंच जाते हैं। अतएव जब कभी ऐसे अनिष्टकारी विचार मस्तिष्क में उठें तब उनसे भागने या शीघ्र निर्णय का प्रयत्न करना चाहिए। किसी बुराई से डरने या भागने से वह जीवन का अंग बन जाती हैं किन्तु जब विचारों में मौलिक परिवर्तन करते हैं और बुराई की गहराई तक छान-बीन करते हैं तो अन्तःकरण की दिव्य ज्योति के समक्ष सच और झूठ की स्वतः अभिव्यक्ति हो जाती है। लोग बुराइयों से सावधान हो जाते हैं। आत्मनिरीक्षण के साथ विचार पद्धति शुभ संस्कार बढ़ाने का दूसरा उपाय है। इसके लिये यह आवश्यक है कि जो भी व्यवसाय करें पहले उस पर अथ से इति तक विचार कर लें और यदि वह वस्तु उपयोगी दिखाई दे तो उसे प्रयत्नपूर्वक अपने जीवन में धारण करें, अन्यथा उसे त्याग दें।
🔷 आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।
🔶 जब तक गम्भीरता से आत्म विवेचन का कार्यक्रम नहीं बनाते तब तक गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन लाना आसान नहीं रहता। उदाहरण के लिये इस प्रकार विचार कीजिये- “मान लीजिये आप तम्बाकू पीते हैं। दिन भर में चार आने की तम्बाकू पी लेते हैं। एक माह में साढ़े सात रुपये के हिसाब से प्रति वर्ष आप 90 रुपये की तम्बाकू पी जाते है और लाभ क्या होता है? आपके शरीर में निकोटीन विष भरता चला जाता है जो कभी-कभी कैन्सर का कारण बन सकता है। सरदर्द, अपच, आँखों की शक्ति का कमजोर होना, वीर्य रोग, दन्त रोग, आदि कितनी व्याधियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। इससे अपना और अपने बाल-बच्चों और समाज का कितना बड़ा अहित होता है”। आप जब इस प्रकार गहराई से विचार करने का अभ्यास प्रारम्भ करेंगे तो विश्वास कीजिये आपके जीवन में कितनी ही बुराइयाँ, क्यों न जड़ जमा चुकी हों, उन्हें आज नहीं तो कल अपना बोरिया बिस्तर बाँधना ही पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.13
🔶 अपने गुण और दोष देखने में जब तक ईमानदारी और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है जब तक वह आत्म विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। झूठे प्रदर्शनों और स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण ही जीवन में परेशानियाँ आती हैं। सच्चाई की मस्ती ही अनुपम है। उसकी एक बार जो क्षणिक अनुभूति कर लेता है वह उसे जीवनपर्यन्त छोड़ता नहीं। सत्य मनुष्य को ऊँचा उठाता है, साधारण स्थिति से उठाकर परमात्मा के समीप पहुँचा देता है। सत् संस्कारों का बल, कुसंस्कारों की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक होता है किन्तु कुसंस्कारों में जो क्षणिक सुख और तृप्ति दिखाई देती है उसी के कारण लोग दुष्कर्मों की ओर बड़ी जल्दी खिंच जाते हैं। अतएव जब कभी ऐसे अनिष्टकारी विचार मस्तिष्क में उठें तब उनसे भागने या शीघ्र निर्णय का प्रयत्न करना चाहिए। किसी बुराई से डरने या भागने से वह जीवन का अंग बन जाती हैं किन्तु जब विचारों में मौलिक परिवर्तन करते हैं और बुराई की गहराई तक छान-बीन करते हैं तो अन्तःकरण की दिव्य ज्योति के समक्ष सच और झूठ की स्वतः अभिव्यक्ति हो जाती है। लोग बुराइयों से सावधान हो जाते हैं। आत्मनिरीक्षण के साथ विचार पद्धति शुभ संस्कार बढ़ाने का दूसरा उपाय है। इसके लिये यह आवश्यक है कि जो भी व्यवसाय करें पहले उस पर अथ से इति तक विचार कर लें और यदि वह वस्तु उपयोगी दिखाई दे तो उसे प्रयत्नपूर्वक अपने जीवन में धारण करें, अन्यथा उसे त्याग दें।
🔷 आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।
🔶 जब तक गम्भीरता से आत्म विवेचन का कार्यक्रम नहीं बनाते तब तक गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन लाना आसान नहीं रहता। उदाहरण के लिये इस प्रकार विचार कीजिये- “मान लीजिये आप तम्बाकू पीते हैं। दिन भर में चार आने की तम्बाकू पी लेते हैं। एक माह में साढ़े सात रुपये के हिसाब से प्रति वर्ष आप 90 रुपये की तम्बाकू पी जाते है और लाभ क्या होता है? आपके शरीर में निकोटीन विष भरता चला जाता है जो कभी-कभी कैन्सर का कारण बन सकता है। सरदर्द, अपच, आँखों की शक्ति का कमजोर होना, वीर्य रोग, दन्त रोग, आदि कितनी व्याधियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। इससे अपना और अपने बाल-बच्चों और समाज का कितना बड़ा अहित होता है”। आप जब इस प्रकार गहराई से विचार करने का अभ्यास प्रारम्भ करेंगे तो विश्वास कीजिये आपके जीवन में कितनी ही बुराइयाँ, क्यों न जड़ जमा चुकी हों, उन्हें आज नहीं तो कल अपना बोरिया बिस्तर बाँधना ही पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.13
मंगलवार, 26 जून 2018
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 3)
🔶 सन्तुलित मस्तिष्क की पहचान यह नहीं है कि वह शिथिलता, निष्क्रियता अपनाये और संसार को माया मिथ्या बताकर बे सिर-पैर उड़ाने उड़ने लगें। विवेकवान उद्विग्नता छोड़ने पर पलायन नहीं करते। वे कर्तव्य क्षेत्र में अंगद की तरह अपना पैर इतनी मजबूती से जमाते हैं कि असुर समुदाय पूरी शक्ति लगाकर भी उखाड़ने में सफल न हो सके। प्रलोभनों और दबावों से जो उबर सकता है, उसी के लिये यह सम्भव है कि उत्कृष्टता को वरण करे और आँधी तूफानों के बीच भी अपने निश्चय पर चट्टान की तरह अडिग रहे। इसके लिए उदाहरण, प्रमाण ढ़ूँढ़ने हों, साथी, सहचर, समर्थक ढ़ूँढ़ने हों तो इर्द-गिर्द नजर न डालकर महामानवों के इतिहास तलाशने पड़ेंगे। अपने समय में या क्षेत्र में यदि वे दीख न पड़ते हो तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। इतिहास में उनके अस्तित्व और वर्चस्व को देखकर अभीष्ट प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है और विश्वास किया जा सकता है कि महानता का मार्ग ऐसा नहीं है, जिस पर चलने से यदि लालची सहमत न हो तो छोड़ देने की बात सोची जाने लगे।
🔷 वैभववानों की एक अपनी दुनिया हैं। किन्तु सोचना यह नहीं चाहिए कि संसार इतना ही छोटा है। इसमें एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसे स्वर्ग कहते हैं। उसमें सत्प्रवृत्तियों का वर्चस्व है और अपनाने वाले जो भी उसमें बसते है, देवोपम स्तर का वरण करते हैं। दैत्यों के संसार में सोने की लंका बनाने और दस सिर जितनी चतुरता और बीस भुजाओं जैसी बलिष्ठता हो सकती है, किन्तु उतना ही सब कुछ नहीं हैं। भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, प्रह्लादों और दधीचियों जैसी भी एक बिरादरी है। बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर, रैदास, गाँधी, विनोबा जैसे अनेकों ने उसमें प्रवेश पाया है।
🔶 दयानन्दों और विवेकानन्दों का भी अस्तित्व रहा है। संख्या की दृष्टि से कमी पड़ते देखकर किसी को भी मन छोटा नहीं करना चाहिए। समूचे आकाश में सूर्य और चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ अपने पराक्रम से संव्याप्त अन्धकार से निरन्तर लड़ती रहती हैं। हार मानने का नाम नहीं लेती। समुद्र में मणि मुक्तक तो जहाँ तहाँ ही होते हैं, सीपों और घोंघों से ही उसके तट पटे पड़े रहते हैं। बहुसंख्यकों को बुद्धिमान अथवा अनुकरणीय मानना हो तो फिर उद्भिजों की बिरादरी को वरिष्ठता देनी पड़ेगी। यह बहुमत वाला सिद्धान्त मनुष्य समाज पर लागू नहीं हो सकता। श्रेष्ठता ही सदैव जीतती रही है, श्रेय पाती रही है। हमें अपनी दृष्टि नाव के मस्तूल पर, प्रकाश स्तम्भ पर रखनी चाहिए। इस संसार में निकृष्टता है तो श्रेष्ठता भी अनुपलब्ध नहीं है। मात्र दृष्टिकोण ही है, जो हमें उसके दर्शन नहीं करा पाता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔷 वैभववानों की एक अपनी दुनिया हैं। किन्तु सोचना यह नहीं चाहिए कि संसार इतना ही छोटा है। इसमें एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसे स्वर्ग कहते हैं। उसमें सत्प्रवृत्तियों का वर्चस्व है और अपनाने वाले जो भी उसमें बसते है, देवोपम स्तर का वरण करते हैं। दैत्यों के संसार में सोने की लंका बनाने और दस सिर जितनी चतुरता और बीस भुजाओं जैसी बलिष्ठता हो सकती है, किन्तु उतना ही सब कुछ नहीं हैं। भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, प्रह्लादों और दधीचियों जैसी भी एक बिरादरी है। बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर, रैदास, गाँधी, विनोबा जैसे अनेकों ने उसमें प्रवेश पाया है।
🔶 दयानन्दों और विवेकानन्दों का भी अस्तित्व रहा है। संख्या की दृष्टि से कमी पड़ते देखकर किसी को भी मन छोटा नहीं करना चाहिए। समूचे आकाश में सूर्य और चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ अपने पराक्रम से संव्याप्त अन्धकार से निरन्तर लड़ती रहती हैं। हार मानने का नाम नहीं लेती। समुद्र में मणि मुक्तक तो जहाँ तहाँ ही होते हैं, सीपों और घोंघों से ही उसके तट पटे पड़े रहते हैं। बहुसंख्यकों को बुद्धिमान अथवा अनुकरणीय मानना हो तो फिर उद्भिजों की बिरादरी को वरिष्ठता देनी पड़ेगी। यह बहुमत वाला सिद्धान्त मनुष्य समाज पर लागू नहीं हो सकता। श्रेष्ठता ही सदैव जीतती रही है, श्रेय पाती रही है। हमें अपनी दृष्टि नाव के मस्तूल पर, प्रकाश स्तम्भ पर रखनी चाहिए। इस संसार में निकृष्टता है तो श्रेष्ठता भी अनुपलब्ध नहीं है। मात्र दृष्टिकोण ही है, जो हमें उसके दर्शन नहीं करा पाता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 संत की चिन्ता
🔶 एक नगर मे एक संत चिन्ता मे खोये हुये थे! संसारी का रोना स्वार्थ का होता है उसकी चिन्ता अपने स्वार्थ के लिये होती है पर सच्चे संत का रोना और उनकी चिन्ता परमार्थ के लिये होती है !
🔷 एक नगर के बाहर एक सन्त रहते थे कई व्यक्ति वहाँ आया जाया करते थे और वहाँ सच्चे जिज्ञासु भी अक्सर वहाँ आया जाया करते थे! अनेक लोग आते और केवल अपने दुखों का रोना रोते और चले जाते! एक दिन सन्त श्री नगर भ्रमण गये और वापस आकर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गये और बड़ी चिन्ता मे डुबे हुये गहरे चिन्तन मे खोये हुये थे इतनी चिन्ता मे खोये हुये थे की उनके सामने अनेक व्यक्ति और जिज्ञासु का दल आकर बैठ गया पर उन्हे पता न चला! फिर सहसा उनकी द्रष्टि उनपर पड़ी!
🔶 जिज्ञासु दल - क्या हुआ नाथ आप ऐसी कौनसी चिन्ता मे खोये हुये थे?
🔷 सन्त श्री - हॆ वत्स जब महानगर को देखा तो उसकी हालत देखकर बड़ा दुःख हो रहा है! चारों तरफ आग लगी हुई है!
🔶 जिज्ञासु - कैसी आग हॆ नाथ?
🔷 सन्त श्री - आग लगी है चारो तरफ़ कुसंस्कारों की , अंधी दौड़ की, अश्लीलता की, मूर्खतापूर्ण देखादेखी की, कामवासना की और आसूरी शक्तियां छाई हुई है चारो तरफ समझदार समझ जायेगा आग से बच जायेगा पर मुर्ख और कुतर्की आग मे जलकर राख हो जायेंगे मिट्टी मे मिलकर खाक हो जायेंगे!
🔶 साधक - तो हम क्या करें देव?
🔷 संत श्री - अपना कर्तव्य निभाओ और आपका पहला कर्तव्य है की आप अधिक से अधिक को इस आग से बचाओ दूसरा कर्तव्य है की आसपास के लोगों को बचाओ और कोई न सुने तो कम से कम अपने आपको तो इस आग से बचाओ!
🔶 जिज्ञासु - कैसे बचाये हॆ नाथ इस भयंकर ज्वाला से?
🔷 संत श्री - भक्तिरूपी नियमित साधना की चादर ओढ़ लो वत्स और साधना की चादर अधिक से अधिक लोगों को ओढाओ और और मुर्ख और कुतर्की न ओढ़े तो कम से कम तुम तो अपने आप को नियमित-साधना की चादर से अपने आपको बचाओ! और एक बात याद रखना वत्स ये आग बड़ी भयंकर है जो दिख रही है समझ भी रहे है पर अपनो कुतर्कों की वजह से और धर्म व संत की अवहेलना करने की वजह वो इस आग मे जल रहे है!
🔶 सभ्यता और मर्यादाओं का उल्लंघन पे उल्लंघन किये जा रहे है बार बार समझा रहे है की सच्ची शान्ति चाहते हो तो धर्म वृक्ष की छाँव मे मर्यादा से बैठ जाओ! अब जो मान लेगा तो कल्याण हो जायेगा और जो नही मानेगा उन्हे फिर भयंकर दूरगामी परिणाम भोगने पडेंगे!
🔷 इसलिये ईश्वर से यही प्रार्थना करना की हॆ नाथ ऐसी बुद्धि देना की मैं आपको भूलु नही और यदि एक को याद रख लिया और बाकी को भुल भी गये तो कोई दिक्कत नही और यदि सब को याद रख के उस एक को भुला दिया तो कोई मतलब नही !
🔷 एक नगर के बाहर एक सन्त रहते थे कई व्यक्ति वहाँ आया जाया करते थे और वहाँ सच्चे जिज्ञासु भी अक्सर वहाँ आया जाया करते थे! अनेक लोग आते और केवल अपने दुखों का रोना रोते और चले जाते! एक दिन सन्त श्री नगर भ्रमण गये और वापस आकर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गये और बड़ी चिन्ता मे डुबे हुये गहरे चिन्तन मे खोये हुये थे इतनी चिन्ता मे खोये हुये थे की उनके सामने अनेक व्यक्ति और जिज्ञासु का दल आकर बैठ गया पर उन्हे पता न चला! फिर सहसा उनकी द्रष्टि उनपर पड़ी!
🔶 जिज्ञासु दल - क्या हुआ नाथ आप ऐसी कौनसी चिन्ता मे खोये हुये थे?
🔷 सन्त श्री - हॆ वत्स जब महानगर को देखा तो उसकी हालत देखकर बड़ा दुःख हो रहा है! चारों तरफ आग लगी हुई है!
🔶 जिज्ञासु - कैसी आग हॆ नाथ?
🔷 सन्त श्री - आग लगी है चारो तरफ़ कुसंस्कारों की , अंधी दौड़ की, अश्लीलता की, मूर्खतापूर्ण देखादेखी की, कामवासना की और आसूरी शक्तियां छाई हुई है चारो तरफ समझदार समझ जायेगा आग से बच जायेगा पर मुर्ख और कुतर्की आग मे जलकर राख हो जायेंगे मिट्टी मे मिलकर खाक हो जायेंगे!
🔶 साधक - तो हम क्या करें देव?
🔷 संत श्री - अपना कर्तव्य निभाओ और आपका पहला कर्तव्य है की आप अधिक से अधिक को इस आग से बचाओ दूसरा कर्तव्य है की आसपास के लोगों को बचाओ और कोई न सुने तो कम से कम अपने आपको तो इस आग से बचाओ!
🔶 जिज्ञासु - कैसे बचाये हॆ नाथ इस भयंकर ज्वाला से?
🔷 संत श्री - भक्तिरूपी नियमित साधना की चादर ओढ़ लो वत्स और साधना की चादर अधिक से अधिक लोगों को ओढाओ और और मुर्ख और कुतर्की न ओढ़े तो कम से कम तुम तो अपने आप को नियमित-साधना की चादर से अपने आपको बचाओ! और एक बात याद रखना वत्स ये आग बड़ी भयंकर है जो दिख रही है समझ भी रहे है पर अपनो कुतर्कों की वजह से और धर्म व संत की अवहेलना करने की वजह वो इस आग मे जल रहे है!
🔶 सभ्यता और मर्यादाओं का उल्लंघन पे उल्लंघन किये जा रहे है बार बार समझा रहे है की सच्ची शान्ति चाहते हो तो धर्म वृक्ष की छाँव मे मर्यादा से बैठ जाओ! अब जो मान लेगा तो कल्याण हो जायेगा और जो नही मानेगा उन्हे फिर भयंकर दूरगामी परिणाम भोगने पडेंगे!
🔷 इसलिये ईश्वर से यही प्रार्थना करना की हॆ नाथ ऐसी बुद्धि देना की मैं आपको भूलु नही और यदि एक को याद रख लिया और बाकी को भुल भी गये तो कोई दिक्कत नही और यदि सब को याद रख के उस एक को भुला दिया तो कोई मतलब नही !
सोमवार, 25 जून 2018
👉 साधना
🔷 जो तपेगा वो गलेगा, जो गलेगा वो ढलेगा, जो ढलेगा वो बनेगा, जो बनेगा वो मिटेगा और जो मिटेगा बस वही रहेगा! अर्थात जो परमार्थ के लिये अपने आपको निजी स्वार्थ को मिटा देगा बस वही अमर रहेगा
🔶 एक नगर से दो योजन की दुरी पर एक आश्रम बना हुआ था एक महात्मा जी और उनके कुछ शिष्य वहाँ रहते थे! महात्मा जी रोज तप हवन और सत्संग किया करते थे और शिष्य नगर से भिक्षा लेकर आते थे कुछ शिष्य तप करते पर कुछ नही करते थे महात्मा जी बार बार समझाते थे की शिष्यों बिना तप के कुछ नही मिलेगा इसलिये जीवन मे तप जरूरी है!
🔷 एक दिन कुछ शिष्यों ने कहा की हॆ देव आखिर तप से होगा क्या और आप हमें सिद्ध कर के बताये तो महात्मा जी ने कहा ठीक है आज से आप सात दिन तक बिल्कुल निराहार रहोगे केवल जल ग्रहण करोगे फिर सात दिन बाद आप को अपने आप पता चल जायेगा की साधना क्यों जरूरी है!
🔶 सात दिन बाद सभी की हालत मरे हुये बैल की तरह हो गई अब महात्मा जी ने कहा जाओ नगर से भोजन लेकर आओ तो सभी ने कहा की देव हमारे शरीर मे इतना सामर्थ्य नही है की हम वहाँ तक जाकर आ सके! तो महात्मा जी ने कहा अब पता चला की साधना क्यों जरूरी है अरे वत्स शक्तिहीन को यहाँ कोई नही पूछता है इस सत्य को स्वीकार करो वत्स और समझो जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी समझो की शक्ति है तो कोई मूल्य है शक्ति न होगी तो हर कोई गली बाड की तरह कुचल कर चला जायेगा!
🔷 गली बाड की तरह मत रहना अपने आप को मजबुत बाड की तरह बनाना ताकी हर कोई तुम्हे कुचल कर न जायें! जैसै रोटी जरूरी है तन की समर्थता के लिये वैसे ही साधना बहुत जरूरी है मन की समर्थता के लिये! और जो साधना करेगा वही आगे की यात्रा आनंदपूर्ण कर पायेगा तो उठो और साधो इस जीवन को क्योंकि बिना साधना के कुछ भी नही है तो लो सद्गुरु का आशीर्वाद और चलिए साधना के मार्ग पर और साधो इस जीवन को क्योंकि जो साधेगा वही जगेगा और जो जागेगा वही कुछ पायेगा नही तो जैसै आया है वैसे ही चला जायेगा!
🔶 जीवन में बिना तपे कुछ भी नही मिलता है और बिना त्याग और समर्पण के कुछ भी नही है! धरती बिना तपे अनाज नही देती है दुध भी तभी घी देता है जब वो अग्नि में अपने आपको तपाता है।
🔷 किसी पदधारी से पुछना की उसने कितनी मेहनत की होगी तब जाकर उसे कॊई पद मिला होगा! जो अपने जीवन का तनिक भी मूल्य समझेगा वो इस जीवन में अपना कॊई न कॊई लक्ष्य जरूर बनायेगा और यदि उसने कॊई लक्ष्य बना लिया तो फिर वो साधना जरूर करेगा।
जो साधना करेगा वो जीवन को साधेगा
जो जीवन को साधेगा वो तपेगा
जो तपेगा वो गलेगा
जो गलेगा वो ढलेगा
जो ढलेगा वो बनेगा
जो बनेगा वो मिटेगा
और जो मिटेगा
बस वही रहेगा !!
🔶 सब की अपनी अपनी रणभूमि है वत्स और सब का अपना अपना लक्ष्य और जो अपने लक्ष्य के प्रति जितना ईमानदारी से चलेगा वो उतना ही लाभ में रहेगा!
🔷 इसलिये ये याद रखना की साधना जरूरी ही नही बहुत जरूरी है! और परमार्थ के लिये अपने निहित-स्वार्थ को त्यागना!
🔶 एक नगर से दो योजन की दुरी पर एक आश्रम बना हुआ था एक महात्मा जी और उनके कुछ शिष्य वहाँ रहते थे! महात्मा जी रोज तप हवन और सत्संग किया करते थे और शिष्य नगर से भिक्षा लेकर आते थे कुछ शिष्य तप करते पर कुछ नही करते थे महात्मा जी बार बार समझाते थे की शिष्यों बिना तप के कुछ नही मिलेगा इसलिये जीवन मे तप जरूरी है!
🔷 एक दिन कुछ शिष्यों ने कहा की हॆ देव आखिर तप से होगा क्या और आप हमें सिद्ध कर के बताये तो महात्मा जी ने कहा ठीक है आज से आप सात दिन तक बिल्कुल निराहार रहोगे केवल जल ग्रहण करोगे फिर सात दिन बाद आप को अपने आप पता चल जायेगा की साधना क्यों जरूरी है!
🔶 सात दिन बाद सभी की हालत मरे हुये बैल की तरह हो गई अब महात्मा जी ने कहा जाओ नगर से भोजन लेकर आओ तो सभी ने कहा की देव हमारे शरीर मे इतना सामर्थ्य नही है की हम वहाँ तक जाकर आ सके! तो महात्मा जी ने कहा अब पता चला की साधना क्यों जरूरी है अरे वत्स शक्तिहीन को यहाँ कोई नही पूछता है इस सत्य को स्वीकार करो वत्स और समझो जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी समझो की शक्ति है तो कोई मूल्य है शक्ति न होगी तो हर कोई गली बाड की तरह कुचल कर चला जायेगा!
🔷 गली बाड की तरह मत रहना अपने आप को मजबुत बाड की तरह बनाना ताकी हर कोई तुम्हे कुचल कर न जायें! जैसै रोटी जरूरी है तन की समर्थता के लिये वैसे ही साधना बहुत जरूरी है मन की समर्थता के लिये! और जो साधना करेगा वही आगे की यात्रा आनंदपूर्ण कर पायेगा तो उठो और साधो इस जीवन को क्योंकि बिना साधना के कुछ भी नही है तो लो सद्गुरु का आशीर्वाद और चलिए साधना के मार्ग पर और साधो इस जीवन को क्योंकि जो साधेगा वही जगेगा और जो जागेगा वही कुछ पायेगा नही तो जैसै आया है वैसे ही चला जायेगा!
🔶 जीवन में बिना तपे कुछ भी नही मिलता है और बिना त्याग और समर्पण के कुछ भी नही है! धरती बिना तपे अनाज नही देती है दुध भी तभी घी देता है जब वो अग्नि में अपने आपको तपाता है।
🔷 किसी पदधारी से पुछना की उसने कितनी मेहनत की होगी तब जाकर उसे कॊई पद मिला होगा! जो अपने जीवन का तनिक भी मूल्य समझेगा वो इस जीवन में अपना कॊई न कॊई लक्ष्य जरूर बनायेगा और यदि उसने कॊई लक्ष्य बना लिया तो फिर वो साधना जरूर करेगा।
जो साधना करेगा वो जीवन को साधेगा
जो जीवन को साधेगा वो तपेगा
जो तपेगा वो गलेगा
जो गलेगा वो ढलेगा
जो ढलेगा वो बनेगा
जो बनेगा वो मिटेगा
और जो मिटेगा
बस वही रहेगा !!
🔶 सब की अपनी अपनी रणभूमि है वत्स और सब का अपना अपना लक्ष्य और जो अपने लक्ष्य के प्रति जितना ईमानदारी से चलेगा वो उतना ही लाभ में रहेगा!
🔷 इसलिये ये याद रखना की साधना जरूरी ही नही बहुत जरूरी है! और परमार्थ के लिये अपने निहित-स्वार्थ को त्यागना!
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 2)
🔷 यह मान्यता अनगढ़ों की है कि वैभव के आधार पर ही समुन्नत बना जा सकता है, इसलिए उसे हर काम छोड़कर हर कीमत पर अर्जित करने में अहर्निश संलग्न रहना चाहिए। सम्पन्नता से मात्र सुविधाएँ खरीदी जा सकती है और वे मात्र मनुष्य के विलास, अहंकार का ही राई रत्ती समाधान कर पाती है। राई रत्ती का तात्पर्य है, क्षणिक तुष्टि। उतना जितना कि आग पर ईंधन डालते समय प्रतीत होता है कि वह बुझ चली। किन्तु वह स्थिति कुछ ही समय में बदल जाती है और पहले से भी अधिक ऊँची ज्वालाएँ लहराने लगती हैं। दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने में वैभव काम आ सकता है। दर्प दिखाने, विक्षोभ उभारने के अतिरिक्त उससे और कोई बड़ा प्रयोजन सधता नहीं है। अनावश्यक संचय के ईर्ष्या द्वेष से लेकर दुर्व्यसनों तक के अनेकानेक ऐसे विग्रह खड़े होते है, जिन्हें देखते हुए कई बार तो निर्धनों की तुलना में सम्पन्नों को अपनी हीनता अनुभव करते देखा गया है।
🔶 उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है।
🔷 व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं। इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है।
🔶 निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔶 उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है।
🔷 व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं। इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है।
🔶 निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 True knowledge
🔷 Once upon a time, there lived an erudite man in a town. He has studied a vast range of scholarly works. He used to feel proud of his scholastic and intellectual attainments. Whether it was day time or night, he used to walk with a lighted lamp in his hand. If asked about this peculiar habit, he would arrogantly reply- “There is darkness everywhere in the world. I walk with this lamp so that there could be some light”.
🔶 Once this arrogant scholar came across a saint. The saint started laughing when he saw the scholar with the lighted lamp and said-“My friend, if your eyes are not blind of the ever shining sun then don’t tell that there is darkness around the wourld. What will this tiny lamp of yours add to the limitless glow of the sunlight? Where does the light of your knowledge stand before the the infinite knowledge of the Omniscient? If possible, try to know this simple fact that true knowledge can’t be attained just by reading and cramming tonnes of books and treatises. True knowledge comes through the realization of the indwelling light of everywhere present Divinity.
📖 From Pragya Puran
🔶 Once this arrogant scholar came across a saint. The saint started laughing when he saw the scholar with the lighted lamp and said-“My friend, if your eyes are not blind of the ever shining sun then don’t tell that there is darkness around the wourld. What will this tiny lamp of yours add to the limitless glow of the sunlight? Where does the light of your knowledge stand before the the infinite knowledge of the Omniscient? If possible, try to know this simple fact that true knowledge can’t be attained just by reading and cramming tonnes of books and treatises. True knowledge comes through the realization of the indwelling light of everywhere present Divinity.
📖 From Pragya Puran
👉 संयम की शक्ति
🔷 संयमित जीवन चर्या के अभाव में योग दुष्प्राप्य है, स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुषों को ही इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। सुख और विषय वासना के प्रलोभन में फँस कर ही प्रायः पथ भ्रष्ट होते है।
🔶 संयम से जो शक्ति पैदा होती है वह चरित्र का आधार है। वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि तत्वों का सीधा सम्बन्ध मनोभावों से है। विचार अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित हों तो कर्म भी असंयत ही होंगे। अगर हमारा मन सुमार्गगामी रहकर इन्द्रियों को संयम में रखें तो समस्त साँसारिक कार्यों को करते हुए भी हम सद्गति के अधिकारी बन सकते है।
🔷 महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है। इस संसार में हजारों लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपनी स्थिति से भी गई-गुजरी हालत में जीवनयापन करते हैं। उनके उत्थान के लिये कुछ कर गुजरने वाले व्यक्ति ही महान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
🔶 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 9
🔶 संयम से जो शक्ति पैदा होती है वह चरित्र का आधार है। वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि तत्वों का सीधा सम्बन्ध मनोभावों से है। विचार अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित हों तो कर्म भी असंयत ही होंगे। अगर हमारा मन सुमार्गगामी रहकर इन्द्रियों को संयम में रखें तो समस्त साँसारिक कार्यों को करते हुए भी हम सद्गति के अधिकारी बन सकते है।
🔷 महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है। इस संसार में हजारों लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपनी स्थिति से भी गई-गुजरी हालत में जीवनयापन करते हैं। उनके उत्थान के लिये कुछ कर गुजरने वाले व्यक्ति ही महान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
🔶 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 9
रविवार, 24 जून 2018
👉 मुगलों के छक्के छुड़ाने वाली ऐसी थी यह रानी
आज ही के दिन यानी 24 जून, 1564 को रानी दुर्गावती का निधन हुआ था। 5 अक्टूबर, 1524 को प्रसिद्ध चंदेल राजा कीर्ति सिंह चंदेल के घर जन्मीं रानी दुर्गावती ने मुगलों से जमकर लोहा लिया लेकिन मुगलों की विशाल सेना के सामने ज्यादा दिनों तक उनका प्रतिरोध नहीं चला और 24 जून, 1564 को जब उनको हार करीब महसूस हुई तो आत्म बलिदान दे दिया।
🔷 परिचय
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर,1524 को महोबा में हुआ था। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईस्वी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुंदरता के कारण उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गई। दुर्गावती के पिता महोबा के राजा थे। रानी दुर्गावती सुंदर, सुशील, विनम्र, योग्य एवं साहसी लड़की थी। बचपन में ही उनको वीरतापूर्ण एवं साहस भरी कहानियां सुनना व पढ़ना अच्छा लगता था। पढ़ाई के साथ-साथ दुर्गावती ने घोड़े पर चढ़ना, तीर तलवार चलाना, अच्छी तरह सीख लिया था। शिकार खेलना उसका शौक था। वह अपने पिता के साथ शिकार खेलने जाया करती थीं। पिता के साथ वह शासन का कार्य भी देखती थीं।
🔷 परिचय
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर,1524 को महोबा में हुआ था। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईस्वी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुंदरता के कारण उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गई। दुर्गावती के पिता महोबा के राजा थे। रानी दुर्गावती सुंदर, सुशील, विनम्र, योग्य एवं साहसी लड़की थी। बचपन में ही उनको वीरतापूर्ण एवं साहस भरी कहानियां सुनना व पढ़ना अच्छा लगता था। पढ़ाई के साथ-साथ दुर्गावती ने घोड़े पर चढ़ना, तीर तलवार चलाना, अच्छी तरह सीख लिया था। शिकार खेलना उसका शौक था। वह अपने पिता के साथ शिकार खेलने जाया करती थीं। पिता के साथ वह शासन का कार्य भी देखती थीं।
🔶 विवाह
1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ कराया गया। शादी के कुछ वर्षों बाद दुर्गावती को एक बेटा हुआ जिसका नाम वीर नारायण रखा। बेटे के जन्म के कुछ समय बाद ही राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई।
🔷 जब शेर को मार गिराया
गढ़मंडल के जंगलो में उन दिनों एक शेर ने आतंक मचा रखा था। शेर के आतंक का शिकार कई जानवर बन चुके थे। जब रानी तक यह खबर पहुंची तो वह शेर को मारने निकल पड़ीं। दिन भर की खोज के बाद शाम में एक झाड़ी में शेर दिखाई दिया। रानी ने एक ही वार में शेर को मार दिया। उनके अचूक निशाने को देखकर सैनिक हैरान रह गए।
1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ कराया गया। शादी के कुछ वर्षों बाद दुर्गावती को एक बेटा हुआ जिसका नाम वीर नारायण रखा। बेटे के जन्म के कुछ समय बाद ही राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई।
🔷 जब शेर को मार गिराया
गढ़मंडल के जंगलो में उन दिनों एक शेर ने आतंक मचा रखा था। शेर के आतंक का शिकार कई जानवर बन चुके थे। जब रानी तक यह खबर पहुंची तो वह शेर को मारने निकल पड़ीं। दिन भर की खोज के बाद शाम में एक झाड़ी में शेर दिखाई दिया। रानी ने एक ही वार में शेर को मार दिया। उनके अचूक निशाने को देखकर सैनिक हैरान रह गए।
🔶 पति की मौत के बाद संघर्ष
पति की मौत के बाद गोंड साम्राज्य पर आधिपत्य को लेकर चल रही राजनीति की आहट पाकर रानी ने स्वयं को गोंडवाना की महारानी घोषित कर दिया। 1550 में वह गोंडवाना की रानी बनीं और 1564 तक रानी रहीं। एक महिला ने जब राज्य की सत्ता का संचालन अपने हाथों में लिया तो आसपास के राज्यों के पुरुषवादी शासक काफी प्रसन्न हो गए। उनको आशा थी कि महिला होने के नाते गोंड साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।
🔷 बाज बहादुर को हरायामालवा गणराज्य के शासक बाज बहादुर ने इसी सोच के साथ गोंडवाना पर हमला किया लेकिन बाज बहादुर की सोच गलत साबित हुई और उसे रानी दुर्गावती ने करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही रानी दुर्गावती का यश चारों ओर फैल गया।
पति की मौत के बाद गोंड साम्राज्य पर आधिपत्य को लेकर चल रही राजनीति की आहट पाकर रानी ने स्वयं को गोंडवाना की महारानी घोषित कर दिया। 1550 में वह गोंडवाना की रानी बनीं और 1564 तक रानी रहीं। एक महिला ने जब राज्य की सत्ता का संचालन अपने हाथों में लिया तो आसपास के राज्यों के पुरुषवादी शासक काफी प्रसन्न हो गए। उनको आशा थी कि महिला होने के नाते गोंड साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।
🔷 बाज बहादुर को हरायामालवा गणराज्य के शासक बाज बहादुर ने इसी सोच के साथ गोंडवाना पर हमला किया लेकिन बाज बहादुर की सोच गलत साबित हुई और उसे रानी दुर्गावती ने करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही रानी दुर्गावती का यश चारों ओर फैल गया।
🔶 मुगलों का डटकर मुकाबला किया
मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। आसफ खां ने समझा कि दुर्गावती महिला है, अकबर के प्रताप से भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर देगी. परन्तु रानी दुर्गावती को अपनी योग्यता, साधन और सैन्य शक्ति पर इतना विश्वास था कि उसे अकबर की सेना के प्रति भी कोई भय नहीं था। रानी दुर्गावती के मंत्री ने आसफ खान की सेना और सज्जा को देखकर युद्ध न करने की सलाह दी।
रानी दुर्गावती ने उसे जवाब भिजवाते हुए कहा, 'कलंकित जीवन जीने की अपेक्षा शान से मर जाना अच्छा है। आसफ खान जैसे साधारण सूबेदार के सामने झुकना लज्जा की बात है। रानी सैनिक के वेश में घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ी। रानी को सैनिक के वेश में देखकर आसफ खान के होश उड़ गये। रणक्षेत्र में रानी के सैनिक उत्साहित होकर शत्रुओ को काटने लगे। रानी भी शत्रुओ पर टूट पड़ी। देखते ही देखते दुश्मनो की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली। आसफ खान बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचाने में सफल हुआ।
आसफ खान की बुरी तरह हार सुनकर अकबर बहुत लज्जित हुआ। डेढ़ वर्ष बाद उसने पुनः आसफ खान को गढ़मंडल पर आक्रमण करने भेजा। रानी तथा आसफ खान के बीच घमासान युद्ध हुआ। तोपों का वार होने पर भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी। रानी हाथी पर सवार सेना का संचालन कर रही थी। उन्होंने मुग़ल तोपचियों का सिर काट डाला। यह देखकर आसफ खान की सेना फिर भाग खड़ी हुई। दो बार हारकर आसफ खान लज्जा और ग्लानी से भर गया।
मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। आसफ खां ने समझा कि दुर्गावती महिला है, अकबर के प्रताप से भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर देगी. परन्तु रानी दुर्गावती को अपनी योग्यता, साधन और सैन्य शक्ति पर इतना विश्वास था कि उसे अकबर की सेना के प्रति भी कोई भय नहीं था। रानी दुर्गावती के मंत्री ने आसफ खान की सेना और सज्जा को देखकर युद्ध न करने की सलाह दी।
रानी दुर्गावती ने उसे जवाब भिजवाते हुए कहा, 'कलंकित जीवन जीने की अपेक्षा शान से मर जाना अच्छा है। आसफ खान जैसे साधारण सूबेदार के सामने झुकना लज्जा की बात है। रानी सैनिक के वेश में घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ी। रानी को सैनिक के वेश में देखकर आसफ खान के होश उड़ गये। रणक्षेत्र में रानी के सैनिक उत्साहित होकर शत्रुओ को काटने लगे। रानी भी शत्रुओ पर टूट पड़ी। देखते ही देखते दुश्मनो की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली। आसफ खान बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचाने में सफल हुआ।
आसफ खान की बुरी तरह हार सुनकर अकबर बहुत लज्जित हुआ। डेढ़ वर्ष बाद उसने पुनः आसफ खान को गढ़मंडल पर आक्रमण करने भेजा। रानी तथा आसफ खान के बीच घमासान युद्ध हुआ। तोपों का वार होने पर भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी। रानी हाथी पर सवार सेना का संचालन कर रही थी। उन्होंने मुग़ल तोपचियों का सिर काट डाला। यह देखकर आसफ खान की सेना फिर भाग खड़ी हुई। दो बार हारकर आसफ खान लज्जा और ग्लानी से भर गया।
🔷 अंत समय
24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। रानी ने अपने पुत्र के नेतृत्व में सेना भेजकर स्वयं एक टुकड़ी का नेतृत्व संभाला। दुश्मनों के छक्के छूटने लगे। उसी बीच रानी ने देखा कि उसका 15 का वर्ष का पुत्र घायल होकर घोड़े से गिर गया है। रानी विचलित न हुई।
उसी सेना के कई वीर पुरुषो ने वीर नारायण को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया और रानी से प्रार्थना की कि वे अपने पुत्र का अंतिम दर्शन कर ले। रानी ने उत्तर दिया- यह समय पुत्र से मिलने का नहीं है। मुझे ख़ुशी है कि मेरे वीर पुत्र ने युद्ध भूमि में वीर गति पाई है. अतः मैं उससे देवलोक में ही मिलूंगी।
रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्षो तक संरक्षिका के रूप में शासन किया। भारत के इतिहास में रानी दुर्गावती और चाँदबीबी ही ऐसी वीर महिलाएं थी जिन्होंने अकबर की शक्तिशाली सेना का सामना किया तथा मुगलों के राज्य विस्तार को रोका। अकबर ने अपने शासन काल में बहुत सी लड़ाईयां लड़ी किन्तु गढ़मंडल के युद्ध ने मुग़ल सम्राट के दांत खट्टे कर दिए।
रानी दुर्गावती में अनेक गुण थे। वीर और साहसी होने के साथ ही वे त्याग और ममता की मूर्ति थी। राजघराने में रहते हुए भी उन्होंने बहुत सादा जीवन व्यतीत किया। राज्य के कार्य देखने के बाद वे अपना समय पूजा – पाठ और धार्मिक कार्यो में व्यतीत करती थी।
भारतीय नारी की वीरता तथा बलिदान की यह घटना अमर रहेगी।
24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। रानी ने अपने पुत्र के नेतृत्व में सेना भेजकर स्वयं एक टुकड़ी का नेतृत्व संभाला। दुश्मनों के छक्के छूटने लगे। उसी बीच रानी ने देखा कि उसका 15 का वर्ष का पुत्र घायल होकर घोड़े से गिर गया है। रानी विचलित न हुई।
उसी सेना के कई वीर पुरुषो ने वीर नारायण को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया और रानी से प्रार्थना की कि वे अपने पुत्र का अंतिम दर्शन कर ले। रानी ने उत्तर दिया- यह समय पुत्र से मिलने का नहीं है। मुझे ख़ुशी है कि मेरे वीर पुत्र ने युद्ध भूमि में वीर गति पाई है. अतः मैं उससे देवलोक में ही मिलूंगी।
रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्षो तक संरक्षिका के रूप में शासन किया। भारत के इतिहास में रानी दुर्गावती और चाँदबीबी ही ऐसी वीर महिलाएं थी जिन्होंने अकबर की शक्तिशाली सेना का सामना किया तथा मुगलों के राज्य विस्तार को रोका। अकबर ने अपने शासन काल में बहुत सी लड़ाईयां लड़ी किन्तु गढ़मंडल के युद्ध ने मुग़ल सम्राट के दांत खट्टे कर दिए।
रानी दुर्गावती में अनेक गुण थे। वीर और साहसी होने के साथ ही वे त्याग और ममता की मूर्ति थी। राजघराने में रहते हुए भी उन्होंने बहुत सादा जीवन व्यतीत किया। राज्य के कार्य देखने के बाद वे अपना समय पूजा – पाठ और धार्मिक कार्यो में व्यतीत करती थी।
भारतीय नारी की वीरता तथा बलिदान की यह घटना अमर रहेगी।
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 1)
🔶 समुद्र में जब तक बड़े ज्वार-भाटे उठते रहते हैं तब तक उस पर जलयानों का ठीक तरह चल सकना सम्भव नहीं होता। रास्ता चलने में खाइयाँ भी बाधक होती हैं और टीले भी। समतल भूमि पर ही यात्रा ठीक प्रकार चल पाती है। शरीर न आलसी, अवसाद ग्रस्त होना चाहिए और न उस पर चंचलता, उत्तेजना चढ़ी रहनी चाहिए। मनःक्षेत्र के सम्बन्ध में भी यही बात है, न उसे निराशा में डूबा रहना चाहिए और न उन्मत्त, विक्षिप्तों की तरह उद्वेग से ग्रसित होना चाहिये। सौम्य सन्तुलन ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी विवेकशीलता के पैर उसी स्थिति में टिकते हैं।
🔷 उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे। जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।
🔶 निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔷 उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे। जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।
🔶 निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
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