सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Feb 2017


👉 मृत महिला को मिला नया जीवन

🔴 घटना दिसम्बर सन् 1969 की है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य यज्ञ कराने प्रथमतः पटना पहुँचे। इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मेरे पिताजी श्री विजय कुमार शर्मा अपनी माता जी- मेरी दादी- के साथ जमालपुर से आकर यज्ञ में शामिल हुए। विशाल जन- समूह के बीच हर्षोल्लास के साथ वैदिक रीति से यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। यज्ञ की समाप्ति पर सभी अपने- अपने घर की ओर चल पड़े। पिताजी भी दादी जी के साथ मुंगेर की वापसी की ट्रेन पकड़ने पटना रेलवे स्टेशन पर आए। वहाँ पहुँचते ही दादी के पेट में अचानक बहुत तेज दर्द शुरू हुआ। लम्बी यात्रा और दिन भर की थकान से पेट में गैस बन जाने की आशंका को लेकर पिताजी ने दादी को नींबू- पानी पिलाया। दादी की तबीयत बजाय सुधरने के और भी बिगड़ती चली गई। दादी के मुँह से झाग निकलना शुरू हुआ और कुछ ही देर बाद दादी ने दम तोड़ दिया

🔵 दादी को मरे हुए चार घण्टे गुजर चुके थे। चेहरे पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगी थीं। लाश के चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गई थी। स्टेशन मास्टर रेलवे स्टेशन के अन्य कर्मचारियों के साथ लाश को जमालपुर भेजने की तैयारी में व्यस्त थे

🔴 तभी प्लेटफार्म नं.४ के जन- समुदाय ने नारा लगाया- गुरुजी की जय...... गायत्री माता की जय.....। पिताजी प्लेटफार्म नम्बर- १ पर थे। नारे की ऊँची आवाज से उनका ध्यान प्लेटफार्म नं.४ पर गया। उन्होंने दूर से गुरुजी को देखा। दौड़कर रेल की पटरियों को फलाँगते हुए प्लेटफार्म नं.४ पर पहुँचे। पिताजी की आँखों के आँसू रुक नहीं रहे थे। उन्होंने कँपकँपाती हुई आवाज में गुरुजी से कहा- गुरुजी! मेरी माँ मर गई। उन्हें ......। आगे के शब्द पिताजी के गले में ही अटके रह गए। वे फूट- फूटकर रोने लगे। गुरुदेव ने पिताजी के कंधे पर हाथ रखा और साथ लेकर दो नं. प्लेटफार्म पर जाने के लिए पुल की ओर बढ़े। भीड़ पीछे- पीछे चल पड़ी। क्षण भर के लिए गुरुजी ने दादी की लाश को देखा और मुस्कुराते हुए बोल पड़े- उठा..उठा..माँ को उठा। पिता जी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे।  
    
🔵 गुरुदेव के दुबारा कहने पर उन्होंने यंत्रवत माँ को उठाने की चेष्टा की। ...और आश्चर्य! दादी माँ सचमुच उठकर बैठ गईं। उस वक्त दादी की उम्र प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी थी। गुरुदेव ने पिताजी से कहा- माता जी को घर ले जा, अब इनकी उम्र दो गुनी हो चुकी है। पिताजी, दादी जी को लेकर खुशी- खुशी वापस जमालपुर पहुँचे। तभी से पूरा परिवार गुरुदेव को भगवान मानकर उनके युग परिवर्तन के अनुपम अभियान में जुट गया। युगऋषि का कथन अक्षरशः सत्य हुआ। दादी माँ गुरु- कृपा से उनकी दी हुई दोगुनी उम्र (80 वर्षों) तक आनन्दपूर्वक लोकसेवा करती रहीं और अन्ततः ऋषि सत्ता में विलीन हो गईं।
    
🌹 सुदर्शन कुमार देव संस्कृति विश्वविद्यालय
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 37)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 तीसरा साप्ताहिक अभ्यास है-प्राण संचय। एकान्त में नेत्र बन्द करके अन्तर्मुखी होना चाहिये और ध्यान करना चाहिये कि समस्त विश्व में प्रचण्ड प्राण चेतना भरी हुई है। आमन्त्रित आकर्षित करने पर वह किसी को भी प्रचुर परिमाण में कभी भी उपलब्ध हो सकती है। इसकी विधि प्राणायाम है। प्राणायाम के अनेक विधि-विधान हैं। पर उनमें से सर्वसुलभ यह है कि मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठा जाये। आँखें बन्द रहें। दोनों हाथ घुटनों पर। शरीर को स्थिर और मन को शान्त रखा जाय।     

🔵 साँस खींचते समय भावना की जाये कि विश्वव्यापी प्राण चेतना खिंचती हुई नासिका मार्ग से सम्पूर्ण शरीर में प्रवेश कर रही है। उसे जीवकोष पूरी तरह अपने शरीर में धारण कर रहे हैं। प्राण प्रखरता से अपना शरीर, मन और अन्त:करण ओतप्रोत हो रहा है। साँस खींचने के समय इन्हीं भावनाओं को परिपक्व करते रहा जाये। साँस छोड़ते समय यह विचार किया जाये कि शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में घुसे हुये विकार साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं और उनके वापस लौटने का द्वार बन्द हो रहा है। इस बहिष्करण के साथ अनुभव होना चाहिये कि भरे हुए अवांछनीय तत्त्व हट रहे हैं और समूचा व्यक्तित्व हलकापन अनुभव कर रहा है। प्रखरता और प्रामाणिकता की स्थिति बन रही है।    
                        
🔴 चौथा साप्ताहिक अभ्यास मौन वाणी की साधना है। मौन दो घण्टे से कम का नहीं होना चाहिये। मौनकाल में प्राण संचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिये उतना करने का प्रयास करना चाहिये। सेवा कार्यों के लिये प्रत्यक्ष अवसर सामने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्द्धन के ज्ञान यज्ञ के निमित्त लगनी चाहिये। पीड़ितों की सहायता के लिये हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिये। ज्ञानयज्ञ तो उच्चस्तरीय ब्रह्मयज्ञ है, जिसके साथ प्राणिमात्र का कल्याण जुड़ा हुआ है। साप्ताहिक साधना का दिन ऐसे ही श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाना चाहिये।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सहनशीलता में महानता सन्निहित है

🔴 बात सन् १९६५ की है। उन दिनों भारत-पाकिस्तान का संघर्ष चल रहा था। चाहे जब हवाई हमले की घंटी बज सकती थी सुरक्षा के लिये प्रधान मंत्री भवन मे भी खाई बनवाई गई थी। प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री को कहा गया कि ''आज हमले की आशंका अधिक है आप घंटी बजते ही तुरंत खाई में चले जायें।''

🔵 किंतु दैवयोग से हमला नहीं हुआ। प्रातः देखा गया कि बिना बमबारी के खाई गिरकर पट गई है। खाई बनाने वालों तथा उसे पास करने वालों की यह अक्षम्य लापरवाही थी। यदि वे उस रात खाई के अंदर होते तो क्या होता सोचकर राँगेटे खडे हो जाते हैं। देश के प्रधानमंत्री का जीवन कितना मूल्यवान् होता है? वह भी युद्धकाल में?

🔴 अन्य व्यवस्था अधिकारियों ने भले ही इस प्रसंग पर कोई कार्यवाही की हो, किन्तु शास्त्रीजी ने संबंधित व्यक्तियों के प्रति कोई कठोरता नहीं बरती अपितु बालकों की भाँति क्षमा कर दिया।

🔵 दूसरी घटना भी सन् १९६५ ही है। युद्धकाल था ही, चौबीस घंटों में कभी भी कैबिनेट की इमरजैंसी मीटिंग हो जाती थी। उस दिन भी संध्या समय मीटिग थी। कडाके की ठंड थी, किन्तु उत्तरदायिवों के प्रति सजग तथा समय के पाबंद हमारे तत्कालीन प्रधान मंत्री नियत समय पर मीटिग के लिये चल दिए। जाकर कार मे बैठ गए। पर जब बडी़ देर हो गई और कार खडी ही रही तो उन्होंने इस संबंध में पूछताछ की और देर होने की बात भी कही।

🔴 तब कही संयोजक महोदय ने बताया कि मीटिग तो आज उन्हीं के घर पर है। कोई दूसरा प्रधान मंत्री होता तो यों अपना समय नष्ट करने पर संबधित अधिकारी को अवश्य ही प्रताडित करता, किन्तु वे दूसरों की त्रुटियों को माँ जैसी ममतापूर्वक ही सहन कर जाते थे।

🔵 आमतौर पर ऐसा होता है कि लोग घर में तो अधिकार-आशा तथा डांट-फटकार से काम लेते हैं और बाहर सज्जनता तथा उदारता के प्रतीक बने रहते हैं, किन्तु शास्त्रीजी इसके अपवाद थे। वे स्वभाव से ही उदार तथा सहिष्णु थे।

🔴 ताशकंद जाने के एक दिन पूर्व वे भोजन कर रहे थे। उस दिन उनकी पसंद का भोजन था। खिचडी तथा आलू का भरता। ये दोनों वस्तुएँ उन्हें सर्वाधिक प्रिय थीं। बडे़ प्रेम से खाते रहे। जब खा चुके उसके थोडी़ देर बाद उन्होंने वही प्रसंग आने पर बडे़ ही सहज भाव से श्रीमती ललिता जी से पूछा-क्या आज आपने खिचडी़ में नमक नहीं डाला था ? ललिता जी को बडा खेद हुआ अपनी गलती पर किन्तु वहाँ न कोई शिकायत थी न क्रोध मुस्कराते ही रहे वे फीकी खिचडी़ खाकर।

🔵 दूसरों की गलतियों को भी क्षमा कर देना तथा बजाय डांट-फटकार या चिल्ल-पुकार मचाने के प्रेमपूर्वक बता देना निश्चय ही एक महान् गुण हैं। शास्त्रीजी सहनशीलता के प्रतीक थे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 27, 28

👉 गहना कर्मणो गतिः

🔵 वेद में ऋषि कहते हैं- ‘‘उत्थानं ते पुरुष नावयानम्’’ अर्थात् हे जीव! तुझे उठना है, नीचे नहीं गिरना है। मानव योनि में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा को पहचान व स्वयं को ऊँचा उठा। ‘‘कितने हैं जो इस मर्म को समझ पाते हैं कि मनुष्य जीवन हमें अपने पशुत्व को उभारने के लिए नहीं, देवत्व को विकसित करने के लिए मिला है। कर्मों की श्रेष्ठता द्वारा मनुष्य निश्चित ही उस पुल को पार कर सकता है जो देवत्व एवं पशुत्व के बीच बना सेतु अनन्तकाल से हम सबकी प्रगति की यात्रा का राज मार्ग बना हुआ है। इस पुल तक पहुँचना, देवत्व को पहचानना व फिर उस यात्रा पर चल पड़ना जिनसे भी सम्भव हो पाता है, वे सभी विवेकशील, दूरदर्शी देवमानव कहे जाते हैं।’’

🔴 गीताकार के अनुसार किसी भी काल में क्षणमात्र भी कोई कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भगवान् स्वयं कहते हैं कि यदि वे भी एक क्षण कर्म करना बन्द कर दें तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। सारा लोक व्यवहार नष्ट हो जाए। कर्म करते रहना, कर्त्तव्यपरायण बने रह कर मनुष्य जीवन को सतत् प्रगति की ओर, देवत्व की ओर बढ़ाते चलना ही मनुष्य की सहज नियति है। यह बात अलग है कि कर्म का स्वरूप जाने बिना जब मनुष्य अशुभ कर्मों में, अकर्मों, विकर्मों में निरत हो जाता है तो वह जीवन यात्रा को चलाते हुए भी पतन की ओर ही जाता देखा जाता है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं ‘‘कर्म क्या है, अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं, इसीलिए सभी को कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, अकर्म का भी, विकर्म का भी, क्योंकि कर्म की गति गहन है।’’ (गहना कर्मणो गतिः)

🔵 अकर्म उन्हें कहा जाता है जिन्हें न करने से पुण्य तो नहीं होता, किन्तु किये जाने पर पाप लगता है। विकर्म उन्हें कहते हैं जो परिस्थिति विशेष के अनुसार वास्तविक रूप से कुछ अलग स्वरूप ले चुके हैं तथा निषिद्ध कर्म बन गए हैं, यथा कुपात्र को दान देना। कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखने का नीर-क्षीर विवेक पैदा करने के लिए गीताकार मार्गदर्शन करता हुआ कहता है कि मनुष्य को यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों को बिना किसी आसक्ति के करते रहना चाहिए तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है। यज्ञ के निमित्त अर्थात् परमार्थ प्रयोजनों के लिए। जो भी कर्म इस भाव से किये जायेंगे वे सत्कर्म कहलायेंगे व बन्धनों से परे व्यक्ति को जीवन्मुक्ति की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया के माया-जंजाल से, भवबन्धनों से मुक्ति सहज ही मिल सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या 
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 14

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 9)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 कुंए में मुंह करके आवाज देने पर वैसी ही प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। संसार भी एक कुंए की आवाज की तरह ही है। मनुष्य जैसा सोचता है, विचारता है वैसी की प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही उसके आसपास का वातावरण बन जाता है। मनुष्य के विचार शक्तिशाली चुम्बक की तरह हैं जो अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक ही तरह के विचारों के घनीभूत होने पर वैसी ही क्रिया होती है और वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त होते हैं।

🔵 विचार की प्रचण्ड शक्ति असीम, अमर्यादित, अणुशक्ति से भी प्रबल विचार जब घनीभूत होकर संकल्प का रूप धारण कर लेता है तो स्वयं प्रकृति अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी उसको मार्ग देती है। इतना ही नहीं उसके अनुकूल बन जाती है। मनुष्य जिस तरह के विचारों को प्रश्रय देता है, उसके वैसे ही आदर्श, हाव-भाव, रहन-सहन ही नहीं, शरीर में तेज, मुद्रा आदि भी वैसे ही बन जाते हैं। जहां सद्विचारों  की प्रचुरता होगी वहां वैसा ही वातावरण बन जायेगा। ऋषियों के अहिंसा, सत्य, प्रेम, न्याय के विचारों से प्रभावित क्षेत्र में हिंसक पशु भी अपनी हिंसा छोड़कर अहिंसक पशुओं के साथ विचरण करते थे।

🔴 जहां घृणा, द्वेष, क्रोध आदि से सम्बन्धित विचारों का निवास होगा वहां नारकीय परिस्थितियों का निर्माण होना स्वाभाविक है। मनुष्य में यदि इस तरह के विचार कर जांय कि मैं अभागा हूं, दुःखी हूं, दीन-हीन हूं तो उसका अपकर्ष कोई भी शक्ति रोक नहीं सकेगी। वह सदैव दीन हीन परिस्थितियों में ही पड़ा रहेगा। इसके विपरीत मनुष्य में सामर्थ्य, उत्साह, आत्मविश्वास, गौरवयुक्त विचार होंगे तो प्रगति-उन्नति स्वयं ही अपना द्वार खोल देगी। सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति का उपयोग ही व्यक्ति को सर्वतोमुखी सफलता का प्रदान करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 17)

🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता 

🔵 कहने को तो यों भी कहा जाता है कि अभावग्रस्त परिस्थितियों के कारण मनुष्य को त्रास सहने पड़ते हैं, पर गम्भीरता के साथ निरीक्षण-परीक्षण करने पर तो दूसरी ही बात सामने आती है। व्यक्तित्व की गहराई में घुसी हुई अवाञ्छनीयताओं के कारण ही मनुष्य गई गुजरी परिस्थितियों में पड़ा रहता है। श्रमिकों में कितनी ही अच्छी कमाई करते हुये भी देखें जाते हैं, पर उनकी आदत में नशेबाजी, जुआ, आवारागर्दी जैसी कितनी ही बुरी आदतें जुड़ जाती हैं। 

🔴 जो कमाते हैं, उसे गँवा देते हैं और अभावों की शिकायत करते हुए ही जिन्दगी गुजारते हैं। उनका परिवार भी इसी अनौचित्य की चक्की में पिसता और बरबाद होता रहता है। बात श्रमिकों तक ही सीमित नहीं हैं, वह धनिकों के ऊपर और भी अधिक स्पष्ट रूप से लागू होती है। दुरुपयोग उन्हें भी दुर्गुणी, दुर्व्यसनी बनाता ही है। अपव्यय के रहते किसी के पास खुशहाली रह सकेगी या उसके माध्यम से उपयोगी प्रगति सम्भव हो सकेगी, इसकी आशा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।    

🔵 धनिकों की विद्वानों की, समर्थों की, कलाकारों की अपने देश में कमी नहीं। देश में गरीब और अशिक्षितों का बाहुल्य होते हुए भी, प्रतिभावानों का इतना बड़ा वर्ग मौजूद है, जो अपने साधनों को सर्वतोमुखी प्रगतिशीलता के लिए नियोजित कर सके, तो उतने भर से ही उत्थान उत्कर्ष और अभ्युदय का वातावरण देखते देखते बन सकता है। महापुरुषों का आँकलन दो ही आधारों पर होता है, एक तो उनने समर्थता अर्जन के लिए कठोर प्रयत्न किया है, दूसरा उन उपलब्धियों को उदारतापूर्वक प्रगतिशीलता के पक्षधर सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया होता है। यह दो कदम उठाने पर कोई महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने की स्थिति में पहुँच जाता है। ऐसे लोगों का बाहुल्य जिस भी समुदाय में, क्षेत्र में होगा, वहाँ न सौहार्द्र की कमी रहेगी, न समर्थता की, न प्रगतिशीलता की। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 संसार में हम हैं। संसार में रह करके हम अपने कर्तव्य पूरे करें। हँसी-खुशी से रहें, अच्छे तरीके से रहें, लेकिन इसमें इस कदर हम व्यस्त न हो जायें, इस कदर फँस न जायें कि हमको अपने जीवन के उद्देश्यों का ध्यान ही न रहे। अगर हम फँसेंगे तो मरेंगे।

🔵 आपने उस बन्दर का किस्सा सुना होगा जो अफ्रीका में पाया जाता है-सिम्बून और जिसके बारे में ये कहा जाता है कि शिकारी लोग उसको चने, मुट्ठी भर चने का लालच देकर के उसकी जान ले लेते हैं। लोहे के घड़े में चने भर दिये जाते हैं और सिम्बून उन चनों को खाने के लिये आता है, मुट्ठी बाँध लेता है, मुट्ठी को निकालना चाहता है तो मुट्ठी निकलती नहीं है। जोर लगाता है तो भी नहीं निकलती, इतनी हिम्मत नहीं होती कि मुट्ठी को खाली कर दे, छोड़ दे और हाथ को खींचे। लेकिन वो मुट्ठी को छोड़ना नहीं चाहता है। छोड़ने के न चाहने का परिणाम ये होता है कि हाथ बाहर निकलता नहीं और शिकारी आता है, उसको मार-काट के खतम कर देता है, फिर उसकी चमड़ी को उखाड़ लेता है। हम और आपकी स्थिति ऐसी है, जैसे अफ्रीका के सिम्बून बन्दरों जैसी।

🔴 हम लिप्साओं के लिये, लालसाओं के लिये, वासनाओं के लिये, तृष्णा के लिये, अहंकार की पूर्ति के तरीके से मुट्ठी पकड़ करके बन्दरों के तरीके से फँसे रहते हैं और अपनी जीवन सम्पदा का विनाश कर देते हैं, जिससे हमको बाज आना चाहिए और हमें अपने आपको इससे बचाने के लिये कोशिश करनी चाहिए। हमको अपनी क्षुद्रता का त्याग करना है। क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर देते हैं, तो हम कुछ खोते नहीं हैं, हम कमाते ही कमाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 103)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 8. विवाह योग्य लड़की लड़कों की जानकारी:-- संगठन बन जाने पर उसका प्रथम कार्य प्रगतिशील लोगों के लड़के लड़कियों की जानकारी क्षेत्रीय दफ्तर में एकत्रित करना है। प्रत्येक ग्राम सभा अपने यहां से इस प्रकार की सूचना संग्रह करके क्षेत्रीय कार्यालयों में भेजा करेगी। जो लोग आदर्श विवाह करने के लिए सहमत हों, उन्हीं की जानकारियां संग्रह की जांय। क्योंकि यह सारा प्रयत्न ही आदर्श विवाहों के प्रचलन के लिये किया गया है। जिन्हें पुराने ढर्रे के देन-दहेज और ठाट-बाट के विवाह करने हैं वे अपने आप, अपने ढंग से लड़की-लड़के ढूंढ़ते रहते हैं। हमें तो उन लोगों की सुविधा की दृष्टि से इतना बड़ा यह ढांचा खड़ा करना पड़ रहा है जो आदर्श विवाहों के इच्छुक हों, उनको अपने ही विचारों एवं आदर्श वाले सम्बन्धी मिल सकें यही हमारा उद्देश्य रहना चाहिये।

🔵 ऐसी सूचनाऐं एक क्षेत्र के एक ही दफ्तर में रह सकती हैं। उस क्षेत्र की सभी उपजातियों या जातियों की सूचनाएं अलग-अलग फाइलों में एक ही दफ्तर में एकत्रित रह सकती हैं। सभी जातियों का एक ही दफ्तर रह सकता है। इसी प्रकार संगठनकर्त्ता भी एक ही सब जातियों के लिए काम दे सकता है। क्षेत्रीय प्रगतिशील जातीय सभा कार्यालय आरम्भ में एक ही रखना होगा। पीछे जब काम का बहुत विस्तार हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों के अलग-अलग कार्यालय बांटे जा सकते हैं और यदि काम बहुत बढ़ जाय तो उपजातियों के लिये भी अलग दफ्तर की आवश्यकता पूरी की जा सकती है, पर आरम्भ में एक ही संगठन-कर्त्ता की नियुक्ति करना उचित होगा।

🔴 9. प्रचार साधन और सुविधाएं:-- आदर्श विवाहों की आवश्यकता, उपयोगिता एवं रूपरेखा समझने के लिये व्यापक प्रचार की आवश्यकता होगी। इन विचारों से जब तक लोगों को प्रभावित न किया जायगा, तब तक वे उससे सहमत न होंगे और वैसा करने के लिए साहस न कर सकेंगे। इसलिये छोटी-मोटी पुस्तिकाएं पढ़ना, भजन, गायन, चित्र प्रदर्शिनी, कवि-सम्मेलन, सभा-सम्मेलन, गोष्ठियां आदि के छोटे-छोटे आयोजन आदि माध्यमों से लोगों में आदर्श विवाहों की भावना आकांक्षा एवं हिम्मत पैदा करनी चाहिए। 

🔵 वैसे जोड़े ढूंढ़ने में अधिक व्यक्तियों की सहायता की जानी चाहिये। उत्सव का रूप प्रभावशाली एवं आकर्षक कैसे बने, इसकी व्यवस्था बनाने में सहयोग होना चाहिये, तथा जहां भी ऐसे विवाह हों, उनका प्रचार दूर-दूर तक करने के लिये प्रयत्न होना चाहिये। यह सुविधाएं प्रस्तुत करना क्षेत्रीय संगठन का काम हैं। इन प्रयत्नों से ही उत्साह उत्पन्न होगा और उत्साह सामूहिक कार्यक्रमों की प्रगति का मूलभूत आधार होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 50)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴  तुम्हारा समर्पण यदि सच्चा है, तो शेष जीवन की कार्य पद्धति बनाए देते हैं। इसे परिपूर्ण निष्ठा के साथ पूरी करना। प्रथम कार्यक्रम तो यही है कि 24 लक्ष्य गायत्री महामंत्र के 24 महापुरश्चरण चौबीस वर्ष में पूरे करो। इससे मजबूती में जो कमी रही होगी, सो पूरी जो जाएगी। बड़े और भारी काम करने के लिए बड़ी समर्थता चाहिए। इसी के निमित्त यह प्रथम कार्यक्रम सौंपा गया है। इसी के साथ-साथ दो कार्य और भी चलते रहेंगे। एक यह कि अपना अध्ययन जारी रखो। तुम्हें कलम उठानी है। आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद प्रकाशन की व्यवस्था करके उसे सर्व-साधारण तक पहुँचाना है। इससे देव संस्कृति की लुप्तप्राय कड़ियाँ जुड़ेंगी और भविष्य में विश्व संस्कृति का ढाँचा खड़ा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही जब तक स्थूल शरीर विद्यमान है, तब तक मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला सर्वसुलभ साहित्य विश्व वसुधा की सभी सम्भव भाषाओं में लिखा जाना है। यह कार्य तुम्हारी प्रथम साधना शक्ति से सम्बद्ध है। इसमें समय आने पर तुम्हारी सहायता के लिए सुपात्र मनीषी आ जुटेंगे, जो तुम्हारा छोड़ा काम पूरा करेंगे।

🔵 तीसरा कार्य स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहने का है। यह सन् 1947 तक चलेगा। तब तक तुम्हारा पुरश्चरण भी बहुत कुछ पूरा हो लेगा। यह प्रथम चरण है। इसकी सिद्धियाँ जन साधारण के सम्मुख प्रकट होंगी। इस समय के लक्षण ऐसे नहीं है, जिनसे यह प्रतीत हो कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देकर सहज ही चले जाएँगे किन्तु यह सफलता तुम्हारा अनुष्ठान पूरा होने के पूर्व ही मिलकर रहेगी। तब तक तुम्हारा ज्ञान इतना हो जाएगा जितना कि युग परिवर्तन और नव-निर्माण के लिए किसी तत्त्ववेत्ता के पास होना चाहिए। 

🔴 पुरश्चरणों की समग्र सम्पन्नता तब होती है, जब उसका पूर्णाहुति यज्ञ भी किया जाए। चौबीस लाख पुरश्चरण का गायत्री महायज्ञ इतना बड़ा होना चाहिए कि जिससे 24 लाख मंत्रों की आहुतियाँ हो सकें एवं तुम्हारा संगठन इस माध्यम से खड़ा हो जाए। यह भी तुम्हें ही करना है। इसमें लाखों रुपए की राशि और लाखों की सहायक जनसंख्या चाहिए। तुम यह मत सोचना कि हम अकेले हैं, पास में धन नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं। साथ ही तुम्हारी उपासना का प्रतिफल भी, इसलिए संदेह करने की गुंजायश नहीं है। समय आने पर सब हो जाएगा। साथ ही सर्वसाधारण को यह भी विदित हो जाएगा कि सच्चे साधक की सच्ची साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 51)

🔵 छोटे-छोटे लता-गुल्म नन्हे मुन्ने बच्चे-बच्चियों की तरह पंक्ति बना कर बैठे थे। पुष्पों में उनके अपने सिर सुशोभित थे। वायु के झोंकों के साथ हिलते हुए ऐसे लगते थे मानों प्रारम्भिक पाठशाला के छोटे छात्र सिर हिला हिला कर पहाड़े याद कर रहे हों। पल्लवों पर बैठे हुए पक्षी मधुर स्वर में ऐसे चहक रहे थे, मानों यक्ष गन्धर्वों की आत्माएं खिलौने जैसे सुन्दर आकार धारण करके इस वन श्री का गुणगान और अभिनन्दन करने के लिए ही स्वर्ग से उतरी हों। किशोर बालकों की तरह हिरन उछल कूद मचा रहे थे। जंगली भेड़ें (बरड़) ऐसी निश्चिन्त होकर घूम रही थी मानों इस प्रदेश की गृह लक्ष्मी यही हो। मन बहलाने के लिए चाबीदार कीमती खिलौनों की तरह छोटे-छोटे कीड़े पृथ्वी पर चल रहे थे। उनका रंग, रूप, चाल, ढाल सभी कुछ देखने योग्य था। उड़ते हुए पतंग, फूलों से अपने सौन्दर्य को प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। हममें से कौन अधिक सुन्दर और कौन अधिक असुन्दर है इसकी होड़ उनमें लगी हुई थी।

🔴 नव यौवन का भार जिससे सम्भलने में न आ रहा हो ऐसी इतराती हुई पर्वतीय नदी बगल में ही बह रही थी। उसकी चंचलता और उच्छृंखलता, दर्प देखते ही बनता था। गंगा में और भी नदी आकर मिलती हैं। मिलन के संगम पर ऐसा लगता था मानों दो सहोदर बहिनें ससुराल जाते समय गले मिल रही हों, लिपट रही हों। पर्वत राज हिमालय ने अपनी सहस्र पुत्रियों (नदियों) का विवाह समुद्र के साथ किया है। ससुराल जाते समय में बहिनें कैसी आत्मीयता से मिलती हैं, संगम पर खड़े-खड़े इस दृश्य को देखते-देखते जी नहीं अघाता। लगता है हर घड़ी इसे देखते ही रहें।

🔵 वयोवृद्ध राज पुरुषों और लोक नायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर तक ऐसे बैठे थे मानो किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्त-चित्त होकर संलग्न हों। हिमाच्छादित चोटियां उनके श्वेत केशों की झांकी करा रही थीं। उन पर उड़ते हुए छोटे बादल ऐसे लगते थे मानो ठण्ड से बचाने के लिए नई रुई का बढ़िया टोपा उन्हें पहनाया जा रहा है। कीमती शाल-दुशालों में उनके नग्न शरीर को लपेटा जा रहा हो।

🔴 जिधर भी दृष्टि उठती उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था। उनके जवान न थी, वे बोलते न थे पर उनकी आत्मा में रहने वाला चेतन बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहता था। जो कहता था हृदय से कहता था और करके दिखाता था। ऐसी बिना शब्दों की किन्तु अत्यन्त मार्मिक वाणी इससे पहले सुनने को नहीं मिली थी। उनके शब्द सीधे आत्मा तक प्रवेश करते और रोम-रोम को झंकृत किये देते थे। अब सूनापन कहां? अब भय किसका? सब ओर सहचर ही सहचर जो बैठे थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Feb 2017


👉 एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान

🔴 बचपन से ही साधना में मेरी गहरी रुचि थी। ध्यान मुझे स्वतः सिद्ध था। तरह- तरह के अनुभव होते थे, जिन्हें किसी से कहने में भी मुझे डर लगता था। पर धीरे- धीरे उनका अर्थ समझ में आने लगा। एक दिन न जाने कहाँ से एक महात्मा मस्तीचक आए और धूनी जलाकर बैठ गए। उनका नाम था- बाबा हरिहर दास। उनसे प्रभावित होकर मैंने दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- मैं तुम्हारा गुरु नहीं हो सकता हूँ। तुम्हारे गुरु इस धरती पर अवतरित हो चुके हैं। मेरा उद्धार भी तुम्हारे गुरु के द्वारा ही होना है। एक दिन वे मथुरा से यहाँ आएँगे और इसी मिट्टी की कुटिया में आकर मेरा उद्धार करेंगे।

🔵 बाबा हरिहर दास ने जिस दिन मुझे यह बात बताई, उस दिन के पहले से ही मेरे सपने में एक महापुरुष का आना शुरू हो चुका था। वे खादी के धोती- कुर्ते में नंगे पाँव आया करते थे। उनके चेहरे से अलौकिक आभा टपकती रहती थी। जब भी वे मेरे सपने में आते, मैं यंत्रचालित- सा उनके चरणों में अपना माथा टेक देता। फिर वे मेरा सिर सहलाकर मुझे आशीर्वाद देते और बिना कुछ कहे वापस चले जाते।

🔴 वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। लेकिन एक रात ऐसी भी आयी, जब उन्होंने अपना मौन तोड़ दिया। अंतरंगता से आप्लावित शब्दों में उन्होंने मुझसे कहा- अभी कितने दिन यहाँ रहना है। मैं वहाँ तुम्हारी राह देख रहा हूँ।
  
🔵 तभी से एक अनजानी- सी बेचैनी मेरे भीतर घर कर गई। अब तक मुझे इसका आभास हो चुका था कि यही मेरे पूर्व जन्म के गुरु हैं। लेकिन प्रश्र यह था कि इस अवतारी चेतना को मैं कहाँ खोजूँ? कुछ ही दिनों बाद दैवयोग से मैं मथुरा पहुँचा। वहीं पर मुझे मिले बार- बार मेरे सपने में आने वाले मेरे परम पूज्य गुरुदेव- युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य!

🔴 पहली ही मुलाकात में उनसे मुझे ऐसा प्यार मिला कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। उनके पास रहते- रहते करीब चार वर्ष बीत गए थे। आचार्यश्री के मार्गदर्शन में साधना और उपासना के बल पर मैं अपने जीवन में होने वाली अनेक घटनाओं के बारे में जानने लग गया था।

🔵 इसी क्रम में एक दिन मुझे अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान हो गया। तब मैंने पूज्य गुरुदेव से कहा- इस शरीर से आपकी सेवा अगले तीन- चार महीने तक ही हो सकेगी। गुरुदेव ने पूछा- ऐसा क्यों? मैंने मुस्कुराते हुए कहा- मेरी मृत्यु होने वाली है। मरने के बाद भूत बनकर शायद आपकी सेवा कर सकूँ, पर इस शरीर से तो सेवा नहीं हो पाएगी। जवाब में पूज्य गुरुदेव भी मुस्कराने लगे। उन्होंने कहा- तुम्हें इसी शरीर से मेरा काम करना है।

🔴 कुछ दिन और बीत गए। मृत्यु को कुछ और करीब आया जानकर मैंने पूज्य गुरुदेव के सामने फिर से यही बात दुहराई। गुरुदेव झल्ला उठे। उन्होंने डपटते हुए पूछा- अच्छा बता, तेरी मृत्यु कैसे होगी? मैंने कहा- आज से ठीक दो महीने बाद मुझे एक साँप काट लेगा और उसी से मेरी मृत्यु हो जाएगी।  मेरी बात सुनकर उनकी झल्लाहट कुछ और बढ़ गई। उन्होंने कहा- तू अपना काम करता चल। मरने की बकवास छोड़ दे। मुझे लगा कि गुरुदेव का इशारा शरीर की नश्वरता की ओर है। मैं भी करीब आती हुई मौत को भूलकर अपने काम में मगन हो गया।

🔵 महीने- डेढ़ महीने बाद तो मैं इस बात को पूरी तरह से भूल गया था कि मौत मेरी तरफ तेजी से बढ़ती आ रही है। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया जिसे नियति ने मेरी मृत्यु के लिए निर्धारित कर रखा था। सुबह के समय मैं, शरण जी तथा दो- तीन अन्य परिजनों के साथ नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। गुरुदेव सामने के कमरे में थे। हम सब उनके बाहर निकलने का ही इन्तजार कर रहे थे। समय बीतता जा रहा था, पर वे बाहर निकलने का नाम नहीं ले रहे थे। विलम्ब होता देख मैं उधर जाने की सोच ही रहा था कि अचानक पेड़ से एक भयंकर विषधर सर्प मेरे सिर पर गिरा। उसी क्षण मुझे अपनी ध्यानावस्था में देखा हुआ दृश्य याद आ गया कि आज मुझे मृत्यु से कोई बचा नहीं सकता है। पर आश्चर्य! उस काले साँप का फन मेरी आँखों के आगे नाच रहा था। उस काले साँप ने दो- तीन बार अपने फन से मेरे सिर पर और छाती पर प्रहार किया, पर काट नहीं सका। ऐसा लगा कि किसी ने उसके फन को नाथ कर रख दिया है।

🔴 अपने जीवन में समय को पूरी तरह से साध लेने वाले मेरे गुरुदेव समय के बीत जाने पर भी आज कमरे से बाहर क्यों नहीं निकले, यह बात अब मेरी समझ में आ चुकी थी। डसने की कोशिश में असफल हुआ वह साँप धीरे- धीरे मेरे शरीर पर सरकता हुआ नीचे आ गया। अब तक वहाँ कुछ और लोग भी जमा हो गए थे। सबने मिलकर उस साँप को मार दिया। तब तक वहाँ इस बात को लेकर कोहराम मच गया कि शुक्ला जी को साँप ने काट खाया है। गुरुदेव अपने कमरे से निकले। इन सारी बातों से अनजान बनते हुए उन्होंने पूछा -क्या हुआ शुक्ला? मैंने मरे हुए साँप को दिखाते हुए कहा- यह सर्प मेरा काल बनकर आया था। लगता है मैं बच गया। गुरुदेव ने गंभीर स्वर में कहा- इस सर्प को मारना नहीं चाहिए था। किसने मारा? किसी ने मुँह नहीं खोला। सभी सिर झुकाए खड़े रहे। वातावरण को सहज बनाने के लिए गुरुदेव बोले- खैर, जाने दो। स्नान कर लो। पूज्यवर की शक्ति सामर्थ्य से अभिभूत होकर मैं स्नान करने के लिए चल पड़ा।

🔵 उस दिन भी रोज की भाँति ही दोपहर के बाद वाले कार्यक्रम में परम वन्दनीया माताजी के गायन में मुझे तबले पर संगत करनी थी। मंच पर सारी व्यवस्था हो चुकी थी। तबला, हारमोनियम रखे जा चुके थे। माताजी के लिए माइक सेट करना था। जैसे ही मैंने माइक को पकड़कर उठाना चाहा, मेरा हाथ माइक से चिपक गया। माइक में २४० बोल्ट का करंट दौड़ रहा था। अपनी पूरी ताकत लगाकर मैंने हाथ झटकना चाहा, पर झटक नहीं सका। फिर मैं चीखकर बोला- लाइन काटो। मुझे लगा कि अब मेरी मृत्यु निश्चित है। सुबह साँप से तो मैं बच गया था, पर बिजली के इस करंट से बचना असंभव है। लेकिन मेरे और मेरी मौत के बीच तो पूज्य गुरुदेव की तपश्चर्या की ताकत दीवार बनकर खड़ी थी। उन्होंने भेदक दृष्टि से बिजली के तार की ओर देखा और तार का कनेक्शन कट गया। माइक ने मेरा हाथ छोड़ दिया और मैं झटके से नीचे गिर पड़ा। सब लोग दौड़कर मेरे पास आ गए। पूज्य गुरुदेव भी स्थिर चाल से चले आ रहे थे। लोगों ने उन्हें रास्ता दिया। उन्होंने पास आकर पूछा- कैसे हो बेटे? बोलना चाहकर भी मैं कुछ बोल नहीं सका। ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे शरीर को लकवा मार गया हो।

🔴 डॉक्टर बुलाये गए। उन्होंने कहा- बिजली का झटका बहुत जोर का लगा है। इसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। ठीक होने में कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएँगे। डॉक्टर के चले जाने के बाद पूज्य गुरुदेव ने कहा -इसके सारे शरीर में सरसों के तेल से मालिश करो।

🔵 संगीत का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। मैं अकेले में बिस्तर पर लेटा हुआ गुरुसत्ता की सर्वसमर्थता पर मुग्ध हो रहा था। कुछ ही घण्टों के दौरान दो बार काल मुझे निगलने के लिए आया और दोनों बार उन्होंने मुझे मौत के मुँह से बाहर निकाल लिया। मैं उनके प्रति कृतज्ञता के भाव में डूबता जा रहा था कि न जाने कब आँखों में गहरी नींद समाती चली गई। आधी रात के बाद अचानक मेरी नींद टूटी। ऐसा लगा कि कोई मेरी छाती पर बैठकर मुझे जान से मारने की कोशिश कर रहा है और मैं अब कुछ ही क्षणों का मेहमान हूँ। एक ही दिन में तीसरी बार मैं अपनी मृत्यु को करीब से देख रहा था। दोपहर बाद के बिजली के झटके ने मेरी सारी ताकत पहले ही निचोड़ ली थी। इसीलिए चाहकर भी मैं कोई प्रतिकार नहीं कर सका। जब मुझे लगा कि अगली कोई भी साँस मेरी अन्तिम साँस साबित हो सकती है, तो मेरे मुँह से सिर्फ दो ही शब्द निकले- हे गुरुदेव! उनका नाम लेना भर था कि मेरी छाती पर सवार मेरा काल शून्य में विलीन हो गया। इस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव ने विधि के विधान को चुनौती देकर एक ही दिन में तीन- तीन बार मुझे नया जीवन दिया।                  

🔴 सुबह होते ही पत्नी ने पूज्य गुरुदेव के कल के आदेश का पालन करने की तत्परता दिखाई। सरसों के तेल की मालिश शुरू हुई। बीस मिनट की मालिश में ही एक चौथाई आराम मिल गया। मालिश का यह क्रम करीब एक हफ्ते तक चलता रहा। डॉक्टर साहब ने तो जोर देकर कहा था कि मुझे ठीक होने में कम से कम तीन महीने लग जायेंगे, लेकिन आठवें दिन ही मैं अपने आपको पहले से भी अधिक ताकतवर महसूस करने लगा था। उनकी दवा धरी की धरी ही रह गई थी।
  
🌹 रमेशचन्द्र शुक्ल मस्तीचक, (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 36) 13 Feb

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    
🔴 उपवास पेट का साप्ताहिक विश्राम है। इससे छह दिन की विसंगतियों का सन्तुलन बन जाता है और आगे के लिये सही मार्ग अपनाने का अवसर मिलता है। जल लेकर उपवास न बन पड़े तो शाकों का रस या फलों का रस लिया जा सकता। दूध, छाछ पर भी रहा जा सकता है। इतना भी न बन पड़े तो एक समय का निराहार तो करना ही चाहिये। मौन पूरे दिन का न सही किसी उचित समय दो घंटे का तो कर ही लेना चाहिये। इस चिह्न पूजा से भी दोनों प्रयोजनों का उद्देश्य स्मरण बना रहता है और भविष्य में जिन मर्यादाओं का पालन किया जाता है, उस पर ध्यान केन्द्रित बना रहता है। साप्ताहिक विशेष साधना में जिह्वा पर नियन्त्रण स्थापित करना प्रथम चरण है।  

🔵 द्वितीय आधार है-ब्रह्मचर्य नियत दिन शारीरिक ब्रह्मचर्य तो पालन करना ही चाहिये। यौनाचार से तो दूर ही रहना चाहिये, साथ ही मानसिक ब्रह्मचर्य अपनाने के लिये यह आवश्यक है कि कुदृष्टि का, अश्लील कल्पनाओं का निराकरण किया जाये। नर नारी को देवी के रूप में और नारी नर को देवता के रूप में देखे तथा श्रद्धा भरे भाव मन पर जमायें। भाई-बहन पिता-पुत्री माता-सन्तान की दृष्टि से ही दोनों पक्ष एक दूसरे के लिये पवित्र भावनायें उगायें। यहाँ तक कि पति-पत्नी भी एक दूसरे के प्रति अर्द्धांग की उच्चस्तरीय आत्मीयता संजोयें। 
                      
🔴 अश्लीलता को अनाचार का एक अंग माने और उस प्रकार के दुश्चिन्तन को पास न फटकने दें। सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य तभी सधता है, जब शरीरसंयम के साथ-साथ मानसिक श्रद्धा का भी समन्वय रखा जाय। इससे मनोबल बढ़ता है और कामुकता के साथ जुड़ने वाली अनेकानेक दुर्भावनाओं से सहज छुटकारा मिलता है। सप्ताह में हर दिन इस लक्ष्य पर भावनायें केन्द्रित रखी जाय तो उसका प्रभाव भी अगले छह दिनों तक बना रहेगा।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्लास्टिक का दिल बनाने वाले महान् डॉक्टर

🔴 टेमगाज के एक डॉक्टर श्री माईकेल डेवा ने चिकित्सा शास्त्र में एक अद्भुत चमत्कार कर दिखाया। उन्होंने एक हृदय रोगी का खराब दिल निकालकर उसके स्थान पर प्लास्टिक का एक नकली दिल लगा दिया।

🔵 डॉ० डेवा के इस अद्भुत कार्य का प्रभाव रोगी पर किसी प्रभार भी अन्यथा नही पडा। उसका नकली दिल यथावत् काम कर रहा है। शरीर का रक्त संचालन तथा रक्तचाप सामान्य रहा। साथ ही शरीर के अन्य अवयवों की कार्य प्रणाली में किसी प्रकार का व्यवधान अथवा विरोध नहीं आया। डॉ० डेवा की इस सफलता ने चिकित्सा विज्ञान में एक नई क्रांति का शुभारंभ कर दिया है।

🔴 डॉ० डेवा ने प्रारंभ से ही, जब वे कालेज मे पढते थे यह विचार बना लिया था कि वे अपना सारा जीवन संसार की सेवा में ही लगायेंगे। अपनी सेवाओं के लिये उन्होंने चिकित्सा का क्षेत्र चुना। डॉ० डेवा जब किशोर थे तभी से यह अनुभव कर रहे थे कि रोग मानव जाति के सबसे भयंकर शत्रु हैं। यह मनुष्यों के लिए न केवल अकाल के कारण बनते हैं बल्कि जिसको लग जाते है उसका जीवन ही बेकार तथा विकृत बना देते हैं। न जाने कितनी महान् आत्माऐं और ऊदीयमान प्रतिभाएँ जो संसार का बडे़ से बडा़ उपकार कर सकती है, विचार निर्माण तथा साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत दान कर सकती है, इनका शिकार बनकर नष्ट हो जाती है।

🔵 इसके साथ ही उन्हें यह बात भी कम कष्ट नहीं देती थी कि रोग से ग्रस्त हो जाने पर जहाँ मनुष्य की कार्यक्षमता भी नष्ट हो जाती है, वहाँ उसके उपचार में बहुत सा धन भी बरबाद होता रहता है। रोगों के कारण संसार के न जाने कितने परिवार अभावग्रस्त बने रहते है। जो पैसा वे बच्चों की पढाई और परिवार की उन्नति में लगा सकते हैं, वह सब रोग की भेंट चढ़ जाता है और बहुत से होनहार बच्चे अशिक्षित रह जाते है।

🔴 इस बात को सोचकर तो वे और भी व्यग्र हो उठते थे कि रोगों से दूसरे नये रोगो का जन्म होता है। संसार की आबादी बुरी तरह बढती जा रही है। लोग अभी इतने समझदार नहीं हो पाए है कि यह समझ सकें कि जनवृद्धि के कारण संसार में उपस्थित अभाव भी अनेक रोगों को जन्म देता है। भर पेट भोजन न मिलने से मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे उसे अनेक रोग दबा लेते हैं, उनका सक्रमण तथा प्रसार होता है और संसार की बहुत-सी बस्तियाँ बरबाद हो जाती है। रोग युद्ध से भी अधिक मानव समाज के शत्रु होते हैं।

🔵 वे चिकित्साशास्त्र के अध्ययन में लग गए और यह भी देखते रहे कि उन्हें इस क्षेत्र की किस शाखा मे अनुसंधान तथा विशेषता प्राप्त करनी चाहिए, उन्होंने पाया कि आजकल मनुष्यों में कृत्रिमता का बहुत प्रवेश हो गया है। लोग अप्राकृतिक जीवन के अभ्यस्त हो गए हैं। उनके खानपान में अनेक अखाद्य पदार्थ शामिल हो गये हैं, जो शरीर के लिये बहुत घातक सिद्ध होते है। इसके साथ तंबाकू शराब और अन्य बहुत-से नशों के कारण भी मानव स्वास्थ्य बुरी तरह चौपट होता जा रहा है। इन सारे व्यसनों तथा अनियमितताओं का सीधा प्रभाव हृदय पर पडता है इसीलिये अधिकांश रोगी दिल की किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त रहते हैं हार्टफेल्यौर की बीमारी का कारण भी उनका यही अनुपयुक्त रहन-सहन तथा आहार-विहार है।

🔴 डॉ० डेवा ने इस अयुक्तता पर दु़ःखी होते हुए एक हृदय संबंधी अनुसंधान तथा चिकित्सा में विशेषता प्राप्त करने के लिए जीवन का बहुत बडा भाग लगा दिया। उन्होंने एक लंबी अवधि के प्रयोग चिकित्सा, उपचार तथा अनुसंधान परीक्षणों के बाद अपनी साधना का मूल्य पाया और खराब दिल निकालकर उसके स्थान पर प्लास्टिक का दिल लगा सकने में सफल हो गए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 25, 26

👉 आस्तिकता का यथार्थ

🔵 आम लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान् मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसों से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म मानना, यह एक जन-जन की मान्यता है व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोरों से आरती गाई जाती है, नगाड़े-शंख आदि बजाए जाते हैं, एवं चरणों पर मिष्ठान्न के ढेर लगा दिए जाते हैं। सवा रूपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकम्पा खरीदने के दावे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत् में हमें दिखाई दे रहा है? विवेकशीलता कहती है कि ‘‘नहीं’’।

🔴 ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े। आत्मावलंबन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना से विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें एवं वस्तुतः समाज के एक-एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगे। कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अन्तःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छलछला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवत् सत्ता वहाँ विद्यमान है।

🔵 अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग का आस्तिक यह समुदाय अभी अन्दर से उतना ही दिवालिया, भीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता है, तो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धि, संवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीखायी पड़ने लगता है।

🔴 आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त संवेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अन्तस् में अवतरण है। आस्था संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही आस्तिकता का संवर्धन कर जन-जन के मनों के सन्ताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रियाकलाप तदनुरूप ही नियोजित करने चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 13

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 8)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 जिस तरह के हमारे विचार होंगे उसी तरह की हमारी सारी क्रियायें होंगी और तदनुकूल ही उनका अच्छा-बुरा परिणाम हमें भुगतना पड़ेगा। विचारों के पश्चात ही हमारे मन में किसी वस्तु या परिस्थिति की चाह उत्पन्न होती है और तब हम उस दिशा में प्रयत्न करने लगते हैं। जिसकी हम सच्चे दिल से चाह करते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिए अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ कार्य किया जाय, तो इष्ट वस्तु की प्राप्ति अवश्यम्भावी है। जिस आदर्श को हमने सच्चे हृदय से अपनाया है, यदि उस पर मनसा-वाचा-कर्मणा से चलने को हम कटिबद्ध हैं तो हमारी सफलता निःसन्देह है।

🔵 जब हम विचार द्वारा किसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र मन पर अंकित कर उसके लिए प्रयत्नशील होते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ हमारा सम्बन्ध जुड़ना आरम्भ हो जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हम दीर्घ काल तक नवयुवा बने रहें तो हमें चाहिए कि हम सदा अपने मन को यौवन के सुखद विचारों के आनन्द-सागर में लहराते रहें। यदि हम चाहते हैं कि हम सदा सुन्दर बने रहें, हमारे मुख-मण्डल पर सौन्दर्य का दिव्य प्रकाश हमेशा झलका करे तो हमें चाहिए कि हम अपनी आत्मा का सौन्दर्य के सुमधुर सरोवर में नित्य स्नान कराते रहें।

🔴 यदि आपको संसार में महापुरुष बनकर यश प्राप्त करना है, तो आप जिस महापुरुष के सदृश होने की अभिलाषा रखते हैं, उनका आदर्श सदा अपने सामने रक्खें। आप अपने मन में दृढ़ विश्वास जमा लें कि आप में अपने आदर्श की पूर्णता और कार्य सम्पादन शक्ति पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। आप अपने मन से सब प्रकार की हीन भावना को हटा दें और मन में कभी निर्बलता, न्यूनता, असमर्थता और असफलता के विचारों को न आने दें। आप अपने आदर्श की पूर्ति हेतु मन, वचन, कर्म से पूर्ण दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करें और विश्वास रक्खें कि आपके प्रयत्न अन्ततः सफल होकर रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 16)


🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता

🔵 जहाँ भी आवश्यकताओं और अभावों की चर्चा होती है, वहाँ साधन-संवर्धन के लिए प्रयत्नरत होने का सुझाव दिया जाता है। इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है। बढ़े हुए साधनों के सहारे अनेकों उपयोगी कार्य किये जा सकते हैं। इसलिए आप्तजन ‘‘सौ हाथों से कमाने’’ का उत्साह उभारते हैं, पर उनके साथ ही ‘‘हजार हाथों से खर्च करने’’ का निर्देश भी दिया जाता है। यहाँ दुरुपयोग कर गुजरने के लिए नहीं वरन् सदाशयता भरे प्रगतिशील प्रयोजन के लिए उस उपार्जन को नियोजित करने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है। वैसा अनावश्यक संचय न किया जाये, जिसकी परिणति आमतौर से दुर्व्यसनों के लिए ही होती है, जो ईर्ष्या उभारती है और दूसरों को भी उसी अवाञ्छनीय मार्ग पर चल पड़ने के लिए बरगलाती है। 

🔴 पारा पचता नहीं। वह शरीर के विभिन्न अंगों में से फूट-फूट कर निकलता है। इसी प्रकार अनावश्यक और बिना परिश्रम का कमाया हुआ अथवा निष्ठुरता की मानसिकता से विलासिता, जैसे दुष्प्रयोजनों में उड़ाया गया धन, हर हालत में अनर्थ ही उत्पन्न करेगा। इसके दुष्परिणाम ही सामने आयेंगे। खुले तेजाब को, जलती आग को कोई कपड़ों में लपेट कर नहीं रखता। इसी प्रकार उत्पादन में लगी हुई पूँजी के अतिरिक्त, निजी खर्च के लिए मौज मजे में उड़ाने के लिए कुछ सञ्चय जमा नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा उससे मात्र गलत परम्पराएँ ही जन्म लेंगी। अमीरों की सन्तानें, आमतौर से आरामतलब, निकम्मी और दुर्गुणी ही देखी गयी हैं। जो कुछ परिश्रमपूर्वक ईमानदारी से नहीं कमाया गया है, जिसे उपयोगी प्रयोजन में लगाने से रोककर अनियन्त्रित संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए जमा कर रखा गया है, उसकी अवाञ्छनीय प्रतिक्रिया न केवल सञ्चयकर्ता को, वरन् उससे किसी भी रूप में प्रभावित होने वाले को भी पतनोन्मुख प्रवृत्तियों में धकेले बिना न रहेंगी।

🔵 दुरुपयोग की तरह निष्क्रियता-निरुत्साह भी अनिष्टकारक है। आलसी-प्रमादी ही आमतौर से दरिद्र पाये जाते हैं। उत्साह का अभाव ही उन्हें शिक्षा से वंचित रखता है। सभ्यता के अनुशासन को अभ्यास में न उतार पाने के कारण ही लोग अनगढ़ और पिछड़ी स्थिति में पड़े रहते हैं। यदि उनके इन दोष दुर्गुणों को हटाया घटाया जा सके, तो इतने भर से निजी प्रतिभा में नया उभार आ सकता है और उस दरिद्रता से छुटकारा मिल सकता है, जिसके कारण कि आए दिन अभावों, असन्तोषों और अपमानों का दबाव सहना पड़ता है।  
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सामाजिक क्रान्ति (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 भगवान् का अवतार जहाँ कहीं भी होता है, वहाँ ये मान्यता निश्चित रूप से रहती है कि भगवान् के अवतार जितने भी हुए हैं, अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के लिये, हमारे भीतर भगवान् की प्रेरणा आये तो दोनों ही क्रियाकलाप हमको समान रूप से अपनाने पड़ेंगे। श्रेष्ठ आचरण अपने में और दूसरों में स्थापित करना, साथ ही साथ में अवांछनीयता और अनैतिकताएँ अपने भीतर अथवा अपने आस-पास के वातावरण में अगर हमको दिखाई पड़ती हैं तो उनसे संघर्ष करने के लिये डट जाना चाहिये। अनीति के सामने हम सिर न झुकायें। जहाँ कहीं भी अनाचार हमको दिखाई पड़ता हो उससे लोहा लेने के लिये अपनी परिस्थिति के अनुसार असहयोग, विरोध अथवा जो भी सम्भव हो, उसे करने के लिये साहस एकत्रित करें। समाज की सुव्यवस्था इसी प्रकार से सम्भव है।

🔵 डरपोक आदमी, कायर आदमी और मुसीबत से डरने वाले आदमी, पाप से भयभीत होने वाले आदमी, गुंडागर्दी से अपना मुँह छिपाने वाले आदमी कभी उन बुराइयों को दूर न कर सकेंगे और समाज में जहाँ सुव्यवस्था की आवश्यकता है और जहाँ अनीति के निराकरण की आवश्यकता है, वो पूरी न हो सकेगी। सामाजिक क्रान्ति के लिये हमको ऐसा शौर्य और साहस जन-मानस में जगाने की आवश्यकता है, भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये।

🔴 मनुष्य जाति सामूहिक आत्महत्या के लिये बढ़ती सी मालूम पड़ती है, उसको रोकने के लिये हमको धर्मतंत्र को पुनर्जीवंत करना चाहिए। बड़ा काम बड़े साधनों से ही होता है और बड़े साधन केवल बड़े व्यक्तित्व ही जुटा सकने में सम्भव होते हैं। यही हमारा लक्ष्य है, जिसके अनुरूप हम चाहते हैं, हर व्यक्ति के अन्दर महानता जागृत हो। हर व्यक्ति अपनी वैयक्तिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा सामाजिक जीवन के लिये कुछ अधिक त्याग-बलिदान करने की हिम्मत जुटाये। पुनर्गठन से हमारा यही मतलब है कि हम नया व्यक्ति बनायें, नया समाज बनायें, नया युग लायें। इसके लिये आवश्यकता है कि हम सब व्यक्ति निर्माण करने के कार्य पे जुट जायें और व्यक्ति को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाने के लिये भरसक प्रयत्न करें।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/samajik_karnti

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 102)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 6. संगठन-कर्त्ता की आवश्यकता:-- अच्छा यही हो कि क्षेत्रीय प्रचार के लिए कम से कम एक वैतनिक या अवैतनिक पूरे समय का कार्यकर्त्ता नियत हो। वह अपना पूरा समय उसी कार्य के लिए लगाता रहे। अपने साथ एक-दो सक्रिय प्रभावशाली सदस्यों को लेकर वह जन-सम्पर्क के लिए प्रयत्न करता रहे। लोगों को इकट्ठा करने, समझाने तथा प्रभावित करने का गुण कार्यकर्त्ता में अवश्य होना चाहिए। संकोची, दब्बू प्रकृति के या आलसी व्यक्ति इस कार्य को ठीक तरह नहीं कर सकते। इसलिए संगठनकर्त्ता नियत करते समय यह बातें देख लेनी चाहिए।

🔵 क्षेत्रीय शाखा का एक कार्यालय नियत होना चाहिए। यथा-सम्भव उसे प्रधान या मन्त्री के निकट होना चाहिए। किसी उदार व्यक्ति का कमरा इस कार्य के लिए प्राप्त करना चाहिए। उसमें दफ्तर तथा सदस्यों के विचार विनिमय कर सकने जैसी गुंजाइश होनी चाहिए। जहां संगठनकर्ता की नियुक्ति सम्भव न हो, वहां क्षेत्रीय संगठन के सदस्य गण स्वयं ही थोड़ा-थोड़ा समय देकर वह कार्य करते रहें। कोई भी उपाय क्यों न हो, इस कार्य में समय की नितान्त आवश्यकता है, सो लगाने के लिए किसी न किसी प्रकार व्यवस्था बननी ही चाहिए।

🔴 7. दोनों कार्यक्रम एक दूसरे से पूरक:-- युग-निर्माण केन्द्रों और इन जातीय संगठनों में कोई प्रतिद्वन्द्विता या भिन्नता नहीं होनी चाहिये। वस्तुतः दोनों को एक ही समझना चाहिए। यह भिन्नता केवल विवाह शादियों की सुविधा की दृष्टि से की गई है। सो हर जगह इन जातीय संगठनों को अपना सम्मिलित स्वरूप युग-निर्माण शाखाओं के रूप में भी रखना चाहिए। एक व्यक्ति उन दो संगठनों का सदस्य आसानी से रह सकता है, जो परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार युग-निर्माण योजना के सदस्यों को दो उत्तरदायित्व वहन करने पड़ेंगे। एक सभी जाति, धर्मों का सम्मिलित युग-निर्माण आन्दोलन चलाने का—दूसरा समाज सुधार के लिये अपने व्यक्तिगत प्रभाव-क्षेत्र में जाति की ओर ध्यान देने का। इनमें परस्पर कोई भिन्नता या झंझट नहीं। वरन् एक दूसरे के पूरक हैं। रोटी खाना और पानी पीना देखने में दो अलग प्रकार के काम हैं, उनका दृश्य स्वरूप भी भिन्न प्रकार का है, पर वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसलिए किसी रोटी खाने वाले को पानी पीना कोई अलग काम या भिन्न प्रकार का झंझट मालूम नहीं पड़ता। इसी प्रकार युग-निर्माण आन्दोलन और जातीय-संगठनों में बाहर से देखने का ही अन्तर है, वस्तुतः युग-निर्माण की सामाजिक क्रान्ति योजना का एक पहलू या मोर्चा भर जातीय संगठन है।

🔵 अस्तु हर जगह इस प्रकार का खांचा मिलाया जाना चाहिए कि दोनों कार्य एक ही साथ चलते रहें। प्रत्येक कार्यकर्त्ता दोनों कार्य करता रहे। यह दोनों आपस में टकराते नहीं। दुहरा झंझट तभी तक मालूम पड़ेगा, जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाय। जो उसे कार्यान्वित करेंगे, वे देखेंगे कि युग-निर्माण योजना की शत-सूत्री योजना का जातीय संगठन भी एक अंग मात्र है। जिस प्रकार प्रौढ़ पाठशाला, पुस्तकालय, वृक्षारोपण, हवन आदि में एक ही व्यक्ति कई प्रवृत्तियों में एक साथ भाग लेता रहा सकता है, उसी प्रकार यह दोनों कार्यक्रम एक साथ चलाये जा सकने में पूर्णतया सरल एवं शक्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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