रविवार, 12 फ़रवरी 2017

👉 आस्तिकता का यथार्थ

🔵 आम लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान् मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसों से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म मानना, यह एक जन-जन की मान्यता है व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोरों से आरती गाई जाती है, नगाड़े-शंख आदि बजाए जाते हैं, एवं चरणों पर मिष्ठान्न के ढेर लगा दिए जाते हैं। सवा रूपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकम्पा खरीदने के दावे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत् में हमें दिखाई दे रहा है? विवेकशीलता कहती है कि ‘‘नहीं’’।

🔴 ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े। आत्मावलंबन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना से विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें एवं वस्तुतः समाज के एक-एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगे। कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अन्तःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छलछला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवत् सत्ता वहाँ विद्यमान है।

🔵 अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग का आस्तिक यह समुदाय अभी अन्दर से उतना ही दिवालिया, भीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता है, तो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धि, संवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीखायी पड़ने लगता है।

🔴 आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त संवेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अन्तस् में अवतरण है। आस्था संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही आस्तिकता का संवर्धन कर जन-जन के मनों के सन्ताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रियाकलाप तदनुरूप ही नियोजित करने चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 13

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...