रविवार, 5 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 March 2017


👉 मुँह की खानी पड़ी नाचती हुई मौत को

🔴 घटना वर्ष १९९७ के दिसम्बर महीने की है। उस समय मैं घोड़ासहन सीमा शुल्क इकाई (निवारण) में निरीक्षक के पद पर तैनात था। घोड़ासहन तहसील भारत नेपाल सीमा पर मोतिहारी जिला में अवस्थित है। मैं मुजफ्फरपुर सीमा शुल्क निवारण प्रमण्डल से स्थानान्तरित होकर वर्ष १९९७ फरवरी माह में घोड़ासहन गया था। हम लोगों का कार्यकाल सीमा शुल्क (इंडो नेपाल बॉर्डर) पर पाँच साल का होता है। फिर हमारी सेवा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग को लौटा दी जाती है।

🔵 सीमा शुल्क में मेरी सेवा का कार्यकाल १९९७ में समाप्त हो रहा था। वर्ष १९९८ में मुझे लौटकर केन्द्रीय उत्पाद शुल्क में आना था। विश्वस्त सूत्रों से मुझे ज्ञात हुआ कि मेरा स्थानान्तरण केन्द्रीय उत्पाद शुल्क, टाटानगर मुख्यालय में होने को है।

🔴 उस समय मेरा छोटा बेटा राँची में अपने तीन दोस्तों के साथ अशोक नगर में रहकर प्लस टू की पढ़ाई डी.ए.वी.जवाहर विद्या मंदिर, श्यामली में कर रहा था। उसका स्वास्थ्य थोड़ा खराब रहता था। इसलिए मैं चाहता था कि मेरा स्थानान्तरण राँची हो जाय, ताकि मेरा पुत्र मेरे साथ रहकर पढ़ाई कर सके। इस आशय का निवेदन करने मैं अपने विभागीय मुख्यालय पटना गया।

🔵 मैं शाम को पटना से बस पकड़कर सीतामढ़ी पहुँचा। बस के लेट हो जाने की वजह से घोड़ासहन जाने की ट्रेन छूट गई। दूसरी ट्रेन करीब बारह बजे रात में थी। मैं घोड़ासहन स्टेशन परिसर में ही ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। ट्रेन करीब २ बजे रात में आई। सीतामढ़ी से घोड़ासहन का सफर २ घंटे में पूरा हुआ।

🔴 तीन बजे के बाद मुझे झपकी आ गई और मैं बैठे- बैठे गहरी निद्रा में चला गया। घोड़ासहन स्टेशन आया। पूड़ी- सब्जी बेचने वालों और दूसरे लोगों के शोरगुल से मेरी नींद खुली। तब तक गाड़ी चल चुकी थी। मैं कच्ची नींद से जागने की वजह से थोड़ा असहज सा था।

🔵 मेरे पास एक पतला ब्रीफकेस था। मैं चलती ट्रेन से उतर गया। पर मुझे लगा कि यह तो घोड़ासहन नहीं है। लोगों ने गलत कह दिया है। मैं फिर ट्रेन पर चढ़ गया। पर लोग कहने लगे कि ये घोड़ासहन ही है। फिर मैं ट्रेन से दूसरी बार उतरने लगा। उतरने के क्रम में एक हाथ में ब्रीफकेस होने की वजह से संतुलन बिगड़ गया, जिससे सीढ़ीवाला रॉड मेरे हाथ से छूट गया और मैं नीचे गिर गया।

🔴 मैं चीखता हुआ पटरी पर तेजी से घूम रहे चक्के के पास जाने लगा। मुझे लगा कि अब या तो मेरी जीवन लीला समाप्त हो जाएगी अथवा मैं अपंग हो जाऊँगा। मैंने मन ही मन पूज्य गुरुदेव को याद किया और उनसे प्रार्थना करने लगा- हे गुरुदेव! मुझे बचा लीजिए।

🔵 अगले ही पल करुणावतार गुरुदेव ने करुणा दिखाई। मुझे लगा कि मेरी पीठ पर किसी पहलवान ने बहुत जोर का प्रहार किया और मैं विपरीत दिशा में उछलता चला गया। इस आकस्मिक प्रहार से मैं क्राउलिंग करता हुआ कम से कम २० फिट की दूरी पर जाकर गिरा। लेकिन मुझे कहीं कोई गहरी चोट नहीं लगी। लुढ़कना बन्द होने के बाद मैं अपने कपड़े झाड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ और ब्रीफकेस उठाकर घर की ओर चल पड़ा।

🔴 उस समय मुझे यह पता नहीं चला कि मेरा घुटना एक पत्थर से टकरा गया है और उस घुटने से खून का रिसाव हो रहा है। जब मैं घर पहुँचा, तो मेरी पत्नी ने मुझे टोका कि यह खून कैसा है। सारी बातें सुनकर पत्नी की घबराहट कहीं बहुत अधिक न बढ़ जाए, यह सोचकर मैंने उन्हें सिर्फ इतना बताया कि अँधेरे में मैं एक पत्थर से टकरा गया था। ....और कोई विशेष बात नहीं है।

🔵 आज भी मुझे जब इस घटना की याद आती है, तो मैं सिहर उठता हूँ और गुरुवर की उस अनुकंपा के स्मरण से मेरा रोम- रोम पुलकित हो उठता है।

🌹 जटा शंकर झा राँची (झारखंड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 13)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 सैनिकों को युद्ध मोर्चों पर पराक्रम दिखाने के लिए तैयार कराने के लिए, उन्हें भेजने वाला तन्त्र यह व्यवस्था भी करता है कि उन्हें आवश्यक सुविधाओं वाली साज-सज्जा मिल सके, अन्यथा वे अपनी ड्यूटी ठीक प्रकार पूरी करने में असमर्थ रहेंगे। नव सृजन के दुहरे मोर्चे पर इसी प्रकार की व्यवस्था, युग परिवर्तन का सरञ्जाम जुटाने वाली सत्ता ने भी कर रखी है।             

🔵 सफलता के उच्च लक्ष्य तक पहुँचने में कितनी ही बाधाएँ पड़ सकती हैं, उन्हें पार करने के लिए-वांछित प्रगति के लिए अनेक आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं। समझना चाहिए कि इस सन्दर्भ में किसी अग्रगामी आदर्शवादी को निराश न होना पड़ेगा, क्योंकि उसकी पीठ पर सर्वशक्तिमान सत्ता का हाथ जो रहेगा?    

🔴 तेज हवा पीछे से चलती है, तो पैदल वालों से लेकर साइकिल आदि के सहारे लोग कम परिश्रम में आगे बढ़ते जाते हैं और मञ्जिल सरल हो जाती है। इसी प्रकार नव सृजन का लक्ष्य, कल्पना करने वालों को कठिन दीखता तो है, पर उस स्रष्टा को विदित है कि उनकी नव सृजनयोजना को पूरा करने के लिए, जो अपने प्राण हथेली पर रखकर अग्रगमन का साहस दिखा रहे हैं, उन्हें सफलता का लक्ष्य प्रदान करने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ जुटानी और क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए?

🔵 माँगने वाले भिखमंगे दरवाजे-दरवाजे पर झोली पसारते, दाँत निपोरते, गिड़गिड़ाते और दुत्कारे जाते हैं। मनोकामनाएँ पूरी कराने वाले ईश्वर भक्ति का आडम्बर ओढ़कर इसी प्रकार निराश रहते हैं और उपेक्षा सहते हैं, पर जिन्हें ईश्वर का काम करना पड़ता है, उन्हें तो आदरपूर्वक बुलाया जाता है और अभीष्ट साधनों का उपहार भी दिया जाता है। इन दिनों गर्ज ईश्वर को पड़ी है। उसी का उद्यान समुन्नत करने के लिए कुशल माली चाहिए। उसी की दुनियाँ को समुन्नत, सुसंस्कृत, सुसम्पन्न बनाने के लिए कुशल कलाकारों और शूरवीर सैनिकों की आवश्यकता पड़ रही है। जो उसकी पुकार पर अपनी क्षमता को प्रस्तुत करेंगे, वे दैवी अनुग्रह से किसी प्रकार वंचित न रहेंगे, वरन् इतना कुछ प्राप्त करेंगे, जिसे पाकर वे निहाल बन सकें।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्भीक-सहिष्णुता

🔵 निर्भीकता, सहनशीलता और समदर्शिता सच्चे संत के आवश्यक गुण माने गए हैं। जो किसी भय अथवा दबाव में आकर अपने पथ से विचलित हो उठे, अपने व्यक्तिगत अपमान अथवा कष्ट से उत्तेजित अथवा विक्षुब्ध हो उठे अथवा जो किसी लोभ-लालच, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, पद पदवी के कारण किसी के प्रति अंतर माने उसे सच्चा संत नहीं कहा जा सकता, सच्चा संत भगवान् के राज्य में निर्भय विचरता और व्यवहार करता है, सुख-दुःख, मान-अपमान को उसका कौतुक मानता और प्राणी मात्र में समान दृष्टिकोण रखता है। उसको न कहीं भय होता है, न दु:ख और न ऊँच-नीच।

🔴 सिक्खों के आदि गुरु नानक साहब में यह सभी गुण पूरी मात्रा में मौजूद थे और वे वास्तव में एक सच्चे संत थे। गुरु नानक गाँव के जमींदार दौलत खाँ के मोदीखाने में नौकर थे। जमींदार बड़ा सख्त और जलाली आदमी था, किंतु गुरु नानक न तो कभी उससे दबे न डरे। बल्कि एक बार जब उन्होंने तीन दिन की विचार समाधि के बाद अपना पूर्ण परीक्षण कर विश्वास कर लिया कि अब उन्होंने जन-सेवा के योग्य पूर्ण संतत्व प्राप्त कर लिया है तब वे दौलतखाँ को यह बतलाने गये कि अब नौकरी नहीं करेंगे, बल्कि शेष जीवन जन सेवा में लगाएँगे।

🔵 जमींदार ने उन्हें अपने बैठक खाने में बुलवाया गुरुनानक गये और बिना सलाम किए उसके बराबर आसन पर बैठ गये जमींदार की भौंहे तन गई बोला-नानक! मेरे मोदी होकर तुमने मुझे सलाम नहीं किया और आकर बराबर में बैठ गए। यह गुस्ताखी क्यों की ? नानक ने निर्भीकता से उत्तर दिया दौलतखान! आपका मोदी नानक तो मर गया है, अब उस नानक का जन्म हुआ है, जिसके हृदय में भगवान् की ज्योति उतर आई है, अब जिसके लिए दुनिया में सब बराबर हैं। जो सबको अपना प्यारा भाई समझता है। कहते-कहते नानक के मुख पर एक तेज चमकने लगा। जमींदार ने कुछ देखा और कुछ समझा, 'फिर भी कहा-अगर आप किसी में अंतर नहीं समझते और मुझे अपना भाई समझते हैं, तो मेरे साथ मस्जिद में नमाज पढने चलिए। नानक ने जरा संकोच नहीं किया और एक एकेश्वरवादी संत उसके साथ मस्जिद चला गया।

🔴 जिस समय नानक मक्का की यात्रा को गए, घटना उस समय की है। निर्द्वद्व संत दिन भर स्थान-स्थान पर सत्संग करते, मुसलमान धर्म का स्वरूप समझते और अपने धर्म का प्रचार करते फिरते रहे। एक रात में मस्ती के साथ एक मैदान में पड़कर सो रहे थे। संयोगवश उनके पैर काबा की ओर फैले हुए थे। उधर से कई मुसलमान निकले। वे बडे ही संकीर्ण विचार वाले थे। गुरुनानक को काबे की तरफ पैर किए लेटा देखा तो आपे से बाहर हो गए। पहले तो उन्होने उन्हें काफिर आदि कहकर बहुत गालियाँ दीं और तब भी जब उनकी नीद न टूटी तो लात-घूँसों से मरने लगे। नानक जागे और नम्रता से बोले- "भाई क्या गलती हो गई जो मुझ परदेशी को आप लोग मार रहे है ?

🔵 मुसलमान गाली देते हुए बोले- 'तुझे सूझता नहीं कि इधर कबा-खुदा का घर है और तू उधर ही पैर किये लेटा है।''

🔴 नानक ने कहा- 'उसे सब जगह और सब तरफ न मानकर किसी एक खास जगह में मानना, मनुष्य की अपनी बौद्धिक सकीर्णता है। अच्छा हो कि आप लोग भी उसे मेरी ही तरह सब जगह और सब तरफ मानें। इसी में खुदा की बडाई है और इसी में हमारी सबकी भलाई है।''

🔵 गुरु नानक की सहनशीलता, निर्भीकता और ईश्वरीय निष्ठा देखकर मुसलमानो का अज्ञान दूर हो गया। उन्होंने उन्हे सच्चा संत समझा और अपनी मूल की माफी माँगकर उनका आदर किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 65, 66

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 29)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 जो विचार देर तक मस्तिष्क में बना रहता है, वह अपना एक स्थायी स्थान बना लेता है। यही स्थायी विचार मनुष्य का संस्कार बन जाता है। संस्कारों का मानव-जीवन में बहुत महत्व है। सामान्य-विचार कार्यान्वित करने के लिए मनुष्य को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है, किन्तु सरकार उसको यन्त्रवत् संचालित कर देता है। शरीर-यन्त्र जिनके द्वारा सारी क्रियायें सम्पादित होती हैं, सामान्य विचारों के अधीन नहीं होता।

🔵 इसके विपरीत इस पर संस्कारों का पूर्ण आधिपत्य होता है। न चाहते हुए भी, शरीर-यन्त्र संस्कारों की प्रेरणा से हठात् सक्रिय हो उठता है और तदनुसार आचरण प्रतिपादित करता है। मानव जीवन में संस्कारों का बहुत महत्व है। इन्हें यदि मानव-जीवन का अधिष्ठाता और आचरण का प्रेरक कह दिया जाय तब भी असंगत न होगा।

🔴 केवल विचार मात्र ही मानव चरित्र के प्रकाशक प्रतीत नहीं होते। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत से ऐसे लोग पाये जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े उदात्त महान् और आदर्श पूर्ण होते हैं, किन्तु उनकी क्रियायें उसके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन तो यह सच्चरित्रता नहीं होती।

🔵 इसी प्रकार बहुत से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म-कर्म वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा बहती रहती है। ऐसे व्यक्ति भी सच्चे चरित्र वाले नहीं माने जा सकते। सच्चा चरित्रवान् वही माना जायेगा और वास्तव में वही होता है जो विचार और आचार दोनों को समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 7)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 ऊँची सतह के बड़े तालाब में अधिक पानी होता है। पास में ही कोई कम पानी वाला गड्ढा हो तो दोनों की तुलना में असाधारण अंतर होगा। इतने पर भी यदि दोनों के बीच एक नाली बना दी जाए तो ऊँचे तालाब का पानी नीचे गड्ढे को भरना जल्दी आरंभ कर देगा और वह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि दोनों जलाशय एक सतह पर नहीं आ जाते। नीचे वाले गड्ढे का पानी निश्चित रूप से ऊँचा उठेगा; भले ही इसमें ऊँचे वाले को कुछ घाटा ही क्यों न रहा हो।

🔴 ईश्वर-सान्निध्य के लिये किये गये प्रयास अंधविश्वास नहीं है। यदि उनका सही तरीका न समझ सके तो मृगतृष्णा में भटकने वाले हिरण की तरह भ्रमग्रस्तों जैसी धमाचौकड़ी मचाते रहेंगे। तब तो खिन्नता, विपन्नता और असफलताएँ ही हाथ लगेंगी। यदि रुके बिना धीरे-धीरे चलने वाली चींटी भी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है तो फिर कोई कारण नहीं कि ईश्वर-सान्निध्य का सही मार्ग विदित हो जाने पर उस प्रयोजन में आश्चर्यजनक सफलता न मिल सके।          

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 11)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर

🔴 यह बिलकुल नामुमकिन बात है। उसके पीछे कोई दम नहीं है। इसके पीछे राई भर सच्चाई नहीं है। इतनी ही राई भर की सच्चाई उसके भीतर है कि आदमी पूजा पाठ करे और भगवान् का नाम ले, ताकि भगवान् का काम जिसको हम भूल गये, उसको हम याद करें, भगवान् के कामों के लिए कदम बढ़ायें। बस इतना ही पूजा- पाठ का मतलब है। अगर हम पूजा- पाठ ढेरों के ढेरों करते रहें और भगवान् की खुशामद करते रहें, भगवान् को जाल में फँसाने के लिए अपनी चालाकियाँ इस्तेमाल करते रहें और ये मानते रहें कि भगवान् ऐसा बेवकूफ आदमी है कि माला घुमाने के बाद में अपना नाम सुनने के बाद में अपनी खुशामद लेकर के और रिश्वत लेकर के हमारे मन चाहे प्रयोजन पूरा कर देगा और हमको भौतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण कर देगा और हमको आत्मिक शान्ति दे देगा, तो यह बिलकुल ही नामुमकिन बात है।

🔴 भगवान् के स्वरूप को हम समझने में बिलकुल असमर्थ हैं। ये सिर्फ चालाकियाँ हैं। इसके पीछे जो छिपी हुई बात थी, उतनी ही बात छिपी हुई थी कि लोग यह समझ पायें कि भगवान् और जीव का कोई सम्बन्ध है। भगवान् की कोई इच्छा है। मनुष्य के जीवन के साथ में भगवान् की कुछ प्रेरणाएँ जुड़ी हुई हैं। उन बातों को याद कराने के लिए और उन बातों को स्मरण कराने के लिए ही सारा पूजा- पाठ का, सारे के सारे आध्यात्मिकता का खाँचा जान- बूझकर खड़ा किया गया है। आदमी अपने को कैसा भूला हुआ है?    

🔵 अपने आप को शरीर समझता है, आत्मा अपने आप को नहीं समझता। उसकी याद दिलाने के लिए ये सब कुछ है और इसमें कुछ दम नहीं है। अगर आदमी को यह (ईश्वरीय अनुशासनों का) ध्यान ही न हो, घटिया और कमीना जीवन जिये, खुराफात, पूजा- पाठ करके लम्बे- चौड़े ख्वाब देखे, तो उस आदमी को शेखचिल्ली के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 68)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 नैतिक क्रान्ति-बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति सम्पन्न की जानी है। इसके लिए उपयुक्त व्यक्तियों का संग्रह करना और जो करना है उससे सम्बन्धित विचारों को व्यक्त करना अभी से आवश्यक है। इसलिए तुम अपना घर-गाँव छोड़कर मथुरा जाने की तैयारी करो। वहाँ छोटा घर लेकर एक मासिक पत्रिका आरम्भ करो। साथ ही क्रान्तियों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देने का प्रकाशन भी। अभी तुम से इतना काम बन पड़ेगा। थोड़े ही दिन उपरांत तुम्हें दुर्वासा ऋषि की तपस्थली में मथुरा के समीप एक भव्य गायत्री मंदिर बनाना है। सह कर्मियों के आवागमन, निवास, ठहरने आदि के लिए। इसके उपरांत 24 महापुरश्चरण के पूरे हो जाने की पूर्णाहुति स्वरूप एक महायज्ञ करना है।

🔵 अनुष्ठानों की परम्परा जप के साथ यज्ञ करने की है। तुम्हारे 24 लक्ष के 24 अनुष्ठान पूरे हो जा रहे हैं। इसके लिए एक सहस्र कुण्डों की यज्ञशाला में एक हजार मांत्रिकों द्वारा 24 लाख आहुतियों का यज्ञ आयोजन किया जाना है। उसी अवसर पर ऐसा विशालकाय संगठन खड़ा हो जाएगा। जिसके द्वारा तत्काल धर्मतंत्र से जन जागृति का कार्य प्रारम्भ किया जा सके। यह अनुष्ठान की पूर्ति का प्रथम चरण है। लगभग 24 वर्षों में इस दायित्व की पूर्ति के उपरांत तुम्हें सप्त सरोवर हरिद्वार जाना है, जहाँ रहकर वह कार्य पूरा करना है, जिसके लिए ऋषियों की विस्मृत परम्पराओं को पुनर्जागृति करने हेतु तुमने स्वीकृति सूचक सम्मति दी थी।’’

🔴 मथुरा की कार्य शैली, आदि से अंत तक किस प्रकार सम्पन्न की जानी है, इसकी एक सुविस्तृत रूपरेखा उन्होंने आदि से अंत तक समझाई। इसी बीच आर्ष साहित्य के अनुवाद प्रकाशन, प्रचार की तथा गायत्री परिवार के संगठन और उसके सदस्यों को काम सौंपने की रूपरेखा उन्होंने बता दी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 69)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 आमतौर से लोग रोते- कलपते, रोग- शोक से सिसकते- बिलखते किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते हैं। वस्तुत: इन्हीं को तपस्वी कहा जाना चाहिए। कष्ट, त्याग, उद्वेग यदि आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए सहा जाता, तो मनुष्य योगी, सिद्ध पुरुष, महामानव, देवता ही नहीं भगवान् भी बन सकता था। बेचारों ने पाया कुछ नहीं, खोया बहुत। वस्तुत: यही सच्चे परोपकारी, आत्मदानी और बलिदानी हैं, जिन्होने परिश्रम से लेकर पाप की गठरी ढोने तक का दुस्साहस कर डाला और जो कमाया था उसे साले- बहनोई, बेटे- भतीजों के लिए छोड़कर स्वयं खाली हाथ चल दिए। दूसरे के सुख के लिए स्वयं कष्ट सहने वाले वस्तुत: यही महात्मा, ज्ञानी, परमार्थी अपने को दीखते हैं। वे स्वयं अपने को मायाग्रस्त और पथभ्रष्ट कहते हैं तो कहते रहें

🔵 अपने इर्द- गिर्द घिरे असंख्यों मानव देहधारियों के अन्तरंग और बहिरंग जीवन की- उसकी प्रतिक्रिया परिणति को जब- हम देखते हैं,तो लगता है, इन सबसे सुख और सुविधा जनक जीवन हमीं ने जी लिया। हानि  अधिक से अधिक इतनी हुई कि हमें कम सुविधा और सम्पन्नता का जीवन जीना पड़ा। सम्मान कम रहा और गरीब जैसे दीखे, सम्पदा न होने के कारण दुनियाँ वालों ने हमें छोटा समझा और अवहेलना की। बस इससे अधिक घाटा किसी आत्मवादी को नहीं हो सकता, पर इस अभाव से अपना कुछ भी हर्ज नहीं हुआ, न कुछ काम रुका। दूसरे षड़ष व्यंजन खाते रहे, हमने जौ- चना खाकर काम चलाया। 

🔴 दूसरे जीभ के अत्याचार से पीड़ित होकर रुग्णता का कष्ट सहते रहे, हमारा सस्ता आहार ठीक तरह पचता रहा और निरोगिता बनाये रहा। घाटे में हम क्या रहे? जीभ का क्षणिक जायका खोकर हमने "किवाड़- पापड़" होने की उक्ति सार्थक होती देखी। जहाँ तक जायके का प्रश्न है, उस दृष्टि से तुलना करने पर विलासियों की तुलना में हमारी जौ की रोटी अधिक मजेदार थी। धन के प्रयास में लगे लोग बढ़िया कपड़े, बढ़िया घर, बढ़िया साज- सज्जा अपनाकर अपना अहंकार पूरा करने और लोगों पर रौब गाँठने की विडम्बना में लगे रहे। हम स्वल्प साधनों में उतना ठाठ तो जमा नहीं सके, पर सादगी ने जो आत्म- संतोष और आनन्द प्रदान किया उससे कम प्रसन्नता नहीं हुई, चाहे छिछोरे- बचकाने लोग मखौल उड़ाते रहे हों, पर वजनदार लोगों ने सादगी के पर्दे के पीछे झाँकती हुई महानता को सराहा और उसके आगे सिर झुकाया। नफे में कौन रहा, विडम्बना बनाने वाले या हम?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 4 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 March 2017


👉 जागृत हुई गाँव की सामूहिक शक्ति

🔴 यद्यपि मैंने कभी गुरुदेव के साक्षात् दर्शन नहीं किए और न ही दीक्षा ली। पर उनके साहित्य को पढ़कर क्रमशः उनके करीब आता चला गया। इन पुस्तकों के सहारे ही मैं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की गहराई में उतर सका और इस आध्यात्मिक यात्रा के क्रम में मैंने आचार्यश्री का वरण गुरु के रूप में कर लिया। उन्हें गुरु मान लेने के बाद से मुझे सूक्ष्म जगत से कई तरह के संकेत मिलने लगे। इन्हीं संकेतों के आधार पर आचार्यश्री की पुस्तकों को लेकर मैंने एक पुस्तकालय की स्थापना की, जिसमें आज अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। पूज्य गुरुदेव ने स्वप्न में आकर मुझे लेखन कार्य के लिए प्रेरित किया। यह गुरुसत्ता की असीम अनुकम्पा का ही परिणाम है कि आज भी कृषि विज्ञान पर लिखी गयी मेरी पुस्तकों पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा शोध- कार्य किए जा रहे हैं। मेरे जीवन में पूज्य गुरुदेव के अनुदान की वर्षा इस प्रकार होती रही कि गाँव का एक साधारण- सा युवक होकर भी मैंने कई देशों की यात्रा सरकारी आमंत्रण पर की।

🔵 जीवन की छोटी- बड़ी अनेक विपत्तियों में मुझे पूज्य गुरुदेव का सहारा मिलता रहा। इन विपत्तियों के दौर में समाधान की ओर ले जाने वाले घटनाक्रम को देखकर यह बात साफ तौर से समझ में आ जाती थी कि यह समाधान किसी मानवीय प्रयासों से नहीं, अपितु सूक्ष्म चेतना के संरक्षण से मिला है।

🔴 इस तथ्य को मैंने पहली बार तब समझा, जब मेरे यहाँ डाका पड़ा। छोटी- मोटी चोरियाँ तो हमारे गाँव में हो जाया करती थीं लेकिन डकैती जैसे बड़ी वारदात से गाँव वाले उस वक्त तक परिचित नहीं हुए थे। जमींदार का परिवार होने के कारण डकैतों ने सबसे पहले मेरे ही घर पर हमला बोला। हट्टे- कट्टे शरीर वाले लगभग ४० डकैत, वह भी हथियारों से लैस। उन्हें देखते ही सभी के प्राण सूख गए। शिकार आदि के लिए शौकिया तौर पर पिताजी के पास एक बन्दूक थी, मगर अचानक हुए इस हमले के कारण पिताजी को बन्दूक तक पहुँचने का अवसर ही नहीं मिला। आते ही डकैतों ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। घर के सभी लोग बुरी तरह घबरा गए।

🔵 डकैतों ने हम सभी को पूरी तरह से आतंकित करने के लिए घर के लोगों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। मेरे अन्दर बार- बार इनका विरोध करने की प्रेरणा जाग रही थी, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्हें छुड़ाने के लिए आगे बढ़ने का तो प्रश्र ही नहीं था। उनकी बन्दूक कभी भी आग उगल सकती थी। डकैतों के इतने बड़े गिरोह से अकेला मैं मुकाबला करूँ तो कैसे करूँ। मैंने गुरुदेव का स्मरण किया और उनसे प्रार्थना की- हे प्रभु बताएँ, इस विपत्ति में मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँ।

🔴 मुझे लगा कि पूज्य गुरुदेव एक ही वाक्य बार- बार दुहरा रहे हैं- छत पर जा, छत पर जा....। पहले तो तनी हुई बन्दूक के सामने से भागने की हिम्मत नहीं पड़ी, पर तीसरी बार यह निर्देश मिलने के बाद मैं दौड़कर छत पर पहुँच गया। मन ही मन गुरु- गुरु, गायत्री- गायत्री जपता जा रहा था। एक छत से दूसरी छत पर कूदता हुआ मैं कई मकान आगे तक जा पहुँचा और जोर- जोर से शोर मचाने लगा। एक- एक कर लोग इकट्ठे होने लगे। सबके हाथों में लाठी- भाले आदि विभिन्न प्रकार के हथियार थे। सभी शोर मचाते हुए मेरे घर की ओर दौड़ पड़े। गाँव वालों की भारी भीड़ को पास आता देखकर डकैतों के हौसले पस्त हो गए। उस समय तक वे जो धन- संपत्ति समेट सके थे, उसे लेकर भाग खड़े हुए। गाँव वालों की सामूहिक शक्ति को मिली इस भारी जीत से सभी खुश थे। धन सम्पत्ति की तो काफी क्षति हुई थी, कई लोग घायल भी हो गए थे, लेकिन जान किसी की नहीं गई। खतरों से खेलकर मैंने जिस प्रकार पूरे गाँव को इकट्ठा किया, सभी बड़े- बूढ़े लोग उसकी सराहना कर रहे थे, मेरी उपस्थित बुद्धि को सराह रहे थे। एक ने पूछा- तुम्हें डर नहीं लगा? मैंने सच- सच बता दिया कि पहले तो डर रहा था, मगर गुरु- गुरु जपते ही सारा डर गायब हो गया।

🔵 पिताजी ने कहा- तुमने तो अभी तक दीक्षा भी नहीं ली है, फिर गुरु- गुरु क्यों कर रहे थे? मैंने उन्हें बताया कि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की किताबों से मुझे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का जो गहरा ज्ञान मिला है उसी के कारण मैंने मानसिक रूप से गुरु के रूप में आचार्यश्री का वरण कर लिया है।

🔴 इस घटना के दौरान मुझे जिस प्रकार की आन्तरिक अनुभूति हुई थी उसे देखते हुए मेरे मन में यह विश्वास पूरी तरह से जम चुका था कि उन्होंने भी मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर लिया है। इसके बाद भी कई बार अलग- अलग रूपों में उनके दर्शन होते रहे- कभी स्वप्न में, कभी प्रत्यक्ष।

🌹 कृष्णमुरारी किसान शेखपुरा (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 12)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं  

🔴 उन्नति के अनेक क्षेत्र हैं, पर उनमें से अधिकांश में उठना प्रतिभा के सहारे ही होता है। धनाध्यक्षों में हेनरी फोर्ड, रॉक फेलर, अल्फ्रेड नोबुल, टाटा, बिड़ला आदि के नाम प्रख्यात हैं। इनमें से अधिकांश आरम्भिक दिनों में साधनरहित स्थिति में ही रहे हैं। पीछे उनके उठने में सूझ-बूझ ही प्रधान रूप से सहायक रही है। कठोर श्रमशीलता, एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति सघन तत्परता ही सच्चे अर्थों में सहायक सिद्ध हुई है, अन्यथा किसी को यदि अनायास ही भाग्यवश या पैतृक सम्पत्ति के रूप में कुछ मिल जाए, तो यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि उसे सुरक्षित रखा जा सकेगा या बढ़ने की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिल ही जाएगा।             

🔵 व्यक्ति की अपनी निजी विशिष्टताएँ हैं जो कठिनाइयों से उबरने, साधनों को जुटाने, मैत्री स्तर का सहयोगी बनाने में सहायता करती हैं। इन्हीं सब सद्गुणों का समुच्चय मिलकर ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व विनिर्मित करता है, जिसे प्रतिभा कहा जा सके, जिसे जहाँ भी प्रयुक्त किया जाए, वहाँ अभ्युदय का-श्रेय-सुयोग का अवसर मिल सके।    

🔴 प्रतिभा के सम्पादन में, अभिवर्धन में जिसकी भी अभिरुचि बढ़ती रही है, जिसने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्नरत रहने में अपनी विशिष्टता की सार्थकता समझा है, समझना चाहिए उसी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है। उसी को जन साधारण का स्नेह-सहयोग मिला है। संसार भर में जहाँ भी खरे स्तर की प्रगति दृष्टिगोचर हो, समझना चाहिए कि उसमें समुचित प्रतिभा का ही प्रमुख योगदान रहा है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सबका आदर सच्ची सभ्यता

🔴 राष्ट्रपति का घोड़ा शान के साथ आगे-आगे चल रहा था। पीछे कुछ साथी थे और बाद में अंगरक्षक घुडसवार। यह कोई राजकीय यात्रा न थी। मन बहलाव के लिये निकले थे सब लोग।

🔵 सडक पर बढ़ते हुए राष्ट्रपति को एक हबशी मिला हबशी ने राष्टाध्यक्ष को पहचाना उसने अपनी टोपी उतारी और झुककर प्रणाम किया फिर राष्ट्रपति ने भी अपनी टोपी उतारी और सिर झुकाकर अभिवादन का उत्तर अभिवादन से दिया। हबशी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा, खुशी-खुशी एक ओर निकलकर अपने घर चला गया।

🔴 कुछ नजदीकी मित्र और संबंधी थे, राष्ट्रपति का प्रत्युत्तर में झुककर प्रणाम करना उन्हें अच्छा न लगा। इतने बडे राष्ट्र का स्वामी एक मामूली हबशी को विनम्र अभिवादन करे, इसमे कुछ शान का घटियापन लगा बेचारे बोल कुछ न सकते थे। सबके सब पीछे-पीछे चलते और मनोविनोद करते गये।

🔵 शाम को घर लौटे अतिथियों सहित सब लोग भोजन पर बैठे तो एक मित्र ने दिन वाला प्रसंग छेड दिया और कहा कहाँ उनकी यह संभ्रात स्थिति कहाँ वह गुलाम हबशी-आपको उसे मस्तक झुकाकर अभिवादन नहीं करना चाहिए था। वह एक साधारण व्यक्ति था। इसलिये उसे विनम्र होना अनिवार्य था आपके लिये नहीं राष्ट्रपति हँसे और बोले-ठीक कहते हो भाई राष्ट्रपति तो बहुत बडा़ आदमी होता है लेकिन क्या उसे बेअदब भी होना चाहिए 'राष्ट्रपति तो मैं इसलिये हूँ कि मुझमें शासन सत्ता संभालने की योग्यता अनुभव की गई है, पर यदि अपना राष्ट्रपति पद और उस व्यक्ति का हबशी कहा जाना दोनों निकाल दें तो फिर हम दोनों एक ही सामान्य श्रेणी के मनुष्य रह जाते है प्रत्येक मनुष्य रह जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य का आदर करे। भाइयो यही तो सच्ची सभ्यता है। पद-प्रतिष्ठा और उच्च सम्मान पाने का यह तो अर्थ नहीं है कि लोग मानवीय कर्तव्यों की अवहेलना करने लगें। उसने जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ प्रणाम किया था, वैसे मैं न करता तो यह मानवता का अपमान न होता ?

🔴 मित्रों को उनकी बात के आगे कोई दलील सूझ न पडी़ तो भी अपने पक्ष की पुष्टि ले लिए उन्होनें इस बार राष्ट्रपति के परिवार वालों का समर्थन पाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कुछ हो आप जैसे विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्ति को वैसा नहीं करना चाहिए।

🔵 राष्ट्रपति की धर्मपत्नी भी वहीं उपस्थित थी। उन्होंने कहा जॉर्ज साहब ने जो कुछ भी किया। वह आदर्श ही नहीं, अनुकरणीय भी है मनुष्य-मत्रुष्य में परस्पर भेद-भाव न रहे इसके लिये यह आवश्यक है कि ऊँची या नीची परिस्थितियों में रहते हुए भी आत्म-समानता का ध्यान रखा जाए। एक दिन था जब हम लोग निर्धन थे, सामान्य श्रेणी में गिने जाते थे। आज इस स्थिति में हैं, इसका यह तो अर्थ नहीं कि हम मनुष्य नहीं रह गये। मनुष्य के नाते इन्होंने जो कुछ किया, वही सही था। एक अनपढ व्यक्ति ने झुककर प्रणाम किया यह उसकी सभ्यता थी और यदि पढ़े-लिखे होकर भी ये वैसा प्रत्युत्तर न देते तो इससे बडी असभ्यता प्रकट होती।'' यह सुनकर सब उनसे सहमत हो गये।

🔴 यह राष्ट्रपति अमेरिका के निर्माता जार्ज वाशिंगटन थे।

🔵 प्रत्येक मनुष्य अपनी अच्छी-बुरी स्थिति का अच्छा-बुरा परिणाम पाता है, इसको मापदंड मानकर सभ्यता नही छोडी जा सकती है। ऊँच-नीच का भेदभाव न रखकर हर मनुष्य को सम्मान देना ही सच्ची सभ्यता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 63, 64

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 28)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 विचार का चरित्र से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जिसके विचार जिस स्तर के होंगे, उसका चरित्र भी उसी कोटि का होगा। जिसके विचार क्रोध प्रधान होंगे वह चरित्र से भी लड़ाकू और झगड़ालू होगा, जिसके विचार कामुक और स्त्रैण होंगे, उसका चरित्र वासनाओं और विषय-भोग की जीती जागती तस्वीर ही मिलेगी। विचारों के अनुरूप ही चरित्र का निर्माण होता है। यह प्रकृति का अटल नियम है। चरित्र मनुष्य की सबसे मूल्यवान् सम्पत्ति है। उससे ही सम्मान, प्रतिष्ठा, विश्वास और श्रद्धा की प्राप्ति होती है। वही मानसिक और शारीरिक शक्ति का मूल आधार है। चरित्र की उच्चता ही उच्च जीवन का मार्ग निर्धारित करती हैं और उस पर चल सकने की क्षमता दिया करती है।

🔵 निम्नाचरण के व्यक्ति समाज में नीची दृष्टि से ही देखे जाते हैं। उनकी गतिविधि अधिकतर समाज विरोधी ही रहती है। अनुशासन और मर्यादा जोकि वैयक्तिक से लेकर राष्ट्रीय जीवन की दृढ़ता की आधार-शिला है, निम्नाचरण व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं रखती है। आचरणहीन व्यक्ति और एक साधारण पशु के जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। जिसने अपनी यह बहुमूल्य सम्पत्ति खो दी उसने मानो सब कुछ खो दिया। सब कुछ पा लेने पर भी चरित्र का अभाव मनुष्य को आजीवन दरिद्री ही बनाये रखता है।

🔴 मनुष्यों से भरी इस दुनियां में अधिकांश संख्या ऐसों की ही है, जिन्हें एक तरह से अर्ध मनुष्य ही कहा जा सकता है। वे कुछ ही प्रवृत्तियों और कार्यों में पशुओं से भिन्न होते हैं, अन्यथा ये एक प्रकार से मानव-पशु ही होते हैं। इसके विपरीत कुछ मनुष्य बड़े ही सभ्य, शिष्ट और शालीन होते हैं। उनकी दुनियां सुन्दर और कलाप्रिय होती है। इसके आगे भी एक श्रेणी चली गई है, जिनको महापुरुष, ऋषि-मुनि और देवता कह सकते हैं।

🔵 समान हाथ-पैर और मुंह, नाक, कान के होते हुए भी और एक ही वातावरण में रहते मनुष्यों में यह अन्तर क्यों दिखलाई देता है? इसका आधारभूत कारण विचार ही माने गये हैं। जिस मनुष्य के विचार जिस अनुपात में जितना अधिक विकसित होने लग जाते हैं उसका स्तर पशुता से श्रेष्ठता की ओर उठता चला जाता है। असुरत्व, पशुत्व, ऋषित्व अथवा देवत्व और कुछ नहीं, विचारों के ही स्तरों के नाम हैं। यह विचार-शक्ति ही है, जो मनुष्य को देवता अथवा राक्षस बना सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 6)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 इस भ्रांत धारणा की एक हानि यह है कि मनुष्य स्वेच्छाचारी व अनाचारी बनता है और अपनी राह पर तीर की नोंक वाले काँटे बोने में लगा रहता है। न चाहते हुए भी अंधकारमय परिस्थितियों को अपने समीप बुलाने के लिये निमंत्रण देने में बाध्य रहा है। अभावग्रस्तता, विषमता और विपन्नताएँ प्राय: इसीलिए दीख पड़ती हैं। यदि सोच ठीक रही होती और उसके प्रकाश में सीधे मार्ग पर चल सकना संभव हुआ होता तो यहाँ सब लोग मिल-जुलकर रहते, हँसती-हँसाती जिंदगी जीते, एक-दूसरे को ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में सहयोग करते।

🔴 तब सीमित साधनों में भी लोग संतुष्ट रहते और अभीष्ट वातावरण बना हुआ होता-हर किसी को अदृश्य मार्ग का दृश्यमान अरुणोदय अनुभव करने का अवसर मिल रहा होता पर उस दुर्बुद्धि को क्या कहा जाए जिसने मनुष्य को मर्यादाओं, प्रतिबंधों और वर्जनाओं को तोड़ने के लिये उद्धृत स्वभाव वाला वनमानुष बनाकर रख दिया है।         

🔵 आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य को बंदर बनाने वाली दो भूलें एक साथ जन्मी हैं और उसने एक ही चक्कर में पूरी तरह चोट करने के बाद आगे बढ़ने का सिलसिला बनाया है। दूसरी भूल है अपने स्वरूप, कर्तव्य और उद्देश्य को भूलने की तथा अपने अति निकट रहने वाले उदार स्वभाव वाले परम सज्जन भगवान् से परिचय बनाने तक की इच्छा न करने की अन्यमनस्कता-अवमानना अपने से बड़ी शक्ति के साथ संबंध जोड़ने की महत्ता को छोटे बच्चे तक समझते हैं।

🔴 वे उसी की ओर खिसकते हैं, जिसके पास खिलौने, चाकलेट और अच्छे उपहारों का सामान होता है; जो प्यार से बुलाते और दुलारपूर्वक गोदी में चढ़ाते हैं। जब इतनी समझ छोटे बालकों तक में पाई जाती है तो आश्चर्य होता है कि मनुष्य भगवान् का घनिष्ठ बनने या उसे अपना घनिष्ठ बनाने में इतनी अधिक उपेक्षा क्यों बरतता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 10)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर
🔴   निर्मल जीवन जीने का अर्थ अपने शारीरिक क्रियाकलापों को अच्छा बनाना और अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करना है।  मन में विचारणाएँ ऊँचे किस्म की हों और शरीर हमारा काम करें, सिर्फ ऊँचे किस्म के काम करे। इन दो गतिविधियों को आप योगाभ्यास कहिये, साधना कहिये, आध्यात्मिक प्रयोजन कहिये। जो आदमी इस काम को कर लेता है, वह स्वयं सब प्रकार से शक्तिशाली हो जाता है और जो शक्तिशाली हो गया है, उस शक्तिशाली मनुष्य के लिए सम्भव है कि अपनी जो क्षमताएँ हैं, उन्हें केवल अपनी उन्नति के लिए सीमाबद्ध न रखें मनुष्यके अन्तरंग की उदारता जब तक विकसित न हुई, दया जब तक विकसित न हुई, करुणा जब तक विकसित न हुई, आत्मीयता विकसित न हुई, और अपने आप को विशाल भगवान् के रूप में परिणत कर देने की इच्छा उत्पन्न न हुई, तब तक आदमी केवल अपने आपको निर्मल बना करके भी अपूर्ण ही बना रहेगा।

🔴 मनुष्य को अपने आप को निर्मल और उदात्त बनाना चाहिए। यही तो आध्यात्मिकता की राह पर चलने वाले दो कदम हैं। कोई भी आदमी आध्यात्मिकता की राह पर चलना चाहता है, तो उसको दोनों ही कदम आगे बढ़ाना है। कोई मंजिल आपको पूरी करनी है, तो लेफ्ट- राइट, लेफ्ट- राइट चलते हुए ही तो मंजिल पार करेंगे और कोई तरीका दुनिया में नहीं है।   

🔵 अब मैं चाहता हूँ कि लोगों के दिमाग में से वहम निकाल दिये जाने चाहिए। लोगों के दिमाग पर न जाने किन लोगों ने वहम पैदा कर दिया है कि भगवान् का नाम लेने से और उसकी माला जपने से और बार- बार पुकारने से और मंदिर के दर्शन करने से, कथा सुनने से और पंचामृत, पंजीरी खा जाने से, स्तोत्र पाठ करने से मनुष्य की आत्मा को शान्ति मिल सकती है और वह अपनी आत्मिक प्रगति कर सकता है।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2017


👉 आसान होता गया शान्तिकुञ्ज का सफर

🔴 जब मैं पहली बार शान्तिकुञ्ज जा रहा था तो पत्नी बहुत रोई थी। उसे किसी ने कह दिया था वहाँ जाने वाले लौटते नहीं, वहीं के हो जाते हैं। उसे संदेह था- कहीं मैं संन्यासी न बन जाऊँ। मैंने समझाया- गुरुदेव स्वयं गृहस्थ हैं। वे हमेशा कहा करते हैं, गृहस्थ एक तपोवन है। सबसे बड़ी तपस्या वहीं होती है, फिर मुझे संन्यास की जरूरत ही क्या है? मैं तो केवल उनके दर्शन करने जा रहा हूँ। इस प्रकार की ढेर सारी बातें करके उसे बड़ी मुश्किल से मना पाया था।

🔵 मैं उन दिनों गायत्री परिवार से पहले- पहल जुड़ा था। गुरुदेव का सत्साहित्य पढ़ता रहा था। सन् १९८६ में जब गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना चल रही थी, उन्हीं दिनों दीवार लेखन तथा अखण्ड ज्योति वितरण का कार्य मुझे मिला। इसी वर्ष ३ फरवरी को गर्दनीबाग, पटना के नौ कुण्डीय यज्ञ में मैंने दीक्षा ली थी। उसी समय श्री चन्द्रशेखर प्रसाद जी (अब स्वर्गवासी) का सान्निध्य प्राप्त हुआ। ये गुरुदेव के समर्पित शिष्यों में से थे। इनके व्यक्तित्व से मैं काफी प्रभावित था।

🔴 एक दिन अचानक प्रसाद जी ने मुझसे कहा- आप हरिद्वार चलें। उन्हीं से मालूम हुआ- गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना के समापन पर सभी नैष्ठिक शिष्यों को पास बुलाया है। उनके पास पत्र आया था, वे चाहते थे मैं भी साथ चलूँ। मैं तो पहले ही अखण्ड ज्योति और युग निर्माण साहित्य से इतना प्रभावित था कि इनके सूत्रधार इस युगपुरुष के दर्शनों के लिए आतुर- सा था। मैं सानन्द चलने को तैयार हो गया।

🔵 होली के बाद पटना से रवाना होना था। होली के अगले दिन घर से चला, खजूरिया चौक पहुँचकर देखा कोई यात्री वाहन नहीं चल रहा है। एक ट्रक वाले से अनुरोध किया तो उसने मुजफ्फरपुर तक पहुँचा देना स्वीकार किया। रास्ते में ड्राइवर को गायत्री मंत्र के विषय में बताया तो उसने उत्साहपूर्वक मुझसे स्टीकर लेकर गाड़ी में चिपका लिया, जबकि वह ड्राइवर मुस्लिम था।

🔴 मुजफ्फरपुर में जहाँ ट्रक से उतरा वहीं तत्काल कार वाले एक साहब ने लिफ्ट दे दी। इस तरह बिना किसी अड़चन के मैं पटना पहुँच गया। अगले दिन सुबह हम चार लोग पटना से रवाना हुए। यहाँ भी अकल्पनीय रूप से हम सभी को खाली बर्थ मिल गई, जबकि हमारा रिजर्वेशन नहीं था। मन आनंद और उमंग से भरा था। विपरीत परिस्थिति रहते हुए भी मार्ग में सर्वत्र अनुकूलता बनती चली गई। ऐसा लग रहा था जैसे गुरुदेव ने मुझे भी बुलाया हो, तभी तो रास्ते के सारे अवरोध सारी प्रतिकूलताएँ अपने आप ही दूर होती जा रही हैं।       

🔵 प्रातःकाल हरिद्वार पहुँचा, और फिर मेरे सामने था बहुप्रतीक्षित अपना वह गुरुद्वारा- गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज! कितनी पवित्र शांति! गंगा की गोद में बसा यह तीर्थ- दर्शन कर निहाल हो गया। गंगा स्नान के बाद भोजन प्रसाद लिया। अब, बस इस बात की प्रतीक्षा थी कि कब गुरुदेव के दर्शन हों।

🔴 दोपहर साढ़े बारह बजे गोष्ठी थी। यात्रा से सभी थके हुए थे, वे सोने की तैयारी कर रहे थे। मैं सोना नहीं चाहता था। भय था कहीं गहरी नींद सो जाऊँ, तो अवसर चूक सकता है। सोचा, गोष्ठी के बाद सो लूँगा। लेकिन इतनी विकल प्रतीक्षा के बावजूद रात्रि की थकान ने असर दिखाया और कब सो गया, इसका पता ही नहीं चला। अचानक ऐसा लगा कि किसी ने झकझोरकर जगाया हो- गोष्ठी में नहीं जाना क्या? मेरी नींद खुल गई, देखा आसपास कोई नहीं है, जल्दी- जल्दी हाथ- मुँह धोकर गोष्ठी में पहुँचा।

🔵 गोष्ठी के पहले घोषणा की गई- जिन्हें गुरुदेव का पत्र मिला है, वे अपना नाम दें- गुरुदेव ने माँगा है। मैं निराश हो गया- मुझे तो पत्र नहीं मिला था, द्वार तक पहुँचकर भी दर्शन से वंचित रह गया- सोचकर अंतर तक व्यथित हो उठा, आँखों में आँसू आ गए। परन्तु अगले ही क्षण फिर घोषणा हुई- यदि कोई व्यक्ति स्वयं को क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम समझते हैं, तो वे भी अपना नाम दें। उम्मीद जगी, मैंने अपना नाम दे दिया और इस तरह गुरुदेव के पास जाने की व्यवस्था बन गई।

🔴 गुरुदेव के सम्मुख पहुँचा तो पुरुषार्थ की उस प्रतिमा को देख कर ऐसा लगा कि ये तो स्वयं महाकाल हैं। दर्शन पाकर धन्य हो गया। उन्होंने कहा था- बेटा, मैं व्यक्ति नहीं, एक शक्ति हूँ। यह जो हाड़- मांस का पुतला देख रहे हो, यह मेरा स्थूल रूप है।

🔵 उनका निर्देश था- जीवन में स्वाध्याय और सत्संग कभी मत छोड़ना। दुनिया पेट और प्रजनन में मर खप जाती है। तुम उससे अलग हटकर रहना। गुरुदेव की प्रेरणा मुझे आज भी अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का संबल देती है। 

🌹 मनोजित दासगुप्ता टाटा- जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/aasan

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 11)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं   

🔴 नेपोलियन भयंकर युद्ध में फँसा था। साथ में एक साथी था। सामने से गोली चल रही थी। घबराने लगा तो नेपोलियन ने कहा-डरो मत, वह गोली अभी किसी फैक्टरी में ढली नहीं है, जो मेरा सीना चीरे।’ वह उसी संकट में घिरा होने पर भी दनदनाता चला गया और एक ही हुंकार में समूची शत्रुसेना को अपना सहायक एवं अनुयायी बना लिया। प्रतिभा ऐसी ही होती है।            

🔵 अमेरिका का अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन, इटली के गैरीबाल्डी आदि की गाथाएँ भी ऐसी हैं कि वे गई-गुजरी परिस्थितियों का सामना करते हुए जनमानस पर छाए और राष्ट्रपति पद तक पहुँचने में सफल हुए। लेनिन के बारे में जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि साम्यवाद के सूत्रधार के रूप में उसने क्या से क्या करके दिखा दिया।     

🔴 विनोबा का भूदान आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रान्ति सहज ही भुलाई नहीं जा सकती। भामाशाह की उदारता देश के कितने काम आई। बाबा साहब आमटे द्वारा की गई पिछड़ों की सेवा एक जीवन्त आदर्श के रूप में अभी भी विद्यमान है। विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को खड़ा करने वाले वेडेन पावेल की सृजनात्मक प्रतिभा को किस प्रकार कोई विस्मृत कर सकता है। सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द सेना अविस्मरणीय है।     

🔵 भारतीय साहित्यकारों के उत्थान की गाथाओं में कुछ के संस्मरण बड़े प्रेरणाप्रद हैं। पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी, भिक्षान्न से पले बालकृष्ण शर्मा ‘‘नवीन’’ भैंस चराने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी आदि घोर विपन्नताओं से ऊँचे उठकर मूर्धन्य साहित्यकार बने थे। शहर के कूड़ों में से चिथड़े बटोरकर गुजारा करने वाले गोर्की विश्वविख्यात साहित्यकार हो चुके हैं। यह सब प्रतिभा का ही चमत्कार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 एकाग्रचित्त काम-बहुत बड़े परिणाम

🔴 इंग्लैंड के इतिहास में 'एल्फ्रेड' का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। एल्फ्रेड ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक साहसिक कार्य किए जिससे वह महान् एल्फ्रेड (एल्फ्रेड द ग्रेट) के नाम से जाना जाता है।

🔵 प्रारंभ में एल्फ्रेड भी एक साधारण राजा की तरह जो बाप-दादों से होता आया है वह चाहे अच्छा या हो बुरा करने की अंधविश्वासी प्रवत्ति के कारण वह सामान्य व्यक्तियों का सा खाओ पियो और वैभव विलास में डूबे रहो ? जीवन जीने लगा। समुद्र में पडा़ तिनका जिस तरह लहरों के साथ उठता-गिरता है, वैसे ही अस्त व्यस्त जीवन एल्फ्रेड का भी था। एक दिन ऐसा भी आया, जब उसकी यह सुस्ती शत्रुओं के लिये लाभदायक सिद्ध हुई। एल्फ्रेड का राज्य औरों ने हडप लिया और उसे गद्दी से उतारकर मार गिराया।

🔴 इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे एल्फ्रेड को एककिसान के घर नौकरी करनी पडी उसे बर्तन माँजने, पानी भरने और चौके का काम सौंपा गया, उसके काम की देख रेख किसान की स्त्री करती थी। एल्फ्रेड छिपे वेष में जिंदगी काटने लगा।

🔵 एक दिन किसान की स्त्री को किसी आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा। बटलोई पर दाल चढी़ थी, सो उसने एल्फ्रेड से कहा कि जब तक मैं वापिस नही आ जाती तुम बटलोई की दाल का ध्याना रखना यह कहकर स्त्री चली गई।

🔴 वहाँ से काम पूरा कर लौटी तो स्त्री ने देखा, एल्फ्रेड एक ओर बैठा कुछ सोच रहा है ओर बटलोई की सारी दाल जल चुकी है। स्त्री ने कहा-मूर्ख नवयुवक। लगता है तुझ पर एल्फ्रेड की छाया पड़ गई है, जो काम सौंपा जाता है उसे कभी एकाग्र चित्त होकर पूरा नहीं करता। तू भी उसकी तरह मारा-मारा घूमेगा।

🔵 स्त्री बेचारी को क्या पता था कि जिससे वह बात कर रही है वह एल्फ्रेड ही है, पर एल्फ्रेड को अपनी भूल का पता चल गया। उसने बात गाँठ बाँध ली, आज से जो कुछ भी करुँगा दत्तचित्त होकर करुंगा। कल्पना के किले बनाते रहने से कोई लाभ नहीं।

🔴 एल्फ्रेड एक बार फिर सहयोगियों से मिला। धन संग्रह किया, सेना एकत्र की और फिर दुश्मनों पर चढा़ई करके लंदन को फिर से जीत लिया। इस बार उसने सारे इंग्लैण्ड को एक सूत्र में बाँधकर नये उत्साह, सूझ-बूझ और एकाग्रता से काम किया, जिससे देश की उन्नति हुई।

🔵 एक दिन एल्फ्रेड़ फिर उस किसान स्त्री के घर गया और उसे बहुत-सा धन देकर कहा-माँ तूने उस दिन शिक्षा न दी होती तो मैं इस स्थिति पर नही पहुँचता। छोटे की भी अच्छी बात मानने के एल्फ्रेड के इस गुण की प्रशंसा की जाती है। स्त्री तो आश्चर्य में डूब गई कि मैंने उस दिन इतने महान आदमी को अनजान में यह शब्द कह दिये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 62, 63

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...