मंगलवार, 4 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 4

🌹 Make Your Life an Offering

🔵 To make your life an offering, make sure that you comply with the following:

•    See every person as worthy of kindness.
•    Utilize your time with honesty and discipline.
•    Work for the welfare of others.
•    Limit your speech to worthy causes.
•    Accept only that which you have honestly earned.
•    Constantly keep God in your thoughts.
•    Stay focused on your duties.
•    Maintain your mental equilibrium.

🔴 Making your life an offering is the sign of true intelligence and farsight. Your life cannot truly be considered an offering until you give up your ego.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 आज का सद्चिंतन 4 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 July 2017


सोमवार, 3 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 3

🌹 Take Refuge in Your Conscience

🔵 If you desire peace, capabilities, and energy, then take refuge in your conscience. Even if you deceive the entire world, you will never be able to deceive your conscience. If you consult it on every occasion, you will never lose your ability for moral discretion, and no matter the opposition, you will be able to succeed.

🔴 When you begin to think of yourself as the most virtuous and exemplary individual, your spiritual decay begins and you lose contact with your conscience.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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शनिवार, 1 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 1

🌹 Recognize the Need for Spiritual Contemplation

🔵 Performing social service without a spiritual outlook makes people obsessed with own virtue. They consider themselves great They expect obedience and praise. Because of this, their increased arrogance makes them enemies of many. They become not philanthropists, but destroyers. Without a spiritual outlook, they can never develop humility, nor do they have the ability to change themselves. Such people go on committing endless mistakes and make their own lives unbearable.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 1 July 2017


👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

🔵 बहुत से लोग तो धर्म को केवल पुस्तकों में सुरक्षित रखने की वस्तु और वेद गीता आदि धर्म ग्रन्थों को अलमारियों में बन्द रहने की चीज समझते हैं। “इनका ख्याल है कि धर्म व्यवहार और आचरण में लाने की वस्तु नहीं-असली जीवन में उसका कोई सरोकार (सम्बन्ध) नहीं”। कोई-कोई तो ऐसी अनर्गल (बे सिर पैर की) बातें कहते हुए सुने जाते हैं कि “मैंने सब कुछ किया-चोरी की-जारी की, ठगी की-मक्कारी की, लेकिन धर्म नहीं खोया।” उस भोले भाले मानस से पूछो कि आखिर तुमने ‘धर्म खोना’ किस बात में समझ रखा है? यह तुरन्त उत्तर देगा कि “मैंने किसी के हाथ का छुआ नहीं खाया, दो-दो सौ मील का सफर किया, परन्तु कभी रेल में भोजन नहीं किया, चौके से बाहर पूड़ी, पराँठे की बात दूर, चने भी नहीं चाबे।

🔴 धर्म का वास्तविक रूप वह है जिसके धारण करने से किसी का अस्तित्व बना रहे, जैसे अग्नि का धर्म प्रकाश और गरमी है, अन्यथा राख का ढेर। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म वह है जिससे उसमें मनुष्यत्व बना रहे-इन्सानियत कायम रहे, यदि किसी कार्य से इन्सान में इन्सानियत की जगह वहशीपन आ जावे और उसके कारण वह दूसरों को मारने लगे-उनसे लड़ने लगे, तो यह उसका धर्म नहीं। जिसके द्वारा मनुष्य में-इन्सान में इन्स अर्थात् प्रेम का भाव उत्पन्न हो एक दूसरे की सेवा और सहायता का ख्याल पैदा हो वह ही धर्म है। शास्त्रों में लिखा है “यतोऽभ्युदय निश्रेयस सिद्धिःस धर्म” जिसके द्वारा मनुष्य ऐहिक उन्नति करता हुआ साँसारिक ऐश्वर्य भोगता हुआ आवागमन के चक्र से छूटकर मुक्ति लाभ करे- मोक्षधाम (नजात) प्राप्त करे, वह ही मनुष्य का धर्म है।

🔵 दूसरे शब्दों में धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों सुखों का साधन है। जो भी पुस्तक ऐसे धर्म का प्रतिपादन करे वह ‘धर्म-ग्रन्थ’ कहलाने की अधिकारिणी है चाहे वह वेद हो, बाईबल हो, कुरान, तौरेत हो या जिन्दावस्ता। जो पुस्तक एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का शत्रु बनावे अथवा एक मनुष्य समुदाय को दूसरे मनुष्य समुदाय के नाश के लिए उद्यत करे, वह पुस्तक कदापि ‘धर्म-ग्रन्थ, ईश्वर की ओर से ‘इलहामी’ कहलाने के योग्य नहीं और न ऐसा धर्म ही ईश्वर की और से हो सकता है, ईश्वरीय धर्म तो वह है जो सब की भलाई चाहे-जिससे विश्वभर का हित साधन हो।

🔴 महात्मा गाँधी के कथनानुसार- “जिस धर्म का हमारे दैनिक आचार व्यवहार पर कुछ असर न पड़े वह एक हवाई ख्याल के सिवा और कुछ नहीं है। मैं तो धर्म को ऐसी ही आवश्यक वस्तु समझता हूँ जैसे वायु, जल और अन्न। जैसी चाह आजकल बहुत से नवयुवकों को सिनेमा और अखबारों की है कि बिना अखबार पढ़े, बिना सिनेमा देखे, चैन ही नहीं पड़ता, ऐसी ही भूख धर्म की लगनी चाहिये। प्रतिदिन कोई न कोई परोपकार कार्य, दूसरों की भलाई का काम, अवश्य हो जाना चाहिए और न होने पर सिगरेट की तलब और सिनेमा की चाह की तरह, दिल में एक प्रकार की तड़प उठनी चाहिए कि अफसोस! आज का दिन व्यर्थ गया।”

🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.12

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 1)

🔴 समाज, परिवार के मूलाधार दाम्पत्य-जीवन की गाड़ी स्त्री और पुरुष दो पहियों पर चलती है। दोनों में से प्रत्येक कि स्थिति का प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता है। नारी का जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुष की तरह ही अपना एक विशिष्ट स्थान है। इसके प्रत्येक कार्यकलापों का प्रभाव भी मनुष्य के समस्त जीवन पर पड़ता है। योग्य सुशिक्षित स्त्रियाँ जिस परिवार, जिस समाज में होंगी उसकी उन्नति विकास एवं प्रगति भी निश्चित होगी। इसी तरह स्त्रियों की गिरी हुई अवस्था, पिछड़ापन, अज्ञान, मूर्खता, विकृति भी समाज के पतन और अधोगति का कारण बन जायेंगी। शीलवान, सच्चरित्र योग्य, सुशिक्षित, सती साध्वी नारियाँ पुरुष की प्रेरणा स्रोत बनकर समाज को पुरोगामी बनाती हैं तो फूहड़, मूर्ख, कटु-भाषिणी, कलह कारिणी, कामचोर, आलसी, फिजूल खर्च, फैशनपरस्त नारी पुरुष और समाज से जीवन-पथ का अवरोध बनकर, उसकी दुष्प्रवृत्तियों को भड़काकर, उसे पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

🔵 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहणी है, नियन्त्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है तो नारी पुरुष की प्रगति विकास की प्रेरणास्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम-स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मानव समाज के जीवन में नारी का बहुत बड़ा स्थान है। और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान पतन निर्भर करते हैं। दाम्पत्य जीवन की लौकिक सफलताओं में घर की व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई जायँ, साधन सामग्रियों को बड़ी मात्रा में जुटाया जाय किन्तु यदि उसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती है तो बड़ी-से-बड़ी योजनायें भी असफल हो जाएँगी। इसी तर घर की व्यवस्था पर ही परिवार की समृद्धि और दरिद्रता निर्भर करती है और इस गृहव्यवस्था का उत्तरदायित्व नारी पर ही है। इसीलिए उसे गृहणी कहा गया है। गृहणी की कार्यकुशलता, योग्यता आदि पर ही घर की उन्नति प्रगति, सुख, दुख, हानि, लाभ, आदि निर्भर करते हैं।

🔴 खाने-पीने के समान खुले पड़े हों, बिखरते हों, चूहे, बिल्ली, कुत्ते उन्हें नष्ट करते हों, बर्तन अस्त-व्यस्त पड़े हों, कपड़े-लत्ते इधर उधर बिखरे पड़े हों, बच्चे घर की चीजों के खिलौने बनाकर खेलते हों नौकर या पड़ोसी सामान चुराकर ले जाते हों, ढूँढ़ने पर कोई चीज न मिले और उसे खरीदना पड़े, इन स्थितियों में कोई व्यक्ति कितना ही कमाता हो, कितनी ही सम्पन्नता क्यों न हो किन्तु थोड़े ही दिनों में वहाँ दरिद्रता का साम्राज्य हो जायगा। मनुष्य तो केवल कमा सकता है। उसका कार्यक्षेत्र घर के बाहर है। पुरुष की कमाई का सदुपयोग कर घर की ठीक-ठीक व्यवस्था करना गृहणी के ऊपर ही है। सफल गृहणी समस्त सुख दुःख, अभाव-अभियोग, उतार-चढ़ाव में भी कुशलता से घर की नाव को चलाती रहती है जबकि कि अयोग्य स्त्री सम्पन्नता में भी दरिद्रता का साम्राज्य ला देती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 22)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि और शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, उनमें बुद्धि शक्ति ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता का चमत्कार ही सन्निहित है। इतनी बड़ी शक्ति देकर मनुष्य को परमात्मा ने कुछ उत्तरदायित्वों में भी बाँधा है, ताकि दी हुई शक्ति का दुरुपयोग न हो। उत्तरदायित्वों का नाम है-कर्तव्य धर्म।

🔵 रेलगाड़ी इंजन में विशेष शक्ति होती है, यह अपने मार्ग से भटक पड़े तो अनर्थ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जमीन पर दो पटरी बिछा दी गई हैं और इंजन को उसी पर चलते रहने की व्यवस्था बनाई गई है। बिजली में बहुत शक्ति रहती है। वह शक्ति इधर-उधर न बिखरे पड़े इसलिए उसका नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रबंध किया गया है कि बिजली तार में ही होकर प्रवाहित हो और वह तार भी ऊपर से ढका रहे। हर शक्तिशाली तत्त्व पर नियंत्रण आवश्यक होता है। नियंत्रित न रहने देने पर जो शक्तिशाली वस्तुएँ अनर्थ पैदा कर सकती हैं। मनुष्य को यदि परमात्मा ने नियंत्रित न रखा होता, उस पर धर्म कर्तव्यों का उत्तरदायित्व न रखा होता तो निश्चय ही मानव प्राणी इस सृष्टि का सबसे भयंकर सबसे अनर्थकारी प्राणी सिद्ध हुआ होता।

🔴  अशक्त या स्वल्प शक्ति वाले पदार्थ या जीव नियंत्रित रह सकते हैं क्योंकि उनके द्वारा बहुत थोड़ी हानि की संभावना रहती है। कीड़े-मकोड़े मक्खी-मच्छर कुत्ता-बिल्ली प्रभृति छोटे जीवों पर कोई बंधन नहीं रहते, पर बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जानवरों पर नाक की रस्सी (नाथ) लगाम, नकेल अंकुश आदि के द्वारा नियंत्रण रखा जाता है। यदि ऐसा प्रतिबंध न हो तो वह शक्तिशाली जानवर लाभकारी सिद्ध होने की अपेक्षा हानि ही उत्पन्न करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.34

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/mary

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 121)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ
🔵 ३. गायत्री तपोभूमि मथुरा के भव्य भवन का निर्माण शुभारम्भ अपनी पैतृक सम्पत्ति बेचकर किया। पीछे लोगों की अयाचित सहायता से उसका ‘‘धर्मतंत्र से लोक शिक्षण’’ का उत्तरदायित्व संभालने वाले केंद्रों के रूप में विशालकाय ढाँचा खड़ा हुआ।

🔴 ४. अखण्ड-ज्योति का सन् १९३७ से अनवरत प्रकाशन। बिना विज्ञापन और चंदा माँगे, लागत मूल्य पर निकलने वाली, गाँधी की हरिजन पत्रिका जबकि घाटे के कारण बंद करनी पड़ी थी, तब अखण्ड-ज्योति अनेकों मुसीबतों का सामना करती हुई निकलती रही और अभी एक लाख पचास हजार की संख्या में छपती है, एक अंक को कई पढ़ते हैं इस दृष्टि से पाठक दस लाख से कम नहीं है।

🔵 ५. साहित्य सृजन। आर्षग्रंथों का अनुवाद तथा व्यावहारिक जीवन में अध्यात्म सिद्धांतों का सफल समावेश करने वाली नितांत सस्ती, किंतु अत्यंत उच्चस्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन। इनका अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद। यह लेखन इतना है कि जिसे एक मनुष्य के शरीर भार के समान तोलने पर भी अधिक ही होगा। इसे करोड़ों ने पढ़ा है और नया प्रकाश पाया है।
  
🔴 ६. गायत्री परिवार का गठन-उसके द्वारा लोकमानस के परिष्कार के लिए प्रज्ञा अभियान का और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए युग निर्माण योजना का कार्यान्वयन। दोनों के अंतर्गत लाखों जागृत आत्माओं का एकीकरण। सभी का अपने-अपने ढंग से नव सृजन भाव-भरा योगदान।
  
🔵 ७. युग शिल्पी प्रज्ञा पुत्रों के लिए आत्मनिर्माण-लोक निर्माण की समग्र पाठ्य-विधि का निर्धारण और सत्र योजना के अंतर्गत नियमित शिक्षण, दस-दस दिन के गायत्री साधना सत्रों की ऐसी व्यवस्था जिसमें साधकों के लिए निवास भोजन आदि का भी प्रबन्ध है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari.2

शुक्रवार, 30 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 21)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 इसलिए अपनी सद्गति एवं समाज की प्रगति का मार्ग समझकर, व्यक्तिगत सुख- स्वार्थ की अंधी दौड़ बंद करके व्यापक हितों की साधना प्रारंभ करनी चाहिए। अपनी श्रेयानुभूति को क्रमशः सुखों, स्वार्थों से हटाकर व्यापक हितों की ओर मोड़ना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
  
🔵 भगवान ने मनुष्य को इतनी सारी सुविधाएँ, विशेषताएँ, इसलिए नहीं दी हैं कि वह उनसे स्वयं ही मौज- मजा करे और अपनी काम- वासनाओं की आग को भड़काने और उसे बुझाने के गोरखधंधे में लगा रहे। यदि मौज- मजा करने के लिए ही ईश्वर ने मनुष्य को इतनी सुविधाएँ दी होतीं और अन्य प्राणियों को अकारण इससे वंचित रखा होता तो निश्चय ही वह पक्षपाती ठहरता। अन्य जीवों के साथ अनुदारता और मनुष्य के साथ उदारता बरतने का अन्याय भला वह परमात्मा क्यों करेगा, जो निष्पक्ष, जगत पिता, समदर्शी और न्यायकारी के नाम से प्रसिद्ध है।
 
🔴 युग निर्माण सत्संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि मनुष्य का जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है। शास्त्रों में अपनी कमाई को आप ही खा जाने वाले को चोर माना गया है।

🔵 जो मिला है उसे बाँटकर खाना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह उसका अपना निज का उपार्जन नहीं, वरन् सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम एवं त्याग का फल है। यदि ऐसा न हुआ होता तो मनुष्य भी एक दुर्बल वन्य पशु की तरह रीछ- वानरों की तरह अपने दिन काट रहा होता। इस त्याग और उपकार की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही धर्म, संस्कृति एवं मानवता है। उसी के आधार पर, प्रगति पथ पर इतना आगे बढ़ जाना संभव हुआ।

🔴 यदि इस पुण्य प्रक्रिया को तोड़ दिया जाए, मनुष्य केवल अपने मतलब की बात सोचने और उसी में लग रहने की नीति अपनाने लगे, तो निश्चय ही मानवीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी और ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन के फलस्वरूप जो विकृति उत्पन्न होगी, उससे समस्त विश्व को भारी त्रास सहन करना पड़ेगा। परमार्थ की आधारशिला के रूप में जो परमार्थ मानव जाति की अंतरात्मा बना चला आ रहा है, उसे नष्ट- भ्रष्ट कर डालना, स्वार्थी बनकर जीना निश्चय ही सबसे बड़ी मूर्खता है। इस मूर्खता को अपनाकर हम सर्वतोमुखी आपत्तियों को ही निमंत्रण देते हैं और उलझनों के दलदल में आज की तरह ही दिन- दिन गहरे धँसते चले जाते हैं।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.32

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/apane.2

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 9)

🔴 आप जागरूक रहिए। आप उदार तो रहें; लेकिन भलमनसाहत को उस सीमा तक मत ले जाएँ, कि आपकी जागरूकता ही चली जाए। दुनिया में बहुत अच्छे आदमी हैं; लेकिन बुरे आदमी भी कम नहीं हैं। बुरे आदमियों के प्रति आपको जागरूक रहना चाहिए, कोई आप पर हमला न कर दे, कोई आपकी भलमनसाहत का अनुचित फायदा न उठा ले—इस दृष्टि से आपके जागरूक रहने की भी जरूरत है और उदार रहने के लिए? दूसरों की सेवा करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? दूसरों की सहायता करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? लेकिन मैं यह कहता हूँ कि आप ऐसा मत कीजिए कि आपकी सद्भावना और उदारता का लोग अनुचित लाभ उठा जाएँ और आपको उल्लू बनाते फिरें। ऐसा मत कीजिए। जागरूक भी रहिए और उदार भी बनिए। दोनों का समन्वय कीजिए।

🔵 आप सज्जन भी रहिए और शूरवीर भी रहिए। नहीं, हम तो सज्जन रहेंगे। सज्जन रहेंगे, तो क्या कायर बनेंगे?  सज्जन का मतलब क्या यह होता है कि कोई आदमी आपकी बहिन-बेटी से छेड़खानी करे और आपके प्रति बुरा सलूक करे तब भी आप सब कुछ देखते-सहते रहें? यही सोचते रहेंगे कि हमें क्या करना है, भगवान की मर्जी है, ऐसा ही हमारे भाग्य में लिखा है, तब आप ऐसा ही करेंगे। नहीं, सज्जन तो बनिए; लेकिन उसके साथ में अपनी शूरवीरता को गँवाइए मत। सज्जन इसीलिए हारते रहे हैं कि उन्होंने शूरवीरता गँवा दी। सज्जन हो गये, तो कायर हो गये। सज्जनता का अर्थ कायरता नहीं होता। सज्जनता के साथ में शूरता की भी प्रमुखता रहनी चाहिए। आप समग्र जीवन जिएँ। सज्जन भी बनें और शूरवीर भी बनें, उदार भी बनें और जागरूक भी बनें, नम्र भी बनें और सम्मान भी दें। इसी तरीके से जीवन में दोनों को मिला करके जियेंगे, तो बहुत अच्छा रहेगा।

🔴 आप जा ही रहे हैं तो एक और नया दृष्टिकोण बना करके जाइए कि हमारे आप सघन मित्र और सहयोगी हैं। आप गुरु-चेले की बात मत कीजिए। गुरु-चेला उसे कहते हैं, जो दिया करता है और लिया करता है। आप ऐसा मत कीजिए। आप हमारे सहयोगी और मित्र बन जाइए। मित्र मुझे बहुत पसन्द रहे हैं। मित्रों को मैं बहुत प्यार करता हूँ। क्यों? क्योंकि मित्र कीमत चुकाकर कीमत उतार देते हैं और भिखारी, गुरु-चेले? ये ऐसे ही हैं, चावल दे दिये, माला पहना दी, बस प्रसन्न हो गये। आप ऐसा मत कीजिए। आप मित्र बन जाइए हमारे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 30 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 June 2017


👉 उदारता और संकीर्णता :-

🔴 राजा सत्यनारायण की दो अलग अलग वाटिका मे एक विशेष वृक्ष था और राजा स्वयं अपने हाथो से उन वृक्षों को जल देने जाते थे और उन्हे सींचते व हमेशा हराभरा बनाये रखते थे!

🔵 एक बार उन्हे अचानक लम्बी अवधी के लिये राज्य से बहुत दुर जाना पड़ा जाते जाते उन्होंने उन वृक्षों की जिम्मेदारी अपनी दो सन्तानों को दी और उन्हे कहा की तुम दोनो का एक ही कार्य है की तुम्हे इन वृक्षों को अपनी जान से ज्यादा सम्भालकर रखना है और याद रखना की इनकी हरियाली समाप्त न हो पाये अन्यथा कहर ढा जायेगा सारा राज्य समाप्त सा होकर रह जायेगा !

🔴 एक वर्ष के बाद राजा पुनः अपने राज्य मे लोटे तो उन्होंने देखा की एक वृक्ष तो हराभरा है और दूसरा खड़ा तो है पर पुरी तरह से सूखा हुआ था!

🔵 राजा ने तत्काल दोनो संतानों को बुलाया और कहा क्यों रे तुमने इन्हे पानी नही दिया तो एक संतान ने कहा हॆ आदरणीय पिताश्री पानी तो हम दोनो ने ही दिया पर इसने वृक्ष की जड़ को समाप्त कर दिया हालाँकि इसने कोई कमी न रखी परन्तु ये जड़ को न बचा पाया और वृक्ष भीतर ही भीतर समाप्त होता चला गया और मैने इसे बहुत समझाया की जड़ को बचा नही तो पुरा वृक्ष समाप्त हो जायेगा परन्तु इसने मेरी एक न सुनी और अब पश्चाताप कर रहा है पर अब बहुत देर हो चुकी है...!

🔴 पर जाते समय मैने कहा था की वृक्ष को खुशहाल रखना है और फल प्राप्त करना है तो जड़ का विशेष ध्यान रखना...!

🔵 हाँ पिताश्री , और आपके कथनानुसार और आपकी कृपा से मैने जड़ को बचा लिया इसलिये ये वृक्ष हराभरा है !

🌹👉 सारांश

🔴 ये सारी सृष्टि और मनुष्य की सारी जिन्दगी एक वृक्ष की तरह ही तो है और "राम" इस सॄष्टि के मूलतत्व है और जिस जिस ने संकीर्णता और विकारों की ज्वाला से  "मूल" को बचा लिया उसके जीवन का वृक्ष कभी नही सूखा और जिसने संकीर्णता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसका समूल विनाश हो गया !

🔵 यहाँ दो चादर है एक उदारता की दूसरी संकीर्णता की जिसने उदारता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसके लिये सारा जगत "राममय" हो गया वो हर जीव मे , सारी सृष्टि मे , कणकण मे अपने "आराध्य" को देखता है और उसके मानव जीवन का लक्ष्य हराभरा हो जाता है !

🔴 उदारता ही जीवन है और संकीर्णता ही मृत्यु और उदारतापूर्वक अपने आराध्य के मार्ग पे चलते रहना और एक दिन उस अवस्था को पाने का प्रयास करना की हमें हर जीव और कण कण मे अपने आराध्य दिखने लगे जैसे की भक्त प्रहलाद को सर्वत्र नारायण ही दिखाई देते थे और ये उज्जवल अवस्था संकीर्णता से नही उदारता से प्राप्त की जा सकती है इसलिये जिन्दगी मे उदारवादिता के साथ आगे बढ़ना संकीर्णता से नही क्योंकि संकीर्ण एक दिन अशांति के गहरे अन्धकार मे लुप्त हो जाते है।

गुरुवार, 29 जून 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 June 2017



👉 आज का सद्चिंतन 29 June 2017


👉 अभिलाषा इतनी भर है:—

🔵 देवत्व परास्त हो जाय, धर्म हार जाय, विवेक कराहता रहे, चिर-संचित मानव-सभ्यता को निर्बल कर दिया जाय, यह नहीं होने दिया जायेगा। लड़ाई जारी रखी जायेगी, दुनिया के योद्धा, नेता, धनी, बुद्धिमान्, विद्वान साथ न दें तो निराश न बैठा जायेगा। रीछ-वानरों को-अपने नगण्य स्तर के परिजनों को लेकर अखण्ड-ज्योति आगे आयेगी, और सोने की लंका में साधन सम्पन्न-कुम्भकरणों, मेघनाथों, रावणों को ललकारेगी। विजय दूर हो तो हर्ज नहीं। आगे बढ़ना और लड़ना अपना काम है, सो उसे बिना राई-रत्ती हिचकिचाहट लाये, दिन-दूने-रात चौगुने उत्साह के साथ जारी रखा जायेगा।

🔴 अभिलाषा इतनी भर है कि अपने परिवार से जो आशायें रखी गई हैं, उन्हें कल्पना मात्र सिद्ध न होना पड़े। अखण्ड-ज्योति परिजन अपना उत्साह खो न बैठें और जब त्याग, बलिदान की घड़ी आवे, तब अपने को खोटा सिक्का सिद्ध न करने लगें। मनुष्य की महानता उसकी उन सत्प्रवृत्तियों की चरितार्थ करने में है, जिनसे दूसरों को प्रकाश मिले। जिसमें ऐसा कुछ नहीं- जो उदरपूर्ण और प्रजनन प्रक्रियाओं तक सीमाबद्ध है, उसे नर-पशु ही कहा जा सकता है। हम नहीं चाहते कि हमारे बड़ी आशाओं के साथ संजोये हुए सपनों की प्रतिमूर्ति- परिजन उसी स्तर के चित्र हों, जिसका कि घर-घर में कूड़ा-कटकर भरा पड़ा है।

🔵 इस महत्वपूर्ण वेला में जो अपने कर्त्तव्यों का स्मरण रख सकें और जो उसके लिये वासना और तृष्णा को एक सीमा में नियन्त्रित रखकर कुछ अवसर अवकाश युग की पुकार- ईश्वरीय पुकार को सुनने, समझने और तद्नुसार आचरण करने में लग सकें, वे ही हमारी आशाओं के केन्द्र हो सकते हैं। उन साथी, सहचरों, में हम आगे बढ़ते और निर्धारित मोर्चों पर लड़ते हुए आगे बढ़ेंगे।

🌹 पं श्रीराम आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति, दिसम्बर 1966, पृष्ठ 65
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1968/December/v1.65

मंगलवार, 27 जून 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 120)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 हमारी जीवन साधना की परिणतियाँ यदि कोई सिद्धि स्तर पर ढूँढ़ना चाहे तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। हर कदम अपने कौशल और उपलब्ध साधनों की सीमा से बहुत ऊँचे स्तर का उठा है। आरम्भ करते समय सिद्धि का पर्यवेक्षण करने वालों ने इसे मूर्खता कहा और पीछे उपहासास्पद बनते फिरने की चेतावनी भी दी, किंतु मन में इस ईश्वर के साथ रहने का अटूट विश्वास रहा जिसकी प्रेरणा उसे हाथ में लेने को उठा रही थी। लिप्सारहित अंतःकरणों में प्रायः ऐसे ही संकल्प उठते जो सीधे लोकमंगल से सम्बन्धित हों और जिनके पीछे दिव्य सहयोग मिलने का विश्वास हो।

🔴 साधना की ऊर्जा सिद्धि के रूप में परिपक्व हुई तो उसने सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने वाले किसी कार्य में उसे खपा देने का निश्चय किया। कार्य आरम्भ हुआ और आश्चर्य इस बात का है कि सहयोग का साधन जुटाने का वातावरण दीखते हुए ही प्रयास इस प्रकार अग्रगामी बने मानों वे सुनिश्चित रहे हों और किसी ने उसकी पूर्व से ही सांगोपांग व्यवस्था बना रखी हो। पर्यवेक्षकों में से अनेकों ने इसे आरम्भ में दुस्साहस कहा था लेकिन सफलताएँ मिलती चलने पर वे उस सफलता को साधना की सिद्धि कहते चले गए।

🔵 इन दुस्साहसों की छुटपुट चर्चा तो की जा चुकी है। उन सबको पुनः दुहराया जा सकता है।
  
🔴 १. पंद्रह वर्ष की आयु में चौबीस वर्ष तक गायत्री महापुरश्चरण, चौबीस वर्ष में पूरा करने का अनेक अनुबंधों के साथ जुड़ा हुआ संकल्प लिया गया। वह बिना लड़खड़ाए नियत अवधि में सम्पन्न हो गया।
  
🔵 २. इस महापुरश्चरण की पूर्णाहुति में निर्धारित जप का हवन करना था। देश भरके गायत्री उपासक आशीर्वाद देने आमंत्रित करने थे। पता लगाकर ऐसे चार लाख पाए गए और वे सभी मथुरा में सन् १९५८ में सहस्र कुण्डीय यज्ञ में आमंत्रित किए गए। प्रसन्नता की बात थी कि उनमें से एक भी अनुपस्थित नहीं रहा। पाँच दिन तक निवास, भोजन, यज्ञ आदि का निःशुल्क प्रबंध रहा। विशाल यज्ञशाला, प्रवचन मंच, रोशनी, पानी सफाई आदि का सुनियोजित प्रबंध था। सात मील के घेरे में सात नगर बसाए। सारा कार्य निर्विघ्न पूरा हुआ। लाखों का खर्च हुआ, पर उसकी पूर्ति बिना किसी के आगे पल्ला पसारे ही होती रही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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