शनिवार, 1 जुलाई 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 121)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ
🔵 ३. गायत्री तपोभूमि मथुरा के भव्य भवन का निर्माण शुभारम्भ अपनी पैतृक सम्पत्ति बेचकर किया। पीछे लोगों की अयाचित सहायता से उसका ‘‘धर्मतंत्र से लोक शिक्षण’’ का उत्तरदायित्व संभालने वाले केंद्रों के रूप में विशालकाय ढाँचा खड़ा हुआ।

🔴 ४. अखण्ड-ज्योति का सन् १९३७ से अनवरत प्रकाशन। बिना विज्ञापन और चंदा माँगे, लागत मूल्य पर निकलने वाली, गाँधी की हरिजन पत्रिका जबकि घाटे के कारण बंद करनी पड़ी थी, तब अखण्ड-ज्योति अनेकों मुसीबतों का सामना करती हुई निकलती रही और अभी एक लाख पचास हजार की संख्या में छपती है, एक अंक को कई पढ़ते हैं इस दृष्टि से पाठक दस लाख से कम नहीं है।

🔵 ५. साहित्य सृजन। आर्षग्रंथों का अनुवाद तथा व्यावहारिक जीवन में अध्यात्म सिद्धांतों का सफल समावेश करने वाली नितांत सस्ती, किंतु अत्यंत उच्चस्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन। इनका अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद। यह लेखन इतना है कि जिसे एक मनुष्य के शरीर भार के समान तोलने पर भी अधिक ही होगा। इसे करोड़ों ने पढ़ा है और नया प्रकाश पाया है।
  
🔴 ६. गायत्री परिवार का गठन-उसके द्वारा लोकमानस के परिष्कार के लिए प्रज्ञा अभियान का और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए युग निर्माण योजना का कार्यान्वयन। दोनों के अंतर्गत लाखों जागृत आत्माओं का एकीकरण। सभी का अपने-अपने ढंग से नव सृजन भाव-भरा योगदान।
  
🔵 ७. युग शिल्पी प्रज्ञा पुत्रों के लिए आत्मनिर्माण-लोक निर्माण की समग्र पाठ्य-विधि का निर्धारण और सत्र योजना के अंतर्गत नियमित शिक्षण, दस-दस दिन के गायत्री साधना सत्रों की ऐसी व्यवस्था जिसमें साधकों के लिए निवास भोजन आदि का भी प्रबन्ध है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari.2

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