शनिवार, 1 जुलाई 2017

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 1)

🔴 समाज, परिवार के मूलाधार दाम्पत्य-जीवन की गाड़ी स्त्री और पुरुष दो पहियों पर चलती है। दोनों में से प्रत्येक कि स्थिति का प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता है। नारी का जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुष की तरह ही अपना एक विशिष्ट स्थान है। इसके प्रत्येक कार्यकलापों का प्रभाव भी मनुष्य के समस्त जीवन पर पड़ता है। योग्य सुशिक्षित स्त्रियाँ जिस परिवार, जिस समाज में होंगी उसकी उन्नति विकास एवं प्रगति भी निश्चित होगी। इसी तरह स्त्रियों की गिरी हुई अवस्था, पिछड़ापन, अज्ञान, मूर्खता, विकृति भी समाज के पतन और अधोगति का कारण बन जायेंगी। शीलवान, सच्चरित्र योग्य, सुशिक्षित, सती साध्वी नारियाँ पुरुष की प्रेरणा स्रोत बनकर समाज को पुरोगामी बनाती हैं तो फूहड़, मूर्ख, कटु-भाषिणी, कलह कारिणी, कामचोर, आलसी, फिजूल खर्च, फैशनपरस्त नारी पुरुष और समाज से जीवन-पथ का अवरोध बनकर, उसकी दुष्प्रवृत्तियों को भड़काकर, उसे पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

🔵 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहणी है, नियन्त्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है तो नारी पुरुष की प्रगति विकास की प्रेरणास्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम-स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मानव समाज के जीवन में नारी का बहुत बड़ा स्थान है। और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान पतन निर्भर करते हैं। दाम्पत्य जीवन की लौकिक सफलताओं में घर की व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई जायँ, साधन सामग्रियों को बड़ी मात्रा में जुटाया जाय किन्तु यदि उसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती है तो बड़ी-से-बड़ी योजनायें भी असफल हो जाएँगी। इसी तर घर की व्यवस्था पर ही परिवार की समृद्धि और दरिद्रता निर्भर करती है और इस गृहव्यवस्था का उत्तरदायित्व नारी पर ही है। इसीलिए उसे गृहणी कहा गया है। गृहणी की कार्यकुशलता, योग्यता आदि पर ही घर की उन्नति प्रगति, सुख, दुख, हानि, लाभ, आदि निर्भर करते हैं।

🔴 खाने-पीने के समान खुले पड़े हों, बिखरते हों, चूहे, बिल्ली, कुत्ते उन्हें नष्ट करते हों, बर्तन अस्त-व्यस्त पड़े हों, कपड़े-लत्ते इधर उधर बिखरे पड़े हों, बच्चे घर की चीजों के खिलौने बनाकर खेलते हों नौकर या पड़ोसी सामान चुराकर ले जाते हों, ढूँढ़ने पर कोई चीज न मिले और उसे खरीदना पड़े, इन स्थितियों में कोई व्यक्ति कितना ही कमाता हो, कितनी ही सम्पन्नता क्यों न हो किन्तु थोड़े ही दिनों में वहाँ दरिद्रता का साम्राज्य हो जायगा। मनुष्य तो केवल कमा सकता है। उसका कार्यक्षेत्र घर के बाहर है। पुरुष की कमाई का सदुपयोग कर घर की ठीक-ठीक व्यवस्था करना गृहणी के ऊपर ही है। सफल गृहणी समस्त सुख दुःख, अभाव-अभियोग, उतार-चढ़ाव में भी कुशलता से घर की नाव को चलाती रहती है जबकि कि अयोग्य स्त्री सम्पन्नता में भी दरिद्रता का साम्राज्य ला देती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

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