बुधवार, 2 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 17)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 आत्म-दर्शन की सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले सर्वप्रथम समतल भूमि पर पहुँचना होगा। जहाँ आज तुम भटक रहे हो, वहाँ से लौट आओ और उसी भूमि पर स्थित हो जाओ, जिसे प्रवेश द्वार कहते हैं। मानलो कि तुमने अपने अन्य सब ज्ञानों को भुला दिया है और नये सिरे से किसी पाठशाला में भर्ती होकर क, ख, ग सीख रहे हो। इसमें अपमान मत समझो। तुम्हारा अब तक का ज्ञान झूँठा नहीं है। तुम उर्दू खूब पढ़े हो और यदि हिन्दी द्वारा भी लाभ प्राप्त करना चाहो, तो एकदम उसका दर्शन-शास्त्र नहीं पढ़ने लगोगे, वरन् वर्णमाला ही से आरम्भ करोगे। हम अपने आदणीय और ज्ञानी जिज्ञासुओं की पीठ थपथपाते हुए दो कदम पीछे लौटने को कहते हैं, क्योंकि ऐसा करने से प्रथम सीढ़ी पर पाँव रख सकेंगे और आसानी एवं तीव्र गति से ऊपर चढ़ेंगे।

🔵 तुम्हें विचार करना चाहिए कि जब मैं कहता हूँ कि 'मैं' तब उसका क्या अभिप्राय होता है? पशु, पक्षी तथा अन्य अविकसित प्राणियों में यह 'मैं' की भावना नहीं होती। भौतिक सुख-दुख का तो वे अनुभव करते हैं, किन्तु अपने बारे में कुछ अधिक नहीं सोच सकते। गधा नहीं जानता कि मुझ पर किस कारण बोझ लादा जाता है? लादने वाले के साथ मेरा क्या सम्बन्ध है? मैं किस प्रकार अन्याय का शिकार बनाया जा रहा हूँ? वह अधिक बोझ लद जाने पर कष्ट का और हरी घास मिल जाने पर शांति का अनुभव करता है, पर हमारी तरह सोच नहीं सकता।

🔴 इन जीवों में शरीर ही आत्म-स्वरूप है। क्रमशः अपना विकास करते-करते मनुष्य आगे बढ़ आया है। फिर भी कितने मनुष्य हैं, जो आत्म-स्वरूप को जानते हैं? तोता रटन्त दूसरी बात है। लोग आत्म-ज्ञान की कुछ चर्चा को सुनकर उसे मस्तिष्क में रिकार्ड की तरह भर लेते हैं और समयानुसार उसमें से कुछ सुना देते हैं। ऐसे आदमियों की कमी नहीं, जो आत्मा के बारे में कुछ नहीं जानते। इनमें सोचने-विचारने की शक्ति चुक गई है। उनका संसार आहार, निद्रा, भय, मैथुन, क्रोध, लोभ, मोह आदि तक ही सीमित होता है। इन्हीं समस्याओं को सोचने, समझने और हल करने लायक योग्यता उन्होंने प्राप्त की होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 6

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 व्यक्ति के परिवर्तन से ही समाज, विश्व एवं युग का परिवर्तन सम्भव है। इस धरती पर स्वर्गीय वातावरण का सृजन करने के लिए हमें जन-मानस का स्तर बदलना पड़ेगा। आज जिस स्वार्थपरता, संकीर्णता, असंयम और अनीति ने अपना पैर पसार रखा है, उसे हटाने का प्रयत्न करना होगा और उसके स्थान पर सज्जनोचित सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा। यह कार्य केवल कहने-सुनने से—लिखने-पढ़ने से सम्भव नहीं। लेखनी एवं वाणी में प्रचारात्मक शक्ति तो होती है, पर इनका प्रभाव बहुत थोड़ा और बहुत स्वल्प काल तक रहता है।

🔴 मनुष्यों में एक दूसरे को देखकर अनुकरण करने की प्रवृत्ति ही प्रधान रूप से काम करती है। दुष्कर्मों को देखकर लोग दुष्कर्म करते हैं। सत्कर्मों को देखकर वैसी गतिविधि अपनाने को जी करता है। इसलिए प्रयत्न यह करना होगा कि सुधरे हुए आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार लोग अपने जीवन क्रम बनावें। श्रेष्ठ व्यक्तियों के श्रेष्ठ आचरणों को देखकर ही जन-साधारण में वे सत्प्रवृत्तियां विकसित होंगी जो युग-निर्माण जैसे महान् अभियान के लिए नितान्त आवश्यक है।

🔵 अच्छा होता कि यह कार्य राष्ट्र के कर्णधारों द्वारा विशाल पैमाने पर सुसंगठित रूप से किया जाता। पर आज हमारे नेताओं की विचारधारा बिलकुल दूसरी है, वे आर्थिक उन्नति को सर्वोपरि मानते हैं और नीति सदाचार की बात एक फैशन की तरह कहते-सुनते तो रहते हैं, पर उस तरह की स्थिति पैदा करने के लिए कोई ठोस कदम उठाने का उनका कोई मन दिखाई नहीं पड़ता। ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में हम जो कुछ भी हैं—जिस छोटी स्थिति में भी हैं, वहीं से अपनी स्वल्प सामर्थ्य के अनुसार कार्य आरम्भ कर देना चाहिए, वही कर भी रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 16)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 हम जानते हैं कि इन पंक्तियों को पढ़ते समय तुम्हारा चित्त वैसी ही उत्सुकता और प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है, जैसी बहुत दिनों से बिछुड़ा हुआ परदेशी अपने घर-कुटुम्ब के समाचार सुनने के लिए आतुर होता है। यह एक मजबूत प्रमाण है, जिससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की आन्तरिक इच्छा आत्म-स्वरूप देखने की बनी रहती है। शरीर में रहता हुआ भी वह उसमें घुलमिल नहीं सकता, वरन् उचक-उचक कर अपनी खोई हुई किसी चीज को तलाश करता है। बस, वह स्थान जहाँ भटकता है, यही है।

🔵 उसे यह याद नहीं आता कि मैं क्या चीज ढूँढ़ रहा हूँ? मेरा कुछ खो गया है, इसका अनुभव करता है। खोई हुई वस्तु के अभाव में दुःख पाता है, किन्तु माया-जाल के पर्दे से छिपी हुई चीज को नहीं जान पाता। चित्त बड़ा चंचल है, घड़ी भर भी एक जगह नहीं ठहरता। इसकी सब लोग शिकायत करते हैं, परन्तु कारण नहीं जानते कि मन इतना चंचल क्यों हो रहा है? कस्तूरी मृग कोई अद्भुत गन्ध पाता है और उसके पास पहुँचने के लिए दिन-रात चारों ओर दौड़ता रहता है। क्षण भर भी उसे विश्राम नहीं मिलता। यही हाल मन का है। यदि वह समझ जाए कि कस्तूरी मेरी नाभि में रखी हुई है, तो वह कितना आनन्द प्राप्त कर सके और सारी चंचलता भूल जाए।

🔴 आत्म-दर्शन का मतलब अपनी, सत्ता, शक्ति और साधनों का ठीक-ठीक स्वरूप मानस पटल पर इतनी गहराई के साथ अंकित कर लेना है कि वह दिन भर जीवन में कभी भी भुलाया न जा सके। तोता-रटन्त विद्या में तुम बहुत प्रवीण हो सकते हो। इस पुस्तक में जितना कुछ लिखा है, उससे दस गुना ज्ञान तुम सुना सकते हो, बड़े-बड़े तर्क उपस्थित कर सकते हो। शास्त्रीय बारीकियाँ निकाल सकते हो। परन्तु यह बातें आत्म-मंदिर के फाटक तक ही जाती हैं, इससे आगे इनकी गति नहीं है। रट्टू तोता पण्डित नहीं बन सकता।

🔵 शास्त्र ने स्पष्ट कर दिया है कि 'यह आत्मा उपदेश, बुद्धि या बहुत सुनने से प्राप्त नहीं हो सकता।' अब तक तुम इतना सुन चुके हो, जितना अधिकारी भेद के कारण आम लोगों को भ्रम में डाल देता है। आज हम तुम्हारे साथ कोई बहस करने उपस्थित नहीं हुए हैं। यदि तुम्हें यह विषय रुचिकर हो और आत्म-दर्शन की लालसा हो, तो हमारे साथ चले आओ, अन्यथा अपना मूल्यवान समय नष्ट मत करो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part2

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 66)

🔵 समस्त विश्व को समान प्रेम की दृष्टि से देखो। अपनी व्यक्तिगत मित्रता की निष्ठा के द्वारा राह समझ लो कि प्रत्येक व्यक्तिगत जीवन में मौलिक रूप में वही सुन्दर ज्योति प्रकाशित हो रही है जिसे तुम उसमें देखते हो, जिसे तुम भाई के प्रिय नाम से पुकारते हो। विश्वजनीन बनो। अपने शत्रु से भी प्रेम करो। शत्रु मित्र का यह भेद केवल सतह पर ही है। गहरे! भीतर गहरे में केवल ब्रह्म ही है। सभी वस्तु तथा व्यक्ति में केवल ब्रह्म को ही देखना सीखो। किन्तु फिर भी उप्रियता तथा स्वभाव के कलह से बचने के लिये पर्याप्त सावधान रहो।

🔴 सर्वोच्च अर्थ में वास्तविक संबंध वही है जिसमें संबंधत्व का भान ही नहीं है और इसीलिये आध्यात्मिक है। व्यष्टि के बदले समष्टि को पहचानना सीखो। शरीर के स्थान पर आत्मा को पहचानना सीखो। तब तुम अपने मित्र के अधिक निकट होओगे। मृत्यु भी तुम्हें अलग न कर सकेगी तथा स्वयं के भीतर स भी प्रकार के भेदों को जीत -लेने के कारण तुम्हारी दृष्टि में कोई शत्रु भी न होगा। सभी रूपों में जो सौंदर्य है उसे देखो किन्तु उसे प्राप्त करने को इच्छा के बदले उसकी पूजा करो। प्रत्येक जीव तथा रूप तुम्हारे  लिये आध्यात्मिक सन्देह हो।

🔵 सभी विचार जिस स्वभाव से उत्पन्न होते हैं, उसी से संबंधित होते हैं। इसलिये दूसरों की बातें सुनने पर उसके अनुभवात्मक पक्ष को देखो, तर्क को नहीं। तब कोई वाद विवाद उत्पन्न नहीं होगा, तथा तुम्हारे स्वयं के अनुभव को नई प्रेरणा मिलेगी। फिर यह भी जान रखो कि मौन प्राय : उत्तम होता है तथा बोलना और तर्क करना हमारी शक्तियों का अपव्यय करता है। तथा सदैव यह स्मरण रखो कि अपने हीरों को बैंगनवालों के सामने कभी न डालो। उसी प्रकार सभी भावनायें भी स्वभाव से ही संबंधित होती हैं।

🔴 अत: उनके प्रति आसक्त होने के बदले उनके साक्षी बनो। यह जान लो कि विचार तथा भावनाएँ दोनों ही माया के क्षेत्र के अन्तर्गत हैं। किन्तु माया का भी अध्यात्मीकरण करना होगा। अपने जीव भाव को परमात्मभाव के अधिकार में हो जाने दो। इसलिये अनासक्त रहो। क्योंकि तुम आज जो सोचते हो तथा अनुभव करते हो वह कल, हो सकता है, तुम्हें आगे न बढ़ाये। तथा सर्वोपरि यह जान लो कि अपने सच्चे स्वरूप में तुम भाव और विचारों से मुक्त हो। भाव और विचार तुम्हारे सत्य स्वरूप को प्रगट करने में सहायक मात्र होते हैं। इसलिये अपने भाव और विचारों को महान् तथा विश्वजनीन होने दो तथा सर्वोपरि उन्हें पूर्णतः निस्वार्थ होने दो। तब इस संसार के घोर अहंकार में भी तम उस शाश्वत ज्योति को देख सकोगे। भले ही प्रारभ में वह क्षीण क्यों न प्रतीत हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 5

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 (1) स्वस्थ शरीर, (2) स्वच्छ मन और, (3) सभ्य समाज की अभिनव रचना यही युग-निर्माण का उद्देश्य है। इसके लिए अपना व्यक्तित्व, अपना परिवार और अपना समाज हमें आत्मिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाना पड़ेगा। भौतिक सुसज्जा कितनी ही प्राप्त क्यों न करली जाय, जब तक आत्मिक उत्कृष्टता न बढ़ेगी तब तक न मनुष्य सुखी रहेगा और न सन्तुष्ट। उसकी सफलता एवं समृद्धि भी क्षणिक तथा दिखावटी मानी जायगी।

🔴 मनुष्य का वास्तविक पराक्रम उसके सद्गुणों से ही निखरता है। सद्गुणी ही सच्ची प्रगति कर सकता है। उच्च अन्तःकरण वाले, विशाल हृदय, दूरदर्शी एवं दृढ़ चरित्र व्यक्ति अपना गौरव प्रकट करते हैं, दूसरों का मार्ग दर्शन कर सकने लायक क्षमता सम्पन्न होते हैं। ऐसे लोगों का बाहुल्य होने से ही कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में समर्थ एवं समृद्ध बनता है।

🔵 योजना के विविध कार्यक्रमों में यही तथ्य सन्निहित है। व्यक्ति का विकास, परिवार का निर्माण और सामाजिक उत्कर्ष में परिपूर्ण सहयोग की त्रिविधि प्रवृत्तियां जन-साधारण के मनःक्षेत्र में प्रतिष्ठापित एवं परिपोषित करने के लिए यह अभियान आरम्भ किया गया है। इसकी सफलता असफलता पर हमारा वैयक्तिक एवं सामूहिक भविष्य उज्ज्वल या अन्धकारमय बनेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 4

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 कोई प्रसन्न नहीं, कहीं सन्तोष नहीं, किधर भी शान्ति नहीं। दुर्दशा के चक्रव्यूह में फंसा हुआ मानव प्राणी अपनी मुक्ति का मार्ग खोजता है, पर उसे किधर भी आशा की किरणें दिखाई नहीं पड़तीं। अन्धकार और निराशा के श्मशान में भटकती हुई मानव अन्तरात्मा खेद और विक्षोभ के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं करती। बाहरी आडम्बर दिन-दिन बढ़ते चले जा रहे हैं, पर भीतर-ही-भीतर सब कुछ खोखला और पोला बनता चला जा रहा है। उस स्थिति में रहते हुए न कोई सन्तुष्ट रहेगा और न शान्त।

🔴 यह प्रत्यक्ष है कि यदि सम्पूर्ण विनाश ही अभीष्ट न हो तो आज की परिस्थितियों का अविलम्ब परिवर्तन अनिवार्यतः आवश्यक है। स्थिति की विषमता को देखते हुए अब इतनी भी गुंजाइश नहीं रही कि पचास-चालीस वर्ष भी इसी ढर्रे को और आगे चलने दिया जाय। अब दुनिया की चाल बहुत तेज हो गई है। चलने का युग बीत गया, अब हम लोग दौड़ने के युग में रह रहे हैं। सब कुछ दौड़ता हुआ दीखता है।

🔵 इस घुड़दौड़ में पतन और विनाश भी उतनी ही तेजी से बढ़ा चला आ रहा है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रतिरोध एवं परिवर्तन यदि कुछ समय और रुका रहे तो समय हाथ से निकल जायगा और हम इतने गहरे गर्त में गिर पड़ेंगे कि फिर उठ सकना सम्भव न रहेगा। इसलिए आज की ही घड़ी इसके लिए सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त है, जब कि परिवर्तन की प्रतिक्रिया का शुभारम्भ किया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 65)

ध्यान के शांत क्षणों में गुरुदेव की वाणी ने मेरी आत्मा से आनंद के ये शब्द कहे: -

🔵 वत्स! जब तक विचार हैं तब तक उसका मूर्त पक्ष भी रहेगा। इस कारण देवता तथा अन्य आध्यात्मिक यथार्थताएँ मूलतः सत्य हैं। विश्व के असंख्य स्तर हैं। किन्तु उन सभी के भीतर ब्रह्म की कांति चमक रही है। जब तुम ब्रह्म की अनुभूति करोगे तब तुम्हारे लिए चेतना की सभी स्थिति और अवस्थाएँ एक हो जायेगी। इसलिए सभी सत्यों को स्वीकार करो तथा परमात्मा के सभी पक्षों की पूजा करो। उदारमना एवं विश्वजनीन बनो। धर्म के क्षेत्र का विस्तार करो। जीवन के सभी क्षेत्रों में धर्म की भावना को एक संभावना के रूप में देखो।

🔴 जहाँ कहीं भी, जिस किसी प्रकार का अनुभव हो, उसकी आध्यात्मिक व्याख्या करो, वहाँ ईश्वर की वाणी सुनी जा सकेगी। सभी घटनाओं में दूसरे पक्ष को देखना सीखो तब तुम कभी कट्टर न बनोगे। आध्यात्मिक समर्पण के द्वारा अति साधारण सार का कार्य भी पारमार्थिक बन जाता है। समस्त विश्व को पारमार्थिक जीवन से परिपूर्ण देखो। सभी भेदबुद्धि को पोंछ डालो। दृष्टि की सारी संकुचितता को नष्ट कर दो। दृष्टिसीमा का तब तक विस्तार करो जब तक कि वह असीम तथा सर्वग्राही न हो जाय। भगवान कहते हैं जहाँ भी सदाचार है यह जान लो कि मैं वहाँ हूँ।

🔵 पौधे के चारों ओर बेड़ा लगाना उपयोगी है किन्तु अंकुर को उसकी छाया तले आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आश्रय तथा सुरक्षा देने वाला विशाल वृक्ष अवश्य होना चाहिये। उसी प्रकार भेदबुद्धि किसी भावविशेष के विकास के लिये उपयोगी हो सकती है किन्तु ऐसा समय अवश्य आना चाहिये कि वह भावविशेष विश्वजनीन रूप अवश्य ले ले। उदार बनो वत्स, उदार बनो। औदार्य को एक स्वाभाविक वृत्ति बना लो। क्योंकि बौद्धिक रूप में जो उपलब्ध किया जाय उसे भावनात्मक रूप में भी अवश्य उपलब्ध करना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 15)

🌞 पहला अध्याय

🔴 अध्यात्म शास्त्र कहता है कि- ऐ अविनाशी आत्माओ! तुम तुच्छ नहीं, महान हो। तुम्हें किसी अशक्तता का अनुभव करना या कुछ माँगना नहीं है। तुम अनन्त शक्तिशाली हो, तुम्हारे बल का पारावार नहीं। जिन साधनों को लेकर तुम अवतीर्ण हुए हो, वे अचूक ब्रह्मास्त्र हैं। इनकी शक्ति अनेक इन्द्रवज्रों से अधिक है। सफलता और आनन्द तुम्हारा जन्मजात अधिकार है। उठो! अपने को, अपने हथियारों को और काम को भली प्रकार पहचानो और बुद्धिपूर्वक जुट जाओ। फिर देखें, कैसे वह चीजें नहीं मिलतीं, जिन्हें तुम चाहते हो। तुम कल्पवृक्ष हो, कामधेनु हो, सफलता की साक्षात् मूर्ति हो। भय और निराशा का कण भी तुम्हारी पवित्र रचना में नहीं लगाया गया है। यह लो अपना अधिकार सँभालो।

🔴 यह पुस्तक बतावेगी कि तुम शरीर नहीं हो, जीव नहीं हो, वरन् ईश्वर हो। शरीर की, मन की जितनी भी महान् शक्तियाँ हैं, वे तुम्हारे औजार हैं। इन्द्रियों के तुम गुलाम नहीं हो, आदतें तुम्हें मजबूर नहीं कर सकतीं, मानसिक विकारों का कोई अस्तित्व नहीं, अपने को और अपने वस्त्रों को ठीक तरह से पहचान लो। फिर जीव का स्वाभाविक धर्म उनका ठीक उपयोग करने लगेगा। भ्रमरहित और तत्त्वदर्शी बुद्धि से हर काम कुशलतापूर्वक किया जा सकता है। यही कर्म कौशल योग है। गीता कहती है- 'योगः कर्मसु कौशलम्।' तुम ऐसे ही कुशल योगी बनो। लौकिक और पारलौकिक कार्यों में तुम अपना उचित स्थान प्राप्त करते हुए सफलता प्राप्त कर सको और निरन्तर विकास की ओर बढ़ते चलो, यही इस साधन का उद्देश्य है।

ईश्वर तुम्हें इसी पथ पर प्रेरित करे। ..........

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 3

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 जीवन संघर्ष अब इतना कठिन होता जाता है कि सुख शान्ति के साथ जिन्दगी के दिन पूरे कर लेना अब सरल नहीं रहा। हर व्यक्ति अपनी-अपनी समस्याओं में उलझा हुआ है। चिन्ता, भय, विक्षोभ और परेशानी से उसका चित्त अशान्त बना रहता है। शारीरिक व्यथाएं, मानसिक परेशानियां, पारस्परिक, दुर्भाव, न सुलझने वाली उलझनें, आर्थिक तंगी, अनीति भरे आक्रमण, छल और विश्वासघात, प्रवंचना, विडम्बना, असफलताएं और आपत्तियां, घात-प्रतिघात और उतार-चढ़ाव का जोर इतना बढ़ गया है कि साधारण रीति से जीवन व्यतीत कर सकना कठिन होता जाता है।

🔴 संघर्ष इतना प्रबल हो चला है कि जन-साधारण को निरन्तर विक्षुब्ध रहना पड़ता है। इस प्रबल मानसिक दबाव को कितने ही लोग सहन नहीं कर पाते, फलस्वरूप, आत्म-हत्याओं की, पागलों की, निराश हताश और दीन-दुखियों की संख्या दिन-दिन बढ़ती ही चली जा रही है।

🔵 व्यक्तिगत जीवन में हर आदमी को निराशा, तंगी और चिन्ता घेरे हुए हैं। सामाजिक जीवन में मनुष्य अपने को चारों और भेड़ियों से घिरी हुई स्थिति में फंसा अनुभव करता है। राजनीति इतनी विषम हो गई है कि उसमें सत्ताधारी लोगों की मनमानी के आगे जनहित को ठुकराया ही जाता रहता है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अविश्वास और भय का इतना बाहुल्य है कि अणु-युद्ध में सारी मानव सभ्यता का विनाश एक-दो घण्टे के भीतर-भीतर ही हो जाने का खतरा नंगी तलवार की तरह दुनिया के सिर पर लटक रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 64)

🔵 वत्स! जीवन को शांतिपूर्वक ग्रहण करो। सभी समय शांत रहो। किसी भी बात पर क्षुब्ध न होओ। तुम्हारा शारीरिक स्वभाव बहुत अधिक क्षुब्धकारी ढंग से राजसिक है। किन्तु राजसिकता को छोड़ो नहीं, उसका अध्यात्मीकरण करो। यही रहस्य है। अपने आप पर इतना अधिकार रखो कि किसी भी मुहूर्त अपनी चंचल वृत्ति को शांत कर ध्यान की अवस्था में रह सको। सर्वतोमुखी बनो। कर्म तुम्हें जिन लोगों के संपर्क में लाता है उनसे तुम्हारा संबंध ऐसा हो कि तुम उनके भीतर की महानता के साक्षी बन सको। और यदि दोष देखना ही हो तो पहले अपने दोषों को देखो न कि तुम्हारे भाई के दोषों को। तात्कालिक क्षणों के अनुभवों से विह्वल न हो जाओ। इस दिन के बाद उस अनुभव का क्या महत्त्व रह जायेगा।

🔴 सारे धार्मिक जीवन का अर्थ है अहंकार की निवृत्ति। इसकी जड़े इतनी गहरी जमी हैं कि किसी असाध्य रोग के कारण को खोज पाने के समान कठिन है। यह हजारों प्रकार के छद्मों में अपने को छिपाता है किन्तु सभी छद्मों में सबसे अधिक धोखेबाज तथा दुष्ट छद्म आध्यात्मिक छद्म है। असावधानी पूर्वक यह विश्वास करते हुए कि तुम आध्यात्मिक उद्देश्य के लिये कर्म कर रहे हो किन्तु तुम यह पाओगे कि इसके मूल में संभवतः कोई स्वार्थ तुम्हें प्रभावित कर रहा है। अतएव तीक्ष्ण्दृष्टि रखो। केवल व्यक्तित्व को जीत कर तथा उसके विसर्जन द्वारा उच्च अमूर्त को समझा तथा अनुभव किया जा सकता।

🔵 स्वयं के प्रति मर जाना जिससे कि सच्चा आध्यात्मिक जीवन जी सकें यही आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य है। कच्छ प्रकाश (दल दल में दिखने वाला अस्थायी प्रकाश) से संतुष्ट रहने वाले बहुत से लोग असल सूर्य को नहीं देख पाते। जब स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व का निराकरण होता है तभी वास्तविक अमरत्व प्राप्त किया जा सकता। इसे स्मरण रखो। निराकार में मन को स्थिर करो। आत्मविजयी व्यक्तित्व में ही परमात्मा  की ज्योति प्रकाशित होती है। जब वह ज्योति पूर्णतः प्रकाशित होती है, तभी निर्वाण की अभिव्यक्ति होती है।
🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 14)


🌞 पहला अध्याय

🔴 उपरोक्त शंका स्वाभाविक है, क्योंकि हमारी विचारधारा आज कुछ ऐसी उलझ गई है कि लौकिक और पारलौकिक स्वार्थों के दो विभाग करने पड़ते हैं। वास्तव में ऐसे कोई दो खण्ड नहीं हो सकते, जो लौकिक हैं वहीं पारलौकिक हैं। दोनों एक-दूसरे से इतने अधिक बँधे हुए हैं, जैसे पेट और पीठ। फिर भी हम पूरी विचारधारा को उलट कर पुस्तक के कलेवर का ध्यान रखते हुए नये सिरे से समझाने की यहाँ आवश्यकता नहीं समझते। यहाँ तो इतना ही कह देना पर्याप्त होगा कि आत्मदर्शन व्यावहारिक जीवन को सफल बनाने की सर्वश्रेष्ठ कला है। आत्मोन्नति के साथ ही सभी सांसारिक उन्नति रहती हैं। जिसके पास आत्मबल है, उसके पास सब कुछ है और सारी सफलाताएँ उसके हाथ के नीचे हैं।

🔴 साधारण और स्वाभाविक योग का सारा रहस्य इसमें छिपा हुआ है कि आदमी आत्म-स्वरूप को जाने, अपने गौरव को पहचाने, अपने अधिकार की तलाश करे और अपने पिता की अतुलित सम्पत्ति पर अपना हक पेश करे। यह राजमार्ग है। सीधा, सच्चा और बिना जोखिम का है। यह मोटी बात हर किसी की समझ में आ जानी चाहिए कि अपनी शक्ति और औजारों की कार्यक्षमता की जानकारी और अज्ञानता किसी भी काम की सफलता-असफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि उत्तम से उत्तम बुद्धि भी तब तक ठीक-ठीक फैसला नहीं कर सकती, जब तक उसे वस्तुओं का स्वरूप ठीक तौर से न मालूम हो जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 2

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 आज जिस स्थिति में होकर मनुष्य जाति का गुजरना पड़ रहा है वह बाहर से उत्थान जैसी दीखते हुए भी वस्तुतः पतन की है। दिखावा, शोभा, श्रृंगार का आवरण बढ़ रहा है पर भीतर-ही-भीतर सब कुछ खोखला हुआ जा रहा है। दिमाग बड़े हो रहे हैं पर दिल दिन-दिन सिकुड़ते जाते हैं। पढ़-लिखकर लोग होशियार तो खूब हो रहे हैं पर साथ ही अनुदारता स्वार्थपरता, विलास और अहंकार भी उसी अनुपात से बढ़े हैं।

🔴 पोशाक, श्रृंगार, स्वादिष्ट भोजन और मनोरंजन की किस्में बढ़ती जाती हैं, पर असंयम के कारण स्वास्थ्य दिन-दिन गिरता चला जा रहा है। दो-तीन पीढ़ी पहले जैसा अच्छा स्वास्थ्य था वह अब देखने को नहीं मिलता। कमजोरी और अशक्तता हर किसी को किसी-न-किसी रूप में घेरे हुए हैं। डॉक्टर-देवताओं की पूजा प्रदक्षिणा करते-करते लोग थक जाते हैं पर स्वास्थ्य लाभ का मनोरथ किसी बेचारे को कदाचित ही प्राप्त होता है।

🔵 धन बढ़ा है पर साथ ही महंगाई और जरूरतों की असाधारण वृद्धि हुई हैं। खर्चों के मुकाबिले आमदनी कम रहने से हर आदमी अभावग्रस्त रहता है और खर्चे की तंगी अनुभव करता है। पारस्परिक सम्बन्ध खिंचे हुए, संदिग्ध और अविश्वास से भरे हुए हैं। पति-पत्नी, पिता-पुत्र और भाई-भाई के बीच मनोमालिन्य ही भरा रहता है।

🔴 यार-दोस्तों में से अधिकांश ऐसे होते हैं जिनसे विश्वासघात, अपहरण और तोताचश्मी की ही आशा की जा सकती है। चरित्र और ईमानदारी की मात्रा इतनी तेजी से गिर रही है कि किसी को किसी पर विश्वास नहीं होता। कोई करने भी लगे तो बेचारा धोखा खाता है। पुलिस और जेलों की, मुकदमे और कचहरियों की कमी नहीं, पर अपराधी मनोवृत्ति दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 63)

गुरुदेव की वाणी ने कहा :-

🔵 वत्स! तुम यह जानते के लिये बाध्य किये जाओगे कि संसार में कुछ ऐसी कठिनाइयाँ हैं जिनका सामना तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा तथा जो तुम्हारे पूर्व कर्मों के कारण अजेय प्रतीत होंगी। उनके कारण झुँझलाइट में अधीर न होओ। यह जान लो कि जहाँ चिन्ता और अपेक्षाएँ है, वहा अन्ध आसक्ति भी है। अपना कार्य करने के पश्चात् अलग हो जाओ। कार्य के अपने कर्मविधान के अनुसार उसे समय के प्रवाह में बहने दो, जैसा कि वह बहेगा ही।

🔴 अपना कार्य समाप्त कर लेने के पश्चात् तुम्हारा नारा हो, दूर रहो! अपनी संपूर्ण शक्ति से कर्म करो तथा उसके पश्चात् अपनी संपूर्ण शक्ति से समर्पित हो जाओ। किसी भी घटना में हतोत्साहित न होओ, क्योंकि कर्मफल शुभ अशुभ जो भी हो सभी गौण हैं। उन्हें त्याग दो! उन्हें त्याग दो!! तथा यह अच्छी तरह स्मरण रखो कि कर्म करने मैं कर्म की दक्षता उद्देश्य नहीं है, उद्देश्य है, कर्म के द्वारा व्यक्तित्व की परिपूर्णता।

🔵  अपने ही कर्मों को तुम वश में नहीं कर सकते, दूसरे के कर्मों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। उसका कर्म एक प्रकार का है, तुम्हारा कर्म दूसरे प्रकार का। आलोचना न करो, आशा न रखो, भयभीत न होओ। सभी कुछ ठीक हो जायेगा। अनुभव आता जाता है, व्यग्र न होओ। तुम सत्य के धरातल पर खड़े होओ। अनुभव को तुम्हें मुक्त होना सिखाने दो। चाहे जो हो जाय और अधिक बंधन न बाँधो। और क्या तुम इतने मूर्ख हो कि एक ही प्रकार के कर्म में बँध जाओ? क्या मेरे कर्म का क्षेत्र असीम नहीं है?

🔴 कर्मयोग तथा सच्चे कर्म के महान आदर्श को ईर्ष्या तथा आसक्ति से नीचा न करो। बच्चों जैसी भावनाओं को तुम पर अधिकार न करने दो। आशा न रखो, प्रत्याशा न रखो। संसार के प्रवाह तुम्हारे व्यक्तित्व को जहाँ ले जायें ले जाने दो। स्मरण रखो तुम्हारा वास्तविक स्वरूप समुद्रवत् है तथा उदासीन रहो। मन भी सूक्ष्म रूप में शरीर ही है यह जान लो। इसलिये तुम्हारी तपस्या को मानसिक बनाओ। अपनी सभी मानसिक वृत्तियों को शारीरिक वत्त्ति ही समझो तथा निर्लिप्त रहो। तुम आत्मा हो अपनी आत्मा से ही सरोकार रखो। अपने स्वयं का जीवन जीओ। स्वयं के प्रति सच्चे बनो।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 13)

🌞 पहला अध्याय

🔴 काम, क्रोध, लोभ, मोहादि विकार और इन्द्रिय वासनाएँ मनुष्य के आनन्द में बाधक बनकर उसे दुःखजाल में डाले हुए हैं। पाप और बन्धन की यह मूल हैं। पतन इन्हीं के द्वारा होता है और क्रमशः नीच श्रेणी में इनके द्वारा जीव घसीटा जाता रहता है। विभिन्न अध्यात्म पन्थों की विराट साधनाएँ इन्हीं दुष्ट शत्रुओं को पराजित करने के चक्रव्यूह हैं। अर्जुन रूपी मन को इसी महाभारत में प्रवृत्त करने का भगवान का उपदेश है।

🔴 इस पुस्तक के अगले अध्यायों में आत्म दर्शन के लिए जिन सरल साधनों को बताया गया है, उनकी साधना करने से हम उस स्थान तक ऊँचे उठ सकते हैं, जहाँ सांसारिक प्रवृत्तियों की पहुँच नहीं हो सकती। जब बुराई न रहेगी, तो जो शेष रह जाय, वह भलाई होगी। इस प्रकार आत्मदर्शन का स्वाभाविक फल दैवी सम्पत्ति को प्राप्त करना है। आत्म-स्वरूप का, अहंभाव का आत्यन्तिक विस्तार होते-होते रबड़ के थैले के समान बन्धन टूट जाते हैं और आत्मा-परमात्मा में जा मिलता है।

🔵 इस भावार्थ को जानकर कई व्यक्ति निराश होंगे और कहेंगे-यह तो संन्यासियों का मार्ग है। जो ईश्वर में लीन होना चाहते हैं या परमार्थ साधना करना चाहते हैं, उनके लिए यह साधन उपयोगी हो सकता है। इसका लाभ केवल पारलौकिक है, किन्तु हमारे जीवन का सारा कार्यक्रम इहलौकिक है। हमारा जो दैनिक कार्यक्रम व्यवसाय, नौकरी, ज्ञान-सम्पादन, द्रव्य-उपार्जन, मनोरंजन आदि का है, उसमें से थोड़ा समय पारलौकिक कार्यों के लिए निकाल सकते हैं, परन्तु अधिकांश जीवनचर्या हमारी सांसारिक कार्यों में निहित है। इसलिए अपने अधिकांश जीवन के कार्यक्रम में हम इसका क्या लाभ उठा सकेंगे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 1)

सन 1958 में परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित पुस्तक!!
 
🌹 निवेदन!

🔵 आत्म-निर्माण परिवार निर्माण और समाज निर्माण का उद्देश्य लेकर युग-निर्माण योजना नामक एक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों द्वारा जून सन् 63 से आरम्भ की गई है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की अभिनव रचना का लक्ष्य पूरा करने के लिये विगत एक वर्ष से यह आन्दोलन सफलतापूर्वक चल रहा है।

🔴 आन्दोलन के आरम्भ में जन साधारण को उसका स्वरूप समझाने के लिये जो लेख लिखे गये थे उनका संग्रह इस पुस्तक में है। इसलिये पाठकों को ऐसा प्रतीत होगा मानो यह कोई विचाराधीन योजना या किसी भावी कार्यक्रम की कल्पना है। पर वस्तु-स्थिति ऐसी नहीं। गत एक वर्ष से यह पुस्तक छपने तक इस शतसूत्री योजना के यह सभी कार्यक्रम तीन हजार शाखाओं से संगठित परिवार के तीस हजार सदस्यों द्वारा बड़े उत्साहपूर्वक कार्यान्वित किये जा रहे हैं।

🔵 प्रगति जिस आशाजनक और उत्साह पूर्ण कार्यक्रम से हो रही है, उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि किसी समय का यह स्वप्न अगले कुछ ही समय में एक विशाल वृक्ष का रूप धारण करने जा रहा है और युग-निर्माण की बात जो अत्युक्ति जैसी लगती थी अगले दिनों एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में मूर्तिमान होने वाली है।

🔴 नव-निर्माण का यह अभिनव आन्दोलन समय की एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण पुकार है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के लिये यह योजना अपनाये जाने योग्य है। आशा यही है कि पाठक इस शतसूत्री योजना को न्यूनाधिक रूप में अपनाने का प्रयत्न करेंगे। विज्ञजनों से इन संदर्भ में आवश्यक परामर्श सहयोग, मार्ग-दर्शन एवं आशीर्वाद देने की प्रार्थना है, ताकि आन्दोलन को और भी अधिक सुचारु रूप से चलाया जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 12)

🌞 पहला अध्याय

🔴 अब तक उसे एक बहिन, दो भाई, माँ बाप, दो घोड़े, दस नौकरों के पालन की चिन्ता थी, अब उसे हजारों गुने प्राणियों के पालने की चिन्ता होती है। यही अहंभाव का प्रसार है। दूसरे शब्दों में इसी को अहंभाव का नाश कहते हैं। बात एक ही है फर्क सिर्फ कहने-सुनने का है। रबड़ के गुब्बारे जिसमें हवा भरकर बच्चे खेलते हैं, तुमने देखे होंगे। इनमें से एक लो और उसमें हवा भरो। जितनी हवा भरती जायेगी, उतना ही वह बढ़ता जाएगा और फटने के अधिक निकट पहुँचता जाएगा।

🔴 कुछ ही देर में उसमें इतनी हवा भर जायगी कि वह गुब्बारे को फाड़कर अपने विराट् रूप आकाश में भरे हुए महान वायुतत्त्व में मिल जाय। यही आत्म-दर्शन प्रणाली है। यह पुस्तक तुम्हें बतावेगी कि आत्म-स्वरूप को जानो, उसका विस्तार करो। बस इतने से ही सूत्र में वह सब महान विज्ञान भरा हुआ है, जिसके आधार पर विभिन्न अध्यात्म पथ बनाये गये हैं। वे सब फल इस सूत्र में बीज रूप में मौजूद हैं, जो किसी भी सच्ची साधना से कहीं भी और किसी भी प्रकार हो सकते हैं।

🔵 आत्मा के वास्तविक स्वरूप की एक बार झाँकी कर लेने वाला साधक फिर पीछे नहीं लौट सकता। प्यास के मारे जिसके प्राण सूख रहे हैं ऐसा व्यक्ति सुरसरि का शीतल कूल छोड़कर क्या फिर उसी रेगिस्तान में लौटने की इच्छा करेगा? जहाँ प्यास के मारे क्षण-क्षण पर मृत्यु समान असहनीय वेदना अब तक अनुभव करता रहा है। भगवान कहते हैं। ''यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्घाम् परमं मम।'' ''जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता, ऐसा मेरा धाम है।'' सचमुच वहाँ पहुँचने पर पीछे को पाँव पड़ते ही नहीं। योग भ्रष्ट हो जाने का वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता। घर पहुँच जाने पर भी क्या कोई घर का रास्ता भूल सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

👉 गायत्री की दैनिक साधना (भाग 2)

🔴 जिन्हें मन्त्र ठीक तरह शुद्ध रूप से याद न हो वे नीचे की पंक्तियों से उसे शुद्ध कर लें।
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”

🔵 साधारणतः जप प्रतिदिन का नियम यह होना चाहिए कि कम से कम 108 मन्त्रों की एक माला का नित्य किया जाए। जप के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। शौच स्नान से निवृत्त होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिए। धोती के अतिरिक्त शरीर पर और कोई वस्त्र न रहे। ऋतु अनुकूल न हो तो कम्बल या चादर ओढ़ा जा सकता है। जल का एक छोटा पात्र पास में रखकर शान्त चित्त से जप करना चाहिए। होंठ हिलते रहें, कंठ से उच्चारण भी होता रहे, परन्तु शब्द इतने मंद स्वर में रहे कि पास बैठा हुआ मनुष्य भी उन्हें न सुन सके। तात्पर्य यह है कि जप चुपचाप भी हो और कंठ ओष्ठ तथा जिह्वा को भी कार्य करना पड़े।

🔴 शान्त चित्त से एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिए। मस्तिष्क में त्रिकुटी स्थान पर सूर्य जैसे तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उस प्रकाश की तेजस्वी किरणें मेरे मस्तिष्क तथा समस्त शरीर को एक दिव्य विद्युत शक्ति से भरे दे रही है। जप और ध्यान साथ साथ आसानी से हो सकते हैं। आरम्भ में कुछ ऐसी कठिनाई आती है कि जप के कारण ध्यान टूटता है और ध्यान की तल्लीनता से जप में विक्षेप पड़ता है। यह कठिनाई कुछ दिनों के अभ्यास से दूर हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1944 सितम्बर

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? भाग 11)


🌞 पहला अध्याय

🔴 अनेक साधक अध्यात्म-पथ पर बढ़ने का प्रयत्न करते हैं पर उन्हें केवल एकांगी और आंशिक साधन करने के तरीके ही बताये जाते हैं। खुमारी उतारना तो वह है जिस दशा में मनुष्य अपने रूप को भली-भाँति पहचान सके। जिस इलाज से सिर्फ हाथ-पैर पटकना ही बन्द होता है या आँखों की सुर्खी ही मिटती है वह पूरा इलाज नहीं है। यज्ञ, तप, दान, व्रत, अनुष्ठान, जप, आदि साधन लाभप्रद हैं, इनकी उपयोगिता से कोई इन्कार नहीं कर सकता।

🔴 परन्तु यह वास्तविकता नहीं है। इससे पवित्रता बढ़ती है, सतोगुण की वृद्घि होती है, पुण्य बढ़ता है किन्तु वह चेतना प्राप्त नहीं होता जिसके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थों का वास्तविक रूप जाना जा सकता है और सारा भ्रम जंजाल कट जाता है। इस पुस्तक में हमारा उद्देश्य साधक को आत्मज्ञान की चेतना में जगा देने का है क्योंकि हम समझते हैं कि मुक्ति के लिए इससे बढ़कर सरल एवं निश्चित मार्ग हो ही नहीं सकता। जिसने आत्म स्वरूप का अनुभव कर लिया, सद्गुण उसके दास हो जाते हैं और दुर्गुणों का पता भी नहीं लगता कि वे कहाँ चले गये।

🔵 आत्म-दर्शन का यह अनुष्ठान साधकों को ऊँचा उठायेगा। इस अभ्यास के सहारे वे उस स्थान से ऊँचे उठ जायेंगे जहाँ कि पहले खड़े थे। इस उच्च शिखर पर खड़े होकर वे देखेंगे कि दुनियाँ बहुत बड़ी है। मेरा भार बहुत बड़ा है। मेरा राज्य बहुत दूर तक फैला हुआ है। जितनी चिन्ता अब तक थी, उससे अधिक चिन्ता अब मुझे करनी है। वह सोचता है कि मैं पहले जितनी वस्तुओं को देखता था, उससे अधिक चीजें मेरी हैं। अब वह और ऊँची चोटी पर चढ़ता है कि मेरे पास कहीं इससे भी अधिक पूँजी तो नहीं है? जैसे-जैसे ऊँचा चढ़ता है वैसे ही वैसे उसे अपनी वस्तुएँ अधिकाधिक प्रतीत होती जाती हैं और अन्त में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर वह जहाँ तक दृष्टि फैला सकता है, वहाँ तक अपनी ही अपनी सब चीजें देखता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 62)

🔵 आलोचक कला की दीर्घाओं में विभिन्न चित्रों को देखता है जिसमें कुछ भीषण त्रासदिक होते हैं कुछ अत्यन्त सुन्दर होते हैं। किन्तु वह स्वयं वास्तव में उन चित्रों में अंकित भावनाओं से प्रभावित नहीं होता। तुम भी उसी प्रकार करो। जीवन मानो एक कला  दीर्घा है, अनुभव मानो विभिन्न चित्र हैं जो समय की दीवार पर टंगे हुए हैं। यदि तुम करना चाहते हो तो उनका अध्ययन करो किन्तु किसी भी प्रकार की भावनात्मक रुचि से स्वयं को मुक्त रखो। अध्ययन करो किन्तु उससे अप्रभावित रहो। इसे ध्यान में रखने पर तुम सचमुच ही साक्षी हो जाओगे। जिस प्रकार एक चिकित्सक शरीर या उसके रोगों का अध्ययन करता है उसी प्रकार अपने मन तथा अनुभवों का अध्ययन करो। अपने स्वयं की आलोचना में कठोर बनो तभी तुम वास्तविक उन्नति कर पाओगे।

🔴 रास्ता लम्बा है। (आत्म) शिक्षा की प्रक्रिया में कई जीवन आवश्यक हैं। किन्तु गहन जीवन जी कर व्यक्ति इस चक्करदार रास्ते से बच सकता है जिस पर की उथला जीवन जीनेवाले चलते हैं जिनका जीवन केवल उनके व्यक्तित्व के सतह पर ही होता है। आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से लगातार विचार करना, इन्छाओं को उच्चाकाक्षा में बदलना, वासनाओं को आध्यात्मिक भाव से भर देना, ये सब इसके उपाय हैं। जब तक कि तुम्हारा संपूर्ण स्वभाव आध्यात्मिक आदर्श तथा इच्छाओं से परिपूर्ण नहीं हो जाता दिन भर की प्रत्येक घड़ी में सतत तद्रूप होने का दृढ़ निश्चय करो।

🔵 सदैव सावधान रहो। जो सभी शुभ वस्तुओं के दाता हैं उनके प्रति सभी कुछ समर्पित कर दो। जो तुम्हें आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिर रखे, फिर चाहे वह मृत्यु का भय ही क्यों न हो, उसे पकड़ रखो। तुम एक नये पौधे हो जिसे सहारे की आवश्यकता है। जो भी वस्तु तुम्हें शक्तिशाली बनाये उसे पकड़ लो। दृढ़ता तथा प्रचण्डता से उससे चिपके रहो। अविचल, निष्ठावान, उद्यत चित्त, सदाचारी बनो तथा प्रत्येक क्षण एवं अवसर का लाभ उठाओ। पथ बहुत लम्बा है। समय भाग रहा है इसलिये जैसा कि मैंने पहले भी बार बार तुमसे कहा है अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को समर्पित कर स्वयं को कार्य में झोंक दो और तब तुम लक्ष्य पर पहुँच जाओगे।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 10)

🌞 पहला अध्याय

🔴 काम क्रोधादि हमें इसलिए सताते हैं कि उनकी दासता हम स्वीकार करते हैं। जिस दिन हम विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देंगे, भ्रम अपने बिल में धँस जायगा। भेड़ों में पला हुआ शेर का बच्चा अपने को भेड़ समझता था, परन्तु जब उसने पानी में अपनी तस्वीर देखी तो पाया कि मैं भेड़ नहीं शेर हूँ। आत्म-स्वरूप का बोध होते ही उसका सारा भेड़पन क्षणमात्र में चला गया। आत्मदर्शन की महत्ता ऐसी ही है, जिसने इसे जाना उसने उन सब दुःख दारिद्रयों से छुटकारा पा लिया, जिनके मारे वह हर घड़ी हाय-हाय किया करता था।

🔴 जानने योग्य इस संसार में अनेक वस्तुएँ हैं पर उन सबमें प्रधान अपने आपको जानना है। जिसने अपने को जान लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों ने अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई विद्युत शक्ति, ईथर शक्ति, परमाणु शक्ति आदि को ढूँढ़ निकाला है। अध्यात्म जगत के महान अन्वेषकों ने जीवन सिन्धु का मन्थन करके आत्मा रूपी अमृत उपलब्ध किया है। इस आत्मा को जानने वाला सच्चा ज्ञानी हो जाता है और इसे प्राप्त करने वाला विश्व विजयी मायातीत कहा जाता है।

🔵 इसलिए हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आपको जाने। मैं क्या हूँ, इस प्रश्न को अपने आपसे पूछे और विचार करे, चिन्तन तथा मननपूर्वक उसका सही उत्तर प्राप्त करे। अपना ठीक रूप मालूम हो जाने पर, हम अपने वास्तविक हित-अहित को समझ सकते हैं। विषयानुरागी अवस्था में जीव जिन बातों को लाभ समझता है, उनके लिए लालायित रहता है, वे लाभ आत्मानुरक्त होने पर तुच्छ एवं हानिकारक प्रतीत होने लगते हैं और माया लिप्त जीव जिन बातों से दूर भागता है, उसमें आत्म-परायण को रस आने लगता है। आत्म-साधन के पथ पर अग्रसर होने वाले पथिक की भीतरी आँखें खुल जाती हैं और वह जीवन के महत्वपूर्ण रहस्य को समझकर शाश्वत सत्य की ओर तेजी के कदम बढ़ाता चला जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

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