बुधवार, 2 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 6

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 व्यक्ति के परिवर्तन से ही समाज, विश्व एवं युग का परिवर्तन सम्भव है। इस धरती पर स्वर्गीय वातावरण का सृजन करने के लिए हमें जन-मानस का स्तर बदलना पड़ेगा। आज जिस स्वार्थपरता, संकीर्णता, असंयम और अनीति ने अपना पैर पसार रखा है, उसे हटाने का प्रयत्न करना होगा और उसके स्थान पर सज्जनोचित सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा। यह कार्य केवल कहने-सुनने से—लिखने-पढ़ने से सम्भव नहीं। लेखनी एवं वाणी में प्रचारात्मक शक्ति तो होती है, पर इनका प्रभाव बहुत थोड़ा और बहुत स्वल्प काल तक रहता है।

🔴 मनुष्यों में एक दूसरे को देखकर अनुकरण करने की प्रवृत्ति ही प्रधान रूप से काम करती है। दुष्कर्मों को देखकर लोग दुष्कर्म करते हैं। सत्कर्मों को देखकर वैसी गतिविधि अपनाने को जी करता है। इसलिए प्रयत्न यह करना होगा कि सुधरे हुए आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार लोग अपने जीवन क्रम बनावें। श्रेष्ठ व्यक्तियों के श्रेष्ठ आचरणों को देखकर ही जन-साधारण में वे सत्प्रवृत्तियां विकसित होंगी जो युग-निर्माण जैसे महान् अभियान के लिए नितान्त आवश्यक है।

🔵 अच्छा होता कि यह कार्य राष्ट्र के कर्णधारों द्वारा विशाल पैमाने पर सुसंगठित रूप से किया जाता। पर आज हमारे नेताओं की विचारधारा बिलकुल दूसरी है, वे आर्थिक उन्नति को सर्वोपरि मानते हैं और नीति सदाचार की बात एक फैशन की तरह कहते-सुनते तो रहते हैं, पर उस तरह की स्थिति पैदा करने के लिए कोई ठोस कदम उठाने का उनका कोई मन दिखाई नहीं पड़ता। ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में हम जो कुछ भी हैं—जिस छोटी स्थिति में भी हैं, वहीं से अपनी स्वल्प सामर्थ्य के अनुसार कार्य आरम्भ कर देना चाहिए, वही कर भी रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...