शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 63)

गुरुदेव की वाणी ने कहा :-

🔵 वत्स! तुम यह जानते के लिये बाध्य किये जाओगे कि संसार में कुछ ऐसी कठिनाइयाँ हैं जिनका सामना तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा तथा जो तुम्हारे पूर्व कर्मों के कारण अजेय प्रतीत होंगी। उनके कारण झुँझलाइट में अधीर न होओ। यह जान लो कि जहाँ चिन्ता और अपेक्षाएँ है, वहा अन्ध आसक्ति भी है। अपना कार्य करने के पश्चात् अलग हो जाओ। कार्य के अपने कर्मविधान के अनुसार उसे समय के प्रवाह में बहने दो, जैसा कि वह बहेगा ही।

🔴 अपना कार्य समाप्त कर लेने के पश्चात् तुम्हारा नारा हो, दूर रहो! अपनी संपूर्ण शक्ति से कर्म करो तथा उसके पश्चात् अपनी संपूर्ण शक्ति से समर्पित हो जाओ। किसी भी घटना में हतोत्साहित न होओ, क्योंकि कर्मफल शुभ अशुभ जो भी हो सभी गौण हैं। उन्हें त्याग दो! उन्हें त्याग दो!! तथा यह अच्छी तरह स्मरण रखो कि कर्म करने मैं कर्म की दक्षता उद्देश्य नहीं है, उद्देश्य है, कर्म के द्वारा व्यक्तित्व की परिपूर्णता।

🔵  अपने ही कर्मों को तुम वश में नहीं कर सकते, दूसरे के कर्मों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। उसका कर्म एक प्रकार का है, तुम्हारा कर्म दूसरे प्रकार का। आलोचना न करो, आशा न रखो, भयभीत न होओ। सभी कुछ ठीक हो जायेगा। अनुभव आता जाता है, व्यग्र न होओ। तुम सत्य के धरातल पर खड़े होओ। अनुभव को तुम्हें मुक्त होना सिखाने दो। चाहे जो हो जाय और अधिक बंधन न बाँधो। और क्या तुम इतने मूर्ख हो कि एक ही प्रकार के कर्म में बँध जाओ? क्या मेरे कर्म का क्षेत्र असीम नहीं है?

🔴 कर्मयोग तथा सच्चे कर्म के महान आदर्श को ईर्ष्या तथा आसक्ति से नीचा न करो। बच्चों जैसी भावनाओं को तुम पर अधिकार न करने दो। आशा न रखो, प्रत्याशा न रखो। संसार के प्रवाह तुम्हारे व्यक्तित्व को जहाँ ले जायें ले जाने दो। स्मरण रखो तुम्हारा वास्तविक स्वरूप समुद्रवत् है तथा उदासीन रहो। मन भी सूक्ष्म रूप में शरीर ही है यह जान लो। इसलिये तुम्हारी तपस्या को मानसिक बनाओ। अपनी सभी मानसिक वृत्तियों को शारीरिक वत्त्ति ही समझो तथा निर्लिप्त रहो। तुम आत्मा हो अपनी आत्मा से ही सरोकार रखो। अपने स्वयं का जीवन जीओ। स्वयं के प्रति सच्चे बनो।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...