रविवार, 30 अक्तूबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 3

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 जीवन संघर्ष अब इतना कठिन होता जाता है कि सुख शान्ति के साथ जिन्दगी के दिन पूरे कर लेना अब सरल नहीं रहा। हर व्यक्ति अपनी-अपनी समस्याओं में उलझा हुआ है। चिन्ता, भय, विक्षोभ और परेशानी से उसका चित्त अशान्त बना रहता है। शारीरिक व्यथाएं, मानसिक परेशानियां, पारस्परिक, दुर्भाव, न सुलझने वाली उलझनें, आर्थिक तंगी, अनीति भरे आक्रमण, छल और विश्वासघात, प्रवंचना, विडम्बना, असफलताएं और आपत्तियां, घात-प्रतिघात और उतार-चढ़ाव का जोर इतना बढ़ गया है कि साधारण रीति से जीवन व्यतीत कर सकना कठिन होता जाता है।

🔴 संघर्ष इतना प्रबल हो चला है कि जन-साधारण को निरन्तर विक्षुब्ध रहना पड़ता है। इस प्रबल मानसिक दबाव को कितने ही लोग सहन नहीं कर पाते, फलस्वरूप, आत्म-हत्याओं की, पागलों की, निराश हताश और दीन-दुखियों की संख्या दिन-दिन बढ़ती ही चली जा रही है।

🔵 व्यक्तिगत जीवन में हर आदमी को निराशा, तंगी और चिन्ता घेरे हुए हैं। सामाजिक जीवन में मनुष्य अपने को चारों और भेड़ियों से घिरी हुई स्थिति में फंसा अनुभव करता है। राजनीति इतनी विषम हो गई है कि उसमें सत्ताधारी लोगों की मनमानी के आगे जनहित को ठुकराया ही जाता रहता है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अविश्वास और भय का इतना बाहुल्य है कि अणु-युद्ध में सारी मानव सभ्यता का विनाश एक-दो घण्टे के भीतर-भीतर ही हो जाने का खतरा नंगी तलवार की तरह दुनिया के सिर पर लटक रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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