सोमवार, 27 जुलाई 2020

👉 अपना परिवार

अपने परिवार में बुद्धिमानों की, भावनाशीलों की, प्रतिभावानों की, साधना सम्पन्नों की कमी नहीं। पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं। व्यस्तता, अभावग्रस्तता, उलझन, अड़चन आदि के बहाने उपहासास्पद हैं। वे उन्हीं कार्यों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिन्हें निरर्थक समझा जाता है। जो महत्वपूर्ण समझा जाता है उसे सदा प्रमुखता मिलती है और समय, साधन, मनोयोग आदि जो कुछ पास है सब उसी में लग जाता है।

यदि युग पुकार को-जीवनोद्देश्य को महत्व दिया गया होता तो किसी को भी वैसी बहाने-बाजी न करनी पड़ती जैसी कि असमर्थता सिद्ध करने के लिए आमतौर से कही या गढ़ी जाती है। इससे आत्म-प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं। जिन्हें कुछ करने की उत्कट अभिलाषा होती है वे उसके लिए कठिनतम परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी इतना कुछ कर सकते हैं जितना साधन सम्पन्नों से भी नहीं बन पड़ता।

दो-पाँच मालाएँ उलटी-पुलटी घुमाकर-समस्त संकट दूर होने से लेकर प्रचुर धन सम्पदा मिलने तक की ऋद्धि-सिद्धियों में कमी पड़ने की शिकायतें तो आये दिन सुनने को मिलती हैं, पर यह बताने कोई नहीं आता कि उपासना बीज को खाद, पानी देने वाली जीवन-साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है।

परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता। विलासिता, फिजूलखर्ची और जमाखोरी में लगने वाले पैसे का उपयोग यदि रचनात्मक प्रवृत्तियों के परिपोषण में लग सका होता तो अपना छोटा-सा परिवार ही राष्ट्र की महती समस्याओं को सुलझा सकने के उपयुक्त साधन अपने घर से अपने ही हाथों जुटा सकते थे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 Enthusiasm with a Check of Maturity

You should be a real master and not the slave of your sense organs. You can’t enjoy even the pleasure of the senses for long without observing self-continence. Running after ever-new passions ceases peace from your life and results in varieties of weaknesses and self-invited worries.

Being driven by sensual lust is against the human-nature and human-religion. Sri Bhagvad Gita is regarded as the treatise of ideal life. Its guidance will be accomplished in your life only if you succeed in its prerequisite of self-discipline over your senses. Without the endeavors of self-restrain, you can’t proceed in any yoga-sadhana of spiritual refinement; it is a must for achieving something worth on the worldly fronts as well. The Sitar of life produces melodious music only if its wires are controlled carefully.

Just think of the fate of the horse-rider who can’t hold the bridle of the horse. Appropriate control over the horse is a must if the rider wants to reach somewhere safely. The same is about the agile horse of mind in the journey of life. Prudent vigil and self-restrain are essentials for progress, peace and happiness.

Some audacious youths regard discipline as a barrier against their enthusiasm and energy; they want to break all mental, social and national norms. But this puts them and many others into trouble and harms everyone. Alertness and guidance of matured wisdom are as necessary with zest in life as was Krishna’s support to Arjuna in the Mahabharat war. If humans are intelligent beings, they should note that steadfastness and farsightedness are signs of intelligence.

📖  Akhand Jyoti, May 1946

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग ३)

भगवान बुद्ध ने तत्कालीन अनाचारों के- मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध प्रचण्ड क्रान्ति खड़ी की थी, इसी संघर्ष से जूझने के लिए उन्होंने जीवधारी भिक्षुओं और श्रवणों की सेना खड़ी की थी। स्वार्थ के लिए तो सभी संघर्ष करते हैं, किन्तु परमार्थ के लिए लड़ना मात्र आदर्शवादी लोगों के लिए ही सम्भव होता है इसलिए बुद्ध शिक्षा में साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नव-युग का शंख बजाया और नये जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की पूजा-पाठ की सस्ती लकीर पीटते रहना तो जारी रखा किन्तु अनीति से लड़ने की कष्टसाध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म भारत-मध्य एशिया से चढ़ दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते पद-दलित कर दिया गया। शौर्य, साहस की तेजस्विता खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है, वही अपने देश की भी हुई। एकाँगी, सस्ती, धर्म मान्यताएं तो दीन-दुर्बलों को भी अपनी खाल बचाने के लिए अच्छी लगती हैं, पर वास्तविक धर्म में तो अनीति विरोधी संघर्ष ही जुड़ा हुआ है उसके लिए शौर्य, साहस न हो तो फिर मनुष्य बगलें झांकता है और उन सिद्धान्तों की दुहाई देता है जो मात्र उच्चस्तरीय विशिष्ट आत्माओं को विशेष आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ही बनाये गये हैं। पानी में बहते बिच्छू के बार-बार काटने पर भी उसे बार-बार निकालने की कथा किसी विशेष सन्त की कीर्ति में चार चाँद लगा सकती है, पर सर्वसाधारण के लिए शेख सादी की वही उक्ति ठीक है जिसमें “बिच्छू पर दया करना बच्चों को मार डालने के समतुल्य” बताया गया है।

गुरु गोविन्दसिंह का अध्यात्म व्यावहारिक और जीवन्त था। उनने अपने शिष्यों के एक हाथ में माला और दूसरे में भाला थमाया। समर्थ गुरु रामदास ने अपने प्रौढ़ शिष्य शिवाजी को तलवार थमाई थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को ऐसे ही कार्यों में जुटाया। गांधी ने अपने अनुयायियों को प्रत्यक्ष मृत्यु से लड़ने का निर्देश दिया और कहा- ‘‘टूट जाना पर अनीति से लड़ने की हठ छोड़ना मत।’’

भगवान राम ने ऋषियों के अस्थि समूह के बने टीले देखे। उनकी आंखों में ‘‘नयन जल छाये’’ किन्तु वे आंसू कायरों, दुर्बलों और भावोन्मादियों के नहीं वीरों के थे। उनने भुजाएं उठाकर प्रतिज्ञा की कि जिनने यह दुष्कर्म किये हैं उन निश्चरों से इस पृथ्वी को रहित करके छोड़ेंगे। यदि अनाचार पीड़ित पर वस्तुतः दया आती हो और उससे सहानुभूति उपजी हो तो फिर उसका एक ही उपाय है कि उन अनीति के असुर से जूझा जाय तो इस विपत्ति का कारण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

रविवार, 26 जुलाई 2020

👉 परिजनों से हमारी अपेक्षा

युग-परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण व्यक्ति अग्रिम भूमिका निभाते हैं, पर उनके पीछे एक दिव्य समुदाय पहले से ही किसी अदृश्य सूत्र शृंखला में बँधा आता है और उसी के समन्वित प्रयासों से महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। राम के साथ रीछ, वानरों की भूमिका रही। कृष्ण के गोवर्धन उठाने में गोप-बालकों का और महाभारत में पाण्डवों का योगदान रहा। बुद्ध की भिक्षु मण्डली में लाखों नर-नारी थे। गाँधी के सत्याग्रहियों की सेना का परिचय सभी को है। समय की महत्वपूर्ण भूमिका पूरी करने के लिए ऐसी ही सामूहिक शक्तियाँ अवतरित होती हैं, भले ही उसके नेतृत्व का श्रेय किसी को भी मिले।

अपना विशिष्ट समय है। इन्हीं क्षणों मानव जाति के भविष्य का भला या बुरा फैसला होने जा रहा है। या तो मनुष्य जाति को युद्ध विभीषिका, बढ़ती जनसंख्या एवं निकट स्तर की आपाधापी में उलझ कर सामूहिक आत्महत्या करनी पड़ेगी या फिर लोक-एकता, समता, ममता, शुचिता जैसे उच्च आदर्शों को अपनाकर मनुष्य में देवत्व के अवतरण और धरती पर स्वर्ग के वातावरण का आनन्द लेंगे। इन निर्णायक घड़ियों में विशिष्ट आत्माओं को विशिष्ट परिश्रम करना पड़ेगा- विशेष कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व निभाना होगा। इतने बड़े कार्य अनायास ही नहीं हो जाते। उसके लिए जन-मानस का प्रखर मार्ग-दर्शन करने के लिए जागृत आत्माओं को वाणी से नहीं अपने अनुकरणीय आचरण प्रस्तुत करने होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें युग-परिवर्तन की इस विशिष्ट वेला में अपनी जीवन नीति इस प्रकार प्रस्तुत करनी चाहिए जो जनसामान्य के लिए अनुकरणीय बन सके।

हम बारीकी से इस सन्दर्भ में तीखी दृष्टि परिजनों पर डालते रहते हैं। कथनी नहीं करनी से ही किसी का मूल्याँकन होता है। इस दृष्टि से अपने परिजन हमारी अपेक्षा, आकाँक्षा के अनुरूप वजनदार नहीं बैठते तो वह हलकापन हमें अखरता है। पेट और प्रजनन में तो नर-कीटक भी लगे रहते हैं। लोभ और मोहग्रसित आपा-धापी में नर-पशुओं को भी प्रवृत्त देखा जा सकता है। वासना, तृष्णा से प्रेरित नर-वानरों के क्रीड़ा-कौतुक तो पिछड़े क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं। हम भी उसी स्तर की इच्छा और क्रिया अपनायें रहें तो फिर विशिष्ट समय में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिए भेजी गई विशेष-आत्माओं का अवतरण ही निरर्थक हो गया। यह कैसी कष्टकर स्थिति है।

परिजनों से हमारी अपेक्षा रही है कि वे वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा के दल-दल से अपने को निकालें। सुविस्तृत परिवार पर जब इस दृष्टि से नजर डालते हैं तो सन्तोष स्वल्प और असन्तोष बड़े परिमाण में सामने आ खड़ा होता है। दूसरों की दृष्टि में युग-निर्माण परिवार के सदस्य नव-निर्माण की मूक साधना में अत्यन्त निष्ठापूर्वक संलग्न रहकर मानवी आदर्शों का अभिवर्धन करने वाले, रचनात्मक कार्यों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए कहे जाते हैं। किसी हद तक यह मूल्याँकन सही भी है। पर इतने से हमें तो सन्तोष नहीं होता। हमें अधिक चाहिए। परिजनों की जीवन विद्या प्रकाशपूर्ण, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद बन सके, यही अपनी अपेक्षा है। इससे कम में युग की पुकार को पूरा कर सकने वाले प्रयास बन ही नहीं पड़ेंगे। ज्यों-ज्यों कुछ आधा-अधूरा, काना-कुबड़ा चलता भी रहा तो उतने से कितनी देर में-क्या कुछ बन पड़ेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 Accept Your Flaws

Whenever one commits a mistake he instantly feels a shock in the inner self. But the next moment his (extrovert) conscious mind comes into action and advices to ignore and hide it because there will insult, penalty or some other unpleasant experience if others come to know about it… This idea further accrues lame excuses, false arguments and triggers him find ways to somehow protect himself and allege someone else for whatever wrong has been done.

But this is the beginning of a vicious cycle. Hiding a flaw even for once induces a tendency to do so again and again. This gradually becomes a habit and one stops caring for what is wrong and what is not. The mist of falsehood darkens and weakens his inner self and cultivates sinful tendencies.

Confessing for own weakness or misdeeds in fact shows one’s spiritual courage and inner purity. So, if one accepts his own flaws or apologizes for whatever wrong he has committed, he would elevate his dignity. This is a brave act. It enhances one’s inner strength. With same strength, one should vow not to repeat such mistakes. Doing this will gradually refine him and accelerate his progress along the righteous path of progress on the worldly as well as spiritual fronts.

📖  Akhand Jyoti, April 1946

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग २)

दिन-दहाड़े सरे-बाजार गुण्डागर्दी होती रहती है और यह भले बनने वाले लोग चुपचाप उस तमाशे को देखते रहते हैं। गुण्डों की हिम्मत बढ़ती है और वे आये दिन दूने उत्साह से वैसी ही हरकतें करते हैं। यदि देखने वाली भीड़ ने जोर से एक साथ शोर ही मचा दिया होता तो सरे आम गुण्डागर्दी करने वालों के पैर उखड़ सकते थे और दुर्घटना बच सकती थी। अनाचार की घटनाएँ घटती हैं, पुलिस छानबीन करती है, पर प्रत्यक्षदर्शी भले मानुसों में से गवाही देने एक भी नहीं जाता। झंझट से बचने में ही जिन्हें खैर दीखती है वे अनाचार का सामना करने में जो थोड़ी बहुत कठिनाई उठानी पड़ती है, उसका झंझट क्यों मोल लें? इस भीरुता पर प्रत्यक्ष रूप से गुण्डागर्दी का लाँछन तो नहीं लगाया जा सकता, पर प्रत्यक्ष रूप से अनीति को खाद-पानी देने की जिम्मेदारी उसी की है। अपनी लड़की से कोई गुण्डा छेड़खानी करे तो लोग बदनामी के डर से उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे दुहरी हानि होती है। अगले दिनों लड़की को फिर कोई छेड़े तो वह बेचारी चुपचाप उसे सहन करती रहती है। जानती है अभिभावकों में सामना करने की हिम्मत तो है नहीं। छिपाने का ही उपदेश देंगे ऐसी दशा में उसे छिपाने की बात स्वयं ही करती रहे तो क्या हर्ज है? दूसरी ओर छेड़ने वालों का साहस सौ गुना हो जाता है वे चक्रवर्ती शासक की तरह मूँछें ऐंठते और ताल ठोकते फिरते हैं। मानो इन सज्जन कहलाने वाले कायरों को उन्होंने मक्खी-मच्छर की तरह अपना वशवर्ती बना लिया हो।

छोटे-बड़े प्रत्येक अनाचार के अवसर पर यही दृश्य देखने को मिलता है। विरोध, प्रतिरोध, असहयोग करने के लिए साहस दिखा सकने वाले ढूंढ़े नहीं मिलते वरन् क्षमा का उपदेश देने, गन्दगी पर मिट्टी डालने की बात कहने वाले लोगों की भीड़ सामने आ खड़ी होती है और रोकथाम के लिए जो कुछ किया जा सकता था वह सम्भव ही नहीं हो पाता। स्थिति कितनी दयनीय और कितनी विषम है। लगता है लोगों ने पाप को सुरक्षित रखने और उसे फलने-फूलने देने की ऐसी नीति अपना ली है जो बाहर से निर्दोष लगती है किन्तु वस्तुतः वही अनाचार को बढ़ावा देने में खाद पानी का काम करती है।

भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश का उभय-पक्षीय आश्वासन है। प्रत्येक अवतार के चरित्र में इन दोनों ही तत्वों का समावेश है। अधिक बारीकी से देखने पर प्रतीत होगा कि अवतारों ने धर्मोपदेश तो कम दिये हैं वरन् पाप से जूझने और उसे निरस्त करके छोड़ने की आक्रोश प्रक्रिया में ही अपना अधिक समय लगाया है। रामचरित्र में विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर पंचवटी, दण्ड कारण्य आदि में जूझते हुए अन्ततः लंका युद्ध में जा डटने के ही प्रसंग भरे पड़े हैं। कृष्ण चरित्र में भी उनके जन्मकाल से ही असुरों से जूझने की महाभारत रचाने की और अन्ततः अपने ही वंश वालों को नष्ट होने देने की संरचना में समय बीता। भगवान परशुराम, भगवान नृसिंह, वाराह, भगवती, दुर्गा आदि के अवतार चरित्रों में अनीति से संघर्ष का ही प्रसंग बढ़ा-चढ़ा है। उनके साथी समर्थकों की सेना को धर्म स्थापना का-जप हवन का कितना समय मिला कह नहीं सकते पर स्पष्ट है कि भगवत् भक्तों ने ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अपनी सामर्थ्य झोंक देने का आदर्श उपस्थित किया। रीछ-वानरों ने, ग्वाल-बालों ने पाण्डवों ने, प्रधानतया अनीति विरोधी तप साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

शनिवार, 25 जुलाई 2020

👉 बोलना ही बंधन है

एक राजा के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया। राजकुमार स्वभाव से ही कम बोलते थे। राजकुमार जब युवा हुआ तब भी अपनी उसी आदत के साथ मौन ही रहता था। राजा अपने राजकुमार की चुप्पी से परेशान रहते थे कि आखिर ये बोलता क्यों नहीं है। राजा ने कई ज्योतिषियों,साधु-महात्माओं एवं चिकित्सकों को उन्हें दिखाया परन्तु कोई हल नहीं निकला। संतो ने कहा कि ऐसा लगता है पिछले जन्म में ये राजकुमार कोई साधु थे जिस वजह से इनके संस्कार इस जन्म में भी साधुओं के मौन व्रत जैसे हैं। राजा ऐसी बातों से संतुष्ट नहीं हुए।

एक दिन राजकुमार को राजा के मंत्री बगीचे में टहला रहे थे। उसी समय एक कौवा पेड़ की डाल पर बैठ कर काव - काव करने लगा। मंत्री ने सोचा कि कौवे कि आवाज से राजकुमार परेशान होंगे इसलिए मंत्री ने कौवे को तीर से मार दिया। तीर लगते ही कौवा जमीन पर गिर गया। तब राजकुमार कौवे के पास जा कर बोले कि यदि तुम नहीं बोले होते तो नहीं मारे जाते। इतना सुन कर मंत्री बड़ा खुश हुआ कि राजकुमार आज बोले हैं और तत्काल ही राजा के पास ये खबर पहुंचा दी। राजा भी बहुत खुश हुआ और मंत्री को खूब ढेर - सारा उपहार दिया।

कई दिन बीत जाने के बाद भी राजकुमार चुप ही रहते थे। राजा को मंत्री कि बात पे संदेह हो गया और गुस्सा कर राजा ने मंत्री को फांसी पर लटकाने का हुक्म दिया। इतना सुन कर मंत्री दौड़ते हुए राज कुमार के पास आया और कहा कि उस दिन तो आप बोले थे परन्तु अब नहीं बोलते हैं। मैं तो कुछ देर में राजा के हुक्म से फांसी पर लटका दिया जाऊंगा। मंत्री की बात सुन कर राजकुमार बोले कि यदि तुम भी नहीं बोले होते तो आज तुम्हे भी फांसी का हुक्म नहीं होता। बोलना ही बंधन है। जब भी बोलो उचित और सत्य बोलो अन्यथा मौन रहो। जीवन में बहुत से विवाद का मुख्य कारण अत्यधिक बोलना ही है। एक चुप्पी हजारों कलह का नाश करती है।

राजा छिप कर राजकुमार की ये बातें सुन रहा था,उसे भी इस बात का ज्ञान हुआ और राजकुमार को पुत्र रूप में प्राप्त कर गर्व भी हुआ। उसने मंत्री को फांसी मुक्त कर दिया।

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

क्रान्तियों में आँधी जैसा वेग चाहिये। अक्सर उखाड़ फेंकने वाले आन्दोलनों को ही क्रान्ति कहा जाता है। पर जिसका लक्ष्य सृजन हो, उत्पादन हो, अभिवर्धन हो, काया-कल्प जैसा परिवर्तन हो वह देवत्व की पक्षधर क्रान्ति तो और भी कठिन होती है। एक मशाल लेकर समूचे  गाँव को एक घंटे में जलाया जा सकता है, फिर उस गाँव में लगे क्षेत्र में सिंचाई का प्रबन्ध करके हरीतिमा की मखमली चादर बिछाना कितना श्रम साध्य और समय साध्य होता है, इसे सभी जानते हैं। अग्निकाण्ड के लिये एक पागल का उद्धत आचरण भी पर्याप्त है, पर लह-लहाती फसल उगाने या भव्य भवन बनाने के लिये तो कुशल कारीगरों की सुविकसित योग्यता और अगाध श्रम निष्ठा चाहिये।

प्रज्ञा परिवार सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों सैनिकों का स्तर ऊंचा चाहिये। ऐसा ऊंचा इतना अनुशासित कि उसके कर्तृत्व को देखकर अनेकों की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया- वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को सम्पन्न करने के लिये कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिये। लोभ, मोह और अहंकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिये। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकेंगे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के सन्देश को और भी व्यापक बनाया जाय। इसके लिये जन-जन से संपर्क साधा जाय। घर-घर अलख जगाया जाय। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाय। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़े उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जांय। भले ही वे जन्म मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना पड़ता, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन सम्पन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिये जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके। जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिये इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊंचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिये। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसा चरित्र भी चाहिये और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९८५

👉 Throw Away All Fears from Your Mind

Getting scared is not a natural tendency of human self. Your soul is absolutely free. It is only our mind, which has created all sorts of fears, worries, sorrows and what not. It is up to you whether to make your inner world ghostly and abominable by such negative tendencies or transform it into a living paradise pervaded with fearlessness, vivid zest, and illumined faith. No one can harm or help you if you awakened yourself. If you want, you can really be strong and free from all worries and fears. Remember again and again that it is your own good or bad thoughts, virtuous or evil tendencies and discerning or confused intellect that ‘create’ your auspicious or ill omen.

Even a slightest instinct of fear or worry disturbs your mental peace. Your thoughts then tend to revolve around its imaginary causes. It expands with greater intensity unless you awaken, firmly decide and uproot and throw it out from your mental field. Better do it now itself and keep away from all such negative feelings. Fight out and eradicate the demons of all fears and worries by the might of inner strength and self-confidence. Think of yourself as the immortal soul, the smog of all weaknesses and apprehensions will disappear with the dawn of self-recognition.

📖  Akhand Jyoti, Mar. 1946

👉 सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ

धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग १)

संसार में अवाँछनीयता कम और उत्कृष्टता अधिक है। तभी तो यह संसार अब तक जीवित है। यदि पाप अधिक और पुण्य स्वल्प रहा होता तो अब तक यह दुनिया श्मशान बन गई होती। यहाँ सत्य, शिव और सुन्दर इन तीनों में से एक का भी अस्तित्व जीवित न रहा होता। आग दुनिया में बहुत है, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी हम देखते हैं कि अनाचार घटता नहीं, बढ़ता ही जाता है। सरकारी प्रयत्न रोकथाम के लिए काफी बढ़ाये गये हैं, पर उनकी पकड़ में दुष्टता की पूँछ भर आती है। सारा कलेवर जो जहाँ का तहाँ जमा बैठा रहता और अपना विस्तार करने में संलग्न रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि सज्जनता का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी दुष्टता क्यों पनपती और फलती-फूलती चली जाती है? रोकथाम की सर्वजनीन आकाँक्षा क्यों फलवती नहीं होती? असुरता की शक्ति क्यों अजेय बनती जा रही है? देवत्व उसके आगे पराजित होता और हारता, झक मारता क्यों दिखाई देता है?

विचार करने पर स्पष्ट होता है कि पाप-शक्ति स्वल्प है। बलवान चोर घर में घुसे और घर मालिकों में से कुछ स्त्री, बच्चे जग पड़ें-कुत्ते भौंकने लगें तो उन्हें तत्काल उलटे पैरों भागना पड़ता है। स्पष्ट है पाप अत्यन्त दुर्बल होता है प्रकारान्तर से दुर्बलता ही निकृष्टता के रूप में परिणत होती है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल बताया गया हैं। परन्तु उसके हारने और असत्य के मजबूती से पैर जमाये रहने का कुछ तो कारण होना ही चाहिए। वह यह है कि जन-मानस में से उस रोष-आक्रोश का-शौर्य-साहस का अस्तित्व मिटा नहीं तो घट अवश्य गया है, जिसमें अनीति की चुनौती स्वीकार करने की तेजस्विता विद्यमान रहती है। इस कसौटी पर औसत आदमी बड़ा डरपोक, कायर, दब्बू, संकोची, पलायनवादी और कुछ-कुछ वैसा ही बन जाता है जैसा कि गीता का विवादग्रस्त अर्जुन था। उसमें रोष-आक्रोश उत्पन्न करने के लिए ही भगवान को गीता सुनानी पड़ी और अपने प्राण प्रिय मित्र को क्लीव, क्षुद्र, दुर्बल, अनार्य आदि एक से एक कड़वी गालियों की झड़ी लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई।

अर्जुन समझौतावादी, संतोषी प्रकृति का और सज्जन दीखता है। वह क्षमा करने, सन्तोष रखने की नीति अपनाना चाहता है और भीख आदि के सहारे संतुष्ट रहना चाहता है। युद्ध का कटु प्रसंग उसे अच्छा नहीं लगा। आज हम सब की मनःस्थिति ऐसी ही हो गई है कि झगड़े में न पड़ने, किसी तरह झंझट काट लेने, अनाचार से निगाह चुरा लेने की बात में ही भलाई देखते हैं। यह भलाई दिखाने वाली सज्जनता का आवरण ओढ़े हुए क्षमाशीलता वस्तुतः परले सिरे की कायरता होती है। इससे अपने को झंझट में न पड़ने से बचाने के अतिरिक्त किसी से दुश्मनी मोल न लेने और बदनामी से बचने जैसे ऐसे तत्व भी मिले रहते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से अनीति समर्थक और परिपोषक ही कहा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति १९७६ नवम्बर ६४

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

👉 The World is a Reflection of Our Minds

The state and activities of the mind affect the body and those of the latter influence the mind in return. This cycle continues throughout the life. For example, if there is an ailment or pain somewhere in the body, mind also will be disturbed and worried. If mind is depressed, the body will also become inactive and so on. According to Vedanta, your mind is the architect of what you are and what the nature of your world is.

Mind is the linkage between successive live. One’s inner desires, convictions, thoughts are constantly inscribed in the inner core of the mind; these influence the intrinsic tendencies of mind and hence the future course of life… Even the kind of life form, the type of body, the circumstances one is born in, are shaped by the intrinsic nature of one’s mind. Thus, the world around us is nothing but a shadow or a reflection of our mind.

The world is neither good nor bad in itself. Little deeper thinking will make it clear to you that you experience the world as per the nature of your own inner self. Good or bad, beauty or ugliness, superiority or inferiority, etc are all creations of your own mind. It is in your hands whether to ruin your life in the poison of evils of jealous, hatred, selfishness or sooth it by the nectar of virtuous
tendencies.

📖  Akhand Jyoti, Feb. 1946

👉 प्रज्ञा परिजनों का स्तर

प्रज्ञा परिजनों का स्तर जन साधारण की दृष्टि से कहीं ऊंचा है। दूसरे लोग पेट-प्रजनन के अतिरिक्त जहाँ दूसरी बात सोचते ही नहीं वहाँ प्रज्ञा पुत्रों ने लोभ, मोह और अहंकार के त्रिविध भव-बंधन तोड़े नहीं तो ढीले अवश्य किये हैं। निजी आवश्यक कार्यों के साथ-साथ उन्होंने जन-जागृति के, युग परिवर्तन के कार्य को भी महत्व दिया है। यह साधारण बात नहीं, असाधारण बात है। अन्यान्य संस्था संगठनों की तुलना में प्रज्ञा परिवार का स्तर ऊंचा नहीं तो नीचा भी नहीं कहा जा सकता। इतने पर भी हमें शिकायत रही कि साधु, ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह करने वाले देव मानव स्तर के लोगों की संख्या विस्तार, आत्मबल, त्याग, बलिदान और पवित्रता, प्रखरता एक दृष्टि से उतनी ऊंची नहीं उठ पायी जितनी कि हम उनसे चाहते थे। जो युग परिवर्तन के हनुमान, अर्जुन जैसे अग्रदूत बनते, उनसे उतना पुरुषार्थ बन नहीं पड़ा।

इसी प्रकार यही कमी हमें खटकती रही कि जिस आन्दोलन के द्वारा 500 करोड़ मनुष्यों का भाग्य, भविष्य और स्वरूप ऊंचा उठाने के लिये प्रज्ञा आलोक का प्रकाश जितना व्यापक होना चाहिये था, उतना नहीं हो सका। मिशन की जानकारी भले ही करोड़ों को हो। पर उसके समर्थक सहयोगी 20 लाख से अधिक नहीं बढ़ पाये। यह संख्या जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कने की तरह है। 500 करोड़ का 2500 वां भाग ही 20 लाख होता है। सभी परिजन यदि मिशन का सन्देश और अधिक जन-जन तक पहुँचाना चाहें तो वर्तमान प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को 25 हजार व्यक्तियों के साथ घनिष्ठ संपर्क साधना होगा। यह मुनादी पीटने की दृष्टि से तो शायद किसी कदर सफल भी हो जाय, पर जहाँ तक चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ वानर तो मोर्चे पर खड़े कर सकेंगे पर वैसा बना नहीं। अन्य संगठनों की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से 20 लाख समर्थक सदस्य होना बड़ी बात हो सकती है। पर काम जितना करने को पड़ा है और समय जितना विषम है, उसे देखते हुये साथियों की संख्या निश्चित रूप से अपर्याप्त है।

समय की विषमता दिन-दिन गम्भीर होती जाती है। सर्वनाश के बादल सभी दिशाओं से घुमड़ते आ रहे हैं। तूफानी विग्रहों की गणना नहीं। प्रदूषण, विकिरण जन संख्या उत्पादन जैसी समस्याएं सामने हैं। जन-जन के मन-मन में पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। दुष्टों को आक्रमण करने का जितना दुस्साहस है उससे अनेक गुना छद्म श्वेत वस्त्रधारी और भले मानुष बनने वाले लोग करते हैं। प्रपंचों, संकीर्णताओं और अवाँछनीयताओं की दृष्टि से सभ्य दिखते हुये भी आदमी आदिम युग के जंगलियों जैसा असभ्य बनता जाता है। महायुद्ध की विभीषिका उन सबसे ऊपर है। किसी भी दिन बारूद के पहाड़ में कहीं से कोई चिनगारी उड़ कर पहुँच सकती है और उसका अन्त, इस सुन्दर धरती के रूप में परमात्मा की जो कलाकृति उभरी है। उस सृजन के देखते-देखते भस्मसात हो सकती है। अब की बार का युद्ध इस धरती को सम्भवतः प्राणियों के रहने योग्य भी न रहने दे।

इस विनाश बेला में सुरक्षा शक्ति की- शान्ति सेना की जितनी बड़ी संख्या चाहिये, उसका हौसला जितना बढ़ा-चढ़ा होना चाहिये। वह प्रयत्न करने पर भी बन नहीं पड़ा। एक अच्छा संगठन खड़ा करने भर से हमें किसी भी प्रकार का सन्तोष नहीं होता। जितना बड़ा संकट है, उसके अनुरूप ही अनर्थ को रोक सकने वाली चतुरंगिणी चाहिये। वह न बन पड़े तो छुटपुट प्रयत्नों का, निर्माणों का महत्व ही क्या रह जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९८५

👉 मनुष्य−मनुष्य के बीच का अन्तर

आलसी और उत्साही, कायर और वीर, दीन और समृद्ध, दुर्गुणी और सद्गुणी, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश−पाताल जैसा अन्तर मनुष्यों के बीच में दीख पड़ता है उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती हैं पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है। पंचानवे प्रतिशत कारण मानसिक स्थिति ही है। बुरी−से−बुरी परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक विशेषताओं के द्वारा उन बाधाओं को पार करता हुआ, देर−सवेर में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगा। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी−से−बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है, मानवोचित सम्मान और सुविधायें प्राप्त कर सकता है। पर जिसकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायगी।

परमात्मा ने मनुष्य और मनुष्य के बीच में बहुत थोड़ा अन्तर रखा है। सभी के शरीर लगभग एक से हैं। आवश्यकतायें, विशेषताएँ, परिस्थितियाँ भी सभी की लगभग एक−सी हैं। शरीर और मस्तिष्क की बनावट और कार्य प्रणाली में भी कोई बहुत अन्तर नहीं है। यों थोड़ा बहुत अन्तर रहता है, वह इतना ही है जितना एक पेड़ के पत्तों में, या एक जाति के पक्षियों में रहता है। यह इतना अधिक नहीं है कि उसके कारण किसी को विवशता अनुभव करनी पड़े। कुछ थोड़े से रुग्ण अपंग या ऐसे ही असमर्थों को छोड़कर साधारणतया सभी को परमात्मा ने लगभग एक−सा शरीर और मन दिया हुआ होता है और यदि मनुष्य उनका सदुपयोग करे तो ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त कर सकता है और यदि दुरुपयोग करने पर उतर आवे तो पतन, अन्धकार एवं नरक जैसी, अज्ञान दारिद्र एवं असमर्थता जैसी—बुरी परिस्थिति में ग्रसित हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 21

👉 भक्त के लिए ईश्वर का उपहार

ईश्वर अपने हर भक्त को एक प्यार भरी जिम्मेदारी सौंपता है और कहता है इसे हमेशा सम्भाल का रखा जाय। लापरवाही से इधर-उधर न फेंका जाय। भक्तों में से हर एक को मिलने वाली इस अनुकम्पा का नाम है- दुःख। भक्तों को अपनी सच्चाई इसी कसौटी पर खरी साबित करनी होती है।

दूसरे लोग जब जिस-तिस तरीके से पैसा इकट्ठा का लेते हैं और मौज-मजा उड़ाते हैं तब भक्त को अपनी ईमानदारी की रोटी पर गुजारा करना होता है। इस पर बहुत से लोग बेवकूफ बताते हैं न बनायेंगे तो भी उनकी औरों के मुकाबले तंगी की जिन्दगी अपने को अखरती, और यह सुनना पड़ता है कि भक्ति का बदला खुशहाली में क्यों नहीं मिला। यह परिस्थितियाँ सामने आती हैं। इसलिए भक्त को बहुत पहले से ही तंगी और कठिनाई में रहने का अभ्यास करना पड़ता है। जो इससे इनकार करता है उसकी भक्ति सच्ची नहीं हो सकती। जो सौंपी हुई अमानत की जिम्मेदारी सम्भालने से इन्कार करे उसकी सच्चाई पर सहज ही सन्देह होता है।

दुनिया में दुःखियारों की कमी नहीं। इनकी सहायता करने की जिम्मेदारी भगवान भक्त जनों को सौंपते हैं। पिछड़े हुए लोगों को ऊंचा उठाने का काम हर कोई नहीं सम्भाल सकता। इसके लिए भावनाशील और अनुभवी आदमी चाहिए। इतनी योग्यता सच्चे ईश्वर भक्तों में ही होती है। करुणावान के सिवाय और किसी के बस का यह काम नहीं कि दूसरों के कष्टों को अपने कन्धों पर उठाये और जो बोझ से लदे हैं उनको हलका करें। यह रीति-नीति अपनाने वाले को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ईश्वर का सबसे प्यारा बेटा है ‘‘दुःख’’। इसे सम्भाल कर रखने की जिम्मेदारी ईश्वर अपने भक्तों को ही सौंपता है। कष्ट को मजबूरी की तरह कई लोग सहते हैं। किन्तु ऐसे कम हैं जो इसे सुयोग मानते हैं और समझते हैं कि आत्मा की पवित्रता के लिए इसे अपनाया जाना आवश्यक है।

जो सम्पन्न हैं, जिन्हें वैभव का उपयोग करने की आदत है उन्हें भक्ति रस का आनन्द नहीं मिल सकता। उपयोग की तुलना में अनुदान कितना मूल्यवान और आनंददायक होता है, जिसे यह अनुभव हो गया वह देने की बात निरन्तर सोचता है। अपनी सम्पदा, प्रतिभा और सुविधा को किस काम में उपयोग करूं इस प्रश्न का भक्त के पास एक ही सुनिश्चित उत्तर रहता है दुर्बलों को समर्थ बनाने, पिछड़ों को बढ़ाने और गिरों को उठाने के लिए। इस प्रयोजन में अपनी विभूतियाँ खर्च करने के उपरान्त संतोष भी मिलता है और आनन्द भी होता है। यही है भगवान की भक्ति का प्रसाद जो ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के हिसाब से मिलता रहता है।

भक्त की परीक्षा पग-पग पर होती है। सच्चाई परखने के लिए और महानता बढ़ाने के लिए। खरे सोने की कसौटी पर कसने और आग पर तपाने में उस जौहरी को कोई एतराज नहीं होता जो खरा माल बेचने और खरा माल खरीदने का सौदा करता है। भक्त को इसी रास्ते से गुजरता पड़ता है। उसे दुःख प्यारे लगते हैं क्योंकि वे ईश्वर की धरोहर हैं और इसलिए मिलते हैं कि आनन्द, उल्लास, संतोष और उत्साह में क्षण भर के लिए भी कमी न आने पाये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985

👉 Teen Tarh Ke Log तीन तरह के लोग

हम झूठ बोलते हैं क्योंकि सच बोलने पर लोग अक्सर हमारा साथ छोड़ देते हैं। यह विडम्बना है कि झूठ ज्यादा खूबसूरत और मधुर होता है, इसीलिए जल्दी स्वीकार भी हो जाता है... सच कड़वा, तीखा और ज्वलनशील होता है...इसीलिए सच सुनकर वो लोग भी आपसे दूर हो जाते हैं जो कहते फिरते हैं कि "वो आपके साथ हैं".... लोग अकेले पड़ जाने के भय से झूठ बोलते हैं, फिर उसी झूठ को सच मानने लगते हैं, और फिर धीरे - धीरे उसी झूठ में जीने लगते हैं।

ज़िन्दगी में हमें तीन तरह के लोग मिलते हैं,

एक वो जिन्हें आपसे जुड़ने में रुची होती है, आपसे गप्पे मारने में, टाइम पास करने में ...किंतु आपके सच को सुनने में कतई रुचि नहीं होती ... ये लोग मौका पड़ने पर "आपकी ज़िन्दगी आप जानों" कहकर भाग जाते हैं...

दूसरे लोग वो होते हैं जो आपका सच बड़े प्रेम और भावुकता से सुनते हैं, पर मौका पड़ने पर बड़ी धूर्तता से उसे आपके विरुद्ध प्रयोग करते हैं... ऐसे लोगों को जरा सा भी फर्क नहीं पडता कि उनके इस व्यवहार से, कुटिलता से आप किस हद तक टूट सकते हैं।

तीसरा प्रकार उन लोगों का है जो आपकों सुनते हैं, और अपने जीवन अनुभवों से आपकों समझाते हैं, धैर्य रखने की सलाह देते हैं, साथ ही आपके हर निणर्य में आपके नज़रिए को समझने का प्रयास करते हैं, क्योंकि ऐसे लोग वाकई आपको समझते हैं।

तीसरे प्रकार के लोग कम ही मिलते हैं... इसीलिए हम झूठ बोलते हैं, और झूठ ही जीते हैं... क्योंकि वही सरल है, वही सहज है, वही स्वीकार्य भी है। ....इसीलिए तो संत रहीमदास कहते हैं:-

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय l
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय ll

🙏 सुप्रभात 🙏
आपका यह दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

👉 क्रोध पर नियंत्रण:-

एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता। प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी -थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।

वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की और बैठ गया उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।

राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है।

काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिराके वापस सामने बैठ गया।

अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है, मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है अब मैं इसे नही छोड़ूंगा अब ये जब वापस आएगा तो  इसे खत्म कर दूंगा।

इसप्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है। काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द -बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहा से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।

क्योकि उस डाली पर एक भयंकर अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी।

राजा के मन में पश्चॉत्ताप  का समन्दर उठने लगता है की हे प्रभु! मैने यह  क्या कर दिया। जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया।

काश मैने सन्तों  के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता, अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नही जाती। हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया? हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है।

इसीलिये कहते हैं कि..

क्षमा औऱ दया धारण करने वाला सच्चा वीर होता है।
क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ साथ अपने खुद का ही बहुत नुकसान कर देता है।
क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमेशा क्रोध पर नियंत्रण  रखना चाहिए।

👉 नवयुग का आगमन अतिनिकट है।

जो संकट इन दिनों सामने खड़े दृष्टिगोचर हो रहे हैं, विज्ञजनों ने जिन सम्भावनाओं का अनुमान लगाया है, वे काल्पनिक नहीं हैं। विभीषिकाएँ वास्तविक हैं, इतने पर भी विश्वासियों को यह विश्वास करना चाहिए कि समय चक्र को बदला जायेगा और जो संकट सामने खड़े दीखते हैं, उन्हें उलटा जायेगा।

सामान्य स्तर के लोगों की इच्छा शक्ति भी काम करती है। जनमत का भी दबाव पड़ता है। जिन लोगों के हाथ में इन दिनों विश्व की परिस्थितियाँ बिगाड़ने की क्षमता है, उन्हें जागृत लोकमत के सामने झुकना ही पड़ेगा। लोकमत को जागृत करने का अभियान “प्रज्ञा आन्दोलन” द्वारा चल रहा है। यह क्रमशः बढ़ता और सशक्त होता जायेगा। इसका दबाव हर प्रभावशाली क्षेत्र के समर्थ व्यक्तियों पर पड़ेगा और उनका मन बदलेगा कि अपने कौशल, चातुर्य को विनाश की योजनाएं बनाने की अपेक्षा विकास के निमित्त लगाना चाहिए। प्रतिभा एक महान शक्ति है। वह जिधर भी अग्रसर होती है, उधर ही चमत्कार प्रस्तुत करती जाती है।

वर्तमान समस्याएँ एक दूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव, बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएं। एक को सुलझा लिया जाय और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है तो उनके हल निकल कर ही रहेंगे।

शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्र बल-धन-बल। दूसरा बुद्धि बल संगठन बल। पिछले बहुत समय से शस्त्र बल और धन बल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन आया, सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवी शक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठन बल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ कर दिखा सकती हैं, इसकी अनुभूति सबको करानी है।

न्याय की प्रतिष्ठा हो, नीति को सब ओर से मान्यता मिले, सब लोग हिलमिल कर रहें और मिल बांटकर खायें, इस सिद्धांत को जन भावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जायेगा, तो दिशा मिलेगी, उपाय सूझेंगे, नयी योजनाएं बनेंगी, प्रयास चलेंगे और अंततः लक्ष्य तक पहुंचने का उपाय बन ही जायेगा।

‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’’ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ यह दो ही सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें अपना लिये जाने के उपरांत तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किस अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा, किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा। मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और उसे औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके। नव निर्माण का प्रश्न भी ऐसा ही है। मनुष्य कुछ बनाने पर उतारू हो तो वह क्या नहीं बना सकता? मिश्र के पिरामिड, चीन के दीवार, ताजमहल, स्वेज तथा पनामा की नहर, पीसा की मीनार उसी के प्रयासों से ही तो बन पड़े हैं। जलयान, थलयान, नभयान के रूप में उसी की सूझ-बूझ दौड़ती है। नवयुग निर्माण के लिए प्रतिभाशाली लोगों को लोकमत के दबाव से विवश यदि किया जाय तो कोई कारण नहीं कि “मनुष्य में देवत्व” के उदय और “धरती पर स्वर्ग” के अवतरण की प्रक्रिया कुछ ही समय में सरलतापूर्वक सम्पन्न न की जा सके।

अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अन्त समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रम पूर्वक किया भी जायेगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1985

👉 Win Yourself

A life driven by cravings or aimed at sensual joys alone is useless; it is a blot on the glory of human life, a burden on the earth. Despite being endowed with superior powers, immense potentials, such a person lives a life not different from beasts. He has chosen disgraceful decline… It is pathetic to see a fellow human remaining dormant and letting his life be ruined without any effort, and suffering the consequent miseries. He also makes others related to him face adversities, insult and pains in different forms.

Sensual passions and luxuries without hard work are worse then ‘death’ whereas self-restrain, awareness and disciplined alacrity are real signs of life. A true winner is the one who transforms the ‘wrought iron’ of ambitions and cravings into the ‘gold’ of enlightened potentials. Such a fellow finds joy in every element of Nature.

The dignity of human life lies in uprooting the beastly tendencies, winning over the passions and rising for higher goals. You should be the master and not a slave of your body and mind. A wise man rules over his sense organs and makes constructive use of them as per the directions of wisdom. It is only such farsighted people who awaken the divine potentials indwelling in the human body and mind. The secret of unalloyed bliss, luminous success lies in chiseled refinement and evolution of the inherited physical and mental abilities.

📖  Akhand Jyoti, Dec. 1945

👉 सफलताओं का मूल आधार

बुद्धिमानों का यह कथन सर्वांश में सत्य है कि धर्म−अर्थ, काम मोक्ष का मूल आधार शरीर है। दुर्बल और रुग्ण शरीर वाला अपनी जीवन यात्रा का भार भी स्वयं वहन नहीं कर पाता, उसे पग−पग पर दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। दूसरे लोग सहायता न करें तो अपना ही काम न चले ऐसे लोग धर्म कार्य कर सकने के लिए श्रम कैसे कर पावेंगे? धन कमाने के योग्य पुरुषार्थ भी उनसे कैसे बन पड़ेगा? कामोपभोग के लिए इन्द्रियों में सक्षमता कैसे स्थिर रहेगा? और फिर मोक्ष के योग्य श्रद्धा, विश्वास, धैर्य, श्रम और संकल्प का बल भी उनमें कहाँ से रहेगा? इसलिए बीमार और कमजोर आदमी इस संसार में कुछ भी प्राप्त कर सकने की स्थिति में नहीं रहता। रोग को पाप का फल माना गया है। वस्तुतः वह प्रत्यक्ष नरक ही है। नरक में पापी लोग जाते हैं।

स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करना भी सदाचार के, धर्म के अन्य नियमों को तोड़ने के समान ही अनुचित है। जब झूठ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि दुष्कर्मों द्वारा सामाजिक एवं नैतिक नियमों का उल्लंघन करने वाले ईश्वरीय और राजकीय दंड भोगते हैं तो स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करने वाले क्यों पापी न माने जायेंगे? क्यों उन्हें प्रकृति दंड न देगी? शरीर में भीतर व्यथा और बाह्य जीवन में असफलता, यह दुहरा दंड उन लोगों के लिए सुनिश्चित है जो पेट पर अत्याचार करके उसे शक्तिहीन बना देते हैं। चटोरेपन की बुरी आदतें ही स्वास्थ्य की बर्बादी का एकमात्र कारण है, इसलिए इन आदतों को भले ही राजकीय दंड विधान में अपराध न माना गया हो पर प्रकृति की दंडसंहिता में अपराध ही गिना गया है और उसके लिए वह दंड सुनिश्चित है जिसे आज सब ही भुगत रहे हैं। भीतर व्यथा और बाहर असफलता के दंड हम में से अधिकाँश को आज सहन करने पड़ रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (अन्तिम भाग)

महामानवों के पास भौतिक सम्पदायें भले ही न रही हो पर उनकी चरित्र निष्ठा, आदर्शवादिता और उदारता की पूँजी इतनी प्रचुर मात्रा में उन्हें विभूतिवान बनाये रही है और वह वैभव इतना बढ़ा रहा है, जिसके ऊपर धन कुबेरों की सम्पन्नता को न्यौछावर किया जा सके। ऋषियों के चरणों में राजमुकुट रखे देखकर यह समझा जा सकता है कि सन्मार्गगामी सर्वथा निर्धन नहीं होते, उनके पास अपने ढंग की ऐसी सम्पदा होती है जिसे पाकर मानव जीवन को सब प्रकार सार्थक एवं धन्य हुआ माना जा सके।
  
भौतिक विज्ञानियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि शारीरिक स्वास्थ्य का आधार मात्र पौष्टिक आहार एवं व्यायाम नहीं है वरन् मनःक्षेत्र की समस्वरता पर आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की नींव रखी हुई है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय रोगों के विशेषज्ञ यह कहते हैं कि अधिक मानसिक श्रम करने आदि के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं होते वरन् छल, प्रपंच, क्रूर दुराचरण जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ ही मनःसंस्थान में अन्तर्द्वन्द्व मचाती हैं और उन्हीं के फलस्वरूप अनिद्रा एवं सनक से लेकर उन्माद जैसे रोग अपने विभिन्न आकार- प्रकार में उठ खड़े होते है। कोई समय था जब वात, पित्त, कफ़, आहार- विहार, कृमि कीटाणु, छूत संक्रमण, ऋतु प्रभाव, गृहदशा, भाग्य प्रारब्ध आदि को विभिन्न रोगों का कारण माना जाता था। वे बातें पुरानी हो गई। मनःशास्त्र के विज्ञानी अब उस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अनैतिक, असामाजिक और अवांछनीय चिन्तन से, इस प्रकार की घुटन से भरा आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुँच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति- नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एक मात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञानवेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल कराते हैं पश्चाताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।
  
भारतीय धर्म शास्त्र आधि और व्याधि का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध मानता रहा है। आधि अर्थात् मनःक्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ जिस व्यक्ति में भरी होंगी वह शरीर और मस्तिष्क के रोगों से ग्रसित होता चला जायेगा और वे रोग मात्र औषधि चिकित्सा से कदापि अच्छे न हो सकेंगे। कष्टसाध्य रोगों की एक श्रेणी कर्मजन्य भी होती है। उन्हें अन्तःक्षेत्र में जमी हुई दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। इन्हें पश्चाताप और प्रायश्चित द्वारा उखाड़ने का विधान है। असाध्य महारोगों के लिए यह प्रायश्चित्त चिकित्सा प्राचीन अध्यात्म विज्ञान और भौतिक मनोविज्ञान के आधार पर समान रूप से उपयुक्त मानी गई है। मन की निर्मलता से बढ़कर शारीरिक रोगों की निवृत्ति का और कोई कारगर उपाय नहीं है।
  
निश्चित रूप से मनुष्य एक स्वसंचालित यन्त्र है जो कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए परिणाम भोगने की शृंखला में मजबूती के साथ जकड़ा हुआ है। यदि हम सद्भावनाओं का, सत्प्रवृत्तियों का चिन्तन और कर्तृत्व अपनायें तो सहज ही सुख- शान्ति की परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म- दुष्कर्म के प्रतिफल हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शनिवार, 18 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (अंतिम भाग)

मन की सफाई जितनी आवश्यक है, अक्सर उस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। बहिरंग उपचार को ही प्रमुख मानने वाले तथा फिर उपासक, साधक अपना ध्यान शरीर शोधन तक ही नियोजित रखते हैं। जबकि उनका मन तरह-तरह भ्रम-जंजालों में तर्क-वितर्कों में भ्रमण करता रहता है। लिप्सा, वासना से मुक्ति पाना ही वास्तविक मोक्ष है। अपने मन की शुद्धि की जा सके एवं कामनाओं को भावनाओं में परिणित किया जा सके तो साधना की दिशा में कदम बढ़ा सकना संभव है। जीवन के साधना के विभिन्न उपचार जिनमें परोपकार व लोकमंगल की अनेकानेक गतिविधियाँ आती हंै—इस दिशा में सहायक होते हैं। मनोयोग से किसी काम को करना जीवन साधना का ही अंग है। ‘वर्क इज वरशिप’ इसी को कहते हैं। सबसे पहले जीवन को सुव्यवथित एवं सुनियोजित बना लें, फिर साधना क्षेत्र में प्रवेश करें। पारिवारिकता का विस्तार, अपने दायरे का फैलाव, अनुदारता का उदारता में परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य की संपन्नता का परिचायक है। पर यह सबके लिए इतना आसान नहीं है।
   
इस प्रकार के कदम उठा सकना केवल उसी के लिये सम्भव है, जो त्याग-तप की दृष्टि से आवश्यक साहस कर सके। लोगों की निन्दा-स्तुति, प्रसन्नता-अप्रसन्नता का विचार किये बिना विवेक, बुद्धि के निर्णय को शिरोधार्य कर सके। यदि वस्तुतः जीवन के सदुपयोग जैसी कुछ वस्तु पानी हो तो हमें साहस करने का अभ्यास प्रशस्त करते हुए दुस्साहसी सिद्ध होने की सीमा तक आगे बढ़ चलना होगा। मनस्वी और तेजस्वी होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
  
इन्द्रिय निग्रह में, तितिक्षाओं के अभ्यास में, साधनाओं से इसी दुस्साहस की साधना की जाती है। अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य व्रत, उपवास, सर्दी-गर्मी सहना, पैदल यात्रा, दान, पुण्य, मौन आदि क्रियाकलाप इसीलिए हैं कि शरीर यात्रा के प्रचलित ढर्रे को तोड़कर आन्तरिक इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए शरीर तथा मन को विवश किया जाए। मनोबल बढ़ाने के लिए ही तपश्चर्यायें विनिर्मित की गई हैं। मनोबल और साहस एक ही गुण के दो नाम हैं। मन को वश में करना एकाग्रता के अर्थ में नहीं माना जाना चाहिए। एकाग्रता बहुत छोटी चीज है। मन को वश में करने का अर्थ है—आकांक्षाओं को भौतिक प्रवृत्तियों से मोड़कर आत्मिक उद्देश्योंं में नियोजित करना। इसी प्रकार आत्मबल संपन्न होने का अर्थ है—आदर्शवाद के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकने का शौर्य।  हमें मनस्वी और आत्मबल संपन्न होना चाहिये। आदर्शवाद के लिए तप और त्याग कर सकने का साहस अपने भीतर अधिकाधिक मात्रा में जुटाना चाहिए। तभी हमारा कारण शरीर परिपुष्ट होगा और उससे देवत्व के जागरण की सम्भावना बढ़ेगी। कहना न होगा इस लक्ष्य की आपूर्ति की साधना मानसिक परिशोधन के साथ आरंभ करनी है। मलीनताओं के आवरण से ढके मन के परिष्कार के लिए तप और तितिक्षा का मार्ग अपनाना पड़ता है। पवित्र मन को देवता मानकर अभ्यर्थना की गयी है। कुसंस्कारी मन को पतन-पराभव का कारण माना गया है। मनुष्य की प्रगति अथवा अवगति में मन की ही प्रमुख भूमिका होती है। गीताकार इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहता है—
  
अर्थात् मन मनुष्य के बन्धन अथवा मोक्ष का साधन है। यह बन्धन और मुक्ति और कुछ नहीं मानसिक व्यापार की प्रतिक्रियाएँ मात्र हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे अनेकानेक विकारों से ग्रस्त मन ही बन्धन है। जब वह निर्विकार, निस्पृह और आसक्ति के बन्धनों से रहित होता है तो मुक्ति का साधन बन जाता है। अपने जीवन काल में ही मानसिक स्थिति के अनुरूप बन्धन-मुक्ति का अनुभव किया जा सकता है और आन्तरिक विकारों के बन्धनों से निकलने तथा मुक्ति के दिव्य आनन्द का रसास्वादन करने के लिए मानसिक परिशोधन का आध्यात्मिक पुरूषार्थ करने का साहस जुटाना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Immeasurable Power of Truth

You should speak truth, think truthfully and make your character, your actions, your behavior shine with the glow of truth. This will endow you with immense power, which will be stronger than any other force or power of the world. Confucius used to say that ‘truth contains the force of thousand elephants’.

Indeed the force of truth is immeasurable. It can’t be compared with any other force of the world. The wisest, strongest, truly dignified, is the one, who is honest to the soul, whose conduct is pure as per the guidance of the inner self, who has discarded falsehood, show-off, artificialness in all respects. He won’t have any fear, any worries.

On the contrary, those who are dishonest, manipulative or cunning, they remain trapped in some hidden fear and suspicion all the time. Power of wealth, might, power of people’s support, power of intellect, many kinds of powers are there in the world, but none stands before the power of truth. A truthful person is so powerful that even the gods of heavens bow before him.

📖  Akhand Jyoti, Nov. 1945

👉 पहले भूमि तैयार करनी पड़ेगी

युग−निर्माण की दिशा में हमें पहला कार्य एक ही करना होगा कि जन−मानस में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के निर्माण की आवश्यकता अनुभव करावें। लोगों को यह बतावें कि इन विभूतियों के बिना मानव जीवन निरर्थक जैसा है, ऐसे अर्धमृत जीवन में साँसों की गिनती पूरी कर लेने में क्या सार है? यदि जीना है तो इंसान की तरह क्यों न जियें, यदि मनुष्य का सुरदुर्लभ शरीर पाया है तो इसे सार्थक क्यों न करें? बीमार शरीर, मलीन मन, पतित समाज में रहना नरक के समान दुखदायी ही रहता है। सो जब उसे बदल सकना संभव है तो उस संभावना को सार्थक क्यों न किया जाय? इस प्रकार के प्रश्न जब जन−मानस के अन्तःकरण में उठने लगेंगे तो वह कुछ सोचने और कुछ करने के लिए भी तत्पर होगा। ऐसा जन−जागरण ही हमारा आज का प्रधान कार्य होना चाहिए।

प्रचार में बड़ी शक्ति है। चाय वालों ने चाय की और बीड़ी वालों ने बीड़ी की गंदी आदतें अपने प्रचार के बल पर घर−घर पहुँचा दी। सिनेमा के गंदे गाने छोटी देहातों में बच्चों की जवानों पर चढ़ गये, यह प्रचार साधनों की ही महत्ता है। हम युग−निर्माण के उपयुक्त संयम की, उदारता की, विवेक की आवश्यकता की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करना चाहें तो प्रचार के बल पर ही हो सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार का एक बड़ा विशाल और शक्तिशाली संगठन है। हम सब मिलकर आज युग−निर्माण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक विचारों का प्रसार करें और कल उन आयोजनों, कार्यक्रमों, आन्दोलनों एवं अभियानों की व्यवस्था करें जो आज की अव्यवस्था को उखाड़ दें और उसके स्थान पर स्वर्गीय वातावरण को पृथ्वी पर अवतरित करने के उपकरण उपस्थित कर दें। हमें यही करना है—यही करेंगे भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग ३)

सुविधाजनक प्रगतिशील वातावरण में सुसंस्कारी परिवार में जन्म होना पूर्वकृत सत्कर्मों का फल कहा जा सकता है। दुर्भागी व्यक्ति कुसंस्कारी परिस्थितियों में जन्म लेकर असुविधाजनक अड़चन भरे वातावरण में रहते हैं और प्रगति पथ पर बढ़ने में भारी अड़चन अनुभव करते हैं। इस विभेद के पीछे पूर्व जन्मों में संग्रहीत शुभ- अशुभ कर्म के परिणाम झाँकते देख सकते हैं। यों इन अड़चन भरी परिस्थितियों में भी सत्कर्म करने की, आगे बढ़ने की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है और कोई चाहे तो नियत अवरोधों को सहन करते हुए भी आगे बढ़ने, ऊँचे उठने में सफल हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जिनमें अन्धे, अपंग, मूक, बधिर जैसी विषमताओं से ग्रसित लोगों ने इतनी उन्नति कर ली जिसे देखकर सर्व सुविधा सम्पन्न व्यक्तियों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा।
  
यदि इस संसार में ऐसी व्यवस्था रही होती कि तत्काल कर्मफल मिला करता तो फिर मानवी विवेक एवं चेतना की दूरदर्शिता की विशेषता कुण्ठित अवरुद्ध हो जाती। यदि झूठ बोलते ही जीभ में छाले पड़ जायें, चोरी करते ही हाथ में दर्द उठ खड़ा हो, व्यभिचार करते ही बुखार आ जाय, छल करने वाले को लकवा मार जाय तो फिर किसी के लिए भी दुष्कर्म कर सकना सम्भव न होता। एक ही निर्जीव रास्ता चलने के लिए शेष रह जाता। ऐसी दशा में स्वतन्त्र चेतना का उपयोग करने की, भले और बुरे में से एक को चुनने की विचारशीलता नष्ट हो जाती और विवेचना, ऊहापोह का बुद्धि प्रयोग सम्भव न रहता। तब दूरदर्शिता और विवेकशीलता की क्या आवश्यकता रहती और इसके अभाव में मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रतिभा का कोई उपयोग ही न हो पाता। बुरे कार्य के दुष्परिणाम और भले कार्य के सत्परिणाम समझने के लिए अन्तःप्रेरणा, अध्यात्म तत्त्वदर्शन, धर्म विज्ञान, नीति सदाचरण, श्रेय साधना का जो उपयोगी एवं आकर्षक सतोगुणी धर्म कलेवर खड़ा किया गया है उसकी कुछ आवश्यकता ही न रहती। सब कुछ नीरस हो जाता यहाँ जो कौतुक कौतूहल दीख रहा है, बहुरंगी, कटु- मधुर अभिव्यंजनाएँ सामने आ रही है उनमें कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर न होता। इन परिस्थितियों में और कुछ लाभ भले ही होता, मनुष्य की वह चेतनात्मक प्रतिभा कुण्ठित ही रह जाती जिसके कारण प्रगति पथ पर इतना आगे तक चल सकना सम्भव हो सका है।
  
कर्म का फल शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से कुछ विलम्ब से भी मिल सकता है, पर आन्तरिक दृष्टि से तुरन्त तत्काल मिलता है। सद्भावनाएँ धारण करने वाला अन्तःकरण अपने आप में अत्यधिक प्रफुल्लित रहता है। सुगन्ध विक्रेता बिना प्रयास किए निरन्तर उस महक का लाभ उठाता रहता है जिसके लिए दूसरे लोग तरसते ललचाते रहते हैं। सत्कर्म का सबसे बहुमूल्य लाभ आत्म- संतोष है जिसे प्राप्त करने में तनिक भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सन्मार्ग पर चलने वाले का अन्तरात्मा अपने आप को प्रोत्साहन भरा आशीर्वाद देता रहता है। इस आधार पर बढ़ता हुआ आत्मबल मनुष्य की वास्तविक शक्ति को इतना अधिक बढ़ा देता है जिसकी तुलना उपनिषद्कार की उक्ति के अनुसार हजार हाथियों के बल से भी नहीं की जा सकती।
 
सद्भाव सम्पन्न सन्मार्गगामी का कोई स्वार्थवश कितना ही विरोध क्यों न हो, पर भीतर ही भीतर उसके लिए गहन श्रद्धा धारण किये रहेगा। महात्मा गाँधी पर आक्रमण करने वाले गोड़से ने गोली दागने से पूर्व उनके चरण स्पर्श करके प्रणाम किया था। ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाने वाले लोग आँसुओं की धार से अपनी श्रद्धाञ्जलि चढ़ा रहे थे। सुकरात को विष पिलाने वाले जल्लाद ने आत्म प्रताड़ना से अपना माथा पीट लिया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग ४)

हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान, पुण्य, कथा, कीर्तन सभी का महत्व है पर उनका पूरा लाभ उन्ही को मिलता है जिनने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गन्दी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो तो भजन-पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अन्तरात्मा की निर्मलता अपने आप में  एक साधन है जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी आत्म-दर्शन का, मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धिदायिनी बन जाती हंै।
  
‘सुमनस्’  शब्द संस्कृत भाषा में बहुत ही प्रतिष्ठा का प्रतीक है। जिसका मन स्वच्छ होता है उसे ‘सुमनस्’ कहकर सम्मानित किया जाता है। ऋषि लोग प्रसन्न होकर किसी को ‘सौमनस्’ अर्थात् सुन्दर मन वाला होने का आशीर्वाद दिया करते थे। प्रस्तुत-इस निकम्में प्राणी मनुष्य में यदि कोई विशेषता हो सकती है तो वह उसकी मानसिक स्वच्छता ही है। जिसे यह सम्पदा प्राप्त हुई उसका जीवन सच्चे अर्थों में सफल हो गया। स्वच्छ मन वाले मानवों का देव समाज जहाँ बढ़ता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। स्थान चाहे पृथ्वी हो या कोई और लोक, वहीं रहेगा जहाँ ऊँचे मन वाले मनुष्य रहेंगे। किसी राष्ट्र की दौलत सोना, चाँदी नहीं वरन् वहाँ उच्च मन वाली जनता ही है। श्रेष्ठ मनुष्य का मूल्य सोने और चाँदी के पहाड़ से अधिक है। गाँधी और बुद्ध की कीमत रूपयों में नहीं आँकी जा सकती।
   
आम लोगों की मनोभूमि तथा परिस्थिति, कामना, वासना, लालसा, संकीर्णता और कायरता के ढर्रे में घूमती रहती है। इस चक्र में घूमता रहने वाला किसी तरह जिन्दगी के दिन ही पूरे कर सकता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उद्यापन, कथा, कीर्तन,  प्रणाम, प्राणायाम जैसे माध्यम मन बहलाने के लिए ठीक हैं, पर उनसे किसी को आत्मा की प्राप्ति या ईश्वर दर्शन जैसे महान् लाभ पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। उपासना से नहीं, साधना से कल्याण की प्राप्ति होती और जीवन साधना के लिए व्यक्तिगत जीवन में इतना आदर्शवाद तो प्रतिष्ठापित करना होता है जिसमें लोक-मंगल के लिए महत्वपूर्ण स्थान एवं अनुदान सम्भव हो सके।
   
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Chiseled Refinement of Life

It’s the law of Nature that stress and struggle of particles generate force and motion. Friction and violent movement though appear harsh, but are necessary for sharpened gaze. The yellow metal gets its golden bright glow only after being heated and hammered. An ordinary piece of stone or metal becomes magnificent sculptures or precious idols only after undergoing hard hitting and shrill cutting.

The same is true of human life. Glory of life sparkles only after passing through testing times, bearing the tough disciplines, pains and difficulties on the path of ideals. Those who can rise and march against obstructions and opposition alone can reach high goals. You can hardly find any great life or eminent success that was achieved by any one without unflinching efforts and examinations.

Devout endeavors of penance and adoption of ascetic disciplines for selfpurification and self-transformation are described as tapasya (tapa). Chiseled refinement of life is the essence of tapa. This awakens hidden powers and sublime potentials. Vedic history has witnessed how great tapaswis have been able to conquer heavens by the spiritual force of their tapasya. The best devotion of the life-God is tapa. It is the only means of glorious accomplishments.

Remember, only those gain importance and reverence in this world, who can smile in hardships and who can enjoy the pains of tapaspya for noble aims.

📖  Akhand Jyoti, Oct. 1945

👉 सद्विचारों की उपयोगिता और आवश्यकता

हमारा शरीर आहार के आधार पर बनता और बिगड़ता है। इसी प्रकार मन का बनाव और बिगाड़ विचारों पर निर्भर रहता है। सद्विचारों के संपर्क में आये बिना कोई व्यक्ति उसी प्रकार मानसिक स्वच्छता प्राप्त नहीं कर सकता जिस प्रकार आहार की सुव्यवस्था किये बिना शरीर को बलवान बना सकना संभव नहीं होता। मन तभी स्वच्छ रह सकता है जब उसे सद्विचारों का सान्निध्य मिले। मानसिक स्वच्छता के लिए स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता उसी प्रकार है जिस प्रकार बर्तन माँजने के लिए मिट्टी और पानी की उपयोगिता होती है। सद्विचारों का प्रसार जब कम हो जाता है और कुविचारों का विस्तार बढ़ जाता है तब स्वभावतः जन मानस में मलीनता छा जाती है और पाप तापों का, क्लेश कलह का रोग शोक का वातावरण पनपता दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य के भीतरी मन की बुराइयाँ उसके सामने विपत्ति बनकर आ खड़ी होती हैं।

कुएँ की प्रतिध्वनि की तरह हमें अपनी भावनाओं के अनुरूप ही दूसरों का प्रत्युत्तर मिलता है। जैसे हम स्वयं है वैसे ही दूसरे भी दीखते हैं। स्वभावतः वे वैसे नहीं तो कम से कम हमारे लिए तो वैसे बन ही जाते हैं, अपना क्रोधी स्वभाव हो और दूसरों से झगड़ते रहने की आदत पड़ जाय तो उसके फलस्वरूप दूसरे लोग जो भले ही स्वभावतः क्रोधी न हों हमारे आचरण से क्षुब्ध होकर कुछ देर के लिए तो क्रोधी बन ही जाते हैं। चोर, व्यभिचारी, बेईमान, असभ्य, अकर्मण्य मनुष्य के संपर्क में आने वाले व्यक्ति कुछ देर तक तो घृणा और क्षोभ प्रकट करेंगे ही। मन का मैला मनुष्य कुढ़न का अभिशाप भोगता है अपनी सारी श्रेष्ठताएँ खोकर निम्न स्तर का बन जाता है। मित्रों को शत्रु रूप में बदल लेता है। लोक−परलोक तो उसके बिगड़ते ही हैं। इतनी हानिकारक मन की मलीनता हमारे लिए सर्वथा त्याज्य है। वैयक्तिक और सामूहिक सारे संघर्ष इसी पर ठहरे हुए हैं। पापों की जड़ यही है। इसे काट दिया जाय तो वे कटीली झाड़ियाँ जो पग−पग पर दुख देती हैं नष्ट हो सकती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग २)

घृणित कर्म करने वाले आप ही अपने को दण्ड देते हैं और सन्मार्ग पर चलने वाले अपनी गतिविधियों के कारण स्वयं ही पुरस्कृत होते हैं। शृंखला अपनी गति से चल रही है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुमार्ग पर चलने वाले सुख शान्ति से रहे और सन्मार्ग अपनाने वालों को दुःख दारिद्र्य से ग्रसित होना पड़े। यदि ऐसा होता तो यहाँ उचित अनुचित के बीच कोई भेद ही न रह जाता और कोई कुकर्म से बचने एवं सत्कर्म अपनाने के लिए तैयार ही न होता। अधर्म का तात्कालिक आकर्षण यदि चिरस्थायी लाभ दे सका होता और उसके दुष्परिणामों की कोई आशंका न होती तो कदाचित् ही कोई उस कष्ट साध्य प्रतीत होने वाली प्रक्रिया को अपनाता।
  
ईश्वर ने मनुष्य को जितना स्वावलम्बी बनाया है उतना ही परावलम्बी भी। सर्वत्र स्वतन्त्र मनुष्य नहीं, ईश्वर ही है। ईश्वर इसलिए स्वतन्त्र है कि उसने नियम व्यवस्था बनाई है और उसने सर्वप्रथम अपने को बाँधा है। जहाँ विश्व का कण- कण किसी विधान से बँधा है उसी प्रकार ईश्वर भी मर्यादा पुरुषोत्तम है। मर्यादाएँ टूटने न पायें, उन्हें तोड़ने का कोई दुस्साहस न करे इसलिए उसने अपने को भी प्रतिबन्धित किया है। पात्रता की मर्यादा से अधिक अनुदान किसी को नहीं मिलते। कर्मफल की मर्यादा का उल्लंघन करके वह न तो किसी को क्षमा प्रदान करता है और न किसी को भक्त- अभक्त होने के नाम पर राग, द्वेष की नीति अपनाता है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। बिजली मनुष्य की बहुत सेवा सहायता करती है, पर करती तभी तक है जब तक उसे विधि पूर्वक प्रयुक्त किया जाता है। अविधिपूर्वक व्यवहार करने पर यज्ञाग्नि भी होता को जला सकती है। प्रचुर खर्च करके बिजली के यन्त्रों को सुसज्जा एवं मनोयोग पूर्वक लगाने वाले भी यदि प्रयोगों में प्रमाद बरतें तो वह प्रतिष्ठापित विद्युत यन्त्र प्रयोक्ता के प्राण लिये बिना न छोड़ेंगे। ईश्वर को कर्मफल शृंखला में अग्नि या विद्युत के समतुल्य माना जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
  
कर्मफल तत्काल मिले ऐसी विधि व्यवस्था इस संसार में नहीं है। क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच कुछ समय का अन्तराल रहता है। बीज बोते ही फल- फूलों से लदा वृक्ष सामने प्रस्तुत नहीं होता। गर्भाधान के अगले क्षण ही प्रसव नहीं होता और प्रसव के उपरान्त तत्काल नवजात शिशु किशोर या प्रौढ़ नहीं बन जाता। अभिभावकों को उसके लिए धैर्य रखना होता है। बीज का फल वृक्ष और गर्भाधान का फल समर्थ सन्तान होता है यह सही है, पर यह भी सही है कि आरम्भ और परिणाम के बीच कुछ अन्तर अवश्य रहता है। हथेली पर सरसों बाजीगर ही जमा सकते हैं। किसान को उसके लिए छः महीने तक साधना और प्रतीक्षा करनी पड़ती है। गाय के पेट में घास जाकर दूध में बदलती है इसे कौन नहीं जानता, पर यह लाभ धैर्यपूर्वक ही उठाया जा सकता है। कोल्हू से तेल निकलने की तरह गाय को एक ओर घास खिलाने और दूसरी ओर दूध पाने की आशा की जाय तो सफलता न मिलेगी। ठीक इसी प्रकार कर्म को फल रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया कुछ समय चाहती है।
  
जन्मजात अपंग, बाधित, असमर्थ, रुग्ण व्यक्तियों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उद्धत आचरण करने वालों के प्रगति साधनों का प्रकृति ने किस प्रकार अपहरण कर लिया। बन्दूक का दुरुपयोग करने वालों का लाइसेन्स जब्त हो जाता है, इसी प्रकार मोटर चलाने में प्रमाद बरतने वालों का लाइसेन्स छिन जाता है। अपराधियों को न्यायालय में समाज से पृथक रहने का यातनापूर्ण कारावास मिलता है और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते हैं। जन्मजात बाधितों को देखकर हम अनुमान लगा सकते हैं कि मिली हुई कर्म स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वालों से प्रकृति किस प्रकार प्रतिशोध लेती है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

👉 द्वेष का कुचक्र

द्रोणाचार्य और द्रुपद एक साथ ही गुरुकुल में पढ़ते थे। द्रुपद बड़े होकर राजा हो गये। एक बार किसी प्रयोजन की आवश्यकता पड़ी। वे उनसे मिलने गये। राज सभा में पहुँचकर द्रोणाचार्य ने बड़े प्रेम से उन्हें सखा कहकर संबोधन किया। पर द्रुपद ने उपेक्षा ही नहीं दिखाई तिरस्कार भी किया। उनने कहा-जो राजा नहीं वह राजा का सखा नहीं हो सकता। बचपन की बातों का बड़े होने पर कोई मूल्य नहीं उनका स्मरण करके आप मेरे सखा बनने की अनधिकार चेष्टा करते हैं।

द्रोणाचार्य को इस तिरस्कार का बड़ा दुःख हुआ। उनने इसका बदला लेने का निश्चय किया। वे हस्तिनापुर जाकर पाँडवों और कौरव बालकों को अस्त्र विद्या सिखाने लगे। जब शिक्षा पूर्ण हो गई और शिष्यों ने गुरु से दक्षिणा माँगने की प्रार्थना की तो पाँडवों से उनने यही माँग, कि राजा द्रुपद को जीतकर उन्हें बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो। भीम और अर्जुन ने यही किया, उसने द्रुपद को बाँधकर द्रोणाचार्य के सामने उपस्थित कर दिया।

द्वेष का कुचक्र टूटता नहीं। द्रुपद के मन में द्रोणाचार्य के लिए प्रतिशोध की भावना बनी रही। उसने भी द्रोणाचार्य को नीचा दिखाने की ठानी और बाज़ ऋषि को प्रसन्न करके मन्त्र शक्ति से एक ऐसा पुत्र प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जो द्रोणाचार्य को मार सके। उस पुत्र का नाम धृष्टद्युम्नः रखा गया। बड़े होने पर महाभारत में उसी ने द्रोणाचार्य को मारा।

📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग ३)

लाभ की तरह हानि का, संयोग की तरह वियोग का, दिन की तरह रात का आना बिलकुल स्वाभाविक है। कपड़े के ताने-बाने की तरह यह जीवन भी सुख और दुःख, उतार और चढ़ाव के ताने-बाने से बुना हुआ है। बुरा इसलिए है कि उसमें सुधारने का प्रयत्न करते हुए हम अपने को अधिक पुरुषार्थी अधिक पुण्यवान बनायें। शुभ इसलिए है कि उसे देखकर हम प्रमुदित हों और उस उपलब्धि का वितरण दूसरों को भी करें। दोनों ही प्रकार की—भली और बुरी परिस्थितियों से  हँसते-खेलते भी निपटा जा सकता है तो फिर रोते कलपते उनसे क्यों निपटें? ताश खेलने में बाजी हार जाने पर, खेल खेलते हुए परास्त हो जाने पर, नाटक करते हुए आपत्तिग्रस्त हो जाने पर कौन रोता कलपता है। उस हानि को हलकेपन से, उपेक्षाभाव से देखने पर जरा सी देर मन हलका-सा रहता है और फिर हम अपना आगे का काम स्वस्थ चित्त से करने लगते हंै। यदि हमारा मन विवेकी हो तो शोक, वियोग, हानि, कष्ट, परेशानी, दुर्व्यवहार आदि के अप्रिय प्रसंगों को हंसकर सहन कर सकते हैं और फिर सन्तुलित मन को उन समस्याओं का हल खोजने में लगाकर आगे कठिनाई से पार होने का मार्ग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। मन की स्वच्छता से विवेक जागृत होता है, सोचने का सही तरीका अभ्यास में आता है और तब प्रायः सभी उलझी हुई समस्यायें शान्ति पूर्वक सुलझ जाती हैं।
   
इन थोड़ी सी पंक्तियों में यह विस्तार पूर्वक नही बताया जा सकता कि मन की मलीनता को हटा देने पर हम संताप से कितने बचे रह सकते हैं और मन को स्वच्छ रखकर उत्थान और आनन्द का कितना अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यह लिखने-पढ़ने और कहने-सुनने की नहीं, करने और अनुभव में लाने की बात है। लौकिक जीवन को आनन्द और उत्थान की दिशा में गतिवान् करने का प्रमुख उपाय यह है कि हम अपने मन स्वच्छ कर उसकी मलीनताओं को हटावें। मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं। अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजने और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्य रूप से यह पुरूषार्थ करना पड़ता है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते?  दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं, अपने आपको समझा ही  सकते हैं, अपने को तो सन्मार्ग पर चला ही सकते हंै। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचा उठना चाहते हंै और उसका साधन हमारे हाथ में है तो फिर उसके लिए पुरूषार्थ क्यों न करें? आत्म-सुधार के लिए आत्म-निर्माण के लिए आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य   

👉 Thoughts are Seeds of Deeds

Narrow-mindedness, selfish boundaries, and misery are certainly not the natural components of the Supreme Creation of the Almighty. These kinds of heinous things are the products of our vices, our wrong ambitions and thoughts. Because of our ignorance and unawareness, they have silently invaded our inner self too and eaten much of our inner strength and sublime powers. This is why, our progress or wellbeing largely remains confined to the body and physical resources; there is hardly any sign of mental, intellectual or emotional evolution, spiritual refinement or growth of virtuous prosperity.

There is only one cause of all misery and agony in this world and that is – the misdeeds of humans. And what drives it? Maligned thinking. Thoughts are like seeds which give rise to the trees of karmas (actions); joy, sorrows and sufferings are their fruits.

It is indeed pathetic that despite living in the limitless treasure of joy that Nature is, we shut our inner self in the narrow barriers of prejudiced convictions and selfish passions. As a result, we get entrapped in the smog of abrupt, fallacious, irrelevant thoughts and often remain fearful, jealous, worried and depressed in one way or the other. All our misery is an outcome of our inner bankruptcy. Its time we realize it and improve ourselves right from the root of our thinking rather than attributing our failures and sorrows to – “ill omen”, “lack of resources or support” or “destined life”.

📖  Akhand Jyoti, Sept. 1945

👉 मानसिक और सामाजिक बुराइयाँ

मन की मलीनता और समाजगत बुराइयाँ एवं कुरीतियाँ इसलिए टिकी हुई और बढ़ी हैं कि उनका पोषक वातावरण चारों ओर बना रहता है। मन एक दर्पण की तरह है उस पर जैसी छाया पड़ती है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। हमारे चारों ओर आज जिस प्रकार के विचार और कार्य फैले होते हैं उसी का प्रभाव ग्रहण करके अपनी प्रवृत्तियाँ भी उसी ओर मुड़ने लगती हैं। एक बुरा व्यक्ति दूसरे अनेकों को अपनी बुराइयाँ सिखा लेता है। व्यभिचारी, नशेबाज, दुर्व्यसनी अपनी आदतों को कितने ही लोगों को सिखा देते हैं। कुविचारों को फैलाने के अगणित माध्यम आज मौजूद हैं। अश्लीलता, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता को प्रोत्साहन देने वाली पुस्तकों, तस्वीरों, गीतों, पत्र−पत्रिकाओं, फिल्मों की आज भारी धूम है, उनका आकर्षक एवं व्यापक प्रचार जन साधारण के भोले मस्तिष्कों को प्रभावित करके उन्हें अपने चंगुल में जकड़ लेता है और लोगों के मन बुराइयों की ओर झुक पड़ते हैं।

बुरे आदमी बुराई के सक्रिय सजीव प्रचारक होते हैं। वे अपने आचरणों द्वारा बुराइयों की शिक्षा लोगों को देते हैं। उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। हम में से कुछ लोग धर्म−प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें होती हैं। इन प्रचारकों की कथनी और करनी में अन्तर रहता है। यह अन्तर जहाँ भी रहेगा वहाँ प्रभाव भी क्षणिक रहेगा। सच्चे धर्म प्रचारक जिनकी कथनी और करनी एक रही है अपने अगणित अनुयायी बनाने में समर्थ हुए हैं। बुद्ध, गाँधी, तिलक, कबीर, नानक आदि की कथनी और करनी एक थी, वे अपने आदर्शों के प्रति सच्चे थे, इसलिए अगणित व्यक्ति उनका अनुकरण करने वाले, उनके आदर्शों पर बड़े से बड़ा त्याग करने वाले प्रस्तुत हो गये थे। आज अच्छाइयों के सच्चे एवं आदर्श प्रचारक नहीं है। बुराइयों के आस्थावान प्रचारक मौजूद हैं, वे बुरे काम करते हैं, बुराइयाँ सिखाते हैं, पर ऐसे धर्म−प्रचारक कहाँ हैं जो अपने आचरणों से दूसरों को शिक्षा और प्रेरणा प्रदान करें। जहाँ थोड़े बहुत सच्चे लोग हैं वहाँ प्रभाव भी पड़ रहा है। हजारों मील से आकर विदेशी ईसाई मिशिनरी भारत में ईसाई धर्म का प्रचार पूरी आस्था और लगन के साथ कर रहे हैं फलस्वरूप गत दस वर्षों में ही लाखों की संख्या में लोगों ने हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई धर्म की दीक्षा ली है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग १)

क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम शाश्वत है। इसे सर्वत्र देखा और अनुभव किया जा सकता है। क्रियाओं के जैसे बीज होगे वैसे ही फल परिणाम के रूप में सामने आयेंगे। गेहूँ का बीज गलकर अपने अदृश्य असंख्यों बीज पैदा करता है। आम का बीज गलकर आम ही पैदा करता है। नीम का बीज गलता है तो नीम का वृक्ष ही पैदा करता है। गेहूँ के बीज से नीम का वृक्ष पनपे ऐसा न तो देखा गया और न ही सुना गया। प्रकृति के उपवन में कर्मफल व्यवस्था के उदाहरण सर्वत्र देखे जाते है।
 
दैनन्दिन जीवन में भी इसके प्रमाण मिलते हैं। अपवादों को छोड़कर बिना कोई पढ़े विद्वान बन गया हो ऐसा देखा नहीं जाता। बिना नियमित निर्धारित समय तक अध्ययन किये किसी को विशिष्ट डिग्री मिल गयी हो यह सामान्य क्रम में नहीं होता। डाक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक बनने के लिए नियत समय तक निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ना और उसमें उत्तीर्ण होना पड़ता है। विद्यार्थी को अभीष्ट प्रकार की योग्यता सम्पादन के लिए पूरे धैर्य का परिचय देना होता तथा परिश्रम की कीमत चुकानी पड़ती है।
  
माली मन चाहे पुष्पों के लिए उनके पौध लगाता, तत्काल बिना किसी प्रकार के प्रतिदान की अपेक्षा किये उन्हें सींचता रहता है, निराई गुड़ाई करता है। किसान भी इसी प्रकार के मनोयोग, धैर्य का परिचय देता है। फल पाने की उतावली उनमें नहीं होती क्योंकि उन्हें यह मालूम होता है कि समय के परिपाक पर फल मिलेगा ही। कर्मों का सुनिश्चित फल एक अकाट्य नियम है जिसे कुछ बातों में स्पष्ट देखा जा सकता है।
  
पर कुछ मानवी कृत्य ऐसे होते हैं जिनका तत्काल फल नहीं मिलता। भले कर्मों के सुनिश्चित परिणाम होते हुए भी तुरन्त मिलते न देखकर कितने ही व्यक्ति उस शाश्वत व्यवस्था पर उँगली उठाते, संदेह करते हैं जिसे कर्मफल सिद्धान्त के रूप में जाना जाता है। कितने व्यक्ति तो सृष्टा तथा उसकी नियम व्यवस्था पर भी आशंका व्यक्त करने लगते हैं। उन्हें यह बात भली भाँति जानना चाहिए कि भगवान किसी को न तो दण्ड देता है और न पुरस्कार। वह केवल विधि व्यवस्था का विधायक और नियन्ता मात्र है। सृष्टि की क्रमबद्धता और समस्वरता को बनाये रखने भर का ध्यान रखता है। व्यक्तिगत जीवन में उसका हस्तक्षेप नहीं के बराबर है। हर किसी को उसने यह पूरी आजादी दी है कि जो चाहे जिस तरह सोचे या करे। साथ ही विवेक का अनुदान देकर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चिन्तन कर्तृत्व का स्तर ही उसके सामने दण्ड पुरस्कार के रूप में सामने आयेगा। स्वतन्त्रता दिशा अपनाने भर की है। पर जो कँटीले मार्ग पर चलेगा वह चुभन से बच न सकेगा यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया। धर्मशास्त्र, तत्व दर्शन और प्रमाण उदाहरणों से भरा इतिहास इसी यथार्थता का पग- पग पर प्रतिपादन करते रहे हैं।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...