सोमवार, 27 जुलाई 2020

👉 अपना परिवार

अपने परिवार में बुद्धिमानों की, भावनाशीलों की, प्रतिभावानों की, साधना सम्पन्नों की कमी नहीं। पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं। व्यस्तता, अभावग्रस्तता, उलझन, अड़चन आदि के बहाने उपहासास्पद हैं। वे उन्हीं कार्यों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिन्हें निरर्थक समझा जाता है। जो महत्वपूर्ण समझा जाता है उसे सदा प्रमुखता मिलती है और समय, साधन, मनोयोग आदि जो कुछ पास है सब उसी में लग जाता है।

यदि युग पुकार को-जीवनोद्देश्य को महत्व दिया गया होता तो किसी को भी वैसी बहाने-बाजी न करनी पड़ती जैसी कि असमर्थता सिद्ध करने के लिए आमतौर से कही या गढ़ी जाती है। इससे आत्म-प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं। जिन्हें कुछ करने की उत्कट अभिलाषा होती है वे उसके लिए कठिनतम परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी इतना कुछ कर सकते हैं जितना साधन सम्पन्नों से भी नहीं बन पड़ता।

दो-पाँच मालाएँ उलटी-पुलटी घुमाकर-समस्त संकट दूर होने से लेकर प्रचुर धन सम्पदा मिलने तक की ऋद्धि-सिद्धियों में कमी पड़ने की शिकायतें तो आये दिन सुनने को मिलती हैं, पर यह बताने कोई नहीं आता कि उपासना बीज को खाद, पानी देने वाली जीवन-साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है।

परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता। विलासिता, फिजूलखर्ची और जमाखोरी में लगने वाले पैसे का उपयोग यदि रचनात्मक प्रवृत्तियों के परिपोषण में लग सका होता तो अपना छोटा-सा परिवार ही राष्ट्र की महती समस्याओं को सुलझा सकने के उपयुक्त साधन अपने घर से अपने ही हाथों जुटा सकते थे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

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