शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 1)

Q.1. Why is Gayatri Mantra regarded as Guru Mantra?

Ans. Every body knows that one can learn very well under the direct guidance of a capable teacher. This, however, does not mean that a person devoid of knowledge and character be accepted as Guru. Instead of accepting an illiterate person as teacher and suffer the consequences it is better to regard the scriptures or any rishi  or devatma as one’s Guru and for this purpose even a picture or an idol of the person concerned can be used.

All human beings are born through the same biological process as other animals. Man is, therefore, in no way different from other species of animal kingdom, until he takes the first step towards his spiritual evolution by way of initiation in Sadhana. This ceremony of initiation amongst the Hindus is known as the Upnayan Sanskar.  The newly initiated person is called a Dwij (i.e. born-again) in spiritual parlance.

Each Hindu is traditionally required to undergo Upnayan Sanskar. In course of this ritual, the subject is made to wear a Janeu (sacred thread) across the body on the left shoulder as a constant reminder to follow the disciplines of Gayatri in life, (The Christians wear the crucifix for a similar purpose). During the Upnayan ceremony, the Guru initiates the person concerned exclusively in Gayatri Mantra. This is why it is known as the Guru Mantra.          
Literally too, the word ‘Guru’ in Sanskrit means ‘Heavy’, ‘powerful’ or ‘significant’. Since, this Mantra has been  referred to in the scriptures as the very manifestation of omnipotence and omniscience of God it is justifiably called as Guru Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

👉 दीया

दीया- जड़ और चेतन का मिलन है। दीया की देह मिट्टी की है, परन्तु उसकी ज्योति में चैतन्यता का प्रकाश है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में भी एक दीया जलाया गया है। उसकी लौ सतत्-निरन्तर ऊपर उठ रही है। दीया की संरचना और संसाधन तो सांसारिक भूमि का भाग है। परन्तु उसकी लौ अनगिन जनों को प्रेरणा, प्रकाश व ऊर्जा देने के लिए लगातार ऊर्ध्वगामी बनी हुई है।
  
यह लौ विश्वविद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं की चेतना की भाँति है। जिन्होंने अपने प्राणों का स्नेह डाल यह दीया जलाया है। डिवाइन इण्डिया यूथ एसोशिएशन- (ष्ठढ्ढङ्घ्न) यही नाम है इस दीया का। इसकी देह मातृभूमि की मिट्टी से बनी है। युवाओं का प्राणबल-मनोबल एवं आत्मबल ही वह तेल है, जिसके बल यह दीया जला है। युवाओं का संकल्प ही इस दीये की बाती है। और इसकी ज्योति, वह तो युवाओं-युवतियों की आत्मचेतना है। जो अपने साहस, पराक्रम, सद्ज्ञान व सद्कर्म की प्रकाश किरणें बिखेर कर देश व विश्व के युवाओं का सत्पथ-सन्मार्ग प्रकाशित कर रही है।
  
संरचना और साधन की दृष्टि से आज यह दीया छोटा लग सकता है; परन्तु इसके अतिरिक्त भी इसमें बहुत कुछ है। और वह है विश्वविद्यालय की युवा चेतना। यह अग्नि शिखा ही इसका प्राण है। इसके निरन्तर ऊपर उठने की उत्सुकता ही इसकी आत्मा है। यह लौ है इसीलिए तो दीया- दीया है, अन्यथा तो सब मिट्टी है। यह लौ पूरी तरह से जल उठेगी तो युवा भारत में क्रान्ति घटित होना सुनिश्चित है। जिनका ध्यान अभी तक इसकी संरचना और साधनों पर है, वे इसके सत्य को न समझ सकेंगे। परन्तु जिन्हें इसकी ज्योति दिखाई दे रही है, वे अवश्य इसके द्वारा होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों को निहार सकेंगे। क्योंकि ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि तब युवाओं के इस संकल्प में युग देवता भगवान् महाकाल के संकल्प के दर्शन अवश्य होंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९०

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

👉 सज्जनता का सौन्दर्य

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 6)

Q.13. What  is the ideal ‘Bramhabhoj’ after completion of the ‘Anusthan’?

Ans. In an Anusthan the last ritual is ‘Brahmbhoj’ after Poornahuti in the Havan. Traditionally it requires feeding Brahmans or young maidens. Qualified, deserving Brahmans are not easily available, these days. Alternatively, maidens (who being symbolic of mother power of God the Matri Shakti, are fed to augment faith) are offered food, but at times they are not permitted by self-respecting parents to take food in a stranger’s house. Brahmbhoj has, thus, ceased to have relevance in the contemporary society.

Under these circumstances, Brahmdan i.e. ‘Dissemination of spiritual wisdom’ (Sadgyan) can truly serve the purpose of Brahmbhoj. For each Ahuti, one is recommended to donate one paisa (one hundredth of local currency) for Brahmdan and with this amount procure literature pertaining to ‘Yug Nirman’ (resurrection of moral values in the society) and distribute it to deserving persons. In this manner, one can sow seeds of spiritual wisdom in many hearts, the fruits of which are reaped by the readers and motivators alike.

Q.14. What should one do if some unfavourable unforeseen events occur during an Anusthan?


Ans. Under such circumstances one may discontinue the Sadhana, Jap etc. for the period and resume it later from the count of disruption. However, a mental recitation, without a rosary, is permissible in all circumstances.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 77

👉 विश्वविद्यालय

आँखें खुली हों तो पूरा जीवन ही विश्वविद्यालय है। जीवन का हर क्षण स्वयं में विश्व की कोई न कोई विद्या समेटे है। और फिर जिसे सीखने की ललक है, वह प्रत्येक व्यक्ति व प्रत्येक घटना से सीख लेता है। प्रकृति के आँगन में हो रही हर हलचल उसे कोई न कोई नयी सीख देती है। याद रहे कि जो इस तरह नहीं सीखता है, वह जीवन में कभी कुछ नहीं सीख पाता। महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहा करते थे, हर व्यक्ति जिससे मैं मिलता हूँ, किसी न किसी बात में मुझसे श्रेष्ठ है। वही मैं उससे सीखने की कोशिश करता हूँ।
  
उन्हीं के जीवन का एक प्रसंग है। वह किसी दूसरे देश में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में गए हुए थे। इस विश्वविद्यालय ने उनके लिए एक व्याख्यान माला का आयोजन किया था। उन्हें सुनने के लिए विभिन्न विषयों के विद्वान, राजनेता, उच्च पदाधिकारी सभी पधारे थे। एक दिन सायं वह अपने व्याख्यान को समाप्त कर घूमने के लिए निकले। राह में उन्होंने देखा, एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था। उस कुम्हार की कारीगरी उन्हें विलक्षण लगी। जीवन और जगत् के स्रष्टा की भाँति, वह भी एक नवीन सृष्टि गढ़ रहा था। आइन्स्टीन काफी देर तक खड़े रहकर उसका यह कौशल देखते रहे।
  
फिर उन्होंने उससे कहा- ईश्वर की खातिर मुझे भी अपना बनाया हुआ बर्तन देंगे क्या? उनके मुख से ईश्वर का नाम सुनकर वह कुम्हार चौंका। फिर उसके होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी। उसने अपने हाथ में लिया हुआ काम छोड़ दिया और अपने बनाए हुए बर्तनों में से एक सबसे सुन्दर बर्तन उठाया। उसे साफ करके बड़े ही सुन्दर ढंग से उसने आइन्स्टीन के हाथों में थमाया। कुम्हार का दिया बर्तन अपने हाथों में लेने के बाद उन महान् वैज्ञानिक ने उसे देने के लिए पैसे निकाले। परन्तु उस कुम्हार ने उन पैसों को लेने से इन्कार करते हुए कहा- महोदय! आपने तो ईश्वर की खातिर बर्तन देने को कहा था, पैसों की खातिर नहीं। आइन्स्टीन, अपनी मित्र मण्डली में हमेशा इस घटना का जिक्र करते हुए कहते थे, जो मैं कभी किसी विश्वविद्यालय में नहीं सीख सका, वह मुझे उस कुम्हार ने सिखा दिया। मैंने उससे निष्काम ईश्वर भक्ति सीखी। भला जीवन से बड़ा विश्वविद्यालय और कहाँ?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८९

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

Bhav Sarita- Album of Spiritual songs by Shraddey Shailbala Pandya (Jiji)



Title

👉 मन

भर्तृहरि सम्राट् थे। उन्होंने सब छोड़ दिया, छोड़-छाड़ जंगल चले गए। मन को यह बात जंची न होगी। मन को यह बात कभी नहीं जंचती। जंगल में बैठे हैं, वर्षों बीत गए हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे तरंगें शांत होती जा रही हैं। एक दिन सुबह ही आंख खोली, सुबह का सूरज निकला है, सामने ही राह जाती है--जिस चट्टान पर बैठे हैं, उसी के सामने से राह जाती है। उस राह पर एक बड़ा हीरा पड़ा है! बांध-बूंध के वर्षों में मन को किसी तरह बिठाया था--और मन दौड़ गया! और मन जब दौड़ता है तो कोई सूचना भी नहीं देता कि सावधान कि अब जाता हूं। वह तो चला ही जाता है तब पता चलता है। वह तो इतनी त्वरा से जाता है, इतनी तीव्रता से जाता है कि दुनिया में किसी और चीज की इतनी गति नहीं है जितनी मन की गति है। तुम्हें पता चले, चले, चले, तब तक तो वह काफी दूर निकल गया होता है।

शरीर तो वहीं बैठा रहा, लेकिन मन पहुंच गया हीरे के पास। मन ने तो हीरा उठा भी लिया। मन तो हीरे के साथ खेलने भी लगा। तुमने कहानियां तो पढ़ी हैं न शेखचिल्लियों की, वे सब कहानियां मन की कहानियां हैं। मन शेखचिल्ली है। और इस के पहले कि मन शरीर को भी उठा दे, दो घुड़सवार दोनों तरफ से आए, उन्होंने तलवारें खींच लीं। दोनों को हीरा दिखाई पड़ा, दोनों ने तलवारें हीरे के पास टेक दीं और कहा, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। भर्तृहरि का मन तो कहने लगा कि यह बात गलत है, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। मगर यह अभी मन में ही चल रहा है। और इसके पहले भर्तृहरि कुछ बोलें, वे तो तलवारें खिंच गईं। राजपूत थे। तलवारें एक-दूसरे की छाती में घुस गईं। दोनों लाशें गिर पड़ीं। हीरा अपनी जगह पड़ा है सो अपनी जगह पड़ा है।

लोग आते हैं और चले जाते हैं, हीरे अपनी जगह पड़े हैं अपनी ही जगह पड़े रह जाते हैं। लाशों का गिर जाना, लहू के फव्वारे फूट जाना, चारों तरफ खून बिखर जाना, हीरे का अपनी जगह ही पड़े रहना--होश आया भर्तृहरि को कि मैं यह क्या कर रहा था! वर्षों की साधना मिट्टी हो गई? मेरा मन तो भाग ही गया था, मैं तो खुद भी दावेदार हो गया था। मैं तो कहने ही जानेवाला था कि चुप, हीरे को पहले मैंने देखा है! तुम दोनों पीछे आए हो। हीरा मेरा है!

मगर इसके पहले कि कुछ कहते, उसके पहले ही यह घटना घट गई--दो लाशें गिर गईं। भर्तृहरि ने आंखें बंद कर लीं। सोचा कि हद हो गई, कितने हीरे घर छोड़ आया हूं जो इससे बड़े-बड़े थे! इस साधारण-से हीरे के लिए फिर लालच में आ गया। कुछ हुआ नहीं, बाहर कोई कृत्य नहीं उठा, लेकिन मन के भीतर तो सब यात्रा हो गई।

जरूरी नहीं है कि तुम बाहर कुछ करो, मन तो भीतर ही सब कर लेता है। यह हो भी सकता है कि बाहर से कोई हिमालय गुफा में बैठा हो और मन सारे संसार की यात्राएं करता रहे। बाहर की गुफाओं से धोखे में मत पड़ जाना। असली सवाल मन का है। और यह भी हो सकता है कि कोई राजमहल में बैठा हो और मन कहीं न जाता हो।

बात बाहर की नहीं है; बात भीतर की है, बात मन की है। और मन बड़ा लोभी है। मन हर चीज में लोभ लगा लेता है। मन कहता है सब मेरा हो जाए। और यह लोभ उसका ऐसा है कि ज़रा-ज़रा से स्वाद के पीछे जहर भी गटक जाता है।

👉 आत्मोपदेश सरल है


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 5)

Q.10. What is the significance of Havan (Yagya) in an Anusthan?

Ans. Jap and Havan are basic ingredients of an Anusthan. After initiation (Dikcha) the worshipper (Sadhak) makes a total surrender to Gayatri and Yagya (his spiritual parents), which are inseparable. Invocation of both is done through specified procedures during the Anusthan.

Q.11. What are the number of ‘Ahutis’ prescribed for various types of Anusthans?

Ans. In ancient times, it was convenient to oblate one tenth of the total number of Japs in the Havan in an  Anusthan. In the present circumstances, it is sufficient to offer one hundredth number of ‘Ahutis’. The number thus amounts to :-
  
(a) Small Anusthan - 240 Ahutis.  
(b) Medium Anusthan - 1250 Ahutis.
(c) Big Anusthan - 24000 Ahutis.    The number may however, be varied depending on circumstances.

Q.12. How are the number of Ahutis distributed during the Yagya (Havan) in course of Anusthans?  
Ans. Havan may either be performed each day or on the last day of the Anusthan. Oblations required each day are equal to the number of ‘malas’, (cycles of rosary) whereas on the last day the number of ‘Ahutis’ should be equal to one hundredth of the total number of Japs (recitation of Mantras).
                          
When more than one person participates in the Havan, the cumulative number (number of persons multiplied by number of Ahutis) is counted. (e.g. 100 Ahutis by 5 persons will be considered as 500 Ahutis; for 240 Ahutis 6 persons may offer together 40 ‘Ahutis’ each etc.).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 76

👉 सहनशक्ति

आज लोगों में सहनशक्ति बहुत कम होती जा रही है। आप भी ऐसा अनुभव करते होंगे, कि आज से 25/30 वर्ष पहले लोगों में जितनी सहनशक्ति, आपस में प्रेम, सहानुभूति,  सेवा, आदर सम्मान की भावना, त्याग तपस्या आदि थी, आज ये सब गुण उतने नहीं रहे। सबसे अधिक तो सहनशक्ति कम हुई है, जिसके बहुत से दुष्परिणाम लोगों को भोगने पड़ रहे हैं। छोटी-छोटी बात पर लोग गुस्सा करते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं, अभिमान करते हैं, नाराज हो जाते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि आपसी संबंध टूट जाते हैं। यह सब क्यों हो रहा है? संबंधों को ठीक से निभाना नहीं जानते।

और यह नहीं जानते कि कोई भी संबंध अच्छा तभी चल पाएगा, जब संबंध रखने वालों में परस्पर एक दूसरे के प्रति सद्भावना सहानुभूति तथा सहनशक्ति हो।

लोगों को देखिए, उनको समझिए, उनसे मिलिए, उनके गुण कर्म को जानने का प्रयास कीजिए, और सहानुभूति प्रेम सद्भावना पूर्वक उनके साथ संबंध निभाने की सहनशक्ति भी रखिए। तभी आप संबंधों की रक्षा कर पाएंगे और आपके जीवन की भी सुरक्षा हो पाएगी। 

👉 राष्ट्र धर्म

राष्ट्र हममें से हर एक के सम्मिलित अस्तित्त्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम हैं, कल थे और आने वाले कल में होंगे, सभी कुछ शामिल है। हम और हममे से हर एक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यों न हों? राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती हैं। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत, झर-झर कर बहते निर्झर, विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन, सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश विहार करने वाले पक्षी सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित हैं। प्रान्त, शहर, जातियाँ, बोलियाँ, भाषाएँ यहाँ तक कि रीति, रिवाज, धर्म, मजहब, आस्थाएँ, परम्पराएँ, राष्ट्र के ही अंग अवयव हैं।
  
राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नहीं है। भारतवासियों की एक ही पहचान है भारत देश, भारत मातरम्। हममें से हर एक का एक ही परिचय है- राष्ट्र ध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणों का गान है। हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परम्पराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक सार्थक और औचित्यपूर्ण हैं, जहाँ तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती हैं। जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में, राष्ट्र के उत्थान में सहायक हैं। राष्ट्र की अखण्डता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को न्यौछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है।
  
राष्ट्रधर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। यह हिन्दू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि सिख, मुस्लिम या ईसाई के लिए। यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कहीं अधिक है। इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है, राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदनशील होना, सजग होना, कर्त्तव्यनिष्ठ होना, राष्ट्रीय हितों के लिए, सुरक्षा व स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत् बलिदान करते रहना।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८८

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

👉 सच्चा सद्भाव

पुत्र की उम्र पचास को छूने लगी। पिता पुत्र को व्यापार में स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मन में चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी। पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभावमें किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर कर लेते, कभी भूखे सो जाते। जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवा का भाव था। उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिता के प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मन में दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया। वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्र को खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुर के गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुर को खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। जब पति को मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- ‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’ बहू बोली- ‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें’; इसके बिना मुझे कुछ संतोष नहीं है, बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आने पर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुप में मिले हो। तुम्हारे मन में कृतज्ञता का भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?

पत्नी के सद्भाव ने पतिकी निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्र पर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

परिवार के किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।

👉 सब कुछ आपके अंदर ही है।


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 4)

Q. 6. Does one himself benefit by doing Jap-Anusthan for others?

Ans. It is true that like helping the needy through one’s own resources, a person reaps spiritual benefits while performing Upasana-Tap for others (“Distant therapy”). The only condition is that it should be carried out to support a deserving cause. On the contrary, if divine powers are sought to further some misdeed, it becomes a sinful act. Purity of motive is, therefore, a pre-requisite for an Anusthan.

Q.7. Is acceptance of a donation or gift in cash or kind is permissible in lieu of an Anusthan done for others?
Ans. It is sanctioned to the extent of minimum amount for bare sustenance. Very little benefit accrues when an Anusthan is performed for others with an eye on deriving maximum personal benefit.

Q.8. What is the time of the day recommended for Jap during an Anusthan? Is it necessary to complete  Jap at a stretch?

Ans. Mornings are best suited. Otherwise, one may complete the count in instalments at different periods of the day.

Q.9. What to do if there is some irregularity during the Anusthan?


Ans. There should not be any apprehension about incurring any divine displeasure as a consequence of an unavoidable irregularity during the Anusthan. Nevertheless, it is advisable to seek protection of a competent Guru toward off possible disturbances and to take care of advertent or inadvertent errors. This service is also provided free from Shantikunj, Hardwar, Uttar Pradesh, India. One is advised to send details of personal introduction and time proposed for the Anusthan for receiving spiritual protection and rectification of errors through the power of Guru. It will doubly ensure success of the Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 75

👉 जीवन सन्देश

मनुष्य की शक्ति अनन्त है। परन्तु यह अचरज भरे दुःख की बात है कि उसकी ये ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने की अन्तिम रात्रि आ जाती है, परन्तु इन शक्तियों का जागरण नहीं हो पाता। यदि कहीं कुछ होता भी है, तो बहुत थोड़ा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनन्त शक्तियों एवं असीमित सम्भावनाओं के बारे में सोचते भी नहीं। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममें से ज्यादातर लोग तो आधा-चौथाई ही जी पाते हैं। कोई-कोई तो अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ या फिर लाखवाँ हिस्सा ही जी पाते हैं। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधूरा ही हो पाता है। आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी जलती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।
  
इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनन्त-अनन्त शक्ति स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए जिन्हें अपने आप की पूर्णता अनुभव करनी है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं। जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही अपने विचारों को क्रिया रूप में परिणत करते रहते हैं। वे जो थोड़ा सा जानते हैं, उसका क्रियान्वयन करते हैं। बहुत ज्यादा जानने के लिए वे नहीं रुके रहते।
  
इस विधि से एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में अनन्त-अनन्त शक्ति का कुआँ खोद लेते हैं। जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनन्त शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। और उसकी अपनी पूर्ण सम्भावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्म शक्ति की अनन्तता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन सन्देश के स्वर यही कहते हैं- कि विचार पर ही मत रुके रहो। चलो और कुछ करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ़ चलना ज्यादा मूल्यवान् है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८३

👉 मधुमक्खी बनाम मक्खी-मच्छर प्रकृति

मधुमक्खी से उम्मीद करो कि वह पुष्प पर बैठेगी और उसका चयन करेगी। लेकिन मक्खी से से उम्मीद मत करो कि कचड़ा छोड़कर वह पुष्प चुनेगी, वह तो कचड़े पर ही बैठेगी। गाय व घोड़े साफ स्थान पर चारा चरेंगे व बैठेंगे। सुअर और भैंस से उम्मीद मत करो कि वह कीचड़ में नहीं लौटेंगे।

तुम्हारे भाषण व ज्ञान देने से मक्खी, सुअर व भैस कचड़ा व कीचड़ नहीं छोड़ेंगे। जैसे भगवान कृष्ण के ज्ञान देने से दुर्योधन ने अधर्म नहीं छोड़ा।

अतः इसीप्रकार अपने मक्खी, सुअर, भैंस की प्रवृत्ति के पड़ोसी, रिश्तेदार से यह उम्मीद मत करो कि वह तुम्हारी निंदा, चुगली नहीं करेंगे और तुम पर अपशब्दों व तानों के कीचड़ नहीं फेंकेंगे। अतः उन्हें इग्नोर करें और अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

साथ ही स्वयं पर भी चेकलिस्ट लगाएं कि हम स्वयं मख्खी है या मधुमक्खी?  निंदा-चुगली का कचड़ा पसन्द है? या ध्यान-स्वाध्याय-भजन-सत्संग का पुष्प?

मक्खी रोग उत्तपन्न करती है और मधुमक्खी मीठा शहद उतपन्न करती है। स्वयं के व्यवहार व स्वभाव की चेकलिस्ट चेक कीजिये कि आपका शहद से मीठा व्यवहार है या  कड़वा, दुःख-विषाद व रोग उतपन्न करने वाला मक्खी-मच्छर सा व्यवहार है?

यदि परिवर्तन चाहते तो परिवर्तन का हिस्सा बनो...स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

👉 कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माँहि!!

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता,तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। भगवान इससे दुखी हो गए थे।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं !! मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं,न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए।

गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।

भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।

इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं।"

वरुण देव बोले आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।

भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ?

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू !! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा। पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।

ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं,बाएं,आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा है।

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 3)

Q.5. Is it possible to have an Anusthan performed by someone else?

Ans. To get Jap performed by others on payment on one’s behalf amounts to purchasing labour and deriving advantage out of it. This earns no merit. There are some important tasks which require to be carried out by one’s own self. It becomes ridiculous if they are got done by others. Can a servant be appointed to study on one’s own behalf ? Can one entrust his sleep to someone else? Nobody appoints someone else to procreate children on his behalf. How can a disease be cured if a person other than the patient is paid and asked to take treatment on behalf of the patient? In the same way devotional worship of God has to be done in His proximity, attained by  the devotee in person. Self-discipline , penance or endurance are required to be practised and friendship is nurtured by a person himself. Physical exercise is also done by a person himself. The same norm applies to Sadhana.

As for as practicable, one should perform his or her own Anusthan, In specific cases of contingency it can be entrusted to a qualified Brahman. The term Brahman here needs an elaboration. In ancient times individuals considered Brahmans were scholars of the science of Brahma. They possessed a high level of upright character, lived a virtuous life with minimum means of sustenance  and comfort.

Now-a-days, it is difficult to find such Brahmans, who besides having been born in a Brahman family (by caste and heredity) and wearing traditional costumes of Brahmans of yore also have the credibility of Brahmanism in their character, behaviour and thoughts. It is very difficult to find a true Brahman from amongst hordes of hypocrites masquerading as Brahmans.

It is, therefore, recommended that if at all necessary, irrespective of caste and creed, Anusthan may be entrusted to such an individual of high character who has an infallible faith in God and is not desirous of any worldly gains of name, fame or material gain.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 73

👉 जीवन में सुख दुख

जीवन में सुख भी आते हैं, दुख भी आते हैं। सुख आने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, उछलता कूदता नाचता है। और जब दुख आता है, तो दहाड़ें मार-मार कर रोता भी है। ये सुख दुख भी अनेक स्तर के होते हैं।

पढ़ाई-लिखाई करने में, धन कमाने में, परिवार के पालन में, देश विदेश की यात्रा आदि कार्यों में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं। व्यक्ति इन सारे कष्टों को अच्छी प्रकार से सह लेता है, क्योंकि उसके सामने कुछ लक्ष्य होता है। अपनी उन्नति, परिवार का पालन करना, समाज को सुख देना, धर्म की रक्षा करना, देश की रक्षा करना इत्यादि कारणों से वह इन सारे दुखों को सह लेता है।

परंतु कभी-कभी जब जीवन में उसे धोखा खाना पड़ता है, विश्वासघात का सामना करना पड़ता है, और वह भी कोई अपना निकट का व्यक्ति ही उसे धोखा दे, तब जो उसको दुख होता है, उसे सहन करना बहुत कठिन पड़ता है।

कोई बात नहीं। यह संसार है। यहाँ सब कुछ होता है। अपने पराए सब लोग सुख भी देते  हैं, दुख भी देते हैं। जब भी कोई अपना निकट का व्यक्ति दुख देवे, धोखा देवे, विश्वासघात करे, तब भी आप विचलित न होवें, यही आपकी वीरता है।

उस समय कैसे उस दुख को सहन करें? कैसे धैर्य रखें? इस प्रश्न का उत्तर है, कि तब ऐसा सोचें, यह संसार अनित्य है। यहां सुख आता है, वह चला जाता है। दुख आता है, वह भी चला जाएगा।

इस प्रकार से सोचने से वह दुख आपको हल्का लगेगा। और फिर भी वह दुख  पूरा दूर न हो, तो उस दुख को, उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर, आप छोड़ देवें। और अपने मन में तीन शब्द बोलें, "ईश्वर न्याय करेगा। ऐसा सोचने से आपका दुख हल्का हो  जाएगा। आपका मन बुद्धि विचलित नहीं होगा। आप अपना जीवन ठीक प्रकार से चला पाएंगे।

👉 शान्ति

शान्ति में स्वतः ही समस्त सुखों का अनुभव होता है, जबकि अशान्ति के क्षणों में समूचा जीवन दुःखमय हो जाता है। अन्तर्मन में शान्ति प्रगाढ़ हो तो दुःखमय परिस्थितियाँ, बाहरी जीवन के सारे आघात मिलकर भी अन्तस में दुःख को अंकुरित नहीं कर पाते। लेकिन यदि अपना अन्तःकरण अशान्त हो, तो सुख साधन, बाह्य जगत् का सुखद व्यवहार सिमटकर भी मन को सुख का अनुभव नहीं दे पाते। यह सच निरन्तर अनुभव होने के बावजूद भी प्रायः सभी का मन इस बोध से वीरान रहता है। सत्य यही है कि अन्तरात्मा शान्ति चाहती है, परन्तु जो हम करते हैं, उससे अशान्ति ही बढ़ती है। याद रहे कि अशान्ति की जड़ महत्त्वाकांक्षा है, जिसे शान्ति की चाहत है, उसे महत्त्वाकांक्षा छोड़नी पड़ेगी। क्योंकि शान्ति का प्रारम्भ वहाँ से होता है, जहाँ से महत्त्वाकांक्षा समाप्त होती है।
  
सन्त इमर्सन ने लिखा है- ‘युवावस्था में मेरे अनेकों सपने थे। उन्हीं दिनों मैंने एक सूची बनायी थी कि जीवन में मुझे क्या-क्या पाना है। इस सूची में वे सारी चीजें थीं, जिन्हें पाकर मैं धन्य होना चाहता था। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सुयश, सम्पत्ति, सुख इसमें सभी कुछ था। इस सूची को लेकर मैं बुजुर्ग सन्त थॉरो के पास गया। और उनसे कहा क्या मेरी इस सूची में जीवन की सभी उपलब्धियाँ नहीं आ जाती हैं? उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना और उनकी आँखों में हँसी की चमक गहरी हो उठी। उनके होंठ मुस्करा उठे और वे बोले- मेरे बेटे! तुम्हारी यह सूची बड़ी सुन्दर है। बहुत विचारपूर्वक तुमने इसे बनाया है। फिर भी तुमने इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात छोड़ दी है, जिसके बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। मैंने पूछा- वह क्या है? उत्तर में उन वृद्ध अनुभवी सन्त ने मेरी सम्पूर्ण सूची को बुरी तरह से काट दिया। और उसकी जगह उन्होंने केवल एक शब्द लिखा- शान्ति।

यह शान्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह तो स्वयं का ही एक ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में अन्तःकरण में शान्ति की मधुर सरगम प्रवाहित होती रहे। यह विचार की नहीं अनुभव की अवस्था है। यह कोई रिक्त, खाली, खोखली मनःस्थिति नहीं है, बल्कि अन्तर्मन के सकारात्मक संगीत की मुधरता है

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

👉 परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)

जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारत...