मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

👉 जीवन सन्देश

मनुष्य की शक्ति अनन्त है। परन्तु यह अचरज भरे दुःख की बात है कि उसकी ये ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने की अन्तिम रात्रि आ जाती है, परन्तु इन शक्तियों का जागरण नहीं हो पाता। यदि कहीं कुछ होता भी है, तो बहुत थोड़ा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनन्त शक्तियों एवं असीमित सम्भावनाओं के बारे में सोचते भी नहीं। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममें से ज्यादातर लोग तो आधा-चौथाई ही जी पाते हैं। कोई-कोई तो अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ या फिर लाखवाँ हिस्सा ही जी पाते हैं। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधूरा ही हो पाता है। आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी जलती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।
  
इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनन्त-अनन्त शक्ति स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए जिन्हें अपने आप की पूर्णता अनुभव करनी है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं। जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही अपने विचारों को क्रिया रूप में परिणत करते रहते हैं। वे जो थोड़ा सा जानते हैं, उसका क्रियान्वयन करते हैं। बहुत ज्यादा जानने के लिए वे नहीं रुके रहते।
  
इस विधि से एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में अनन्त-अनन्त शक्ति का कुआँ खोद लेते हैं। जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनन्त शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। और उसकी अपनी पूर्ण सम्भावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्म शक्ति की अनन्तता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन सन्देश के स्वर यही कहते हैं- कि विचार पर ही मत रुके रहो। चलो और कुछ करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ़ चलना ज्यादा मूल्यवान् है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८३

कोई टिप्पणी नहीं: