शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

👉 दीया

दीया- जड़ और चेतन का मिलन है। दीया की देह मिट्टी की है, परन्तु उसकी ज्योति में चैतन्यता का प्रकाश है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में भी एक दीया जलाया गया है। उसकी लौ सतत्-निरन्तर ऊपर उठ रही है। दीया की संरचना और संसाधन तो सांसारिक भूमि का भाग है। परन्तु उसकी लौ अनगिन जनों को प्रेरणा, प्रकाश व ऊर्जा देने के लिए लगातार ऊर्ध्वगामी बनी हुई है।
  
यह लौ विश्वविद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं की चेतना की भाँति है। जिन्होंने अपने प्राणों का स्नेह डाल यह दीया जलाया है। डिवाइन इण्डिया यूथ एसोशिएशन- (ष्ठढ्ढङ्घ्न) यही नाम है इस दीया का। इसकी देह मातृभूमि की मिट्टी से बनी है। युवाओं का प्राणबल-मनोबल एवं आत्मबल ही वह तेल है, जिसके बल यह दीया जला है। युवाओं का संकल्प ही इस दीये की बाती है। और इसकी ज्योति, वह तो युवाओं-युवतियों की आत्मचेतना है। जो अपने साहस, पराक्रम, सद्ज्ञान व सद्कर्म की प्रकाश किरणें बिखेर कर देश व विश्व के युवाओं का सत्पथ-सन्मार्ग प्रकाशित कर रही है।
  
संरचना और साधन की दृष्टि से आज यह दीया छोटा लग सकता है; परन्तु इसके अतिरिक्त भी इसमें बहुत कुछ है। और वह है विश्वविद्यालय की युवा चेतना। यह अग्नि शिखा ही इसका प्राण है। इसके निरन्तर ऊपर उठने की उत्सुकता ही इसकी आत्मा है। यह लौ है इसीलिए तो दीया- दीया है, अन्यथा तो सब मिट्टी है। यह लौ पूरी तरह से जल उठेगी तो युवा भारत में क्रान्ति घटित होना सुनिश्चित है। जिनका ध्यान अभी तक इसकी संरचना और साधनों पर है, वे इसके सत्य को न समझ सकेंगे। परन्तु जिन्हें इसकी ज्योति दिखाई दे रही है, वे अवश्य इसके द्वारा होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों को निहार सकेंगे। क्योंकि ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि तब युवाओं के इस संकल्प में युग देवता भगवान् महाकाल के संकल्प के दर्शन अवश्य होंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९०

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