सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 52)



🔵 इस शरीर को निर्मूल करना ही होगा। अपनी आत्मा का साक्षात्कार करने के दृढ़ निश्चय में इसे जाने दो। वत्स! अंधकार में छलांग लगाओ तब तुम पाओगे कि वही अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो गया है। सभी बंधनों को काट डालो। वरंच शरीर को कल की अनिश्चितता के महाबंधन के अधीन कर दो और तुरंत तुम पाओगे कि तुमने सर्वोच्च स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है तथा शरीर तुम्हारी आत्मा का दास बन गया है। 

🔴 आध्यात्मिक जीवन में साहस पूर्ण कदमों की आवश्यकता है जैसा कि सांसारिक जीवन के लिये आवश्यक है। जो खतरा मोल नहीं ले सकता उसे कभी कोई उपलब्धि भी नहीं हो सकती। शरीर को अनिश्चितता के समुद्र में फेंक दो। परिव्राजक सन्यासी के समान बनो। व्यक्तिं, स्थान या वस्तु से आसक्त न हो और यद्यपि तुम शरीर खो दोगे तुम्हें आत्मा की प्राप्ति होगी। शौर्य एक आवश्यक वस्तु है। जंगल के शेर का शौर्य। सशक्त हाथ ही माया के परदे को चीर सकते हैं। कल्पना से कुछ नहीं होगा।

🔵 आवश्यकता है पौरुष की। जब तक शरीर का भय है तब तक आत्मानुभूति नहीं हो सकती। थोड़ा विचार करके देखो, संसारी लोग संसारी वस्तुओं की उपलब्धि के लिए कितना त्याग करते हैं। तब क्या तुम आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए त्याग न करोगे? ईश्वरप्राप्ति क्या केवल वाग्मिता या रूपमात्र से हो जायेगी। क्षुद्र आश्रय देने वाले प्रभावों से मुक्त जाओ। खुले में आ जाओ। असीम को अपना क्षितिज बनाओ, समस्त विश्व तुम्हारा क्षेत्र हो जहाँ तुम विचरण करो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 51)

ध्यान की दूसरी घड़ी में गुरुदेव ने कहा: -

🔵 वत्स! मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है, अत: जीवन का सदुपयोग कर लो। जब तुम्हारे मन में कोई उदात्त प्रेरणा जागे तो उसे लोलुपता पूर्वक पकड़ लो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे भूल जाने के पाप के कारण वह सदैव के लिए लुप्त हो जाय। क्योंकि किसी भी आदर्श सिद्धान्त की अनुभूति का एक व्यावहारिक पथ है। अनुभूति की पद्धति भी उतनी ही महत्त्व है जितनी कि स्वयं तत्व की धारणा। अत्यल्प अभ्यास ही क्यों न उसकी तुलना में हजार बड़ी बातों का क्या महत्त्व है? बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं किन्तु उस सिद्धांत की अनुभूति के लिए यदि तुम आवश्यक उत्तरदायित्व ग्रहण न करो तो समय तथा भावना व्यर्थ ही नष्ट हुई।    

🔴 अपने हृदय में कपट न रखो। अपनी अकर्मण्यता पर सोने की चादर डाल कर उसे शरणागति न कहो। निश्चित जान -लो आध्यात्मिक भावनाओं के प्रति तुम्हारी प्रतिक्रिया की कमी के पीछे शारीरिक सुख- सुविधा की अनुशोचना है। यदि तुम्हारे मन में कोई कठिन आध्यात्मिक साधना करने की बात पैठ जाय तो बहुत संभव है तुम्हारा शरीर कह उठे, मन, क्या यह आरामदायक होगा? ओह! शारीरिक कारणों से तुम अपने आदर्श से कितने नीचे गिर गये हो!

🔵 वत्स! सांसारिक संघर्षों में जितने साहस की आवश्यकता है उतना ही साहस आध्यात्मिक जीवन के लिए भी आवश्यक है। कृपण व्यक्ति स्वर्ण- संग्रह में जितना अध्यवसाय करता है, सैनिक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए जितना साहस रखता है, अविनाशी कोष को प्राप्त करने के लिए सदैव के लिए शरीर को जीत लेने के लिए देहात्मबुद्धि को जीत लेने के लिए तुम्हें उतने ही अध्यवसाय की, उतने ही महान साहस की आवश्यकता। किसी भी प्रकार की अनुभूति के पीछे रहस्य है, अदम्य साहस, सर्वथा भयहीन साहस। आत्मविश्लेषण की क्षमता बढ़ाओ तब तुम देख पाओगे कि जब कभी तुम त्यागपूर्ण जीवन का  साहसपूर्वक पालन करने में असफल होते हो तो वह इसलिये कि तुम्हारा शरीर शुद्र स्वार्थपूर्ण नश्वर दैहिक इच्छाओं को पूर्ण करना चाहता है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 50)

🔵 शरीर अवस्था से गुरु- देव के उपदेशों तथा सिद्धान्तों की ओर, व्यक्ति से तत्व की ओर, शिष्य को बच्चे के समान प्रशिक्षित करना आवश्यक है। घनिष्ठ संबंधों में, सर्वोपरि घनिष्ठ गुरु शिष्य के संबंध में शरीर और मन का उतना महत्त्व नहीं रह जाता। स्वयं गुरु की आत्मा ही उच्च से उच्चतम अनुभूति के द्वारा शिष्य में प्रविष्ट हो जाती है। गुरु के स्वभाव में शिष्य का व्यक्तित्व अधिकाधिक विलीन होता जाता है और गुरुदेव का व्यक्तित्व अधिकाधिक उस महत्त्व में, जिसका कि गुरुदेव का शरीर भी एक व्यक्त स्वरूप है विलीन होता जाता है और तब उस अत्युदात्त एकत्व की उपलब्धि होती है। 

🔴 गुरु तथा शिष्य के दो व्यक्तित्वों का जल मिलकर असीम -ब्रह्म- समुद्र हो जाता है। उस परम सौंदर्य की उपलब्धि के लिए जहाँ गुरु की आज्ञा होगी क्या तुम वहाँ नहीं जाओगे? उनके लिए यदि उनकी इच्छा हो तो क्या तुम सहस्रों जन्म- मत्यु के चक्र में नहीं पड़ोगे? तुम उनके प्रिय सेवक हो। उनकी इच्छा ही तुम्हारे लिए नियम है। तुम्हारी इच्छा उनकी इच्छा का उपकरण मात्र है। उनका आदेश पालन करना यही धर्म है। जैसा कि शास्त्र कहते हैं, गुरु ही ईश्वर हैं। गुरु ही ब्रह्मा है।.गुरु ही विष्णु हैं। गुरु ही महादेव हैं। वास्तव में वे ही परम ब्रह्म हैं। गुरु से बड़ा और कोई नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 49)

🔵 जो ब्रह्मस्वरूप हो गया है सभी देवता उसका नमन करते हैं। अपने गुरु की पूजा के परिप्रेक्ष में सभी आध्यात्मिकता के दर्शन करो। इस प्रकार सभी एक हो जायेगा तथा सर्वोच्च अद्वैत चेतना की उपलब्धि होगी। क्योंकि विशाल से विशालतम परिप्रेक्ष में गुरु के दर्शन होंगे। यहाँ तक कि तुम्हारे ज्ञान तथा भक्ति के विस्तार के अनुसार भी गुरुदर्शन होंगे। व्यक्तित्व के चरम विकास के द्वारा सर्वोपरि अहंशून्यता का, स्वयं आत्मा का साक्षात्कार होता है। वहाँ गुरु, ईश्वर, और तुम तथा समस्त विश्व ब्रह्माण्ड एक हो जाते हैं। वही लक्ष्य है। -गुरुदेव को असीम के परिप्रेक्ष में देखो। वही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। गुरुभक्ति के द्वारा तुम सर्वोच्च पथ पर गमन करते हो।

🔴 एक अर्थ में आध्यात्मिक महापुरुष इष्ट से भी अधिक सत्य हैं। तुम के द्वारा ही पिता को समझ सकते हो। ईश्वर की पूजा करने के पूर्व ईश्वरतुल्य मनुष्य की पूजा करो। मनुष्य की ब्रह्मानुभूति संपन्न चेतना के अतिरिक्त ईश्वर और कहाँ है? शिष्य के लिए गुरुपूजा ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि गुरु के व्यक्तित्व की पूजा के द्वारा तुम्हारा क्षुद्र व्यक्तित्वबोध भी तिरोहित हो जायेगा तथा आध्यात्मिक दृष्टि का क्षितिज विशाल से विशालतर होता जायेगा। पहले शारीरिक उपस्थिति आवश्यक हैं उसके पश्चात् आती है गुरु के व्यक्तित्व की पूजा! दूसरा सोपान है शारीरिक उपस्थिति तथा गुरुपूजा के भी परे जाना क्योंकि -गुरु बताते हैं कि शरीर आना नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 48)


और तब गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए एक वाणी ने मेरी आत्मा से कहा : -

🔵 वत्स! अपने गुरु पर असीम श्रद्धा रखो। उनकी कृपा से, उनके ज्ञान से तुम्हारी अन्तरात्मा पुनर्जीवित हो उठी है। उन्होंने तुम्हारा चयन किया है तथा उनके द्वारा ही तुम पूर्ण बनाये गये हो। गुरु की अनुभूतियाँ शिष्य पर मूसलाधार वर्षा के समान गिरती हैं। यह सतत चलता और इसे कोई रोक नहीं सकता। तुम्हारे प्रति उनका प्रेम असीम है। तुम्हारे लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते है। वे तुम्हें कभी नहीं त्यागेंगे। उनका प्रेम ही उनकी दिव्यता का प्रमाण है। उनका अभिशाप भी छद्म में वरदान है।

🔴 तुम्हारे गुरु की अनुभूति तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष और घनीभूत रूप में है। वस्तुत: उनके जीवन के परिवर्तन के द्वारा ही तुम आध्यात्मिक सत्य के दर्शन करते हो। तुम्हारे लिए और कोई मार्ग नहीं है। स्वयं को पूर्णत: गुरु के प्रति समर्पित कर दो। सब देवता भी क्या हैं? जिसने अपने स्वरूप की अनुभूति कर ली वही सबसे महान आध्यात्मिक पुरुष है। जिसने आत्मा का दर्शन कर लिया है उसकी महिमा को देख कर मनुष्य उस अनुभूति को विभिन्न रूपों में देख पाता है। गुरुदेव व्यक्तित्व की सीमा से बहुत अधिक हैं। उनके द्वारा आध्यात्मिक सत्य के सभी पक्ष प्रकाशित होते है। क्या वे स्वयं शिव नहीं हैं?

🔵 शिव महान् गुरु के एक पक्ष मात्र हैं। अपने गुरु का शिव रूप में ध्यान करो। इष्ट के रूप में ध्यान करो और ध्यान के सर्वोच्च क्षणों में तुम पाओगे कि गुरुदेव तुम्हारे इष्ट में विलीन हो गये हैं। आत्मसाक्षात्कार के द्वारा आध्यात्मिक सत्य के मूर्त स्वरूप बने श्रीगुरुदेव तुम्हारे सम्मुख खड़े हैं। फिर तुम भावनात्मक देवताओं या देवी देवताओं संबंधी धारणा को ले कर क्या करोगे ? तुम जहाँ भी जाओगे गुरु तुम्हारे साथ रहेंगे। क्योंकि मनुष्य की सहायता करने के लिए उन्होंने निर्वाण का भी त्याग कर दिया है। इस रूप में वे सचमुच दूसरे बुद्ध हैं। क्योंकि उन्होंने अपने स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया है अत: उनका व्यक्तित्व और अधिक सत्य तथा शक्तिशाली हो उठा है। ब्रह्मचैतन्य लाभ करने के कारण वे अतिमानवीय जीवन तथा ज्ञान से संपन्न हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 47)

🔵 सच्चा ज्ञान  सदैव एक चेतन अनुभूति की प्रक्रिया है। विचारों को आत्मसात् करना भोजन ग्रहण करने के समान ही हमारे चेतन व्यक्तित्व को स्पर्श करता है तथा उस पर प्रभाव डालता है। स्नायुजालों को, विचारों को अवश्य आत्मसात् करना चाहिये तब समस्त शरीर ही चैतन्यमय हो उठता है। शरीर आत्मा हो उठता है। इसी अर्थ में कुछ आचार्यों ने कहा है कि मैं शरीर से भी चिन्मय हूँ। इसीलिए गुरु की शारीरिक सेवा भी एक सौभाग्य हैं। तब शरीर स्वयं चैतन्य की एक प्रक्रिया बन जाता है।

🔴 वत्स! एक बहुत बड़ा कार्य जो तुम्हें करना होगा वह है आत्मसंपर्क। अभी तुम्हारे मन की एकाग्रता अधिकांश परिस्थितियों तथा वातावरण पर निर्भर है।तुम दूसरों से संपर्क करने की आवश्यकता अनुभव करते हों। किन्तु दूसरे का मन तुम्हें थोड़ी उत्तेजना भर दे सकता है। जब तुम दूसरों से बातचीत करते हो तब भी तो स्वयं अपने आपसे भी बात करते हो। किन्तु ज्ञान जो सच्चा प्रेरक कह भीतर से आना चाहिये। दूसरों पर क्यों निर्भर रहोगे ? गैंडे के समान अकेले बढ़ चलो।

🔵 वत्स! मन स्वयं ही गुरु हो जाता है। यह एक प्राचीन उपदेश है। क्यों? क्योंकि मन पर आत्मसाक्षात्कार के लिए जोर डालने वाले तुम स्वयं ही तो दिव्य हो। मैं तथा अन्य सभी उस महान सत्य के विभिन्न पथ हैं। जब मैं शरीर में था, तुम्हारे स्तर पर के चैतन्य का आश्रय किया था, वह मानो एक खिड़की थी जिससे तुम अनंत को देख पाते थे। किन्तु वह चेतना जो कि मैं था, मैं स्वयं ही उसे महान दिव्य सत्ता में विलीन करने की चेष्टा करता हूँ। तुममें जो सत्य है, मुझमें जो सत्य है, वह ब्रह्म ही है। वत्स! उस ब्रह्म की ही पूजा करो! उसी की उपासना करो।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 46)

🔵 बुद्ध तथा ऋषियों के काल तथा आधुनिक युग के मध्य आदर्शवाद और रोमांस का आकर्षण आज भी खड़ा है। पृथ्वी जैसी आज है उस समय भी वैसी ही थी। ग्रीष्म उष्ण तथा शीत ऋतु ठंडी थी। मनुष्य के हृदयों में वासनाएँ थीं। धन और दरिद्रता, स्वास्थ्य और रोग साथ साथ थे। जंगल, पहाड़, नदियाँ, नगर, बाजार, सभी थे और मृत्यु तब भी सभी जगह अकस्मात् व्यक्ति के प्राण हरण कर लेती थी जैसा कि वह आज भी करती हे। उन्हीं कठिनाइयों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ता था। बुद्ध ने भी उसी संसार को देखा जिसे आज तुम देख रहे हो। अत: वही अनुभूति संभव है। स्वयं को कार्य में नियोजित कर दो। ठीक उसी मानवीय वातावरण में जैसा कि आज है स्वयं वेद भी नि:सृत हुये थे। वत्स! स्वयं को कार्य में नियोजित कर दो।

🔴 चेतन मन को हाथ में लेना होगा। यही वह उपकरण है, जो कि जब पूर्णतः तैयार हो जायेगा तब तुम उसके द्वारा अपनी अन्तश्चेतना की छिपी गहराइयों को खोज सकोगे और पुराने संस्कारों को भस्म कर सकोगे जो कि अभी यदा कदा भीतर की देहलीज से ऊपर दौड़ आते हैं। तथा इसी चेतन मन के द्वारा जब उनका आध्यात्मीकरण हो जाता हैं, सर्वोच्च चेतना (समाधि) की उपलब्धि की जा सकती है। मनुष्य ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ता है। चेतन मन के द्वारा जीता क्षेत्र ही ज्ञान है। इसके द्वारा विचारों के असीम क्षेत्र का अधिकाधिक उपलब्ध होता जाता है। इसका अन्त सर्वज्ञता है। वत्स, सच्चा ज्ञान भौतिक नहीं आध्यात्मिक होता है। ज्ञान के द्वारा व्यक्ति उद्घाटित होता है, वस्तु नहीं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 45)


🔵 यदि अमरत्व को प्रगट करना हो तो मर्त्य का दमंन कर उसे सूली पर चढ़ाना होगा। तुम्हारा सत्यस्वरूप चेतना के अस्थायी आधार के पीछे ही है। वत्स! संकीर्णता न रखो। तुमने आध्यात्मिक जीवन का एक पथ स्वीकार किया है, उस विषय में धर्मान्ध क्यों होते हो। ईश्वर  प्राप्ति केवल एक ही उपाय से नहीं होती। सभी पथों से उन्हें पाया जाता है। जहाँ कहीं भी महिमा और महत्ता है प्रभु स्वयं वहाँ प्रगट हैं। सभी दीवारों को ढहा दो। तुम्हारे लिए कोई विशेष सीमायें निर्धारित नहीं की गई हैं।

🔴 सर्वतोमुखी बनो। तुम्हारा संपूर्ण कर्त्तव्य आत्मपूर्णता में ही है। सब विचारों को छोड़कर केवल एक ही विचार का उपदेश देने की आशा तुम्हें किसने दी! उपदेश ही देने की आज्ञा तुम्हें किसने दी ? मैंने अल्पमात्रा में तुम्हारी आँखे खोली हैं? उसके पूर्व तुम्हारी दृष्टि आच्छादित थी। अब तुम यह जान पा रहे हो कि को शिक्षा देने के पूर्व तुम्हें, स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। अहंकार के प्रति सावधान रहो। तथा कथित नि:स्वार्थता तथा कार्य करने की इच्छा के पीछे यही गहरा पैठा अहंकार है। वस्तुत: अहंकार ही सबसे बड़ा अभिशाप है। पहले स्वयं को नियोजित करो। चंचल मन के साथ दूसरों की भलाई करने की आशा तुम कैसे सकते हो ?

🔵 सर्वप्रथम आवश्यक वस्तु है एकाग्रता। तुम्हारी ऊपरी चेतना उतनी ही स्वेच्छाचारी और अप्रशिक्षित है जितना कि एक उद्दण्ड बालक। आवश्यक यह है कि तुम अपनी गहराई को, तुम्हारे सच्चे स्वरूप को ऊपर सतह पर लाओ। एक क्षण देवता होना तथा दूसरे क्षण वासनाओं का दास हो जाना नहीं चलेगा। वत्स! चरित्र, जैसा कि मैंने बार बार कहा है, दर्शन की कसौटी है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 44)


अपने उपदेशों को चालू रखते हुये गुरुदेव ने कहा:

🔵 तिल तिल कर मैं तुम्हारे व्यक्तित्व पर अधिकार करूँगा। पग पग चलकर तुम मेरे निकटतर आते जाओगे क्योंकि मैं ही तुम्हारा प्रभु और ईश्वर हूँ। तथा मैं तुम्हारे और मेरे मध्य इन्द्रियभोग रूपी देवताओं या तत्संबंधी विचारों को सहन नहीं करूँगा। वत्स! पर्दो को चीर डालो।

🔴 तब मैं जान पाया कि गुरुदेव ने ही मेरा दायित्व लें लिया है। मेरे मस्तक पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उन्होंने पुन:कहा:-

🔵 इन्द्रियातीत अनुभूतियाँ अच्छी हैं, किन्तु चरित्र द्वारा उत्पन्न होने वाली चेतना इन्द्रियातीत अनुभूति से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। चरित्र ही सब कुछ हैं तथा चरित्र त्याग से ही बनता है। दुःख तथा आघात हमारी आत्मा की शक्ति को प्रगट कर हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। उनका स्वागत करो। ये जिन दैवी अवसरों का निर्माण करते हैं उन्हें देखो।

🔴 जैसी की -कहावत है, हीरा हीरे को काटता है- उसी प्रकार दुःख ही पाशविक प्रवृत्तियों को जीतता है। धन्य है दुःख! महाभक्तिमति कुन्ती ने प्रभु से प्रार्थना की थी, कि उसके भाग में सदा दु:ख ही पड़ते रहें जिससे कि वह सदैव प्रभु का स्मरण करती रह सके। वत्स! उसकी प्रार्थना ही सच्ची प्रर्थना थी तुम भी उसी प्रकार प्रार्थना करो। यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो यह जान लो कि दुःख तुम्हें मेरे ओर अधिक निकट लायेगा तथा तुम्हारा श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रगट हो उठेगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 43)

🔵 सभी प्रवृत्तियों में संन्यास की प्रवृत्ति सर्वश्रेष्ठ है। स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त करके तुम उन सबकी- सहायता करते हो जो तुम्हें जानते हैं या जो तुम्हारे- जीवन में आयेंगे। आत्म- साक्षात्कार के द्वारा संन्यासी सभी कर्तव्यों को पूर्ण कर लेता है। उसके आत्मत्याग से दूसरे भी  मुक्त हो जाते हैं। अपने हृदय और कर्मों में संन्यासी बनो। किसी व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर न रहो। दूसरों को उनकी स्वतंत्रता दो तथा तुम स्वयं भी मुक्त रहो। अपनी असुविधाओं के कारण निराश न होओ क्योंकि वही असुविधायें यदि आध्यात्मिक दिशा की ओर मोड़ दी जाएँ तो सुविधाओं में परिवर्तित हो जायेंगी।

🔴 अपनी भावनाओं का अध्यात्मीकरण करो। और जब तुम्हारे स्वभाव में कोई दुर्भावना या स्नायविक- उत्तेजना न रहेगी तब तुम अपने आधार पर खड़े हो सकोगे तथा अनेकों के लिए ज्योति और सहायक होओगे, भले ही तुमने उन लोगों को देखा भी न हो। सिंह के समान बनो, तब सभी दुर्बलताएँ तुमसे दूर हो जायेंगी। ईश्वर बनने की इच्छा करो तब तुम्हारी देहात्मबुद्धि दू रहो जायेगी। तुम शुद्धात्मा हो जाओगे। प्रकृति के भव्य दृश्यों पर्वतों, विशाल समुद्रों तथा चमकते सूर्य से शिक्षा ग्रहण करो। शक्तिशाली व्यक्तित्व से एकत्व बोध करो।

🔵 वत्स! -स्वयं का निर्माण करना एक लम्बी तथा कष्टप्रद प्रक्रिया है। तुम उन्नत हो सको इसके पूर्व यह आवश्यक है कि तुम स्वयं के प्रति अत्यन्त निष्कपट बनो। अपने प्रति छूट या दया के सभी पर्दों को लगातार दु:ख तथा अपने क्षुद्र अंह की सीमा के अनुभव द्वारा चीर डालना होगा। ईश्वर के साथ अज्ञान तथा तुम्हारी आत्मा के साथ छद्म नहीं हो सकता। सूक्ष्म तथा सर्वश्रेष्ठ अवश्य प्रगट होगा। अत: दुःख के प्रत्येक वाहक के प्रति कृतज्ञ रहो जो कि एक साथ तुम्हें और तुम्हारी दुर्बलता को तुम्हारे सामने प्रगट कर देता है। कहो, दुःख तुम धन्य हो!

🔴 अल्पविद्या ने तुम्हें बुद्धिमान, अहंवादी बना दिया है। महत् विद्या तुम्हें आध्यात्मिक बना देगी। स्मरण रखो मन आत्मा नहीं है। अनुभवों मन को कुचल डालने दो, जैसा कि वह करेगा। यह उसे शुद्ध करेगा यही मुख्य बात है। क्रमश: आत्मा का सूर्य अज्ञान के काले बादलों को भेद देगा और तब लक्ष्य तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जायेगा। तुम उसकी ज्योति में मिल जाओगे।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

बुधवार, 28 सितंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 42)

🔵 ध्यान की घड़ियों में मुझे सम्बोधित करनेवाली वाणी मैंने सुनी:- हृदय में कटुता न रखो। स्वयं के साथ निष्कपट बनो। स्वयं के संबंध में सभी भ्राँत धारणाओं को उखाड़ फेंको। सभी मिथ्यासक्तियों को निर्मूल कर दो। शरीर के स्थान पर चैतन्य को देखो। दूसरे तुम्हें जैसा देखते हैं स्वयं को उसी प्रकार देखो। सर्वोपरि स्वयं पर मिथ्यानुकम्पा न करो। दृढ़ बनो। यदि तुममें भूले हैं तो वे एक सिंह की भूलों के समान हों।

🔴 विधि का विधान शक्तिशाली है। तुम्हारी स्वयं की इच्छा के अनुपात में वह तुम्हारे हृदय का मर्दन करेगा तथा व्यक्तित्व को झकझोर देगा। किन्तु वह तुम्हें सच्चे आत्मज्ञान की ओर भी ले जायेगा। अत: अपने विश्वास को विधान पर आधारित करो। क्रिया से प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। अत: तुम्हारी क्रियाओं को हृदय की पवित्रता तथा विचारों से आने दो। तब तुम शांति का अनुभव करोगे। भावना के नाम पर प्राय: बहुत से दोष ही ढके जाते है। उनकी जड़ों में स्थूल शारीरिक मूल प्रवृत्तियाँ ही क्रियाशील होती हैं। उन्हें सोने की चादर से ढक देने से कोई अंतर नहीं पड़ता।

🔵 व्यक्ति में विशुद्ध शारीरिक संवेगों को उच्च भावों के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृति होती है। किन्तु विवेक इस छद्म को चीर देता है तथा यह सिखाता है कि मिथ्या आसक्ति सदैव आत्मकेन्द्रित, निरंकुश, क्रूर और विवेकहीन होती है। वह स्वेच्छाचारी, अंधा, तथा शरीरासक्त होता है। इसके विपरीत विशुद्ध प्रेम आत्मा से संबंधित होता है। प्रेमास्पद को असीम स्वतंत्रता देता है तथा आत्मत्याग और विवेक से परिपूर्ण होता है। अत: अपने हृदय से आसक्ति और अनुचित भावों को निकाल फेंको और एक बार यह कर लेने पर जैसे तुम अपनी वमन की हुई वस्तु को घृणास्पद होने के कारण पुन: नहीं देखना चाहते उसी प्रकार उन आसक्तियों के विषय में न सोचो। वह बंधन है, भयानक बंधन। इसे स्मरण रखो तथा मुक्ति के लक्ष्य की ओर वीरतापूर्वक बढ़ चलो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 41)

🔵 सहिष्णुता बढ़ाओ। तुम पूरी तरह अनुत्तरदायी तथा आक्रमक हो। इसके पूर्व कि तुम दूसरों के दोष देखो तथा निर्ममता पूर्वक उनकी आलोचना करो, अपनी भंयकर भूलों को देखो। यदि तुम अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगा सकते तो उसे तुम्हारे ही विरुद्ध बकने दो, दूसरों  के विरुद्ध नहीं। पहले अपना घर सम्हालो। ये शिक्षायें आत्मसाक्षात्कार के सर्वोच्च दर्शन के अनुकूल ही हैं। क्योंकि चरित्र के बिना आत्म -साक्षात्कार हो ही नहीं सकता। नम्रता, निरहंकारिता, सज्जनता, सहनशीलता, दूसरों के दोष न देखना, ये सब गुण आत्मसाक्षात्कार के व्यवहारिक तथ्य हैं। दूसरे तुम्हारे साथ क्या करते हैं इस ओर ध्यान न दो। अपने आत्मविकास में लगे रहो। जब तुमने यह सीख लिया तब एक बहुत बड़े रहस्य को जान लिया।

🔴 अहंकार ही सबके मूल में है। अहंकार को उखाड़ फेंको। वासना के संबंध में सतत सावधान रही। जब तक शरीर चिता पर न चढ़ जाय तब तक पूर्णत: इन्द्रियजित होने का निश्चय नहीं हो सकता। यदि तुम इसी जीवन में मुक्त होना चाहते हो तो अपने हृदय को श्मशान बना कर अपनी सारी इच्छाओं को उसमें भस्म कर दो। अंध आज्ञाकारिता सीखो। तुम एक बच्चे के अतिरिक्त और क्या हो ? क्या हो वास्तविक ज्ञान है ? जैसे बच्चे को ले जाया जाता है उसी प्रकार तुम भी स्वयं को ले जाया जाने दो। स्वयं को मेरी इच्छा के प्रति पूर्णत: समर्पित कर दो। क्या मैं प्रेम में तुम्हारी माँ के समान नहीं हूँ ? और फिर मैं तुम्हारे पिता के समान भी हूँ क्योंकि मैं तुम्हें दण्ड भी देता हूँ। यदि तुम गुरु होना चाहते हो तो सर्वप्रथम शिष्य होना सीखो। तुम्हें अनुशासन की आवश्यकता है।

🔵 पहले मेरे कार्य के लिए तुम्हारा उत्साह बचकाना तथा उत्तेजना पूर्ण था। अब वह सच्ची अन्तर्दृष्टि से युक्त होता जा रहा है। बच्चा विचार-  हीन होता है, युवक आकांक्षी होता है, प्रौढ़ व्यक्ति ही उपादेय होता है। मैं तुम्हें आध्यात्मिक अर्थ में प्रौढ़ बनाना चाहता हूँ। मैं तुम्हें गंभीर, दायित्वपूर्ण, निष्ठावान, सुअनुशासित तथा चरित्र की दृढ़ता और निष्ठा के द्वारा मेरे प्रति अपने प्रेम और निष्ठा को प्रगट करने वाला बनाऊँगा। बढ़ो! मेरा आशीर्वाद तथा प्रेम सदैव तुम्हारे साथ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 40)


मेरी आत्मा में श्रीगुरुदेव की वाणी ने कहा -

🔵 वत्स! स्वयं तुम्हारे विकास के इतिहास से अधिक रुचिकर और कुछ नहीं है। व्यक्तित्व का विकास ही जीवन को रुचिपूर्ण बनाता है। साक्षी बनो। एक ओर खड़े हो जाओ तथा अपने व्यक्तित्व का इस प्रकार निरीक्षण करो मानों वह तुमसे भिन्न कोई वस्तु हो। अपने स्वेच्छाचारी विचारों तथा चंचल इच्छाओं का निरीक्षण करो। गत कल की अनुभूतियों का कितना क्षणिक महत्व है। आगामी दस वर्षों में भी क्या आना जाना है?

🔴 इस बात का विचार कर जीवन में अविचल रहो। जो कुछ भी सांसारिक है उसका कुछ भी महत्व नहीं है। वह चला जायेगा। इसलिये आत्मिक वस्तु में ही समय लगाओ। अनासक्त बनो। ध्यान में डूब जाओ। तुम्हारी वृत्ति साधुओं की सी हो। किसी भी अनुभव या विचार का महत्व चरित्र निर्माण की उसकी प्रवृत्ति पर ही निर्भर करता है। इस बातका अनुभव कर जीवन का एक नया दृष्टिकोण प्राप्त करो।

🔵 संसारी लोग क्षणभंगुर मिट्टी के लोंदे, अपने इस शरीर के लिए कितना समय देते है। उनका मन इन क्षणभंगुर वस्तुओं के लिए कितना चिन्तित रहता है। वे लोग इन नाशवान वस्तुओं के साथ ही नष्ट हो जाते हैं। वे सब माया से ग्रस्त हैं। अत: संसारी वस्तुओं की चिन्ता में न पड़ो। संसारी लोगों का संग त्याग दो। मन कितना सूक्ष्म है। वह सदैव भौतिक वस्तुओं को आदर्शान्वित करने की ही चेष्टा करता है। यही माया का जादू है। ऊपर से दिखने वाले तड़क भड़क तथा मिथ्या सौंदर्य से मोहित न होओ।

🔴 अन्तर्दृष्टि न खोओ। अनादिकाल से यह संघर्ष चल रहा है। तुम्हारी आत्मा के प्रति ईश्वर का जो प्रेम है उसकी तुलना में संसारासक्ति क्या है? आसक्ति शरीर के प्रति होती है इसलिए बंधन है। किन्तु तुम मुझे अपनी आत्मा से प्रेम करते हो वही अंतर है। वत्स! संसार को भयानकता तथा मिथ्यात्व का बोध करने के लिए तुम कठिन पीड़ा से होकर निकलो, यह दोष नहीं है। तुम जितना अधिक कष्ट पाते हो उतने ही मेरे निकट आते हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 26 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 39)


🔵 संसार मृत्यु से परिपूर्ण है। कर्म का नियम अटल है। सावधान हो जाओ। कहीं ऐसा न हो कि अशुभ कर्मों के मध्य तुम्हारी मृत्यु हो जाय! सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी इन्द्रियलोलुपता तुम्हें और अधिक बंधन तथा कठिन दु:खों को उत्पन्न करने वाले कर्मजाल में फँसा दे! वत्स! एक बार अमृत का स्वाद चख लेने पर यह कैसे संभव है कि तुम असार भूसी में रस लो।

🔴 कभी आतंकित न होओ। भगवान की दया पाप के पहाड़ों से भी अधिक बड़ी है। जब तक तुम विश्वास करते हो तब तक आशा है। किन्तु यह पथ लगभग अनन्त लम्बा है। मानव व्यक्तित्व को ईश्वरचैतन्य में परिवर्तित करने में, समस्त दोषों को निर्मूल करने में कितने जीवन लगेंगे इस 'पर विचार करो। तब क्या तुम यह नहीं समझ सकते कि तुम्हें अपने कल्याण के लिए कितना परिश्रम करना पड़ेगा ? और यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो क्या कम से कम मेरे लिए ही तुम लक्ष्य तक पहुँचने की चेष्टा नहीं करोगे ? तुम वीरता पूर्वक संघर्ष कर सको तथा पूर्ण हो जाओ इसके लिए मैंने इतनी लम्बी प्रतीक्षा की है। तुम्हारी साधना के लिए मैं व्याकुल रहा हूँ। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ रहूँगा। मैं सदैव तुमसे प्रेम करूँगा किन्तु तुम्हें आलस्य को दूर करना होगा। नैतिक आलस्य से बाहर निकलो। मनुष्य बनो।

🔵 मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम तुम्हारे जीवन का ध्रुवतारा हैं। यह तुम्हारे अस्तित्व का आधार है औरे इसका कारण भी है। क्योंकि मेरे प्रति तुम्हारे प्रेम से ही तुम्हारा उद्धार होगा। गुरु के प्रति भक्ति ही एक आवश्यक वस्तु है। वह तुम्हारी सभी कठिनाइयों को दूर कर देगी। अत: प्रसन्न रही। जान रखो मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। मेरा इर्श्वरानुराग, मेरी अनुभूति, मेरे पास जो कुछ भी है वह सब तुम्हें दे दिया जायेगा क्योंकि यदि आवश्यक हो तो शिष्य के कल्याण के लिए स्वयं को दे देने में ही गुरु का आनन्द है।

🔴 एक बार जब मैंने तुम्हें स्वीकार कर लिया हैं तब यह संबंध अनन्त काल के लिए हो गया है। जाओ और शांति से रहो। यह स्मरण रखो कि यदि तुम स्वयं के प्रति निष्ठावान हो तो तुम मेरी महिमा को बढ़ा रहे हो, यहाँ तक कि मेरे दर्शन का भी विस्तार कर रहे हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

👉 तुम बीच में खड़े हो

🔴 तुम परमात्मा की आधी शक्ति के मध्य में खड़े हो, तुमसे ऊँचे देव, सिद्ध और अवतार हैं तथा नीचे पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि हैं। ऊपर वाले केवल मात्र सुख ही भोग रहे हैं और नीचे वाले दु:ख ही भोग रहे हैं। तुम मनुष्य ही ऐसे हो, जो सुख और दु:ख दोनों एक साथ भोगते हो। यदि तुम चाहो तो नीचे पशु-पक्षी भी हो सकते हो और चाहो तो देव, सिद्ध, अवतार भी हो सकते हो।

🔵 यदि तुम्हें नीचे जाना है तो खाओ, पीओ और मौज करो। तुम्हें तो सुख के लिए धन चाहिए, वह चाहे न्याय से मिले या अन्याय से। नीचे आने में बाधा या कष्ट नहीं है। पहाड़ से नीचे उतरने में देर नहीं लगती। इसी तरह यदि तुम अपने भाग्य को नष्ट करना चाहो, तो कर सकते हो, परंतु पीछे तुम्हें पश्चात्ताप करना पड़ेगा। यदि तुम ऊपर जाना चाहो तो तुम्हें सत्य-मिथ्या, न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म के बड़े-बड़े विचार करने पडेंगे। पर्वत के ऊपर चढ़ने में कठिनाई तो है ही, परन्तु कठिनाई का फल सुख भी मिलेगा। यदि तुम कठिनाई के दु:ख को सिर पर ले लोगे, तो परम सुखी हो जाओगे।

🔴 दोनों बातें तुम्हारे लिए सही हैं, क्योंकि तुम बीच में खड़े हो, मध्य में रहने वाले आगे-पीछे अच्छी तरह देख सकते हैं, तुम ही अपने भाग्यविधाता हो, चाहे जो कर सकते हो, तुम्हारे लिए उपयुक्त और अनुकूल समय यही है, समय चूक जाने पर पश्चात्ताप ही हाथ रह जाता है।

🌹 -अखण्ड ज्योति -नवम्बर 1943

👉 You are standing in the Middle

🔵 You are standing in the middle of the cosmic layer of God’s creation. At the higher realms are the great saints, Siddhas, angels and incarnations of divine powers. Beneath your level of existence are the animals, birds, insects and lower organisms. Those above are enjoying in the divine paradise and those below are suffering in various forms. You, the human being are the only one allowed to share both the joys and the pains. You are also the only one privileged with the freedom of action to transform your fate accordingly. It’s up to you whether you
want to move your life-course downwards or upwards and destine its devolution to the lower, beastly forms or evolution to beatified, illumined states…

🔴 If you chose to decline then don’t care for anything. Just eat, rest and live for sensual joys. Earn these joys by whatever means – ethical or unethical. It’s really easy to fall down. You can spend all your stock of good omen for petty pleasures or drain it out by adopting heinous actions. But then there will be nothing but repenting and darkness…

🔵 If you want to rise high on the celestial scale of evolution of your life, you will have to distinguish between the right and the wrong, truth and false, fair and unfair, and choose the righteous path of wisdom and ideals. Climbing up on the higher mountains is harder, but then, your endeavors will lead to greater achievements in the end. If you bear hardships for adoption of high ideals, you are indeed elevating your life towards brighter ends.

🔴 You are the architect of your future destiny. Life is momentary. So don’t miss any instant of this precious opportunity. You are in the middle. You can see both ways upwards and downwards and select the future course of your life prudently.

🌹 -Akhand Jyoti, Nov. 1943

शनिवार, 17 सितंबर 2016

👉 प्रार्थना कब सफल होगी

🔴 ईश्वर से की गई प्रार्थना का तभी उत्तर मिलता है, जब हम अपनी शक्तियों को काम में लाएँ। आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता और अज्ञान ये सब अवगुण यदि मिल जाएँ, तो मनुष्य की दशा वह हो जाती है जैसे किसी कागज के थैले के अंदर तेजाब भर दिया जाए। ऐसा थैला अधिक समय तक न ठर सकेगा और बहुत जल्द गलकर नष्ट हो जाएगा।

🔵  ईश्वरीय निमय बुद्धिमान माली के समान हैं जो निकम्मे घास-कूड़े को उखाड़ कर फेंक देता है और योग्य पौधों की भरपूर साज-सॅभाल रखकर उन्हें उन्नत बनाता है। जिसके खेत में निकम्मे खर-पतवार उग पड़ें, उसमें अन्न की फसल मारी जाएगी। ऐसे किसान की कौन प्रशंसा करेगा, जो अपने खेत की दुर्दशा करता है। निश्चय ही ईश्वरीय नियम निकम्मे पदार्थों की गंदगी हटाते रहते हैं, ताकि सृष्टि का सौंदर्य नष्ट न होने पाए।

🔴 प्रार्थना का सच्चा उत्तर पाने का सबसे प्रथम मार्ग आत्म-विश्वास है। कर्त्तव्यपरायण द्वारा ही सच्ची प्रार्थना होनी संभव है। ईश्वर नामक सर्वव्यापी सत्ता में प्रवेश करने का द्वार आत्मा में होकर है। वही इस खाई का पुल है। अविश्वासी और आत्मघाती लोग निश्चय ही विपत्ति में पड़े रहते हैं और सही मार्ग की तलाश करते फिरते हैं। आत्मतिरस्कार करने वालों को ईश्वर के यहाँ भी तिरस्कार मिलता है और उनकी प्रार्थना भी निष्फल चली जाती है।

🌹 -अखण्ड ज्योति -मार्च 1943

👉 When is a Prayer Granted?

🔵 Our prayers deserve to be heard by the Almighty only when we take care of making use of the potentials he has already bestowed upon us. Accumulation of negative tendencies of lethargy, dullness, escapism from duties, ignorance, etc makes one hazardous – for his own life – like a balloon full of concentrated acid, which is most likely to explode anytime or ruin due to the acidic burning.

🔴 The rules in the system of God work like a vigilant gardener who uproots the useless and harmful wild growth and carefully nurses the saplings of the useful vegetation. If a field is not ploughed and is full of useless grass or shrubs etc, how can it yield a crop (even if the soil is fertile)? Who will praise a farmer, who lets his field be destroyed without bothering to clean it? The system of God certainly can’t allow its field of Nature to be left unguarded. The rules of the Omnipresent are such that the vices, the evils, the futile, get eliminated continuously so that the perfection and eternal beauty of HIS creation remains unperturbed. If you expect your calls to be heard, you will also have to constantly strive for self-refinement.

🔵 The best way to get the response to your prayers is to awaken your selfconfidence and follow the path of duties. Then alone your inner self will awake. The opening to the path to the Light Divine lies deep within the realm of soul and enlightened inner self provides the only bridge to reach this sublime source. Those who don’t have faith in the dignity of their own souls, who keep ignoring the inner voice and hunt in the external world to quench their wishes are lost in the smog of passions and confusions and invite adversities for themselves. Those
who scorn their own (inner) selves are also rebuked at God’s end and their prayers evaporate in the void…

🌹 -Akhand Jyoti, March 1943

बुधवार, 14 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 38)


ध्यान की शांति में उस वाणी ने कहा: -

🔵 संसार के बंधन भयंकर हैं। माया के जाल से छूटना कठिन है। जीवन हमें सिखाता है, सच्चा जीवन जीने के लिए हमें जीवन के पार जला होगा। मृत्यु पर विजय प्राप्त करनी होगी। यही सबसे महत् कार्य है, तथा इस विजय का पथ है, उन शारीरिक वृत्तियों को जीतना जो हमें मृत्यु की ओर ले जाती हैं वत्स! मैं तुमसे गंभीरता पूर्वक कहता हूँ कि जो कुछ भी वस्तुएँ तुम्हें प्रलोभित करने के लिए आती हैं उनके प्रति सजगता पूर्वक सावधान रहो। आध्यात्मिक उन्नति का एक मात्र पथ है प्रलोभनों का पूर्वाभास पा लेना। अपने मन पर कड़ी नजर रखो। जो श्रेष्ठ और महान् हैं सदा उसी में व्यस्त रहो। इस प्रकार धीरे धीरे तुम स्वयं को मुक्त कर लोगे।

🔴 जब प्रलोभन आता हैं तब मन को यह समझने का समय मिलने के पूर्व ही कि क्या हो रहा है, वह मानों अकस्मात् ही आ जाता है और व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप में शीघ्रता पूर्वक प्रलोभन के सामने, हार जाने की स्थिति में आ जाता है। सभी संत यह जानते हैं इसलिए वे अशुभ विचारों का पूर्वानुमान कर उन्हें उठने से रोकने तथा उनकी शक्ति को क्षीण करने के लिए दृढ़ता पूर्वक शुभ विचारों का चिन्तन करते हैं। विचारों के द्वारा ही व्यक्ति बनता या बिगड़ता है। अत: सावधान रहो जिससे कि तुम शुभ विचारों का ही चिंतन मनन करते रहो।

🔵 स्मरण रखो मन को ही तुम्हें डूबने से सदा बचाये रखना है। उसे कभी अकर्मण्य न रहने दो। अकर्मण्यता अशुभ का दूसरा पक्ष है, यह वह घोंसला है जिसमें अशुभ अत्यन्त सफलता पूर्वक संवर्धित होता है। अकर्मण्यता से सावधान रहो। जीवन को गंभीरता पूर्वक ग्रहण करो। साय की कमी तथा तुम्हारे सम्मुख आत्मसाक्षात्कार का जो महान कार्य है उसकी गुरुता को समझो। इसी क्षण तुम्हारा समय है। इसी क्षण तुम्हारा अवसर है। अभी तुम जिन परिस्थितियों की सीमाओं तथा संघर्ष में हो, यदि असावधानी पूर्वक तुमने स्वयं को इससे अधिक बुरी परिस्थितियों की सीमाओं और संघर्षों में बह जाने दिया तो तुम्हें अत्यन्त कटु पश्चाताप करना पड़ेगा। उपने वर्तमान जीवन को आत्मजयी बना कर स्वयं को अधिक अच्छे भविष्य का, अधिक उत्तम जन्म का आधिकारी बना लो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 37)

🔵 अभी, यही, अमरत्व के लिए संघर्ष करो। मन को प्रशिक्षित करो। वही एकमात्र महत्त्वपूर्ण कार्य है। जीवन का महान अर्थ तथा उद्देश्य ही वह है। यद्यपि जब कि आत्मा मानों हाड़मांस के पिंजरे मे आबद्ध -है तब भी अभी ही कह अवसर है जबकि देहात्मबुद्धि को जीत कर अमरत्व का प्रदर्शन किया जाय। स्वयं को अमरत्व का अधिकारी बनाओ। जिन्होंने देहात्मबुद्धि को त्याग दिया है देवता भी उनकी पूजा करते हैं। मृत्यु केवल एक भौतिक घटना मात्र है। मन का जीवन बहुत लम्बा होता है तथा आत्मा का जीवन असीम और अनन्त है।

🔴 तब यह कितना आवश्यक है कि तुम महान् विचारों का मनन करो तथा इस प्रकार अपने आध्यात्मिक विकास को त्वरित करो। बाह्य वस्तुओं को त्याग दो। यदि कोई व्यक्ति समस्त विश्व को जीत ले तो भी उसे आत्मविजय करनी होगी। उसे स्वयं को जानना ही होगा क्योंकि आत्मज्ञान ही जीवन का लक्ष्य है। ज्ञान या अज्ञान के रूप में यही वह लक्ष्य है जो जीवन को अर्थ देता है। यही वह लक्ष्य है जो जीने की प्रक्रिया तथा आत्मविकास का स्पष्टीकरण करता है। वही शान वास्तव में मूल्यवान है जो कि अन्तरात्मा को उन्नति की ओर ले जाता है। अत: वीरतापूर्वक स्वयं को आत्मज्ञान प्राप्ति के कार्य में नियुक्त कर दो। हो सकता है कि रास्ता लम्बा हो पर -लक्ष्य के विषय में कोई सन्देह नहीं है। सभी शब्दों को त्याग कर उसी के प्रति सचेष्ट हो जाओ जो कि सर्वोच्च है।

🔵 अपने पैरों पर खडे़ हो जाओ। यदि आवश्यक हो तो समस्त विश्व की भी अवज्ञा कर दो। अन्ततः कौन सी वस्तु तुम्हें हानि पहुँचा सकती है ? परमात्मा के साथ ही सन्तुष्ट रहो। दूसरे लोग बाहरी खजाने की खोज में लगे हैं तुम आन्तरिक खजाने की खोज करो। समय आयेगा जब तुम जान पाओगे कि समस्त पृथ्वी का साम्राज्य आत्मज्ञान की महिमा के सामने धूल के समान है। उठो, इस महत् प्रयत्न के लिए कमर कस लो।

🔴 हे महाप्राण! आओ दिव्य जीवन ही तुम्हारी विरासत है। तुम्हारी संपत्ति को कोई चुरा नहीं सकता। तुम्हारी संपत्ति सर्वशक्तिमान आत्मा की है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 36)

🔵 ध्यान की घड़ियों में पुन: वह वाणी कह उठी- वत्स!, तुम्हें शांति प्राप्त हो। न तो इहलोक में, न परलोक में भय का कोई कारण है। सभी वस्तुओं को व्याप्त करता हुआ प्रेम का महाभाव विद्यमान है और उस प्रेम के लिए ईश्वर के अतिरिक्त और कोई दूसरा नाम नहीं है। ईश्वर तुमसे दूर नहीं है। वह देश की सीमा में बद्ध नहीं है क्योंकि वह निराकार तथा अन्तर्यामी है। स्वयं को पूर्णतः उसके प्रति समर्पित कर दो। शुभ तथा अशुभ तुम जो भी हो सर्वस्व उसको समर्पित कर दो। कुछ भी बचा न रखो। इस प्रकार के समर्पण के द्वारा तुम्हारा संपूर्ण चरित्र बन जायेगा। विचार करो प्रेम कितना महान है। यह जीवन से भी बड़ा तथा मृत्यु से भी अधिक सशक्त है। ईश्वरप्राप्ति के सभी मार्गों में यह सर्वाधिक शीघ्रगामी है। 

🔵 आत्मनिरीक्षण क्षण का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान बनो। विश्वास और प्रेम रखो तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर और आशावान बनी तब तुम सहज रूप से जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदारहृदय बनो। शुद्र अहं तथा अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं। सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनन्त प्रभु अपनी अनन्तता में तुम्हारे दुःख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। -यदि दोष भी तुम पर आ पड़े तो वह दोष नहीं रह जायेगा। 

🔴 यदि' तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यन्त भयावह अनुभव भी तुम्हें तुम्हारे प्रेमास्पद प्रभु के संदेशवाहक ही प्रतीत होंगे। वस्तुत: प्रेम - द्वारा ही तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती? वह आत्मा का प्रेमी  भी उसी प्रकार है। विश्वास करो! केवल विश्वास करो! फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुमसे जो भूलें हो गई उनसे भयभीत न होओ। मनुष्य बनो। जीवन का साहस- पूर्वक सामना करो। जो पूरी हो होने दो। तुम शक्तिशाली बनो। स्मरण रखो कि तुम्हारे पीछे अनन्त शक्ति है। स्वयं ईश्वर तुम्हारे साथ हैं। फिर तुम्हें क्या भय हो सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 35)


🔵 एक वन्य पशु जैसे अपने शिकार की खोज करता है, इन्द्रिय- लोलुप व्यक्ति जिस प्रकार भोगों के लिये व्याकुल होता है, क्षुधा से पीड़ित व्यक्ति जिस प्रकार भोजन ढूँढता है, डूबता हुआ व्यक्ति जिस प्रकार रक्षा के लिये आर्तनाद करता है, उसी व्याकुलता और शक्ति से तुम सत्य की खोज करो। जिस प्रकार एक सिंह निर्भीक और मुक्त होता है तथा कोलाहल से नहीं काँपता, उसी प्रकार सत्य लाभ के लिये दृढ़संकल्प हो कर तुम भी इस संसार में विचरण करो। क्योंकि इसके लिये असीम शक्ति तथा निर्भयता की आवश्यकता है। यदि तुम अपनी आत्मा की शक्तियों को एकत्रित कर लो तथा साहस पूर्वक माया के आवरण को चीर डालो और आगे बढ़ो तो तुम्हारे लिए सभी सीमाएँ टूट जायेंगी तथा सभी टेढ़े मेढ़े रास्ते सीधे हो जायेंगे।  
🔵 क्या तुम ईश्वर की खोज कर रहे हो ? तब जान लो कि तुम्हें आत्मदर्शन होगा। तब स्वयं आत्मा ही तुम्हारे सम्मुख ईश्वर के रूप में प्रगट होगी।

🔴 ओम तत् सत्
और तब गुरुदेव की वाणी उस मौन में समा गई जो कि शांति है तथा उनका रूप उस ज्योति में विलीन हो गया जो कि स्वयं ईश्वर की ज्योति है।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...