बुधवार, 28 सितंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 42)

🔵 ध्यान की घड़ियों में मुझे सम्बोधित करनेवाली वाणी मैंने सुनी:- हृदय में कटुता न रखो। स्वयं के साथ निष्कपट बनो। स्वयं के संबंध में सभी भ्राँत धारणाओं को उखाड़ फेंको। सभी मिथ्यासक्तियों को निर्मूल कर दो। शरीर के स्थान पर चैतन्य को देखो। दूसरे तुम्हें जैसा देखते हैं स्वयं को उसी प्रकार देखो। सर्वोपरि स्वयं पर मिथ्यानुकम्पा न करो। दृढ़ बनो। यदि तुममें भूले हैं तो वे एक सिंह की भूलों के समान हों।

🔴 विधि का विधान शक्तिशाली है। तुम्हारी स्वयं की इच्छा के अनुपात में वह तुम्हारे हृदय का मर्दन करेगा तथा व्यक्तित्व को झकझोर देगा। किन्तु वह तुम्हें सच्चे आत्मज्ञान की ओर भी ले जायेगा। अत: अपने विश्वास को विधान पर आधारित करो। क्रिया से प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। अत: तुम्हारी क्रियाओं को हृदय की पवित्रता तथा विचारों से आने दो। तब तुम शांति का अनुभव करोगे। भावना के नाम पर प्राय: बहुत से दोष ही ढके जाते है। उनकी जड़ों में स्थूल शारीरिक मूल प्रवृत्तियाँ ही क्रियाशील होती हैं। उन्हें सोने की चादर से ढक देने से कोई अंतर नहीं पड़ता।

🔵 व्यक्ति में विशुद्ध शारीरिक संवेगों को उच्च भावों के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृति होती है। किन्तु विवेक इस छद्म को चीर देता है तथा यह सिखाता है कि मिथ्या आसक्ति सदैव आत्मकेन्द्रित, निरंकुश, क्रूर और विवेकहीन होती है। वह स्वेच्छाचारी, अंधा, तथा शरीरासक्त होता है। इसके विपरीत विशुद्ध प्रेम आत्मा से संबंधित होता है। प्रेमास्पद को असीम स्वतंत्रता देता है तथा आत्मत्याग और विवेक से परिपूर्ण होता है। अत: अपने हृदय से आसक्ति और अनुचित भावों को निकाल फेंको और एक बार यह कर लेने पर जैसे तुम अपनी वमन की हुई वस्तु को घृणास्पद होने के कारण पुन: नहीं देखना चाहते उसी प्रकार उन आसक्तियों के विषय में न सोचो। वह बंधन है, भयानक बंधन। इसे स्मरण रखो तथा मुक्ति के लक्ष्य की ओर वीरतापूर्वक बढ़ चलो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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