सोमवार, 26 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 39)


🔵 संसार मृत्यु से परिपूर्ण है। कर्म का नियम अटल है। सावधान हो जाओ। कहीं ऐसा न हो कि अशुभ कर्मों के मध्य तुम्हारी मृत्यु हो जाय! सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी इन्द्रियलोलुपता तुम्हें और अधिक बंधन तथा कठिन दु:खों को उत्पन्न करने वाले कर्मजाल में फँसा दे! वत्स! एक बार अमृत का स्वाद चख लेने पर यह कैसे संभव है कि तुम असार भूसी में रस लो।

🔴 कभी आतंकित न होओ। भगवान की दया पाप के पहाड़ों से भी अधिक बड़ी है। जब तक तुम विश्वास करते हो तब तक आशा है। किन्तु यह पथ लगभग अनन्त लम्बा है। मानव व्यक्तित्व को ईश्वरचैतन्य में परिवर्तित करने में, समस्त दोषों को निर्मूल करने में कितने जीवन लगेंगे इस 'पर विचार करो। तब क्या तुम यह नहीं समझ सकते कि तुम्हें अपने कल्याण के लिए कितना परिश्रम करना पड़ेगा ? और यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो क्या कम से कम मेरे लिए ही तुम लक्ष्य तक पहुँचने की चेष्टा नहीं करोगे ? तुम वीरता पूर्वक संघर्ष कर सको तथा पूर्ण हो जाओ इसके लिए मैंने इतनी लम्बी प्रतीक्षा की है। तुम्हारी साधना के लिए मैं व्याकुल रहा हूँ। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ रहूँगा। मैं सदैव तुमसे प्रेम करूँगा किन्तु तुम्हें आलस्य को दूर करना होगा। नैतिक आलस्य से बाहर निकलो। मनुष्य बनो।

🔵 मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम तुम्हारे जीवन का ध्रुवतारा हैं। यह तुम्हारे अस्तित्व का आधार है औरे इसका कारण भी है। क्योंकि मेरे प्रति तुम्हारे प्रेम से ही तुम्हारा उद्धार होगा। गुरु के प्रति भक्ति ही एक आवश्यक वस्तु है। वह तुम्हारी सभी कठिनाइयों को दूर कर देगी। अत: प्रसन्न रही। जान रखो मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। मेरा इर्श्वरानुराग, मेरी अनुभूति, मेरे पास जो कुछ भी है वह सब तुम्हें दे दिया जायेगा क्योंकि यदि आवश्यक हो तो शिष्य के कल्याण के लिए स्वयं को दे देने में ही गुरु का आनन्द है।

🔴 एक बार जब मैंने तुम्हें स्वीकार कर लिया हैं तब यह संबंध अनन्त काल के लिए हो गया है। जाओ और शांति से रहो। यह स्मरण रखो कि यदि तुम स्वयं के प्रति निष्ठावान हो तो तुम मेरी महिमा को बढ़ा रहे हो, यहाँ तक कि मेरे दर्शन का भी विस्तार कर रहे हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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