शनिवार, 5 मार्च 2022

समय नहीं मिलता” कहना छोडें

दुनिया में ऐसा कोई नही जो अपने जीवन में कुछ अच्छा करने की ना सोचता हो या फिर महान बनना ना चाहता हो. लेकिन विडंबना यह है कि हमें उसके लिए वक्त ही नही मिलता. हर दिन हम अपने लिए एक अच्छी रूटीन बनाते है – कि हम आज ऐसा करेंगे, आज उससे मिलेंगे, कुछ नया सीखेंगे या अपने लक्ष्य की तरफ थोड़ा आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. लेकिन वास्तविकता से आप भी परिचित है, ऐसा कुछ ना कर पाने का हम एक ही बहाना देते है कि ”हमारे पास अभी टाइम ही नही है, फिर कभी कोशिश करेंगे.” यह बात भी हम भली भाती जानते है – हम चाहें आगे बढ़े या ना बढ़े लेकिन समय किसी के लिए नही रुकता. इसलिए सदैव समय का सदुपयोग करें, यह आपके ही हाथ में है.

समय नही मिलता, आपकी इस धारणा को आज हम ऐसे रियल लाइफ कुछ रोचक उदाहरण से दूर करने की कोशिश करेंगे. जिसे पढ़कर आप सच में Inspire होंगे. ये उदाहरण हमें समय की कीमत तो समझाते ही है, साथ में यह भी बताते है कि व्यक्ति चाहें कितना भी व्यस्त क्यों ना हो वह अपने मनपसंद कार्य या लक्ष्य की ओर कैसे आगे बढ़ें.

तो आइये, आपको ऐसे कुछ वास्तविक उदाहरण से रूबरू कराते है –

1. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब कॉलेज जाते थे तो रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियाँ उन्हें देखकर ठीक करते थे. क्योंकि वे जानते थे कि विद्यासागर समय के बहुत पाबंद थे, वे कभी एक मिनट भी आगे-पीछे नहीं चलते थे।

2. USA के famous Mathematician Charles F ने रोजाना केवल एक घंटा Maths सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अंत तक डटे रहकर ही उन्होंने Maths में महारथ हासिल कि थी।

3. Gallileo के medical shop होते हुए भी उन्हेंने थोडा-थोडा वक्त बचाकर विज्ञानं के महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।

4. महात्मा गाँधी दातुन करने से पूर्व शीशे पर गीता का श्लोक चिपका लिया करते थे और दातुन करते समय याद कर लिया करते थे. इस तरह से समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने गीता के 13 अध्याय याद कर लिए।

5. Napolean ऑस्ट्रिया को इसलिए हरा पाया, क्योंकि वहां के सैनिक उसका सामना करने के लिए पाँच मिनट देरी से आये थे।

6. Henry Kirak ने घर से ऑफीस तक पैदल आने-जाने के दौरान समय का सदुपयोग करके Greek सीख ली थी. फौजी डॉक्टर बनने के बाद उनका अधिकांश समय घोड़े की पीठ पर बीतता था. उन्होंने उस समय भी Italian और French भाषा का ज्ञान भी प्राप्त किया।

7. रोज चाय बनाने में जितना समय लगता है, उस दौरान उसमे व्यर्थ न बैठकर लान्गफैले ने इन्फरल ग्रन्थ का अनुवाद कर लिया था।

8. हर घडी उपयोगी कार्य में लगे रहना मोजार्ट ने अपने जीवन का आदर्श बना लिया था. अपने इसी आदर्श पर डटे रहकर उन्होंने रैक्युम नामक फेमस ग्रन्थ को मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया।

आपको यह बहुत ही काल्पनिक लगता होगा पर यह बिल्कुल चौका देने वाले सच है. कोई रोज एक घंटे मात्र पढ़कर एक्सपर्ट बन गया, तो किसी ने पैदल चलने के समय का भी सदुपयोग किया, तो किसी ने चाय बनने के समय का भी उपयोग किया, कोई पाँच मिनट की देरी से हार जाता है, तो कोई ऐसे है कि लोग अपनी घड़ी से ज्यादा उनके समय की पाबंदी पर भरोसा करते थे और कोई ऐसे भी है जो मौत से लड़ते-लड़ते भी ग्रंथ लिख दिया.

जब यह लोग उसी 24 घंटे के समय में इतना कुछ कर सकते हैं तो अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर हमारा समय बर्बाद कहां हो रहा है?
 
यकीन मानिए, हमें हमारे लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीतने समय कि आवश्यकता है, उससे कहीं ज्यादा समय हमारे पास होता है. बस जरुरत है उस अमूल्य समय को बर्बाद होने से बचाने की. हमेशा इस बात का स्मरण रखे ”समय का सदुपयोग आपके ही हाथ में है!”

यह प्रचलित कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी – ”काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परले होइगी, बहुरि करेगा कब।”

अब समय है उपरोक्त कथन को जीवन में उतारने का.

आपको इन Examples में से जो भी प्रेरणादायक लगे उन्हें चुनकर एक स्लिप पर लिख लें और ऐसी जगह पर चिपका दें, जहाँ आपकी नजर बड़ी आसानी से जा सके, जिससे आप रोज इन्हे पढ़कर Inspire हो सकें. आप चाहें कितने भी Time Management टिप्स पढ़ लें. लेकिन आपको सबसे पहले स्वयं की आदत में बदलाव लाना होगा और वो है किसी काम को टालने की आदत. याद रखिये, किसी काम को समय पर करना उतना तकलीफ नहीं देता जितना उसको टालना. बस इस Tip को फॉलो करते ही आप बन जायेंगे एक Smart Time Manager।

हम मानते है, आप पहले भी समय का सही सदुपयोग करने का अथक प्रयास कर चुके होंगे और सफल भी हुए होंगे. लेकिन जो सफल नही हुए उनके पास हमेशा एक और मौका होता है. इस लिए सुबह उठते ही 10 से 15 मिनट में आप पुरे दिन का एक Time-Table बना लीजिए. अक्सर हम उत्साह में आकर Time-Table को बहुत ही कठिन बना लेते हैं. जिसे हम बहुत लंबे समय तक फॉलो नही कर पाते और अपने लक्ष्य से भटक जाते है. इसलिए हमेशा Time-Table साधारण ही बनाना चाहिए, ताकि आप इसमें Successful होकर खुद को Self-Motivate कर सकें।

दोस्तों, ब्रूस ली ने समय की कीमत को समझते हुए कहा है – ”अगर आप अपनी ज़िन्दगी से प्यार करते हैं तो वक़्त बर्वाद ना करें, क्योंकि वो वक़्त ही है जिससे ज़िन्दगी बनी होती है।”

तो चलिए, एक बार फिर समय के महत्त्व को महत्त्व देते हैं, और ”समय नही मिलता” कहना छोड़ कर उन चीजों के लिए वक़्त निकाले जो सचमुच में ज़रूरी है।

हम हर पल यह प्रयास करते है कि कुछ ऐसे लेख आपको दे जिससे आपको भी अपने जीवन में प्रेरणा मिलें और आप भी आगे बढ़े. आप अपने विचार कॉमेंट के द्वारा शेयर करें. आशा करते है यह लेख आपकी ज़रूर मदद करेगा. आपको यह लेख कैसा लगा? ज़रूर बताएं. आपकी प्रतिक्रिया हमारा उत्साह बढ़ाती है, हमें और भी बेहतर होने में मदद व प्रेरणा देती है।

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ५

हँसते रहो, मुस्कराते रहो

उठो! जागो! रूको मत!!! जब तक की लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। कोई दूसरा हमारे प्रति बुराई करे या निंदा करे, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहन करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता। अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन। जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दूसरों के अवगुणों की खोज में नहीं रहता है उसे आंतरिक प्रसन्नता रहती है।

जीवन में उतार- चढ़ाव आते ही रहते हैं।

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो।

ऐसा मुख किस काम का जो हँसे नहीं ,, मुस्कराए नहीं।

जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहते हैं उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढऩानहीं चाहिए।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 5
Keep Smiling, Keep Laughing

Wake up! Do not rest until you have achieved your goal. If you regard gossip and ill-will as trivial and refuse to acknowledge them, hostility will not increase. For such things, silence is the best response. True happiness comes from focusing on one's duty rather than on shortcomings in others.

Life is full of ups and downs, but we must always remain cheerful. What good is a face that cannot smile or laugh? Do not be irritated by, criticism from others, and you will retain your mental equilibrium.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 5 March 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 5 March 2022



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शुक्रवार, 4 मार्च 2022

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ४

जीवन को यज्ञमय बनाओ

मन में सबके लिए सद्भावनाएँ रखना, संयमपूर्ण सच्चरित्रता के साथ समय व्यतीत करना, दूसरों की भलाई बन सके उसके लिए प्रयत्नशील रहना, वाणी को केवल सत्प्रयोजनों के लिए ही बोलना, न्यायपूर्ण कमाई पर ही गुजारा करना, भगवान का स्मरण करते रहना, अपने कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रहना, अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना- यही नियम हैं जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय बन जाता है। मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता औरबुद्धिमता है।

जब तक हम में अहंकार की भावना रहेगी तब तक त्याग की भावना का उदय होना कठिन है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 4
Make Your Life an Offering

To make your life an offering, make sure that you comply with the following:

•    See every person as worthy of kindness.
•    Utilize your time with honesty and discipline.
•    Work for the welfare of others.
•    Limit your speech to worthy causes.
•    Accept only that which you have honestly earned.
•    Constantly keep God in your thoughts.
•    Stay focused on your duties.
•    Maintain your mental equilibrium.

Making your life an offering is the sign of true intelligence and farsight. Your life cannot truly be considered an offering until you give up your ego.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ३

अंतरात्मा का सहारा पकड़ो

यदि तुम शांति, सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो तो अपनी अंतरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम सारे संसार को धोखा दे सकते हो किंतु अपनी आत्मा को कौन धेाखा दे सका है। यदि प्रत्येक कार्य में आप अंतरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा ।। दुनियाँ भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अंतरात्मा का पालन कर सकें तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।

जब कोई मनुष्य अपने आपकेा अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है, तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 3
Take Refuge in Your Conscience

If you desire peace, capabilities, and energy, then take refuge in your conscience. Even if you deceive the entire world, you will never be able to deceive your conscience. If you consult it on every occasion, you will never lose your ability for moral discretion, and no matter the opposition, you will be able to succeed.

When you begin to think of yourself as the most virtuous and exemplary individual, your spiritual decay begins and you lose contact with your conscience.

~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २

मानवमात्र को प्रेम करो

हम जिस भारतीय संस्कृति, भारतीय विचारधारा का प्रचार करना चाहते हैं, उससे आपके समस्त कष्टों का निवारण हो सकता है। राजनीतिक शक्ति द्वारा आपके अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पर जिस स्थान से हमारे सुख- दु:ख की उत्पत्ति होती है उसका नियंत्रण राजनीतिक शक्ति नहीं कर सकती। यह कार्य आध्यात्मिक उन्नति से ही संपन्न हो सकता है।

मनुष्य को मनुष्य बनाने की वास्तविक शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मनुष्य- मनुष्य से प्रेम करने को पैदा हुआ है, लडऩे- मरने को नहीं। अगर हमारे सभी कार्यक्रम ठीक ढंग से चलते रहें तो भारतीय संस्कृति का सूर्योदय अवश्य होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १

आध्यात्मिक चिंतन अनिवार्य

जो लोग आध्यात्मिक चिंतन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं कि सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनका कहा मानें। उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लेागों का शत्रु बना देता है। इससे उनकी लोक सेवा उन्हें वास्तविक लोक सेवक न बनाकर लोक विनाश का रूप धारण कर लेती है।

आध्यात्मिक चिंतन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों पर भूल करता चला जाता है और इस प्रकार अपने जीवन को विफल बना देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 1


Recognize the Need for Spiritual Contemplation

Performing social service without a spiritual outlook makes people obsessed with own virtue. They consider themselves great They expect obedience and praise. Because of this, their increased arrogance makes them enemies of many. They become not philanthropists, but destroyers. Without a spiritual outlook, they can never develop humility, nor do they have the ability to change themselves. Such people go on committing endless mistakes and make their own lives unbearable.

~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत ( Lose Not Your Heart)

दूसरे के छिद्र देखने से पहले अपने छिद्रों को टटोलो। किसी और की बुराई करने से पहले यह देख लो कि हम में तो कोई बुराई नहीं है। यदि हो तो पहले उसे दूर क रो। दूसरों की निन्दा करने में जितना समय देते हो उतना समय अपने आत्मोत्कर्ष में लगाओ। तब स्वयं इससे सहमत होंगे कि परनिंदा से बढऩेवाले द्वेष को त्याग कर परमानंद प्राप्ति की ओर बढ़ रहे हो।

संसार को जीतने की इच्छा करने वाले मनुष्यों! पहले अपनेकेा जीतने की चेष्टा करो। यदि तुम ऐसा कर सके तो एक दिन तुम्हारा विश्व विजेता बनने का स्वप्न पूरा होकर रहेगा। तुम अपने जितेंद्रिय रूप से संसार के सब प्राणियों को अपने संकेत पर चला सकोगे। संसार का कोई भी जीव तुम्हारा विरोधी नहीं रहेगा।


👉 Lose Not Your Heart

Before pointing out the faults of others, search for faults in yourself and do your best to fix them first. Spend as much time doing this as you do criticizing others. Then you will realize that the harm caused by criticizing others can replace your happiness. Therefore happiness only comes from removing this harm.

People who wish to conquer the world should conquer themselves first. If you can do this, then you can conquer anything. People
will not stand against you, but will be influenced by you.

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 4 March 2022



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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 4 March 2022


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👉 भक्तिगाथा (भाग ११३)

तीनों गुणों को पार कर जाती है ‘पराभक्ति’

भक्त चोखामेला के अनुभव के स्पर्श ने सभी को रोमांचित कर दिया। भावों का अन्तर्प्रवाह सभी के अस्तित्त्व में अचानक बहने लगा। भक्ति होती ही ऐसी है कि इसके बारे में सुन कर, गुन कर, जान कर और अनुभव कर भावनाएँ स्वतः ही उमगने लगती हैं, परिष्कृत होने लगती हैं। यहाँ तक कि इसकी छुअन से वासनाओं का मटमैला रंग भी स्वच्छ होने लगता है। भक्ति का स्पर्श मिले तो वासनाओं का अंधियारा, भावनाओं का उजियारा बन जाता है। भक्त चोखामेला की भक्ति भी उन्हीं की तरह चोखी व खरी थी तभी तो महाराज सत्यधृति भी उन्हीं के रंग में ऐसे रंगे कि युग बीत जाने के बाद, जीवात्मा से वस्त्र उतर जाने के बाद भी उनके ऊपर से यह रंग उतरा नहीं था। अभी भी भक्त-चोखामेला की स्मृति उन्हें पुलकित, गदगद एवं आह्लादित करती थी।

इन क्षणों में भी वह भावों में भीगे हुए थे। सबकी दृष्टि उनकी ओर थी, लेकिन उनकी नजरें देवर्षि नारद के चेहरे पर टिकी थीं। सम्भवतः उनकी दृष्टि में नए भक्तिसूत्र की उत्सुकता एवं प्रतीक्षा थी। इस दृष्टि को अन्य सभी ने भी पहचाना और वे सब भी देवर्षि नारद की ओर देखने लगे। देवर्षि भी अब तक उनका आशय समझ चुके थे। इसलिए उन्होंने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखकर कहा- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! यदि आप सहित सप्तर्षिगण आज्ञा दें तो मैं भक्ति का अगला सूत्र प्रस्तुत करूं।’’ देवर्षि के इस कथन का सबने प्रसन्न मन से स्वागत किया। सभी को इसी की तो प्रतीक्षा व त्वरा थी। देवर्षि ने भी प्रतीक्षा के इन क्षणों को समाप्त करते हुए अपने नए सूत्र का सत्य उच्चारित किया-

‘गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा’॥ ५६॥
गौणी भक्ति गुणभेद से अथवा आर्तादि भेद से तीन प्रकार की होती है।

देवर्षि द्वारा इस सूत्र को कहे जाने पर भी किसी ने कुछ नहीं कहा, बस सभी महात्मा सत्यधृति की ओर देखते रहे। यद्यपि वह स्वयं भी मौन बैठे स्वयं को वातावरण के मौन से एकाकार कर रहे थे। इस तरह से पर्याप्त समय बीत गया। नीरव वातारण यथावत निःस्पन्द बना रहा तब कहीं जाकर महात्मा सत्यधृति ने अपने शब्दों से नीरवता में रव घोला। उन्होंने कहा- ‘‘हालांकि देवर्षि का कहना सत्य है, फिर भी भक्ति तो एक ही होती है- पराभक्ति। बाकी गौणी भक्ति के तो सारे आयोजन इसी पराभक्ति को पाने और इस तक पहुँचने के लिए है। कोई भी जब और जिस किसी भी तरह से प्रभु की ओर उन्मुख होता है उसी समय उसके चित्त में भक्ति का बीजारोपण हो जाता है। फिर उसका कारण व स्वरूप कुछ भी क्यों न हो?’’

सभी जन महात्मा सत्यधृति की इन बातों को धैर्य व विश्वासपूर्वक सुन रहे थे। उन्हें मालूम था कि महाराज सत्यधृति सर्वदा और सर्वथा अनुभूत सत्य ही कहते हैं। आज भी सम्भवतः उनके अनुभवकोश से कोई अमूल्य रत्न बाहर आकर अपनी प्रकाश छटा बिखेरने वाला है। यह बात सही भी थी। महात्मा सत्यधृति ने कुछ पल रूककर कहा- ‘‘मैं एक ऐसी ही महान् विभूति का साक्षी हूँ, जिन्होंने गौणी भक्ति के क्रमिक सोपानों को पार कर पराभक्ति की निर्मलता प्राप्त की।’’ ‘‘उनकी कथा सुनाकर अनुग्रहीत करें महात्मन्।’’ गन्धर्वश्रेष्ठ चित्ररथ देर तक अपनी उत्सुकता को शान्त न रख सके और उन्होंने महाराज सत्यधृति से अपने मनोभाव कह दिए।

उत्तर में सत्यधृति ने भी प्रसन्नता से हामी भरते हुए कहना शुरू किया- ‘‘उनका नाम था विमलतीर्थ। यद्यपि बचपन में उनका पालन-पोषण, शिक्षा-संस्कार सभी उनके अपने ब्राह्मण कुल के अनुरूप हुए थे। भगवद्भक्ति में उनकी निष्ठा स्वाभाविक थी। परन्तु युवावस्था में पता नहीं पूर्वकृत किस कर्म भोग से घिर गए। पहले तो माता-पिता का देहान्त हुआ। फिर सगे सम्बन्धियों ने छल व षड़यन्त्र से उनकी सभी सम्पत्ति छीन ली। इस पर भी उन सबको चैन न मिला। उनकी शत्रुता कम नहीं हुई। वे सब उन पर प्राणघाती हमलों की योजना बनाने लगे। इतनी आपदाएँ सहते-सहते विमलतीर्थ का धैर्य चुक गया। चित्त का संस्कार कहे अथवा प्रारब्ध की योजना, उनके अन्दर का तमोगुण जाग उठा। भय व क्रोध के वशीभूत होकर उन्होंने शत्रुओं व षड़यन्त्रकारियों के विनाश के लिए भगवान रूद्र की आराधना प्रारम्भ की।

यही उनकी भक्ति की शुरूआत थी। उनकी आर्त पुकार, मन की पीड़ा, क्षोभ, भय, हृदय की भावनाएँ, अन्तःकरण की एकाग्रता- इन सभी ने मिलकर भगवान महेश्वर की करूणा को आकर्षित किया। उनके जीवन से शत्रु व षड़यन्त्र समाप्त हुए। प्रारब्ध भोग भी क्षीण हुआ, इसी के साथ मन में उदय हुआ तमोगुण भी शान्त शमित हुआ परन्तु उनकी निष्ठा भगवान महारूद्र में यथावत रही। उनके जीवन की परिस्थितियाँ अवश्य बदली थीं, परन्तु जीवन जीने के साधन इस विपद्काल में समाप्त हो चुके थे। समय थोड़ा सामान्य होते ही जिन्दगी जीने की चाहत व ख्वाहिश लौट आयी थी। पहले के तमोगुण की समाप्ति के बाद अन्तःकरण में रजोगुण लौट आया था। मन में अनकों कामनाएँ पूरी होने के लिए मचल रही थीं।

इनकी पूर्ति के लिए उन्होंने पुनः भगवान शिव की भक्ति प्रारम्भ की। अबकी बार वह भगवान महादेव के रौद्र रूप की अपेक्षा कल्याणकारी सौम्य रूप अवढरदानी शिव की उपासना भक्ति से कर रहे थे। उनकी एकाग्रता-मन की लय रंग लायी। भगवान आशुतोष प्रसन्न हुए। शिवकृपा से उनका विवाह हुआ। सुशील, सुलक्षणा, रूपवती पत्नी मिली। धन व ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई। सब कुछ मिल जाने के बाद भी उनकी शिवभक्ति की निरन्तरता नहीं टूटी। उनकी पत्नी भी पतिपरायणा होने के साथ भगवान शिव की निष्ठावान भक्त थी। उसने भी भक्तिमार्ग में पति का साथ दिया। संसार के सुख को भोगते व कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए वह शिवोपासना करते रहे।

इसके प्रभाव से न केवल उनके कर्मभोग क्षीण हुए बल्कि रजोगुण का भी शमन हुआ। रजोगुण का शमन होते ही उनके मन की कामनाएँ भी समाप्त हो गयीं। अब तो उनकी बस एक ही अभिलाषा थी कि समस्त कर्मबन्धनों से कैसे मुक्ति मिले। शुद्ध सात्त्विकता से परिपूर्ण सतोगुण के उदय होने पर उन्होंने भगवान शिव के दक्षिणामूर्ति स्वरूप की भक्ति प्रारम्भ की। अब दक्षिणामूर्ति भगवान शिव उनके इष्ट-आराध्य एवं सद्गुरु एक साथ थे। उनके इस स्वरूप की आराधना की सघनता से उनकी सात्त्विकता बढ़ती गयी। साथ ही कर्मबन्धन भी क्षीण होते गए।

यह सब कैसे और किस तरह से होता गया स्वयं विमलतीर्थ को भी पता न चला। अब तो सतोगुण भी उनके अन्तःकरण में अपना अस्तित्त्व खोने लगा था। वह स्वयं गुणातीत अवस्था में प्रवेश करके गौणी भक्ति के तीनों भेदों को पार करते हुए पराभक्ति की कक्षा में प्रवेश करने लगे थे। एक ऐसी अवस्था जिसमें कोई कामना न थी। स्वयं मोक्ष की कामना भी तिरोहित हो चुकी थी। भक्त व भगवान एकरस हो गए थे। भक्त विमलतीर्थ अपने बीते जीवन की याद कर हंस पड़ते थे। वह कहते थे कि भक्त कहीं भी, किसी भी अवस्था से, बस चल भर पड़े तो भगवान उसे अपना ही लेते हैं।’’

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गुरुवार, 3 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १०

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।
 
आज नहीं तो कल, हँसकर नहीं तो रोकर आपको किसी दिन त्याग करना ही पडेगा। आप इकट्ठा करते हैं संसार की संपदाएँ अपनी मुट्ठी मैं बाँध लेते हैं' परंतु प्रकृति यह पसंद नहीं करती कि उसकी चलती-फिरती चीजों पर एक व्यक्ति कब्जा करके बैठ जाए वह आपका गला दबा कर मुट्ठी खुलवा लेती है। जब आप कहते हैं कि' ' नहीं मैं न दूँगा। ' उसी क्षण जोर की चपत पडती है और अाप घायल हो जाते है। संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो प्रत्येक वस्तु  को देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस अखंड नियम प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करेगा वह अपने को उतना ही दुःखी अनुभव करेगा।

शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य जीवन में परोपकार ही सार है, हमें सदैव परोपकार में रत रहना चाहिए। किंतु यह अभिमान, दंभ या कीर्ति के लिए नहीं, आत्म कल्याण के लिए होना चाहिए। मेरे कारण दूसरों का भला हुआ यह सोचना मूर्खता है। हमारे बिना संसार का कोई कार्य अटका न रहेगा। पैदा होने से पहले संसार का सब काम ठीक-ठीक चल रहा था और हमारे बाद भी वैसा ही चलता रहेगा। परमात्मा इतना गरीब नहीं है कि हमारी मदद के बिना उसका काम न चला सके। किसी भिखारी को हमारे ही देने की बड़ी भारी आवश्यकता नहीं है, वह हमारी एक रोटी के बिना भूखा न मर जाएगा।

सच पूछे तो जिसने हमें उपकार करने का अवसर दिया है उसका कृतज्ञ होना चाहिए। हमारी उपकार बुद्धि जाग्रत करके वह हमें ऋणी कर देता है। इससे जो मानसिक उन्नति होती है और आत्मा को जो शक्ति प्राप्ति होती है वह दान लेने वाले को नहीं वरन देने वाले को प्राप्त होती है। दूसरों का उपकार करना मानो एक प्रकार से अपना ही कल्याण करना है। किसी को एक पैसा देकर हम भला उसका कितना भला कर सकते हैं? किंतु उसकी अपेक्षा अपना भला हजारों गुना कर लेते हैं। हमारी उदारता का विकास न होने से संसार को रत्ती भर भी हर्ज न होगा किंतु हमारा ही आनंद स्रोत नष्ट हो जाएगा इसलिए आप परोपकार को अपना जीवन लक्ष्य बनाइए। जितना हो सके दूसरों की भलाई कीजिए इसमें आपका ही भला है, आपका ही लाभ है, आपका ही कल्याण है।
 
त्याग करना, किसी की कुछ सहायता करना, उधार देने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। जो हम दूसरों को देते हैं हमारी रक्षित पूँजी की तरह जमा हो जाता है । जो अपनी रोटी दूसरों को बाँट कर खाता है उसको किसी बात की कमी न रहेगी। जो अपनी संपदा को जोड़-जोड़ कर जमा करता जाता है उस पाषाण हृदय को क्या मालुम होगी कि दान में कितनी मिठास है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १५

👉 भक्तिगाथा (भाग ११२)

प्रेम से होती है प्रभु की पहचान

ऐसे परमात्मा से प्रेम भी उसी के अनुरूप ही होता है। न उसमें गुण होते हैं और न कामना। वह सतत व्यापक होता जाता है, उसमें कभी किसी तरह का विघटन या विच्छेद नहीं होता है। वह स्थूल की सीमा में बंधकर सूक्ष्म से सूक्ष्म होता जाता है। सबसे बड़ी बात कि अनुभव ही उसकी व्याख्या है।’’ भक्त चोखामेला के इस कथन को महाराज सत्यधृति के मुख से सुनकर सभी चकित हो गए। हाँ! ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अवश्य शान्त रहे। काफी देर बाद तक चुप रहने पर वे केवल इतना कह सके कि- ‘‘जहाँ से सारे ज्ञान का उदय होता है, उस तत्व को, सत्य को जो जान गया हो, वह किसी भी तरह अनपढ़ नहीं, वह तो ज्ञानियों का सिरमौर व ज्ञानशिरोमणि है।’’

इतना कहते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने देवर्षि नारद की ओर देखा। उनकी इस दृष्टि में सभी की समवेत दृष्टियाँ समायी थीं। सम्भवतः सभी को नए सूत्र की प्रतीक्षा थी। देवर्षि ने भी पल की देर लगाये बिना अपना नया सूत्र उच्चारित किया -
‘तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव श्रृणोति,
तदेव भाषयति, तदेव चिन्तयति’ ॥ ५५॥
    
अर्थात् इस प्रेम को पाकर प्रेमी भक्त इस प्रेम को ही देखता है, इस प्रेम को ही सुनता है, इस प्रेम का ही वर्णन करता है और इस प्रेम का ही चिन्तन करता है।
    
इस सूत्र को कहने के बाद देवर्षि नारद ने पुनः महात्मा सत्यधृति की ओर देखा, सम्भवतः वह इस सूत्र की व्याख्या में भक्त चोखामेला की अनुभूति सुनना चाहते थे। महाराज सत्यधृति ने देवर्षि की दृष्टि का आशय पहचान लिया। उन्होंने देवर्षि की ओर देखने के बाद अन्यों की ओर देखा। सभी की मुखमुद्रा देवर्षि के साथ सहमति जता रही थी। वे तनिक मुस्कराए और फिर बोले - ‘‘यह भक्ति का चरम अनुभव है। मैंने भक्त चोखामेला को भक्ति के इस अनुभव में विचरण करते हुए देखा है। उन्होंने मुझसे एक अवसर पर कहा था- महाराज! भक्त तो बस अपनी भक्ति की शुरूआत करता है, उसे पूर्णता तो स्वयं परमात्मा देते हैं।
    
जब भक्त शुरू करता है, तब भक्ति साकार होती है, फिर जैसे-जैसे भगवान भक्त में उतरने लगता है, भक्ति सर्वव्यापी एवं निराकार होने लगती है। जब भक्त पूरा मिट जाता है, भक्ति शून्य हो जाती है, निराकार हो जाती है, तब केवल अनन्त असीम भगवत्प्रेम ही बचता है। उसी की चर्चा, उसी का चिन्तन, उसी का दर्शन। उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं। ऐसे में भक्त को मन्दिर में घण्टी बजाते हुए नहीं देखा जा सकता क्योंकि तब उसके प्राणों की धक-धक ही उसकी घण्टी बन जाती है। ऐसा भक्त राम-राम नहीं चिल्लाया करता क्योंकि तब राम तो उसकी हर श्वास में बसे रहते हैं।
    
ऐसे भक्त को तिलक-टीका से कोई काम नहीं रह जाता क्योंकि अब तो वह स्वयं ही तिलक-टीका हो गया। उसका अब अपना कुछ बचा ही नहीं। ऐसा भक्त मन्दिर न जा रहा हो तो कोई अचरज नहीं, क्योंकि ऐसे भक्त के पास स्वयं मन्दिर में बसने वाले भगवान ही चलकर आते हैं। अब भक्त को नहीं पुकारना पड़ता भगवान को, क्योंकि अब तो भगवान ही भक्त का नाम सतत रटते रहते हैं। भक्त तो बस अपने भगवान के प्रेम में डूबा रहता है। प्रेम में ऐसी निमग्नता होती है कि इसके सिवा उसके जीवन में कुछ और बचा ही नहीं रह जाता। भगवान के प्रेम में भक्त डूबता है और भक्त के प्रेम में भगवान डूब जाते हैं। यह प्रेम अन्दर-बाहर सर्वत्र छा जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२१

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ९

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

त्याग में कितना मिठास है, इसे बेचारे स्वार्थ परायण और कंजूस भला क्या समझेंगे? जो इस के अमर मिठास का आस्वादन करना चाहते हैं उनकी नीति होनी चाहिये "आप लीजिए-मुझे नहीं चाहिए। '' यही नीति है जिसके आधार पर सुख और शांति का होना संभव है। "मैं लूँगा आपको न दूँगा की नीति को अपनाकर कैकेयी ने अयोध्या को नरक बना दिया था।
 
सारी नगरी विलाप कर रही थी। दशरथ ने तो प्राण ही दे दिए। राजभवन मरघट की तरह शोकपूर्ण हो गया। राम जैसे निर्दोष तपस्वी को वनवास ग्रहण करना पड़ा। किंतु जब '' आप लीजिए- मुझे नहीं चाहिए '' की नीति व्यवहार में आई तो दूसरे ही दृश्य हो गए। राम ने राज्याधिकार को त्यागते हुए भरत से कहा-' बंधु ! तुम्हें राज्य सुख प्राप्त हो, मुझे यह नहीं चाहिए। ' सीता ने कहा- नाथ! यह राज्यभवन मुझे चाहिए मैं तो आपके साथ रहूँगी।'

सुमित्रा ने  लक्ष्मण से कहा-' ' अवध तुम्हार  काम कछु नाहीं। जो पै राम सिय बन जाहीं।। '' पुत्र! जहा राम रहे, वहीं अयोध्या मानते हुए उनके साथ रहो। कैसा स्वर्गीय प्रसंग है। भरत ने तो इस नीति को और भी सुंदर ढंग से चरितार्थ किया। उन्होंने राज-पाट में लात मारी और भाई के चरणों से लिपट कर बालकों की तरह रोने लगे। बोले-' भाई! मुझे नहीं चाहिए इसे तो आप ही लीजिए। ' राम कहते हैं-' भरत! मेरे लिए तो वनवास ही अच्छा है। राज्य सुख तुम भोगो। ' त्याग के इस सुनहरी प्रसंग में स्वर्ग छिपा हुआ है। एक परिवार के कुछ व्यक्तियो ने त्रेता को सतयुग में परिवर्तित कर दिया। सारा अवध सतयुगी रंग में रंग गया। वहां के सुख सौभाग्य का वर्णन करते-करते वाल्मीकी  और तुलसीदास अघाते नहीं है।

प्रभु ने मनुष्य को इसलिए इस पृथ्वी पर नहीं भेजा है कि एक दूसरे को लूट खाए और आपस में रक्त की होली खेलें। परम पिता की इच्छा है कि लोग प्रेमपूर्वक भाई- भाई की तरह आपस में मिल-जुल कर रहें। यह तभी हो सकता है जब त्याग की नीति को प्रधानता दी जाए स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ का अधिक ध्यान रखा जाए।

आप किसी को कुछ दें या उसका किसी प्रकार का उपकार करें तो बदले में किसी प्रकार की आशा न रखें। जो कुछ आप देंगे वह हजार गुना होकर लौट आवेगा परंतु उसके लौटने की तिथि नहीं गिननी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए देते चलिए क्योंकि देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। ध्यानपूर्वक देखिए सारा विश्व आपको कुछ दे रहा है जितने आनंदादायक पदार्थ आपके पास हैं वे सब आपके ही बनाए हुए नहीं हैं वरन वे दूसरों के द्वारा आपको प्राप्त होते हैं फिर आप  दूसरों को देने में इतना संकोच क्यों करते हैं?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १४

👉 भक्तिगाथा (भाग १११)

प्रेम से होती है प्रभु की पहचान

भक्त चोखामेला की स्मृतियाँ महात्मा सत्यधृति के मन में सघन होती गयीं। स्मृतियों के ये सघन घन सत्यधृति के अन्तःकरण में बरसते गये और उन पवित्र महात्मा का अन्तःअस्तित्त्व भीगता गया। अन्तस में छलकते इन भावों के कारण महात्मा सत्यधृति की आखें छलक आयीं। वह देर तक चुप बैठे रहे और वहाँ उपस्थित सभी जन उन्हें उत्सुकता, अकुलाहट व आतुरता से देखते रहे। इन सबके भावों का तरल स्पर्श उन्हें भी मिला और फिर उनके मौन ने मुखरता अपना ली। वे कहने लगे- ‘‘सम्भवतः बोध, बुद्धि की सीमा में नहीं समाता। चोखामेला जो अनपढ़ था, जिसने शास्त्र नहीं पढ़े थे, जिसने महर्षियों के मुख से तत्त्वचिन्तन को नहीं सुना था- उसकी बातों ने मुझे अचरज में डाल दिया।

उसका भगवत्प्रेम अश्रुतपूर्व व अपूर्व था। मैंने उससे सहजता से पूछा था कि भगवान को तुमने किस विधि से और किस रूप में पहचाना? उत्तर में कुछ कहने के पूर्व जैसे वह भावसमाधि में डूब गया। देर तक मैं उसे ताकता रहा, निहारता रहा और वह शान्त, मौन बैठा रहा। फिर थोड़ी देर बाद उसने कहा- हे महाराज! प्रेम ने मुझे भगवान की पहचान करायी। प्रेम ने मुझे प्रभु से परिचित कराया। प्रेम ने ही मुझे सर्वत्र, सृष्टि के कण-कण में उनकी झलक दिखायी। विनम्र स्वर में कहे गए चोखामेला के इन शब्दों के साथ मैंने उनसे जानना चाहा कि भगवान उन्हें किस रूप में मिले? साकार रूप में अथवा निराकार रूप में?
    
इस प्रश्न पर वह बोला- कौन कहता है, भगवान साकार नहीं हैं। सभी आकार उन्हीं के तो हैं। वृक्ष में भगवान वृक्ष हैं, पक्षी में पक्षी हैं, झरने में झरना हैं, आदमी में आदमी हैं, पत्थर में पत्थर हैं, फूल में फूल हैं। इस सम्बन्ध में एक बात यह भी समझ लेनी चाहिए कि सभी आकार जिसके हैं, वह स्वयं निराकार ही हो सकता है। भले यह बात थोड़ी उल्टी लगे, परन्तु सीधी बात यही है कि सभी आकार जिसके हों, वह निराकार ही होगा।

चोखामेला अपने प्रवाह में कहता जा रहा था - अरे सभी नाम जिसके हैं, उसका अपना नाम कैसे होगा? जिसका अपना कोई नाम है उसके सभी नाम नहीं हो सकते। सभी रूपों में जिसकी झलक है, उसका अपना कोई रूप कैसे हो सकता है? जो सब जगह है, उसे किसी एक जगह खोजने की कोशिश बेकार है। सब जगह होने का एक ही ढंग है कि वे अनन्त व असीम हैं। इतना कहकर चोखामेला ने मेरी ओर देखते हुए कहा- महाराज! परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, वह तो सभी के भीतर बहती जीवन की धार है। परमात्मा ऐसा नहीं है जैसा कि पत्थर है। परमात्मा आप जैसा भी नहीं है क्योंकि आप तो पुरुष हैं। वह पुरुष जैसा होगा तो फिर स्त्री में कौन होगा? यदि वह स्त्री जैसा हो तो फिर पुरुष उससे वंचित हो जायेंगे। यदि वह मनुष्य जैसा हो तो पशुओं में कौन होगा? और पशुओं जैसा हो तो फिर पौधों में कौन होगा?
    
अनपढ़ चोखामेला की इन बातों में पोथियों की रटन नहीं बल्कि अनुभव की छुअन थी। वह कह रहा था और मैं शान्त-मौन सुन रहा था- परमात्मा जीवन का अनन्त व्यापी सागर है। हम सब उसके रूप हैं, तरंगें हैं। हमारे हजार ढंग हैं। हमारे हजारों ढंगों में वह मौजूद है और सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे ढंग पर ही वह समाप्त नहीं है। वह और भी कोई नया ढंग ले सकता है। वह चाहे जितने नए-नए ढंग लेता रहे, पर वह समाप्त नहीं होगा। उसकी सम्भावना अनन्त है। आप ऐसी किसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते जहाँ परमात्मा पूरा का पूरा प्रगट हो गया हो। वह कहीं भी कितना भी प्रगट होता चला जाए, पर सदा-सदा उसके अनन्त रूप प्रगट होने से बचे रह जाते हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१९

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ८

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को सजीव बनाइये

आत्मभाव का प्रयास करिए इससे आसपास रूखी, उपेक्षणीय, अप्रिय वस्तुओं का रूप बिल्कुल बदल जाएगा। विज्ञ लोग कहते हैं कि अमृत छिडकने से मुर्दे उठते हैं। हम कहते हैं कि प्रेम की दृष्टि  से अपने चारों ओर निहारिए मुर्दे सी अस्पृश्य और अप्रिय वस्तुए सजीव और सजीव सर्वांग सुंदर बनकर आपके सामने आनंद नृत्य करने लगेंगी। ऐसा कहा गया है कि पारस को छूकर काला-कलूटा लोहा बहुमूल्य सोना हो जाता है। हम कहते हैं कि सच्चे प्रेम का अरूचिकर और उपेक्षणीय से स्पर्श कराइए वे कुंदन के समान जगमगाने लगेगी। 'दुनियाँ आपको काटने दौडती है, दुर्व्यवहार करती है, सताती है, पाप अंक में धकेलती हैं, इसका कारण एक ही है कि आपके मन मानस में प्रेम का सरोवर सूख गया है, उसमें एकांत शून्यता की सांय-सांय बीत रही है, उसका डरावना अंदर से निकल कर बाहर आ खड़ा होता है और दुनियाँ बुरी दीखने लगती है। जब कोई व्यक्ति दुनियाँ ' से बिलकुल घबराया हुआ, डरा हुआ, निराश, चिढ़ा हुआ सामने आता है और संन्यासी हो जाने का विचार प्रकट करता है तब हम उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया करते हैं कि दोस्त इस दुनियाँ में कुछ भी बुरा नहीं है, आओ अपने पीलिया का इलाज करें और संसार का उसके असली आनंददायी रूप में दर्शन करके शांति लाभ करें।

कुटिलता, अनुदारता, कंजूसी और संकीर्णता को छोड़ दीजिए। इसके स्थान पर सरलता और उदारता को विराजमान कीजिए।  मुद्दतों से सूखे पडे हृदय सरोवर को प्रेम के अमृत जल से भर लीजिये। इस सरोवर ' लोगों को पानी पीकर प्यास बुझाने दीजिए,स्नान,करने, शांति लाभ करने दीजिए क्रीडा करके आनंदित होने दीजिए। अपना प्रेम उदारतापूर्वक सबके लिए खुला रखिए। आत्मीयता की शीतल छाया मे थके हुए पथिकों को विश्राम करने दीजिए। प्रेम इस भूलोक का अमृत है, आत्मभाव इसका पारस है। इस सुर दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाना है तो इन दोनों महातत्त्वों को उपार्जित करने से वंचित मत रहिए।

अपने प्रेम रूपी अमृत को चारों ओर छिडक दीजिए जिससे यह श्मशान सा भयंकर दिखाई पड़ने वाला जींवन देवी-देवताओं की क्रीडा भूमि बन जाए। अपने आत्मभाव रूपी पारस को कुरूप लोहा-लंगड से स्पर्श होने दीजिए जिससे स्वर्णमयी इंद्रपुरी बन कर खडी हो जाए। यह स्वर्ग सच्चे विश्ववासियों और दृढ़ निश्चय वालों के लिए बिलकुल सरल और सुसाध्य है। यह : आपके हाथ में है कि इच्छा और प्रयत्न द्वारा जीवन में स्वर्ग का प्रत्यक्ष आनंद उपलब्ध करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १२

👉 भक्तिगाथा (भाग ११०)

कामनाएँ, अपेक्षाएँ हों तो वहाँ प्रेम नहीं

भक्त सत्यधृति की विनम्रता ने सभी के हृदय को सुखद अनुभूति दी। इसी के साथ अब सबके नेत्र देवर्षि नारद के मुख पर जा टिके। सब को अब प्रतीक्षा थी नवीन भक्तिसूत्र की। देवर्षि को भी सबके मन की त्वरा, तीव्रता व प्रतीक्षा का अहसास था। उन्होंने नारायण नाम के स्मरण के साथ उच्चारित किया-
‘गुणरहितं कामना रहितं प्रतिक्षण
वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्’॥ ५४॥


यह प्रेम गुण रहित है, कामना रहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेद रहित है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है और अनुभव रूप है।

देवर्षि के इस नवीन सूत्र ने सभी के अन्तर्मन को नवीन प्रकाश व प्रफुल्लता दी। ऋषि कहोड़ प्रसन्न हुए और उन्होंने सत्यधृति की ओर देखते हुए कहा- ‘‘महात्मन्! आप इस नवीन सूत्र पर कुछ कहें।’’ महर्षि कहोड़ की यह बात सभी को भायी। सबने उनका हृदय से समर्थन किया। स्वयं देवर्षि नारद के मन में भी यही भाव था कि भगवान् नारायण के अनन्य भक्त सत्यधृति इस पर कुछ कहें। सब की अनुशंसा को विनम्रता से शिरोधार्य करते हुए सत्यधृति ने कहा- ‘‘हे महनीय जनों! मेरे अनुभवों एवं उपलब्धियों में तो मुझे ऐसी कोई व्यापकता नहीं नजर आती। परन्तु हाँ! मेरे स्मृतिकोष में भक्त चोखामेला की कथा उद्भासित हो रही थी। चोखामेला था तो वनवासी किरात- अनपढ़, निरक्षर एवं द्विज जातियों के संस्कारों से वंचित लेकिन उसके आचरण में महर्षियों की सी पवित्रता थी। जिन दिनों मैं उससे मिला उन दिनों मैं धराधाम पर राज्य शासन कर रहा था।’’

परमभक्त सत्यधृति के बारे में यह सत्य भी कम लोगों को पता था कि वह अपने धरती के जीवनकाल में परम प्रतापी, तेजस्वी सम्राट थे। प्रायः समूचा भूमण्डल उनके राज्य शासन में था। अपनी प्रजा उन्हें पुत्रवत प्रिय थी। प्रजा भी अपने नरेश को सहृदय पिता के रूप में देखती थी। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भक्त सत्यधृति के राज्य शासन का स्मरण था। उन्होंने कहा- ‘‘धरती के उस स्वर्णिम युग को कौन भूल सकता है महाराज।’’ ऋषि वशिष्ठ की बात को सुनकर विनय भरे स्वरों में सत्यधृति ने कहा- ‘‘भगवन्! मेरे कर्तृत्व में भला ऐसा कुछ कहाँ? मैं तो भगवान के अनुरागी भक्त चोखामेला की बात कह रहा हूँ। उससे मेरी भेंट कण्व वन में हुई थी। फूस की झोपड़ी में उसका आवास था। नारायण के नाम के सिवा उसका कोई आश्रय न था। मेरी जब उससे भेंट हुई तो उसके होठों पर नारायण का नाम था, नेत्रों में अश्रु, रोम-रोम पुलकन और प्रेम से सम्पूर्ण देह कम्पायमान।

साक्षात भगवत् प्रेम की मूर्ति लग रहा था चोखामेला। मैंने उससे जानना चाहा कि ऐसी अलौकिक भक्ति कहाँ से प्राप्त हुई तो उसने कहा प्रभुनाम के स्मरण से। जब उससे मैंने यह जानना चाहा कि आखिर वह क्या चाहता है भगवान् से? तो उत्तर में उसके आँसू छलक आये और बोला- अरे! मैं तो स्वयं को प्रभु समर्पित करना चाहता हूँ उसने भाव भीगे स्वरों में कहा- प्रेम तो गुणरहित होता है। इसमें कामना का कोई स्थान नहीं है क्योंकि कामना तो पूरी होते ही समाप्त हो जाती है। परन्तु प्रेम तो प्रतिक्षण बढ़ता है। इसमें कभी भी विघटन सम्भव नहीं है क्योंकि विघटन तो वहाँ होता है, जहाँ अपेक्षाएँ होती हैं। अपेक्षारहित, प्रेम समर्पित भक्त एवं प्रेमपूर्ण भगवान तो जब मिलते हैं तो उनमें प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता है। यह अनुभव अतिव्यापक होने के कारण अति सूक्ष्म भी है। इसे कहा-सुना नहीं जा सकता, बस अनुभव किया जा सकता है। इसीलिए प्रेम अनुभवरूप है।’’ इतना कहकर भक्त सत्यधृति ने गहरी साँस लेते हुए कहा- ‘‘उस अनपढ़ भक्त चोखामेला ने मुझे पहली बार भक्ति का तत्त्वज्ञान दिया। उस प्रेमी-अनुरागी भक्त में और भी ऐसा बहुत कुछ था जो कहने-सुनने के योग्य है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१७

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ७




प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को सजीव बनाइये

संसार से ममता को हटा देने या संसार भर में ममता का विस्तार कर देने का एक ही अर्थ है। दोनों का तात्पर्य यह है कि थोडे ही दायरे में ममता को केंद्रीभूत न रहने दिया जाए वरन उसका उपयोग विस्तृत क्षेत्र में किया जाए। केवल अपने शरीर तक या स्त्री, संतान तक ममता का सीमित रहना पाप मूलक है। क्योंकि अन्य लोगों को विराना समझने से उनका शोषण करने की प्रवृत्ति बलवती होती है। जिससे अपना संबंध नहीं, उसकी हानि-लाभ में भी कोई दिलचस्पी नहीं रहती, ऐसी दशा में अपनों के लाभ के लिए विरानों को हानि पहुँचाने का अवसर आवे तो उसे करने में कोई झिझक या संकोच अनुभव नहीं होता। चोर यदि यह अनुभव करे कि जिसका माल रहा हूँ उसे जितना दुःख चोरी में मुझे होता है, उतना ही दुख होगा तो वह चोरी कैसे कर सकेगा? हत्यारा यदि अनुभव करे कि वध करते समय मुझे जितना कष्ट होता है, उतना ही उसे भी होगा तो उसकी छुरी कैसे किसी का गला कतरने में समर्थ होगी? आत्मीयता का अभाव ही सताने और शोषण करने की छूट देता है। अपनों के लिए तो त्याग और सेवा करने की इच्छा होगी। अपनी बीमारी को दूर न करने के लिए मनमाना पैसा खरच किया जा सकता है, यदि भाई को अपना मानते हैं तो उसकी बीमारी में सहायता किए बिना न रहा जाएगा। इस प्रकार पाप और पुण्य की प्रवृत्तियाँ भी इसी अहंता को सिकोड़ने और विस्तार करने पर निर्भर हैं। आप सदैव ही उद्योग करते रहिए कि अपना ' अहम ' सीमित न रहे वरन जितना हो सके, विस्तृत किया जाए।

आत्मभाव के विस्तार की सूक्ष्म मनोवृत्ति का व्यवहार उदारता में दर्शन किया जा सकता है। जिनके विचार और कार्य उदारता पूर्ण हैं, जो दूसरे लोगों की सुविधा का अधिक ध्यान रखते हैं, वास्तव में वे इस भूलोक के देवता हैं। अभागा कंजूस सोचता है कि सारी दौलत अपने लिए जोड़-जोड कर रख लू अपनी विद्या किसी पर न प्रकट करूँ, अपनी शक्तियों को किसी को मुफ्त न दूँ ऐसे लोग सर्प बनकर संपदाओं की चौकीदारी करते हुए मर जाते हैं, उन्हें वह आनंद जीवन भर उपलब्ध नहीं होता जो उदारता के द्वारा मिलता है। एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खरच के उतना ही आनंद प्राप्त कर लेता है जितना कि बहुत खरच और कष्ट के साथ अपने बालकों को खिलाने में प्राप्त किया जाता है। अपने हँसते हुए बालकों को देखकर आपकी छाती गुदगुदाने लगती है। पडोसी के उससे भी सुंदर फूल से हँसते हुए बालक को देखकर आपके दिल की कली क्यूँ नहीं खिलती? अपनी फुलवारी को देखकर खुश होते हैं, पर पास में ही जो सुरभित उद्यान लहलहाते हैं वे आप मे तरंगें नहीं उत्पन्न करते? आपके आसपास अनेक सदाचारी, कर्त्तव्य परायण, मधुर स्वभाव वाले, धर्मात्मा, परोपकारी, विद्वान निवास कर रहे हैं, उनका होना आपको क्यों शांतिदायी नहीं होता? कारण यह कि आप खुद अपने हाथों अपनी एक निजी अलग दुनियाँ बसाना चाहते हैं, उसी से संबंध रखना चाहते हैं उसी की उन्नति को देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं, यह काम शैतान के हैं। शैतान के कार्य आनंदप्रद नहीं हो सकते।

पुराणों की कथा है कि शंकरजी ने अपनी अलग सृष्टि रची और वे सर्प, बिच्छू भूत, पिशाच जैसे दुखदायी जंतुओं की रचना ही कर सके। एक आख्यान ऐसा है जिसके अनुसार विश्वामित्र ने भी अलग सृष्टि बसाई थी, यह रचना भी ऐसी भोंडी और बेहूदी रही। ईसाई धर्म में एक स्थल पर शैतान द्वारा अलग सृष्टि बनाने का वर्णन है। यह रचना उसके लिए अनेक कष्ट और विपत्तियों का कारण बनीं। आप उन दुखदायी स्मृतियों को पुन: दुहराने का प्रयत्न मत कीजिए।
 
आपका बेटा भीम जैसा बलवान, सूर्य जैसा तेजस्वी, वृहस्पति सा विद्वान, इंद्र सा पदारूढ़ बने तब प्रसन्नता होगी, आपकी पत्नी रति जैसी सुन्दर, सीता सी साध्वी, सरस्वती सी बुद्धिमान हो तब आपको प्रसन्नता होगी, ऐसी आशा करेंगे तो प्रसन्नता एक काल्पनिक वस्तु बन जाएगी जो कभी भी प्राप्त न हो सकेगी। अपनी अलग दुनियाँ मत बसाइए आनंद को किन्हीं अमुक व्यक्तियों तक ही बंधित मत रखिए। शैतानी करतूते छोड़िए और ईश्वर के उपासक बनिए। ईश्वर की पुण्य रचना एक से एक उत्तम, अनूठे, मधुर रत्न भरे पडे हैं, उनको मालिकी की दृष्टि से नहीं सरलता, सेवा और स्नेह की दृष्टि से अपना ही समझिए। ईश्वर आपका है, उसकी सुरम्य वाटिका भी विरानी नहीं है, उसे भी अपनी समझिए दूसरों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखिए। पराएपन को अपनेपन में बदल दीजिए। खत्ती में मुट्ठी भर जी डाल कर आप भी साझी हो जाइए चारों ओर आनंददायक घटना और परिस्थितियों की बाढ आ रही है, शीतल जल के फव्वारे छूट रहे हैं, फिर आप क्यों प्यासे खड़े हैं? दूसरों की उन्नति अपनी उन्नति समझिए और बिना खरच का आनंद मनमानी मात्रा में लूटिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १०

https://awgpskj.blogspot.com/2022/02/blog-post_35.html

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ७

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को सजीव बनाइये

संसार से ममता को हटा देने या संसार भर में ममता का विस्तार कर देने का एक ही अर्थ है। दोनों का तात्पर्य यह है कि थोडे ही दायरे में ममता को केंद्रीभूत न रहने दिया जाए वरन उसका उपयोग विस्तृत क्षेत्र में किया जाए। केवल अपने शरीर तक या स्त्री, संतान तक ममता का सीमित रहना पाप मूलक है। क्योंकि अन्य लोगों को विराना समझने से उनका शोषण करने की प्रवृत्ति बलवती होती है। जिससे अपना संबंध नहीं, उसकी हानि-लाभ में भी कोई दिलचस्पी नहीं रहती, ऐसी दशा में अपनों के लाभ के लिए विरानों को हानि पहुँचाने का अवसर आवे तो उसे करने में कोई झिझक या संकोच अनुभव नहीं होता। चोर यदि यह अनुभव करे कि जिसका माल रहा हूँ उसे जितना दुःख चोरी में मुझे होता है, उतना ही दुख होगा तो वह चोरी कैसे कर सकेगा? हत्यारा यदि अनुभव करे कि वध करते समय मुझे जितना कष्ट होता है, उतना ही उसे भी होगा तो उसकी छुरी कैसे किसी का गला कतरने में समर्थ होगी? आत्मीयता का अभाव ही सताने और शोषण करने की छूट देता है। अपनों के लिए तो त्याग और सेवा करने की इच्छा होगी। अपनी बीमारी को दूर न करने के लिए मनमाना पैसा खरच किया जा सकता है, यदि भाई को अपना मानते हैं तो उसकी बीमारी में सहायता किए बिना न रहा जाएगा। इस प्रकार पाप और पुण्य की प्रवृत्तियाँ भी इसी अहंता को सिकोड़ने और विस्तार करने पर निर्भर हैं। आप सदैव ही उद्योग करते रहिए कि अपना ' अहम ' सीमित न रहे वरन जितना हो सके, विस्तृत किया जाए।

आत्मभाव के विस्तार की सूक्ष्म मनोवृत्ति का व्यवहार उदारता में दर्शन किया जा सकता है। जिनके विचार और कार्य उदारता पूर्ण हैं, जो दूसरे लोगों की सुविधा का अधिक ध्यान रखते हैं, वास्तव में वे इस भूलोक के देवता हैं। अभागा कंजूस सोचता है कि सारी दौलत अपने लिए जोड़-जोड कर रख लू अपनी विद्या किसी पर न प्रकट करूँ, अपनी शक्तियों को किसी को मुफ्त न दूँ ऐसे लोग सर्प बनकर संपदाओं की चौकीदारी करते हुए मर जाते हैं, उन्हें वह आनंद जीवन भर उपलब्ध नहीं होता जो उदारता के द्वारा मिलता है। एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खरच के उतना ही आनंद प्राप्त कर लेता है जितना कि बहुत खरच और कष्ट के साथ अपने बालकों को खिलाने में प्राप्त किया जाता है। अपने हँसते हुए बालकों को देखकर आपकी छाती गुदगुदाने लगती है। पडोसी के उससे भी सुंदर फूल से हँसते हुए बालक को देखकर आपके दिल की कली क्यूँ नहीं खिलती? अपनी फुलवारी को देखकर खुश होते हैं, पर पास में ही जो सुरभित उद्यान लहलहाते हैं वे आप मे तरंगें नहीं उत्पन्न करते? आपके आसपास अनेक सदाचारी, कर्त्तव्य परायण, मधुर स्वभाव वाले, धर्मात्मा, परोपकारी, विद्वान निवास कर रहे हैं, उनका होना आपको क्यों शांतिदायी नहीं होता? कारण यह कि आप खुद अपने हाथों अपनी एक निजी अलग दुनियाँ बसाना चाहते हैं, उसी से संबंध रखना चाहते हैं उसी की उन्नति को देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं, यह काम शैतान के हैं। शैतान के कार्य आनंदप्रद नहीं हो सकते।

पुराणों की कथा है कि शंकरजी ने अपनी अलग सृष्टि रची और वे सर्प, बिच्छू भूत, पिशाच जैसे दुखदायी जंतुओं की रचना ही कर सके। एक आख्यान ऐसा है जिसके अनुसार विश्वामित्र ने भी अलग सृष्टि बसाई थी, यह रचना भी ऐसी भोंडी और बेहूदी रही। ईसाई धर्म में एक स्थल पर शैतान द्वारा अलग सृष्टि बनाने का वर्णन है। यह रचना उसके लिए अनेक कष्ट और विपत्तियों का कारण बनीं। आप उन दुखदायी स्मृतियों को पुन: दुहराने का प्रयत्न मत कीजिए।
 
आपका बेटा भीम जैसा बलवान, सूर्य जैसा तेजस्वी, वृहस्पति सा विद्वान, इंद्र सा पदारूढ़ बने तब प्रसन्नता होगी, आपकी पत्नी रति जैसी सुन्दर, सीता सी साध्वी, सरस्वती सी बुद्धिमान हो तब आपको प्रसन्नता होगी, ऐसी आशा करेंगे तो प्रसन्नता एक काल्पनिक वस्तु बन जाएगी जो कभी भी प्राप्त न हो सकेगी। अपनी अलग दुनियाँ मत बसाइए आनंद को किन्हीं अमुक व्यक्तियों तक ही बंधित मत रखिए। शैतानी करतूते छोड़िए और ईश्वर के उपासक बनिए। ईश्वर की पुण्य रचना एक से एक उत्तम, अनूठे, मधुर रत्न भरे पडे हैं, उनको मालिकी की दृष्टि से नहीं सरलता, सेवा और स्नेह की दृष्टि से अपना ही समझिए। ईश्वर आपका है, उसकी सुरम्य वाटिका भी विरानी नहीं है, उसे भी अपनी समझिए दूसरों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखिए। पराएपन को अपनेपन में बदल दीजिए। खत्ती में मुट्ठी भर जी डाल कर आप भी साझी हो जाइए चारों ओर आनंददायक घटना और परिस्थितियों की बाढ आ रही है, शीतल जल के फव्वारे छूट रहे हैं, फिर आप क्यों प्यासे खड़े हैं? दूसरों की उन्नति अपनी उन्नति समझिए और बिना खरच का आनंद मनमानी मात्रा में लूटिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १०

👉 भक्तिगाथा (भाग १०९)

कामनाएँ, अपेक्षाएँ हों तो वहाँ प्रेम नहीं

भक्ति में भीगा स्वर, भाव में भीगा हृदय, रव में डूबा नीरव, स्पन्द में स्पन्दित निस्पन्द, कुछ ऐसी ही विलक्षणता थी वहाँ। हिमालय के हृदयक्षेत्र में ऋषि कहोड़ के मुख से भक्ति की स्रोतस्विनी प्रवाहित हो रही थी। इसमें सभी भीग रहे थे, आनन्दित हो रहे थे। दिवस, रात्रि के आठों याम यहाँ के अणु-अणु में, कण-कण में भक्ति छलक रही थी, बिखर रही थी। ऋषि-महर्षि, देवों-गन्धर्वों की कौन कहे, यहाँ तो पशु-पक्षियों के प्राण भी, पवित्र-परिष्कृत भावों से अनुप्राणित थे। भावों की पुलकन-थिरकन यहाँ सब ओर, चहुँ ओर व्याप्त थी। हिमालय की महिमा यूं ही नहीं गायी जाती। हिमालय केवल बर्फ से ढके पाषाण शिखरों का जमघट भर नहीं है बल्कि यहाँ दैवी चेतना की दीप्ति है, पवित्र आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षयस्रोत है और अब तो यहाँ भक्ति का भाव अमृत भी सतत प्रवाहित हो रहा था जिसमें सभी के मन-प्राण सतत् स्नात हो रहे थे।

अभी भी सम्पूर्ण परिसर व परिकर में महर्षि कहोड़ के स्वर संव्याप्त हो रहे थे। अचानक ही इन स्वरों में जाने कहाँ से एक विशेष प्रकार की दिव्य सुगन्ध घुलने लगी। इसमें अलौकिक प्रकाश आपूरित होने लगा। इसी के साथ ओंकार के मद्धम नाद के अनुगुंजन इसमें गूंजने लगे। इन क्षणों में सब ने अनुभव किया कि उनके अन्तःकरण में अनजानी सी पुलक भर गयी है। स्वयं महर्षि कहोड़ को भी अपनी अन्तर्चेतना में अनोखी प्रसन्नता का अहसास हुआ। उन्होंने एक पल के लिए अपने नेत्र बन्द किए फिर दूसरे ही पल उन्होंने ऋषि वशिष्ठ एवं अन्य सप्तर्षियों की ओर देखा। उनके मुख को देखकर उन्हें ऐसा लगा जैसे कि उन सबको भी वही अनुभूति हो रही थी, जो ऋषि कहोड़ को हो रही थी।

इस अनोखे अनुभव से भावित होकर महर्षि कहोड़ अपने आसन से उठे और बड़े मन्द्र-मधुर स्वर में बोले- ‘‘हे परमभक्त सत्यधृति आप प्रकट हों, हम सभी आपका स्वागत करते हैं।’’ परमभक्त सत्यधृति के बारे में प्राचीन महर्षियों को तो पता था, कुछ ने उनका केवल नाम सुना था, परन्तु उनके दर्शन कम ही लोगों ने किए थे। ऋषि समुदाय में यदा-कदा इसकी चर्चा होती थी कि सत्यधृति भगवान नारायण के परम भक्त हैं। अब वे सत्यलोक में रहकर अपने महान तप व विशुद्ध भावों से प्रकृति में सत्त्व की अभिवृद्धि करते हैं। उनका कहना है कि सूक्ष्म व स्थूल प्रकृति में वास करने वाले जीवों के आचरण व व्यवहार से प्रकृति में रज व तम बढ़ा है जिससे जीवों के जीवन में विकृतियाँ प्रचुर मात्रा में बढ़ी हैं। इनका शमन केवल तभी सम्भव है जबकि प्रकृति में सतोगुण बढ़े।

भक्त सत्यधृति अपने निष्काम तप एवं शुद्ध भक्ति से इन दिनों यही कार्य कर रहे थे। उनके इस मौन कार्य को सभी की मुखर सराहना व संस्तुति प्राप्त थी। ऋषि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र का तो कहना था कि भक्त सत्यधृति का कार्य सर्वथा युगान्तरकारी है। क्योंकि यही वह विधि है, जिससे जीवों की प्रकृति बदली जा सकती है। ऐसे परम भक्त का आगमन सभी को बहुत सुखकारी लगा। सभी ने उनकी अभ्यर्थना की, उन्हें आसन दिया। आसन पर बैठते ही उन्होंने सभी का अभिवादन व अभिनन्दन करते हुए ऋषि कहोड़ एवं देवर्षि नारद की ओर देखा और बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘आप सबकी, विशेष तौर पर आप दोनों की उपस्थिति हमें यहाँ खींच लायी है। देवर्षि जब अपने भक्तिसूत्र उच्चारित करते हैं, तो उनकी पराध्वनि की अनुगूंज सत्यलोक तक पहुँचती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१५

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ६

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को सजीव बनाइये      
 
लोग क्या कहते हैं ' '-इस आधार पर यदि, दुःखी होने की आदत डालेंगे तो सदैव दुःख भोगना पड़ेगा यह संभव नहीं कि सब लोग आपकी मनमर्जी के बन जावें और वैसे ही आचारण करें जैसे कि आप चाहते हैं। '' हम क्या करते हैं ' '-इस आधार पर यदि होने की आदत डालेंगे तो सदैव सुख ही सुख सामने पडेगा। ' अपने को मनमर्जी का बनाना अपने हाथ में है। इससे कौन रोक सकता है कि हम ' को अपना समझें, उन्हें प्यार करें और उस प्यार एवं अपनेपन कारण जो आनंद उपजे उसका उपयोग करें। स्वर्ग निर्माण की यही कुंजी है। अपने प्रेम भाव के कारण बहुत अंशों में ' दूसरों का व्यवहार नरम, मधुर, सुखकर हो जाता है। कदाचित कहीं अपवाद उपस्थित हो, किसी ऐसे जड से पाला पड़े जो उलटा ही उलटा चलता हो तो उसकी गतिविधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखिए उसे अपनी मौत मरने दीजिए आप तो अपने कर्त्तव्य में प्रसन्न रहिए। संसार में अनेक दुष्टात्मा भरे पडे हैं उनके होने से आपको कुछ बड़ा भारी शोक- संताप नहीं होता फिर क्या कारण है कि अमुक व्यक्तिं के दोंषों का दंड आप अपने को दें। दूसरों के बुरे विचार और कार्यों से अपने को प्रभावित मत होने दीजिए। सहनशील और समझौते की नीति से काम लीजिए। बदला या कर्ज चाहने की इच्छा छोडकर विशुद्ध प्रेम का, आत्मभाव का प्रसार कीजिए इससे आप अपने लिए एक स्वर्ग की रचना बड़ी आसानी से कर सकेंगे।

आध्यात्मिक साधना में ' अहंभाव का विस्तार करना '-यह तत्त्व प्रधान  रूप में विद्यमान है। आत्मोन्नति यही तो है कि अपनेपन के दायरे को छोटे से बडा बनाया जाए। जिनका अपनापन केवल अपने शरीर तक ही है वे कीट-पतंग नीची श्रेणी के हैं जो अपनी संतान तक आत्मभाव को बढ़ाते हैं वे पशु-पक्षी उनसे कुछ ऊँचे हैं जिनका अहंकार अपनीं संस्था, राष्ट्र तक है वे मनुष्य हैं, जो, समस्त मानव जाति को अपनेपन से ओत-प्रोत देखते हैं, वे देवता हैं, जिनकी आत्मीयता  चर-अचर तक विस्तृत है वे जीवन मुक्त परम सिद्ध हैं।

जीव अणु है, छोटा है, सीमित है। ईश्वर महान है, विभु है, व्यापक है। जब जीव ईश्वर में तद्रूप होने के लिए आगे बढता है तो वह भी महानता, विभुता, व्यापकता के गुणों में समन्वित होने लगता है। जिन पर भूत चढ़ता है उनके वचन और आचरण भूत जैसे हो जाते हैं, ईश्वरीय कृपा की किरण जिन महात्माओं पर पडती है, उनकी स्पष्ट पहचान ' आत्मभाव का विस्तार ' है। जिसका स्वार्थ जितने कम लोगों तक सीमित है वह ईश्वर से उतना ही दूर है। जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है, अधिक लोगों को अपना समझता है, दूसरों की सेवा सहायता करना आवश्यक कर्त्तव्य समझता है और उनके सुख-दुःख में अपना सुख-दु :ख मानता है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है। आत्मविस्तार और ईश्वर आराधन एक ही क्रिया के दो नाम हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ९

👉 भक्तिगाथा (भाग १०८)

एक शून्य निवेदन है भक्ति

बड़ा कठिन एवं परम दुर्लभ है यह सब लेकिन यह होता है कहीं-कहीं, किसी-किसी में। आमतौर पर भाव एवं विचार कहे जाते हैं, बोले जाते हैं, लिखे जाते हैं- यह सब होता है बहुत होशपूर्वक, बड़ी सघन बौद्धिकता के साथ लेकिन यह बस अभिव्यक्ति होती है। इसकी नापतौल व्याख्या-विवेचना सम्भव है परन्तु जब भक्त की भक्ति से परमात्मा प्रकाशित होता है तो वह अभिव्यक्ति नहीं अभिव्यञ्जना होती है। इस अवस्था में मन, वाणी, बुद्धि और यहाँ तक कि मानवीय चेतना के धरातल व दायरे में जो कुछ भी है, वह सभी मौन-नीरव, निस्पन्द हो जाता है। बस स्वतःस्फूर्त परमात्मा बह उठता है। भक्त नाच उठता है, भक्त गा उठता है, भक्त समाधि में डूबा हुआ बोलने लगता है।

सच तो यह है कि इस अवस्था में भक्त होता है अनुपस्थित- बस भगवान होते हैं उपस्थित। भक्त हो जाता है मौन, बस भगवान हो जाते हैं मुखर। इस मुखरता को, इस उपस्थिति को जानने वाले भी विरले होते हैं। इस अनुभव की अनुभूति भी विरले ही कर पाते हैं अन्यथा तार्किक तो बस तर्क करते रह जाते हैं। उनका कहना है कि अनुभव हुआ है तो कहा भी जाएगा, सुना भी जाएगा और समझा भी जाएगा। सिर में सामान्य दर्द होता है तो इसका पता चलता है और इसे कहा भी जाता है। पाँव में कांटा चुभता है तो पीड़ा की बात कहने-सुनने में आती है। इसी तरह से प्रसन्नता की अनुभूतियों का भी बयान-बखान होता है।

फिर भक्ति का बखान क्यों नहीं? सवाल तर्कपूर्ण लगता है। परन्तु इसका जवाब बड़ा जोखिम भरा है। जहाँ और जिन्होंने यह बखान किया, उसमें से किसी को फाँसी हुई तो किसी को सूली। किसी को पत्थर मारे गए तो किसी को जहर पिलाया गया। उनके लिए कहा गया कि ये धोखा दे रहे हैं, छल कर रहे हैं। इतना कहने के बाद महर्षि ने सबकी ओर बड़े निश्छल नयनों से देखा और बोले- बड़ा अजीब सा है यह छल। इसे छल कहने वाले इतना भी नहीं सोच पाते कि भला कोई फाँसी, सूली पाने के लिए छल क्यों करेगा। कोई जहर पीने के लिए धोखा क्यों देगा।

यह तो वह परम विरल अवस्था है, जब परमात्मा स्वयं मुखर होता है। अपने भक्त के माध्यम से भक्ति के सार को प्रकट करता है। असंख्यों में से कोई विरला ही इसे सुनता, समझता है। यह सच जान पाता है कि अखिल ब्रह्माण्ड के अधीश्वर यहाँ पर प्रकाशित हो रहे हैं। इस अवस्था में परम दिव्य की झलकियाँ मिलती हैं। अनूठापन, अनोखापन यहाँ अपनी चमक बिखेरता है। इसे वही देख पाते हैं, समझ पाते हैं जो प्रभुप्रेम में डूबे हैं, जो परमात्मा के परमरस से भीगे एवं उसमें डूबे हैं। क्षुद्र मन वालों के लिए यहाँ कहीं कोई स्थान नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१४

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ५

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को  सजीव बनाइये      

प्रेम एक ऐसा शब्द है जो टूटे हुए हृदय को जोडता है, बिछुडों को मिलाता है, विद्वेष को शांत करता है, शिकायतों को दूर करता है। अपने मनोभावों को वाणी या आचरण द्वारा पर इस प्रकार प्रकट करें जिससे उसे यह विश्वास हो जाए आपका आत्मभाव सच्चा है, बिना किसी खुदगर्जी या मायाचार के अपनेपन की भावना रखते हैं तो विश्वास कीजिए कि वह आपका गुलाम हो जाएगा। संघर्ष और कलह के लिये फिर गुंजाइश ही नहीं रहेगी। दोषों से रहित व्यक्ति इस संसार में एक भी नहीं है। काम, क्रोध, मोह की वृत्तियाँ न्यूनाधिक अंशों में हर एक के मन में बस रही हैं, किसी की एक बुराई को देखकर उस पर आग बबूला हो जाना, सब बुराइयों की खान मान लेना, घृणास्पद मानना उचित नहीं। आप निष्पक्षता के साथ तलाश करेंगे तो उसमें बुराइयाँ मिलेंगी, पर बुराइयों से अच्छाइयों की मात्रा अधिक होगी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते कि इन अच्छाइयों से आनंदित हों, उन्हें प्रकट करें और प्रोत्साहित करके आगे बढावें ? क्या आप ऐसा नहीं कर सकते कि बुराइयों को कुछ देर के लिए दर गुजर कर जाएँ उन्हें दफना दें, घटावें और सुधारने का प्रयत्न करें? ऐसा नहीं कर सकते तो
 
इसका एकमात्र कारण यह है कि उस व्यक्ति के प्रति आपका सच्चा आत्मभाव नहीं है। झूठ-मूठ किसी रिश्ते में बँध गए हैं, पर उस रिश्ते को निबाहने का आपका क्या कर्तव्य है? इसकी बहुत ही कम जानकारी रखते हैं।

यदि रोग असाध्य हो गया है तो बात दूसरी है अन्यथा अधिकांश मनमुटाव ऐसे होते हैं जिन्हें आसानी से सुलझाया जा सकता है। दूसरे आदमी तभी तक आपसे दूर-दूर रहते हैं जब तक कि उन्हें आपकी आत्मीयता की सचाई पर विश्वास नहीं होता। जिन स्वजनों से आप बड़बड़ाते रहते हैं, क्या कभी आपने वाणी एवं आचरण द्वारा उन्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया है कि मेरी आत्मीयता सच्ची है? इस प्रयत्न में जितने ही सफल होते हैं उनके दिलों में उतनी ही जगह अपने लिए बना लेते हैं।

यह भी मान लिया जाए कि दूसरे लोग आपके साथ उत्तम व्यवहार नहीं करते, हुक्म नहीं मानते, अदब नहीं करते तो भी यह कोई ऐसी बात नही है जिससे बुरा मानने या दुःखी होने की आवश्यकता पड़े। तीन-चार वर्ष का बच्चा आपके साथ कोई सलूक नहीं करता, हुक्म नही बजाता, अदब नहीं करता बल्कि बहुत बार खराब आचरण करता है तो भी उसके व्यवहार आपको बुरे नहीं मालूम होते, वरन किसी हद तक मनोरंजन ही करते हैं, फिर क्या बात है कि बड़ी उम्र के व्यक्ति के किसी प्रकार के आचरण पर अत्यंत दुःख मानते हैं? कारण यह है कि उस छोटे बालक को बड़े से अधिक चाहते हैं, अथवा जितना आत्मभाव बालक पर था, बडे पर उससे कम रखते हैं। स्वार्थ के साथ प्रेम नहीं ठहर सकता हैं। बदला चाहने वाले को निराश होना पड़ता है। आप अपना कर्त्तव्य पालन करने तक ही दुष्ट रहिए। अपनी इच्छा को इतनी सूक्ष्म रखिए आवश्यकताओं इतनी न्यून रखिए कि दूसरों की सहायता की जरूरत न पड़े। यदि जरूरत पड़े तो बदले में कृतज्ञता ज्ञापन, धन्यवाद, प्रशंसा द्वारा उसका कुछ बदला उसी समय चुका दीजिए और शेष को आगे-पीछे बेवाक कर देने की फिक्र में रहिए। कर्जदार बन कर अपने ऊपर दूसरे के उपकार लादने की इच्छा करना कोई गौरव की बात थोडे ही है। बदला चाहने या कर्ज लेने की तुच्छ वृत्ति को छोड़ दें तो कोई कारण नहीं कि अल्पबुद्धि वालों का, बडी उम्र के बालकों का कोई अप्रिय व्यवहार आपको दुखदायी प्रतीत हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ७

बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

👉 जब राजा का घमंड टूटा

एक राज्य में एक राजा रहता था जो बहुत घमंडी था। उसके घमंड के चलते आस पास के राज्य के राजाओं से भी उसके संबंध अच्छे नहीं थे। उसके घमंड की वजह से सारे  राज्य के लोग उसकी बुराई करते थे।

एक बार उस गाँव से एक साधु महात्मा गुजर रहे थे उन्होंने ने भी राजा के बारे में सुना और राजा को सबक सिखाने की सोची। साधु तेजी से राजमहल की ओर गए और बिना प्रहरियों से पूछे सीधे अंदर चले गए। राजा ने देखा तो वो गुस्से में भर गया । राजा बोला – ये क्या उदण्डता है महात्मा जी, आप बिना किसी की आज्ञा के अंदर कैसे आ गए?

साधु ने विनम्रता से उत्तर दिया – मैं आज रात इस सराय में रुकना चाहता हूँ। राजा को ये बात बहुत बुरी लगी वो बोला- महात्मा जी ये मेरा राज महल है कोई सराय नहीं, कहीं और जाइये।

साधु ने कहा – हे राजा, तुमसे पहले ये राजमहल किसका था? राजा – मेरे पिताजी का। साधु – तुम्हारे पिताजी से पहले ये किसका था? राजा– मेरे दादाजी का।

साधु ने मुस्करा कर कहा – हे राजा, जिस तरह लोग सराय में कुछ देर रहने के लिए आते है वैसे ही ये तुम्हारा राज महल भी है जो कुछ समय के लिए तुम्हारे दादाजी का था, फिर कुछ समय के लिए तुम्हारे पिताजी का था, अब कुछ समय के लिए तुम्हारा है, कल किसी और का होगा, ये राजमहल जिस पर तुम्हें इतना घमंड है।

ये एक सराय ही है जहाँ एक व्यक्ति कुछ समय के लिए आता है और फिर चला जाता है। साधु की बातों से राजा इतना प्रभावित हुआ कि सारा राजपाट, मान सम्मान छोड़कर साधु के चरणों में गिर पड़ा और महात्मा जी से क्षमा मांगी और फिर कभी घमंड ना करने की शपथ ली।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ४

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को  सजीव बनाइये      

आप चाहते हैं कि हमारे चारों ओर प्रिय ही प्रिय तत्त्व जमा रहें तो इसका एक ही उपाय है कि आत्मभाव को उन सबसे संबंधित कर दें। सोए हुए निष्क्रिय तत्त्वों के रहते हुए भी अंधकार बना रहता है पर जैसे ही बिजली की धारा उन बल्वों तक पहुँची, वैसे ही वे क्षण भर में दीप्तमान हो उठते हैं और अपने प्रकाश से निकटवर्ती स्थानों को जगमगा देते हैं। अपने निकटवर्ती लोगों पर यदि आप आत्मीयता की भावनाएँ आरोपित कर दें तो वे सब आपको प्रिय, आनंददायक, मनोहर और प्रसन्नता बढ़ाने वाले प्रतीत होने लगेंगे। जो लोग अल्पज्ञ और अपराधी हैं वे भी कपड़ों पर मल-मूत्र त्याग देने वाले अपने बालक के समान आनंदप्रद ही लगेंगे। क्रोध, चिडचिडाहट, द्वेष, घृणा की जो अग्नि शिखाएँ दिन- रात मन में जलती रहती हैं और खून सुखाती रहती हैं वे अनायास ही शांत हो जावेंगी।

प्रिय वस्तुओं का चारों ओर एकत्रित रहना यही तो स्वर्ग है। स्वर्ग की बडी महिमा गाई गई है, कथा-पुराणों में उसका बहुत विस्तृत वर्णन मिलता है, उस सारे वर्णन का सार यह है कि यहाँ सब प्रिय ही वस्तुएँ हैं, जैसे स्थानों में रहना चाहते हैं वह सब वहाँ मौजूद हैं। ऐसा स्वर्ग आप स्वयं बना सकते हैं, इसी जीवन में उसका आनंद लूट सकते हैं, दूर जाने की जरूरत नहीं, जिस स्थान पर रह रहे हैं, वहीं उसकी रचना हो सकती है, क्या आप सचमुच ऐसा चाहते हैं? क्या अपनी ओंखों से इस जीवन में ही उस स्वर्ग की झाँकी करने के लिए सचमुच उत्सुक हैं? यदि हैं तो सच्चे हृदय से तैयार हो जाइए। अपने आत्मभाव को संकुचित मत रखिए वरन उसे निकटवर्ती लोगों के ऊपर बिना भेद-भाव के बिखेर दीजिए। धारा का स्पर्श करते ही अचेतन पडे हुए बल्व जगमगाने हैं, आपके आत्मभाव का स्पर्श होते ही समस्त संबंधित जन प्रेम पात्र बन जाएँगे, प्रिय लगने लगेंगे, उन प्रियजनों के बीच रहकर आप स्वर्ग जैसा आनंद अनुभव करेंगे।

संबंधित लोगों को अपना समझिए उनमें अपनापन रखिए। इस प्रकार उनमें यदि कुछ दोष भी होंगे तो वे प्रिय रूप में दृष्टिगोचर होंगे। अपनों के लिए स्वभावत: उनके दोषों को छिपाने और गुणों को प्रकट करने की वृत्ति रहती है, अपने प्यारे पुत्र के दोषों को कौन पिता प्रकट. करता है? वह तो उसकी प्रशंसा के ही पुल बाँधता रहता है। दुर्गुणी बालक को कोई न तो मार डालता है और न ही जेल पहुँचा देता है वरन सारी शक्तियों के साथ यह प्रयत्न किया जाता है कि किसी सरल उपाय से उसके दुर्गुण दूर हो जाएँ या कम हो जाएँ। यदि ऐसी ही वृत्ति अपने परिजनों के साथ रखें तो उनके अंदर जो बुरे तत्त्व विद्यमान हैं, वे घट जाएँगे, कम-से-कम आपके लिए वे निस्तेज हो ही जाएँगे। डाकू, हत्यारे, ठग, व्यभिचारी आदि लोग भी अपने सी, पुत्र, भाई, बहिन आदि के साथ अपने स्वभावों का उपयोग नहीं करते, सिंह अपने बाल-बच्चों को नहीं फाड़ खाता, इसी प्रकार जिनके प्रति आप आत्मभाव रखते हैं वे भी कम से कम आपके लिए तो दुखदायी न रहेंगे। महात्मा इमरसन कहा करते थे कि ' यदि मुझे नरक में रखा जाए तो मैं अपने सद्गुणों के कारण वहाँ भी स्वर्ग बना लूँगा। आप में यदि विवेक हो वे कुटुंबी, जिनके साथ आपका दिन-रात कलह होता है, आसानी से प्रेम पात्र बन सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ६

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

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