बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १०९)

कामनाएँ, अपेक्षाएँ हों तो वहाँ प्रेम नहीं

भक्ति में भीगा स्वर, भाव में भीगा हृदय, रव में डूबा नीरव, स्पन्द में स्पन्दित निस्पन्द, कुछ ऐसी ही विलक्षणता थी वहाँ। हिमालय के हृदयक्षेत्र में ऋषि कहोड़ के मुख से भक्ति की स्रोतस्विनी प्रवाहित हो रही थी। इसमें सभी भीग रहे थे, आनन्दित हो रहे थे। दिवस, रात्रि के आठों याम यहाँ के अणु-अणु में, कण-कण में भक्ति छलक रही थी, बिखर रही थी। ऋषि-महर्षि, देवों-गन्धर्वों की कौन कहे, यहाँ तो पशु-पक्षियों के प्राण भी, पवित्र-परिष्कृत भावों से अनुप्राणित थे। भावों की पुलकन-थिरकन यहाँ सब ओर, चहुँ ओर व्याप्त थी। हिमालय की महिमा यूं ही नहीं गायी जाती। हिमालय केवल बर्फ से ढके पाषाण शिखरों का जमघट भर नहीं है बल्कि यहाँ दैवी चेतना की दीप्ति है, पवित्र आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षयस्रोत है और अब तो यहाँ भक्ति का भाव अमृत भी सतत प्रवाहित हो रहा था जिसमें सभी के मन-प्राण सतत् स्नात हो रहे थे।

अभी भी सम्पूर्ण परिसर व परिकर में महर्षि कहोड़ के स्वर संव्याप्त हो रहे थे। अचानक ही इन स्वरों में जाने कहाँ से एक विशेष प्रकार की दिव्य सुगन्ध घुलने लगी। इसमें अलौकिक प्रकाश आपूरित होने लगा। इसी के साथ ओंकार के मद्धम नाद के अनुगुंजन इसमें गूंजने लगे। इन क्षणों में सब ने अनुभव किया कि उनके अन्तःकरण में अनजानी सी पुलक भर गयी है। स्वयं महर्षि कहोड़ को भी अपनी अन्तर्चेतना में अनोखी प्रसन्नता का अहसास हुआ। उन्होंने एक पल के लिए अपने नेत्र बन्द किए फिर दूसरे ही पल उन्होंने ऋषि वशिष्ठ एवं अन्य सप्तर्षियों की ओर देखा। उनके मुख को देखकर उन्हें ऐसा लगा जैसे कि उन सबको भी वही अनुभूति हो रही थी, जो ऋषि कहोड़ को हो रही थी।

इस अनोखे अनुभव से भावित होकर महर्षि कहोड़ अपने आसन से उठे और बड़े मन्द्र-मधुर स्वर में बोले- ‘‘हे परमभक्त सत्यधृति आप प्रकट हों, हम सभी आपका स्वागत करते हैं।’’ परमभक्त सत्यधृति के बारे में प्राचीन महर्षियों को तो पता था, कुछ ने उनका केवल नाम सुना था, परन्तु उनके दर्शन कम ही लोगों ने किए थे। ऋषि समुदाय में यदा-कदा इसकी चर्चा होती थी कि सत्यधृति भगवान नारायण के परम भक्त हैं। अब वे सत्यलोक में रहकर अपने महान तप व विशुद्ध भावों से प्रकृति में सत्त्व की अभिवृद्धि करते हैं। उनका कहना है कि सूक्ष्म व स्थूल प्रकृति में वास करने वाले जीवों के आचरण व व्यवहार से प्रकृति में रज व तम बढ़ा है जिससे जीवों के जीवन में विकृतियाँ प्रचुर मात्रा में बढ़ी हैं। इनका शमन केवल तभी सम्भव है जबकि प्रकृति में सतोगुण बढ़े।

भक्त सत्यधृति अपने निष्काम तप एवं शुद्ध भक्ति से इन दिनों यही कार्य कर रहे थे। उनके इस मौन कार्य को सभी की मुखर सराहना व संस्तुति प्राप्त थी। ऋषि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र का तो कहना था कि भक्त सत्यधृति का कार्य सर्वथा युगान्तरकारी है। क्योंकि यही वह विधि है, जिससे जीवों की प्रकृति बदली जा सकती है। ऐसे परम भक्त का आगमन सभी को बहुत सुखकारी लगा। सभी ने उनकी अभ्यर्थना की, उन्हें आसन दिया। आसन पर बैठते ही उन्होंने सभी का अभिवादन व अभिनन्दन करते हुए ऋषि कहोड़ एवं देवर्षि नारद की ओर देखा और बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘आप सबकी, विशेष तौर पर आप दोनों की उपस्थिति हमें यहाँ खींच लायी है। देवर्षि जब अपने भक्तिसूत्र उच्चारित करते हैं, तो उनकी पराध्वनि की अनुगूंज सत्यलोक तक पहुँचती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१५

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