गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 6)

Q.6. I have been doing Gayatri Sadhana regularly. Nevertheless, at times, I feel depressed and dissatisfied with my progress. What is the remedy?

Ans. The feelings of occasional depression, dissatisfaction with progress and momentary loss of interest are not uncommon in course of Sadhana. In order to understand this paradoxical phenomenon, it is  necessary to understand three successively higher phases of spiritual evolution. These are known as :-

(1) The Mantra Diksha or Initiation
This is the initial Kindergarten stage - the ‘Bhuha’ stage of Dikcha, in which the ‘Acharya’ - a representative of Guru, introduces the novice to the concept of Gayatri disciplines through ‘Baikhari Vani’ (by speaking). Any contemplative, spiritually- wise, high-character, talented, person may assume the charge of an ‘Acharya’. Nevertheless, this is a great responsibility, since after establishing the spiritual relationship, sins and virtues of the disciple are shared by the Guru. Since the Guru, by definition, is sinless, his displeasure on any dereliction by the devotee is quite natural. Besides, it must also be very clearly understood, that merely admission to the school of Sadhana through Mantra Dikcha is not sufficient. The devotee must persistently endeavour to qualify for the higher stages of Diksha.

(2) Agni Diksha or Pran Diksha
This is the ‘Bhuwaha’ stage of Dikcha carried out extra-sensorially, through ‘Madhyama’ and pashyanti Vani (Telepathic and soul-to-soul communication). In this case the Guru undertakes refinement and development of the Sukchma Sharir - the conscious and supra-conscious levels of mind (‘Man’: ‘Budhi’, ‘Chitta’ and ‘Ahankar’) of the devotee.

When the devotee graduates to this next higher class of ‘Agni Dikcha’, the Guru extra-sensorally transmits a part of the spiritual charge (Pran) to the devotee, from his own spiritual battery accumulated after prolonged Tapascharya.

The ‘concepts’ planted and developed during the Mantra Dikcha are now translated into ‘action’ by this new acquisition of powerful energy (Pran). At this stage, there is a great turmoil in the inner-self of the devotee, which he/ she apparently feels as a fast growing dissatisfaction with his / her progress, uneasiness and momentary depression. These external symptoms are, in fact, an indication of the churning, taking place within deeper levels of the soul.  Hence, unless the devotee feels this turmoil, it is to be assumed that the activation by the Guru has become feeble, because of some shortcomings in the devotee’s Sadhana.
    
After Agni Dikcha, the devotee becomes more enlightened and is able to discern his / her personal faults, however trivial they are. The term Agni Dikcha owes its nomenclature to the process of ‘Incineration in the inner-self by the fire of discernment’. The phenomenon is parallel to the exercise of Tapascharya for the purification of physical body.

There are three clear signs of a person undergoing Agni Dikcha. (1) A strong inclination to perform ‘Tap’ for self-purification, (2) A feeling of discontentment with one’s progress and a desire for speedy innergrowth and  (3) realisation of many shortcomings in  one’s thoughts, behaviour and nature.

Here, it must be emphasised that ‘Only that Guru can give Dikcha, who has himself earned and conserved sufficient spiritual charge by performing Tapascharya’.

(3) Pran Dikcha (‘Swaha’ stage)
This is the highest level of Dikcha in course of which the transfer of spiritual energy takes place from the soul of the Guru to the soul of the devotee. This is the process through which the Guru hands over spiritual succession to the most deserving disciple. In other words, it means appointing the spiritual successor.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 84

👉 शून्यता

मन की उठती-गिरती लहरों में अपने को ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह न मिला। विद्वानों द्वारा रचित शास्त्र पढ़े, ज्ञानियों की बातें सुनी, पर इससे भी कुछ न हुआ। बस चेतना बोझिल होती गयी, भावनाओं में भारीपन आ गया। अपने को हल्का करने के लिए यूँ ही घूमने निकला। पश्चिमोन्मुख सूरज थोड़ी देर पहले ही बादलों में छुप गया था। लेकिन रात का द्वार रोकने के लिए साँझ अभी तक ठहरी हुई थी। मैं अभी तक स्वयं की खोज कर रहा था। पर वहाँ तो एक शून्यता थी। और जहाँ शून्यता होती है, वहाँ कुछ भी नहीं होता।
  
थोड़ी ही दूर पर बैठी एक बुढ़िया प्याज छील रही थी। उसने एक बड़ी सी प्याज की गाँठ हाथ में ली और छीलने लगी। परतों पर परतें निकलती गयी। मोटी-खुरदरी परतें, फिर मुलायम-चिकनी परतें और फिर कुछ भी नहीं। प्याज छिलते-छिलते उस बुढ़िया के हाथ कुछ भी न बचा। अपनी इस स्थिति पर वह जोर से हँस दी। उसे देखकर लगा कि अपना मन भी तो कुछ ऐसा ही है। इसे उघाड़ते चलें- पहले स्थूल परतें, फिर सूक्ष्म परतें, फिर शून्य। विचार, वासनाएँ और अहंकार, फिर कुछ भी नहीं। बस शून्यता ही बची रहती है। इस शून्यता को जो उघाड़ते हैं, वही ध्यान में प्रवेश करते हैं।
  
यह ध्यान ही परिचय कराता है हमारा अपने आपसे। यह शून्य गहनता ही हमारा अपना स्वरूप है। फिर उसे आत्मा कहें या कुछ और। पर यह सच है कि विचार, वासना, अहंकार जहाँ नहीं है, वहीं वह है- ‘जो है’। पश्चिमी दुनिया के एक बड़े विचारक ने लिखा है कि जब भी मैं अपने में जाता, कोई मैं मुझे वहाँ नहीं मिलता। या तो किसी विचार से टकराव होता है या किसी वासना अथवा फिर किसी याद से। उनकी यह बात कुछ हद तक ठीक है। पर परतों से लौट आना तो भूल है। प्याज हाथ में लिया है तो पूरा ही छील लें। सारी परतें उघड़ जाने पर टकराने के लिए कुछ भी न बचेगा। बची रहेगी तो बस शून्यता। यही तो अपना परिचय है। सतह पर संसार के सब रंग हैं, परन्तु केन्द्र में शून्य नीरवता है। जहाँ स्वयं का ज्ञान, स्वयं की उपलब्धि होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९४

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें


👉 तोड़ कर जोड़ो

भगवान बुद्ध एक बार निबिड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हो गई। वह सदैव अनेक निर्दोषों का वध करके उनकी उंगलियों की माला अपने गले में धारण किया करता था। आज सामने आये हुए साधु को देखकर उसकी बाछें खिल उठीं।

“आज आप ही मेरे पहले शिकार होंगे” अँगुलिमाल ने बुद्ध से कहा और अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाली। तथागत मुसकराये, उनने कहा—”वत्स, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो।”

डाकू ठिठक गया, उसने कहा—”कहिए—क्या कहना है?”

तथागत ने कहा—”सामने वाले वृक्ष से एक पत्ता तोड़कर जमीन पर रख दो।” डाकू ने वैसा ही कर दिया। उन्होंने फिर कहा—”अब इसे पुनः पेड़ से जोड़ दो।” डाकू ने कहा—यह कैसे संभव है। तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता।

बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा—वत्स, इस संसार में मार-काट तोड़-फोड़ उपद्रव और विनाश यह सभी सरल हैं। इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है फिर तुम इसमें अपनी क्या विशेषता सोचते हो और किस बात का अभिमान करते हो? बड़प्पन की बात निर्माण है—विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते?

अंगुलिमाल के अन्तःकरण में वे शब्द तीर की तरह घुसते गये। तलवार उसके हाथ से छूट पड़ी। कातर होकर उसने तथागत से पूछा—”इतनी देर तक पाप कर्म करने पर भी क्या मैं पुनः धर्मात्मा हो सकता हूँ?” वे बोले—”वत्स, मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भी पाप से पुण्य की ओर मुड़ सकता है। धर्म का मार्ग किसी के लिए अवरुद्ध नहीं है। तुम अपना दृष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायगा।” विचार बदले तो मनुष्य बदला। अँगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रज्या ले ली। वह भगवान बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ।

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग १)

यदि आप जल्दी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो इसके लिए सजगता, होशियारी रखना बहुत जरूरी है आध्यात्मिक मार्ग में थोड़ी-सी सफलता थोड़ी सी मन की गंभीरता, एकाग्रता, सिद्धियों के थोड़े से दर्शन, थोड़े से अन्तर्यामी ज्ञान की शक्ति से ही कभी संतुष्ट मत रहो। इससे ज्यादा ऊंची चढ़ाइयों पर चलना अभी बाकी है।

सदा सेवा करने को तैयार रहो। शुद्ध प्रेम, दया और नम्रता सहित सेवा करो। सेवा करते समय कभी मन में भी खीझने या कुढ़ने का भाव मत आने दो। सेवा करते हुए मुख पर खेद और ग्लानि के भाव मत आने दो। ऐसा करने से जिसकी सेवा करते हो वह आपकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आप एक अवसर खो दोगे। सेवा के लिए अवसर ढूँढ़ते रहो। एक भी अवसर को मत जाने दो बल्कि अवसर खुद बनालो।

अपने जीवन को सेवामय बना दो सेवा के लिए अपने हृदय में चाव तथा उत्साह भर लो। दूसरों के लिये प्रसाद बन कर रहो। यदि ऐसा करना चाहते हो तो आपको अपने मन को निर्मल बनाना होगा। अपने आचरण को दिव्य तथा आदर्श बनाना होगा। सहानुभूति, प्रेम, उदारता, सहनशीलता और नम्रता बढ़ानी होगी। यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से भिन्न हों तो उनसे लड़ाई झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा।

आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 6

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 5)

Q. 5. What are indications of progress in Sadhana?

Ans.  After prolonged and persistent ‘Sadhana’ with faith and dedication , the following characteristics appear in the devotee:-

1. Magnetism in personality; sparkling eyes; force in speech; a glowing countenance; gravity and stability in expression. These qualities deeply impress everyone coming in contact with the devotee. People interacting with a devotee of Gayatri behave in conformity with his / her wishes.
2. The devotee feels a new celestial energy operating from within.
3. The devotee progressively loses interest in improper
(sinful) activities. If, some wrong is inadvertently committed by him, he feels extremely repentant. He neither becomes elated on favourable happenings, nor loses equanimity while facing unfavourable circumstances.

4. If he curses someone on becoming deeply hurt, the adversary encounters great misfortune.
5. On the other hand,, his good wishes always result in the welfare of the concerned person.
6. He develops the faculty of thought reading. None can  hide his shortcomings, covert actions and motives from the penetrating gaze of a Gayatri devotee.
7. He can communicate telepathically with people living far away.
8. The environment around him is very quiet and serene. People find unusual peace, purity and serenity in his presence.

9. When at the zenith of his progress, he can paranormally transfer a part of the spiritual energy (collected by him in course of his Sadhana through ‘Tapascharya’), to any deserving individual, for which the latter need not make the required effort. This is called the process of ‘Shaktipat’ in yoga, which the Guru uses for grooming the best disciple as his successor.

10. While contemplating, during the waking hours or in course of meditation he may see emissions of multicoloured lights, other para-normal lights or hear celestial sounds or words.

These are some visible signs of progress in ‘Sadhana’ Besides, the devotee acquires many paranormal capabilities,   which are much beyond normal human experience, knowledge and resources.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 83

👉 भारतीयता

भारतीयता में भारत माता की लाडली सन्तान होने के भाव भरे हैं। इसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुगन्ध से अपनत्व का अहसास है। यही वह भावना है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम सभी भारतवासी भाई-बहनों को स्नेह सम्बन्धों के धागों में पिरोती है। यह शब्द जब हृदय में अन्तर्दीप की तरह प्रज्वलित-प्रकाशित होता है तो पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आसाम, बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड के शूरवीर साहसी सैनिक सीमाओं के प्रहरी बनकर दुश्मनों का दिल दहलाते हैं।

भारत भूमि के कण-कण में भारतीयता की ऊष्मा एवं ऊर्जा है। जो केरल के मेजर उन्नीकृष्णन को मुम्बई हमले में आतंकवादियों को परास्त करते हुए शहीद होने के लिए प्रेरित करती है। यही पंजाब के गगनदीप सिंह वेदी को दक्षिण भारत में आए सुनामी की खौफनाक लहरों में कडलूरवासियों का खेवैया बनने का साहस देती है। कुछ कुटिल कुबुद्धि वाले कुचक्री लोग प्रान्तीयता, क्षेत्रीयता, जातीयता, साम्प्रदायिकता की बातें करके भारतीयता की भावनाओं में दरार डालना चाहते हैं। उनके निजी स्वार्थ का कुत्सित कलुष ही इसका कारण है।

लेकिन इस प्रयास में उनकी पराजय सुनिश्चित है। क्योंकि हम सबकी पहली और अन्तिम पहचान भारतीयता है। फिर भले ही हममें से कोई किसी भी प्रान्त, क्षेत्र अथवा जाति का क्यों न हो? उसकी कोई भी भाषा और कोई भी धर्म क्यों न हो? परन्तु ये सब कभी हमारे भरतवंशी, भारतवासी और भारतीय होने में रुकावट नहीं बन सकते। भारत देश के किसी भी कोने के किसी भी व्यक्ति की श्रेष्ठता हमारी श्रेष्ठता है, उस पर हमें गर्वित होने का पूरा हक है। और इसी तरह भारत भूमि के किसी छोर के किसी भी इन्सान की कमजोरी-कमी हमारी अपनी कमजोरी व कमी है। इसे हटाने-मिटाने के लिए हर तरह से प्रयत्नशील होना हमारा निजी कर्त्तव्य है। स्वाधीन भारत के निवासियों की एक ही पहचान है- भारतीयता। और इस वर्ष के स्वाधीनता दिवस पर हममें से हर एक का एक ही संकल्प है- अपनी भारत भूमि एवं भारतीयता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए सर्वदा तैयार रहना।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९३

👉 You are the Architect of Your Destiny

If you depend upon others or look for someone’s help in the moments of difficulty, you must be living under some illusion. Otherwise, you would identify the root-cause of the problems you are facing and analyze your own vices and flaws that might have been responsible for those troubles. By overcoming those drawbacks and weaknesses, you would be best equipped to resolve or get rid of most of your problems on your own.

With the aspiration of being progressive and successful, you should also begin adopting virtuous tendencies and sharpening and enhancing your potentials. Your destiny is indeed written according to your intrinsic nature, inner qualities. Intense impressions of your tendencies, sentiments and thinking and conduct, account for shaping of your inner personality, which is attributed to be the architect of your future evolution. God’s system works according to – “you harvest what you have sown”.

If good qualities, abilities are not cultivated by you, and the seeds of virtues are left in a virgin (dormant) state within your self, and instead, negative tendencies, follies, untoward habits are allowed to accumulate and grow, God’s rule will formulate your destiny as full of sufferings; you will not have a good fate or hopes in future unless and until you refine yourself and inculcate the potentials of elevation. So it is in fact in your own hand to design your destiny.

If you awaken your self-confidence, set high ideals as your goal and sincerely endeavor to make yourself capable and deserving for that goal, God’s script will indeed destine you to have a bright and successful life accordingly. If you think wisely, know yourself and earnestly search for the illumined goal, you will certainly find the righteous path to achieve it at the right moment.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

👉 असली पारसमणी

एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दें, ताकि वह जीविका चला सके। संत ने कहा–– हमारे पास तो वस्त्र के नाम पर यह लँगोटी व उत्तरीय है। लँगोटी तो आवश्यक है, पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा ओर कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं। वह व्यक्ति बराबर गिड़गिड़ता ही रहा, तो वे बोले–– अच्छा, झोंपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया जा सकता है। तुम उसे ले जाओ। प्रसन्नचित्त वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया। खुशी से चिल्ला पड़ा–– महात्मन्ǃ यह तो पारसमणि है। आपने यह ऐसे ही फेंक दी।

संत बोले––हाँ बेटाǃ मैं जानता हूँ और यह भी कि यह नरक की खान भी है। मेरे पास प्रभुकृपा से आत्मसंतोष रूपी धन है, जो मुझे निरंतन आत्मज्ञान और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वस्तु का क्या मूल्यॽ वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।

फेंक दी उसने भी पारसमणि। बोला–– भगवन्ǃ जो आत्मसंतोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है। उससे मैं इस पत्थर के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दें, जो सीधे प्रभुप्राप्ति की ओर ले जाती है। संत ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया। वे दोनों मोक्षसुख पा गये।

विवेकवान् के समक्ष हर वैभव, हर संपदा तुच्छ है। वह सतत अपने चरमलक्ष्‍य परमपद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है।

👉 आत्म विश्वास का शास्त्र


👉 सुख-दुख में समभाव रखिए! (अन्तिम भाग)

यही बात बाह्यदृष्टि व अन्तर दृष्टि की है। बाह्य-दृष्टि बाहरी वस्तु पर दुख-सुख की कल्पना करती है, अंतर दृष्टि अपनी प्रवृत्तियों व भावनाओं की प्रधानता करती है। इसी दृष्टि-भेद के कारण भोगी को जिसमें आनन्द है योगी को उसमें नहीं। योगी को त्याग में आनंद है, भोगी के लिए वह कष्टप्रद है। उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी दृष्टि को सही बनाना जरूरी है। तभी हम इस द्वंद्व से अतीत होकर समभाव का आनन्द लूट सकेंगे। सभी प्राणियों से मानव में विचारशक्ति की बड़ी भारी विशेषता है। विचारों से हम सुखी होते हैं, विचारों से ही दुखी। विचारों की धारा बदल देने से ही दुःख-सुख की कल्पना बदल जाएगी। किसी जमाने में कोई बात बहुत अच्छी समझी जाती थी पर वही आज अच्छी ही समझी जाती और वर्तमान में भी एक ही वस्तु के विषय में, सबकी राय एक सी नहीं रहती। इसका प्रधान कारण विचार भेद ही है। विचार बदला कि सारा ढाँचा बदल गया।

अधिक गहराई में नहीं भी जा सकें तो दुख-सुख में समभाव रखने के लिए हमारे विचारों को बदलने का एक शब्द मंत्र भी है, जिससे सर्वसाधारण सहज में ही लाभ उठा सकता है। उस चमत्कारी शब्द मंत्र की एक कहानी मैंने विदुषी श्री आर्याबल्लभ जी की व्याख्या में सुनी थी। उसे यहाँ उपस्थित कर रहा हूँ :-

एक बड़े भारी सम्राट थे, जिन्हें प्रतिपल विविध परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। कभी मन दुख की अनुभूति में और कभी सुख की अनुभूति में हर्ष एवं शोक से चलायमान बना रहता था, सम्राट ने यह सोचकर कि इस भीषण द्वंद्व के निवारण का कोई उपाय मिल जाय तो अच्छा हो। उसने अपने विचारक सभासदों व मंत्रियों के सामने अपने विचार रखते हुए कहा कि इसके निवारण का कोई सरल उपाय बतलाइये। जिससे समय-समय पर हर्ष एवं विषाद से मन आँदोलित होता है, वह रुक जाय। यह रोग केवल सम्राट को ही नहीं, सभी को था, पर इसके निवारण का उपाय कोई भी नहीं बतला सकें, आखिर मंत्री को आदेश दिया गया कि तुम्हें इसका रास्ता निकालना ही पड़ेगा, अन्यथा दंडित किये जाओगे। सम्राट की आशा का पालन दुष्कर था अतः मंत्री ने छः महीने की मुद्दत ली ओर लगा इधर-उधर पर्यटन में, क्योंकि पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष के बिना इसका उपाय मिलना संभव न था। अन्त में एक उच्च कोटि के योगी से भेंट हुई, जिन्होंने इसका उपाय बतलाते हुए कहा कि सम्राट को एक ऐसी अंगूठी बना के दो जिसके बीच में या चारों ओर यह मंत्र लिखा हो कि “यह भी चला जायगा”। सम्राट को कह देना कि जब भी उनका मन सुख एवं दुख से आन्दोलित हो। इस अंगूठी में लिखे हुए मंत्र पर मनन करे इससे सुख-दुख की क्षणिकता का ध्यान आने पर मन में हर्ष और शोक का द्वंद्व नहीं होगा। दुख आता और चला जाता है ओर सुख भी सदा नहीं रहता इस रहस्य के जानने से मन समभाव को पा लेता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 17

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 4)

Q.4. Will one incur divine displeasure if there are some inadvertent errors during worship?

Ans. Absolutely not. The Creator is like our Mother. The Divine Mother has only love for her children. How can She punish unless the fault is deliberate? One may contemplate on God even while lying on bed (when one is sick) or without proper physical cleanliness or rituals. The benefits, however small, will definitely accrue. One should not have the least apprehension about harm or divine displeasure due to errors in worship. If any mistake is committed in the rituals of Tantrik Sadhana, the deities, who are mostly demoniac,  may get annoyed and harm an errant Sadhak. However,  Gayatri  is the Divine Shakti, the affectionate mother, full of forgiveness and compassion. She loves her child who lisps and cannot even speak properly. Gayatri is such a Kamdhenu.       

Even erroneous worship having righteous aims and objectives becomes fruitful, if it is faithfully done. It is said about Valmiki that he could not even utter Ram properly and by uttering ‘mara, mara’ attained godliness. In Rightist path of Sadhana, sentiments are more important than rituals. None has been harmed on account of any omission in the method of Gayatri worship. Still, if there is any apprehension, the guidance of a spiritual master in this path of Sadhana can be sought in the matter.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 82

👉 वैज्ञानिक अध्यात्म

वैज्ञानिक अध्यात्म में वैज्ञानिक जीवन दृष्टि एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों का सुखद समन्वय है। वैज्ञानिक जीवन दृष्टि में पूर्वाग्रहों, मूढ़ताओं एवं भ्रामक मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है। यहाँ तो तर्क संगत, औचित्यनिष्ठ, उद्देश्यपूर्ण व सत्यान्वेषी जिज्ञासु भाव ही सम्मानित होते हैं। इसमें रूढ़ियाँ नहीं प्रायोगिक प्रक्रियाओं के परिणाम ही प्रामाणिक माने जाते हैं। सूत्र वाक्य में कहें तो वैज्ञानिक जीवन दृष्टि में परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व मिलता है। वेदों के ऋषिगण इसी का ‘सत्यमेव जयते’ के रूप में उद्घोष करते हैं।
  
वैज्ञानिक जीवन दृष्टि का यह सत्य-आध्यात्मिक जीवन मूल्यों की परिष्कृत संवेदना से मिलकर पूर्ण होता है। परिष्कृत संवेदना ही वह निर्मल स्रोत है, जिससे समस्त सद्गुण जन्मते और उपजते हैं। जहाँ परिष्कृत संवेदना का अभाव है, वहाँ सद्गुणों का भी सर्वथा अभाव होगा। कई बार भ्रान्तिवश सत्य एवं संवेदना को विरोधी मान लिया जाता है। जो इन्हें विरोधी समझते हैं, वही विज्ञान और अध्यात्म के विरोधी होने की बात कहते हैं। जबकि सत्य और संवेदना- विज्ञान और अध्यात्म की भाँति परस्पर विरोधी नहीं पूरक हैं। सत्य संवेदना को संकल्पनिष्ठ बनाता है और संवेदना सत्य को भाव निष्ठ-जीवन निष्ठ बनाती है।
  
वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोगों की निरन्तरता जीवन को सत्यान्वेषी किन्तु संवेदनशील बनाए रखती है। इसके द्वारा मनुष्य में वैज्ञानिक प्रतिभा एवं सन्त की संवेदना का कुशल समायोजन व सन्तुलन बन पड़ता है। इसका विस्तार यदि समाज व्यापी होगा तो समाज धर्म विशेष, मत विशेष व पंथ विशेष के प्रति हठी एवं आग्रही नहीं होगा। यहाँ सम्पूर्ण विश्व के सभी मत एवं सभी पंथ की समस्त श्रेष्ठताएँ सहज ही सम्मानित होंगी। वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोगों के सभी परिणाम समाज में आध्यात्मिक मानवतावाद की प्रतिष्ठा करेंगे। इसी सत्य का साक्षात्कार युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने युगक्रान्ति करने वाले प्रकाश दीप के रूप में अपनी चेतना के समाधि शिखरों पर आसीन होकर किया था। इससे ही प्रज्वलित अनगिन क्रान्ति दीप युग की भवितव्यता को उज्ज्वल स्वरूप देने वाले हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९२

👉 Henry Ford

When a young man asked Mr. Henry Ford for guidance to be as successful and  rich as him, the reply Mr. Henry Ford gave can provide inspiration to all those who are ambitious to acquire materialistic success. Ford said, “Maintain your honesty at any cost and strive in the profession with hard-work and strongly positive attitude”. Ford started his career as a simple automobile mechanic and reached the highest peak of success only through hard-work. He is considered the pioneer and founder of the entire automobile industry.

At the time of setting up his factory, he cherished a dream to produce a car so cheap that each of his employees can afford it. In the year 1930, each car that rolled out was costing 300 $ and the 70,000 cars that stood before the factory gate belonged to the people who worked inside the factory. Henry was believed to be the richest person in the world by the time of his death in the year 1937. He always championed peace and brotherhood. By establishing the Ford Foundation, he showed his generosity and compassion. This billion dollar institute is sincerely engrossed in acts of humanity and charity for the deprived.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 12

👉 "हैनरी फोर्ड

एक युवक ने जब हैनरी फोर्ड से कहा कि ""मैं भी हेनरी फोर्ड के समान संपन्न बनना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।" हैनरी फोर्ड ने जो उत्तर दिया वह हर भौतिक महत्त्वाकांक्षी को प्रेरणा दे सकता है। फोर्ड ने उत्तर दिया, 'किसी भी कीमत पर अपनी प्रामाणिकता बनाए रखो, मनोयोग एवं सतत् श्रम का अवलंबन लेकर व्यवसाय क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हो। एक सामान्य से ओटोमोबाइल मैकेनिक के रूप में फोर्ड ने अपने जीवन क्रम का आरंभ किया तथा पुरुषार्थ के सहारे सफलता की चोटी पर जा पहुँचे। फोर्ड को ओटोमोबाइल उद्योग का संस्थापक माना जाता है।

मोटर कारखाना की स्थापना के समय उनकी इच्छा थी कि इतनी सस्ती कारों का निर्माण करें कि प्रत्येक कर्मचारी को उपलब्ध हो सके। सन् 1930 में फोर्ड कपंनी से निकलने वाली कार की कीमत मात्र 300 डालर थी। फोर्ड कपंनी के सामने हर समय 70,000 कारें खड़ी रहती थीं जो मात्र कंपनी में कार्य करने वाले कर्मचारियों की थीं, सन् 1937 में मृत्यु के समय हेनरी विश्व के सबसे संपन्न व्यक्ति माने गए। फोर्ड शांति के पक्षपाती थी। उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन की स्थापना द्वारा अपने करुण हृदय का परिचय दिया। खरबों डालर की राशि से स्थापित यह संस्था मानवतावादी कार्यों में लगी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 12

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

👉 आत्म-भाव का विस्तार

👉 साधु की संगति:-

एक चोर को कई दिनों तक चोरी करने का अवसर ही नहीं मिला. उसके खाने के लाले पड़ गए. मरता क्या न करता. मध्य रात्रि गांव के बाहर बनी एक साधु की कुटिया में ही घुस गया। वह जानता था कि साधु बड़े त्यागी हैं. अपने पास कुछ संचय करते तो नहीं रखते फिर भी खाने पीने को तो कुछ मिल ही जायेगा. आज का गुजारा हो जाएगा फिर आगे की सोची जाएगी।

चोर कुटिया में घुसा ही था कि संयोगवश साधु बाबा लघुशंका के निमित्त बाहर निकले. चोर से उनका सामना हो गया. साधु उसे देखकर पहचान गये क्योंकि पहले कई बार देखा था पर उन्हें यह नहीं पता था कि वह चोर है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह आधी रात को यहाँ क्यों आया ! साधु ने बड़े प्रेम से पूछा- कहो बालक! आधी रात को कैसे कष्ट किया ? कुछ काम है क्या ? चोर बोला- महाराज! मैं दिन भर का भूखा हूं।

साधु बोले- ठीक है, आओ बैठो. मैंने शाम को धूनी में कुछ शकरकंद डाले थे. वे भुन गये होंगे, निकाल देता हूं. तुम्हारा पेट भर जायेगा. शाम को आये होते तो जो था हम दोनों मिलकर खा लेते। पेट का क्या है बेटा! अगर मन में संतोष हो तो जितना मिले उसमें ही मनुष्य खुश रह सकता है. यथा लाभ संतोष’ यही तो है. साधु ने दीपक जलाया, चोर को बैठने के लिए आसन दिया, पानी दिया और एक पत्ते पर भुने हुए शकरकंद रख दिए।

साधु बाबा ने चोर को अपने पास में बैठा कर उसे इस तरह प्रेम से खिलाया, जैसे कोई माँ भूख से बिलखते अपने बच्चे को खिलाती है. उनके व्यवहार से चोर निहाल हो गया।
सोचने लगा- एक मैं हूं और एक ये बाबा है. मैं चोरी करने आया और ये प्यार से खिला रहे हैं! मनुष्य ये भी हैं और मैं भी हूं. यह भी सच कहा है- आदमी-आदमी में अंतर, कोई हीरा कोई कंकर. मैं तो इनके सामने कंकर से भी बदतर हूं।

मनुष्य में बुरी के साथ भली वृत्तियाँ भी रहती हैं जो समय पाकर जाग उठती हैं. जैसे उचित खाद-पानी पाकर बीज पनप जाता है, वैसे ही संत का संग पाकर मनुष्य की सदवृत्तियाँ लहलहा उठती हैं. चोर के मन के सारे कुसंस्कार हवा हो गए। उसे संत के दर्शन, सान्निध्य और अमृत वर्षा सी दृष्टि का लाभ मिला. तुलसी दास जी ने कहा है-

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।।

साधु की संगति पाकर आधे घंटे के संत समागम से चोर के कितने ही मलिन संस्कार नष्ट हो गये. साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने को उसका मन उतावला हो उठा।
फिर उसे लगा कि ‘साधु बाबा को पता चलेगा कि मैं चोरी की नियत से आया था तो उनकी नजर में मेरी क्या इज्जत रह जायेगी! क्या सोचेंगे बाबा कि कैसा पतित प्राणी है, जो मुझ संत के यहाँ चोरी करने आया!

लेकिन फिर सोचा, ‘साधु मन में चाहे जो समझें, मैं तो इनके सामने अपना अपराध स्वीकार करके प्रायश्चित करूँगा. दयालु महापुरुष हैं, ये मेरा अपराध अवश्य क्षमा कर देंगे. संत के सामने प्रायश्चित करने से सारे पाप जलकर राख हो जाते हैं।

भोजन पूरा होने के बाद साधु ने कहा- बेटा ! अब इतनी रात में तुम कहाँ जाओगे. मेरे पास एक चटाई है. इसे ले लो और आराम से यहीं कहीं डालकर सो जाओ. सुबह चले जाना। नेकी की मार से चोर दबा जा रहा था. वह साधु के पैरों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा. साधु समझ न सके कि यह क्या हुआ! साधु ने उसे प्रेमपूर्वक उठाया, प्रेम से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- बेटा ! क्या हुआ?

रोते-रोते चोर का गला रूँध गया. उसने बड़ी कठिनाई से अपने को संभालकर कहा-महाराज ! मैं बड़ा अपराधी हूं. साधु बोले- भगवान सबके अपराध क्षमा करने वाले हैं. शरण में आने से बड़े-से-बड़ा अपराध क्षमा कर देते हैं. उन्हीं की शरण में जा।

चोर बोला-मैंने बड़ी चोरियां की हैं. आज भी मैं भूख से व्याकुल आपके यहां चोरी करने आया था पर आपके प्रेम ने मेरा जीवन ही पलट दिया. आज मैं कसम खाता हूँ कि आगे कभी चोरी नहीं करूँगा. मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।

साधु के प्रेम के जादू ने चोर को साधु बना दिया. उसने अपना पूरा जीवन उन साधु के चरणों में सदा के समर्पित करके जीवन को परमात्मा को पाने के रास्ते लगा दिया। महापुरुषों की सीख है, सबसे आत्मवत व्यवहार करें क्योंकि सुखी जीवन के लिए निःस्वार्थ प्रेम ही असली खुराक है. संसार इसी की भूख से मर रहा है. अपने हृदय के आत्मिक प्रेम को हृदय में ही मत छिपा रखो।

प्रेम और स्नेह को उदारता से खर्च करो. जगत का बहुत-सा दुःख दूर हो जाएगा. भटके हुए व्यक्ति को अपनाकर ही मार्ग पर लाया जा सकता है, दुत्कार कर नहीं।

👉 सुख-दुख में समभाव रखिए! (भाग १)

सुख और दुख जीवन के दो विशिष्ट पहलू हैं, जिस पर भारतीय मुनियों ने बहुत गंभीर चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सूख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महापुरुषों के अतिरिक्त किसी को हो नहीं पाती, यह विश्व का सबसे महान आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तल स्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुख हैं क्या बला? और उसकी प्राप्ति का, अनुभूति का, कारण क्या है? उन्होंने इसी एक प्रश्न पर जीवन को समर्पित कर दिया कि समस्त दुखों के विनाश एवं आनन्द की अनुभूति का मार्ग क्या है?

उनकी विचारधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुख या सुख समझते हैं, यह मिथ्या कल्पना जन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर उन्होंने ऐसे ऐसे मार्ग खोज निकाले जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके।

साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

भौतिक विचारधारा से आध्यात्मिक विचारधारा की भिन्नता यहाँ अत्यंत स्पष्ट हो जाती है। भौतिक दृष्टिवाला बाहरी निमित्तों पर जोर देगा। तब आध्यात्मिक दृष्टिवाला अपनी आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता चला जायगा। उसकी दृष्टि इतनी सतेज हो जायेगी कि बाहरी पर्दे के भीतर क्या है? उसे भली भाँति देख सके और ऐसा होने पर वह मूल वस्तु को पकड़ने का प्रयत्न करेगा। दृष्टाँत के लिए दो व्यक्ति एक स्थान पर पास-पास ही बैठे हुए हैं। अचानक कहीं से उनके मस्तक पर पत्थर आ गिरे। इससे भ्रान्ति में पड़कर एक तो पत्थर को दोषी मानकर उसे हाथ में लेकर उसे पछाड़ा कि उसके खंड-खंड हो गए। दूसरे ने पत्थर पर रोष न कर वह कहाँ से आया, किसने फेंका, क्यों फेंका इत्यादि पर गंभीरता से विचार करके और मुख्यतः दोष जिसका हो, ज्ञात कर उसके शोधन में प्रगति की, दोनों व्यक्तियों के यद्यपि पत्थर लगने की क्रिया एक सी हुई, पर दृष्टि की गहराई के भेद-भावों में व फल में रात-दिन का अन्तर हो गया।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 16

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 3)

Q.3. What are the rules to be followed after taking Diksha?

Ans. After initiation, the devotee is expected to maintain  regularity in daily routine of worship (Upasana), a persistent endeavour for developing purity in thoughts words and deeds by studying scriptures and interacting with saintly persons (Sadhana) and by donating a part of one’s time and resources for welfare activities (Aradhana). Strict adherence to the routine of Upasana - Sadhana - Aradhana is essential. Nevertheless, if there are some momentary disruptions because of contingencies, one should not have any misgivings about divine displeasure, because God, like mother, is full of love, patience and forgiveness.

Though certain restrictions on diet (such as vegetarianism and abstention from hard drinks) are recommended for accelerating progress in Sadhana, these are not mandatory for the beginner. The devotee has free choice of time and period of Upasana to suit his / her routine.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 81

👉 वामन

वामन का मतलब होता है बौना, यानि कि छोटा। वामन वही नहीं होते जिनकी लम्बाई कम होती है। वामन वे भी होते हैं, जिनके व्यक्तित्व की ऊँचाई कम होती है। जिनके मन-अन्तःकरण छल-कपट से भरे होते हैं। जिनकी भावनाएँ दूषित-कलुषित होती हैं। ऐसे लोग भले कितने बुद्धिमान, तर्ककुशल व साधन सम्पन्न हों, भले ही उनके पास कितनी ही अलौकिक शक्तियाँ- सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ-निधियाँ क्यों न हों? परन्तु अपने छल-कपट के कारण, भावों की अशुद्धि के कारण उन्हें सदा ही वामन कहा और समझा जाता है। इसके विपरीत शुद्ध अन्तःकरण, छल-प्रपंच से दूर, निष्कलुष हृदय वाले व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से सदा विराट् होते हैं। तीनों लोकों में उनकी ख्याति होती है। स्वयं परमेश्वर भी उनकी सराहना करते हैं।
  
पुराणों में कथा है- जब स्वयं भगवान् अपने छल के कारण विराट् होने पर भी वामन कहे गये। इस रोचक कथा प्रसंग में वर्णन है कि स्वयं भगवान् विष्णु को परम धर्मात्मा बलि के पास याचक बनकर वामन के रूप में जाना पड़ा। धर्म परायण दैत्य राजा बलि ने भोग-विलास में डूबे रहने वाले स्वर्गाधिपति इन्द्र को पराजित कर देव व्यवस्था संभाल ली। स्वर्गाधिपति हो जाने के बाद भी बलि सदा तप एवं यज्ञ में निरत रहते थे। उनकी रुचि सुशासन, विष्णु भक्ति एवं तप-यज्ञ में थी न कि भोगों में। देवगणों ने इन्द्र के साथ मिलकर भगवान् विष्णु से प्रार्थना कि- कृपा कर उन्हें देवलोक वापस दिलाएँ। इस प्रार्थना पर भगवान् को भारी असमंजस हुआ, क्योंकि धर्मपरायण-परमभक्त बलि से युद्ध करना सम्भव नहीं था।
  
आखिर उन्हें वामन का रूप धरना पड़ा। पाँच वर्ष के तेजस्वी ब्राह्मण के रूप में उन्होंने महाराज बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया। महाराज बलि एक पल में ही अपने आराध्य को पहचान गए। उन्होंने भक्ति भरे मन से कहा आज्ञा करें भगवन्! उत्तर में वामन बने विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी। बलि के हाँ कहते ही भगवान् वामन से विराट् हो गए। और उन्होंने दो पगों में स्वर्ग व धरती एवं तीसरे में स्वयं बलि को नाप लिया। देने वाले महाराज बलि अपना सर्वस्व देकर प्रसन्न थे। परन्तु भगवान् को अपने द्वारा किए छल पर क्षोभ था। उन्होंने बलि से कहा- वत्स इस अमिट दान के कारण तुम्हारी कीर्ति सदा अमर रहेगी। जबकि मेरे छल के कारण मुझ विराट को भी सदा याचक एवं वामन ही कहा जाएगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९१

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 2)

Q.2. Is Diksha necessary for Sadhana?

Ans. Aspiration for salvation is the birth right of all human beings. Scriptures say that in the biological kingdom created by God three phenomena are extremely rare. One - to be born as a human amongst the innumerable species of living beings; Two - a strong aspiration for salvation from bondage and three - the patronage of a spiritual preceptor and guardian (Guru). Coming in contact with a true Guru and a desire to be initiated are the greatest blessings of life.

The credibility of Guru, is however, the most significant aspect of “Dikcha”. According to scriptures the Guru must have four basic qualifications:
He must be:
(1) “Shrotiya” - i.e. not only well-versed in scriptures but also the one who knows their subtle secrets and has realized their true import in his life.
(2) “Vrijino” - with a spotless reputation; sinless.
(3) “Akamahata” - i.e. he should have no other motive except that of purely doing good to others. He should be an ocean of compassion - without any ulterior motive of name,  fame or any material gain.
(4) “Brammavittam” - The one who has himself realized God.

The Guru is not only a teacher. He transmits spirituality, by personal example. Thus, a grave risk is involved if one falls in the clutches of a fake Guru. If, because of ignorance, someone has taken a Dikcha earlier from an unqualified person, prudence demands seeking a true Guru for spiritual growth,  Such Gurus are, of course, rare now-a-day.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 1)

Q.1. Why is Gayatri Mantra regarded as Guru Mantra?

Ans. Every body knows that one can learn very well under the direct guidance of a capable teacher. This, however, does not mean that a person devoid of knowledge and character be accepted as Guru. Instead of accepting an illiterate person as teacher and suffer the consequences it is better to regard the scriptures or any rishi  or devatma as one’s Guru and for this purpose even a picture or an idol of the person concerned can be used.

All human beings are born through the same biological process as other animals. Man is, therefore, in no way different from other species of animal kingdom, until he takes the first step towards his spiritual evolution by way of initiation in Sadhana. This ceremony of initiation amongst the Hindus is known as the Upnayan Sanskar.  The newly initiated person is called a Dwij (i.e. born-again) in spiritual parlance.

Each Hindu is traditionally required to undergo Upnayan Sanskar. In course of this ritual, the subject is made to wear a Janeu (sacred thread) across the body on the left shoulder as a constant reminder to follow the disciplines of Gayatri in life, (The Christians wear the crucifix for a similar purpose). During the Upnayan ceremony, the Guru initiates the person concerned exclusively in Gayatri Mantra. This is why it is known as the Guru Mantra.          
Literally too, the word ‘Guru’ in Sanskrit means ‘Heavy’, ‘powerful’ or ‘significant’. Since, this Mantra has been  referred to in the scriptures as the very manifestation of omnipotence and omniscience of God it is justifiably called as Guru Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

👉 दीया

दीया- जड़ और चेतन का मिलन है। दीया की देह मिट्टी की है, परन्तु उसकी ज्योति में चैतन्यता का प्रकाश है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में भी एक दीया जलाया गया है। उसकी लौ सतत्-निरन्तर ऊपर उठ रही है। दीया की संरचना और संसाधन तो सांसारिक भूमि का भाग है। परन्तु उसकी लौ अनगिन जनों को प्रेरणा, प्रकाश व ऊर्जा देने के लिए लगातार ऊर्ध्वगामी बनी हुई है।
  
यह लौ विश्वविद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं की चेतना की भाँति है। जिन्होंने अपने प्राणों का स्नेह डाल यह दीया जलाया है। डिवाइन इण्डिया यूथ एसोशिएशन- (ष्ठढ्ढङ्घ्न) यही नाम है इस दीया का। इसकी देह मातृभूमि की मिट्टी से बनी है। युवाओं का प्राणबल-मनोबल एवं आत्मबल ही वह तेल है, जिसके बल यह दीया जला है। युवाओं का संकल्प ही इस दीये की बाती है। और इसकी ज्योति, वह तो युवाओं-युवतियों की आत्मचेतना है। जो अपने साहस, पराक्रम, सद्ज्ञान व सद्कर्म की प्रकाश किरणें बिखेर कर देश व विश्व के युवाओं का सत्पथ-सन्मार्ग प्रकाशित कर रही है।
  
संरचना और साधन की दृष्टि से आज यह दीया छोटा लग सकता है; परन्तु इसके अतिरिक्त भी इसमें बहुत कुछ है। और वह है विश्वविद्यालय की युवा चेतना। यह अग्नि शिखा ही इसका प्राण है। इसके निरन्तर ऊपर उठने की उत्सुकता ही इसकी आत्मा है। यह लौ है इसीलिए तो दीया- दीया है, अन्यथा तो सब मिट्टी है। यह लौ पूरी तरह से जल उठेगी तो युवा भारत में क्रान्ति घटित होना सुनिश्चित है। जिनका ध्यान अभी तक इसकी संरचना और साधनों पर है, वे इसके सत्य को न समझ सकेंगे। परन्तु जिन्हें इसकी ज्योति दिखाई दे रही है, वे अवश्य इसके द्वारा होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों को निहार सकेंगे। क्योंकि ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि तब युवाओं के इस संकल्प में युग देवता भगवान् महाकाल के संकल्प के दर्शन अवश्य होंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९०

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

👉 सज्जनता का सौन्दर्य

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 6)

Q.13. What  is the ideal ‘Bramhabhoj’ after completion of the ‘Anusthan’?

Ans. In an Anusthan the last ritual is ‘Brahmbhoj’ after Poornahuti in the Havan. Traditionally it requires feeding Brahmans or young maidens. Qualified, deserving Brahmans are not easily available, these days. Alternatively, maidens (who being symbolic of mother power of God the Matri Shakti, are fed to augment faith) are offered food, but at times they are not permitted by self-respecting parents to take food in a stranger’s house. Brahmbhoj has, thus, ceased to have relevance in the contemporary society.

Under these circumstances, Brahmdan i.e. ‘Dissemination of spiritual wisdom’ (Sadgyan) can truly serve the purpose of Brahmbhoj. For each Ahuti, one is recommended to donate one paisa (one hundredth of local currency) for Brahmdan and with this amount procure literature pertaining to ‘Yug Nirman’ (resurrection of moral values in the society) and distribute it to deserving persons. In this manner, one can sow seeds of spiritual wisdom in many hearts, the fruits of which are reaped by the readers and motivators alike.

Q.14. What should one do if some unfavourable unforeseen events occur during an Anusthan?


Ans. Under such circumstances one may discontinue the Sadhana, Jap etc. for the period and resume it later from the count of disruption. However, a mental recitation, without a rosary, is permissible in all circumstances.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 77

👉 विश्वविद्यालय

आँखें खुली हों तो पूरा जीवन ही विश्वविद्यालय है। जीवन का हर क्षण स्वयं में विश्व की कोई न कोई विद्या समेटे है। और फिर जिसे सीखने की ललक है, वह प्रत्येक व्यक्ति व प्रत्येक घटना से सीख लेता है। प्रकृति के आँगन में हो रही हर हलचल उसे कोई न कोई नयी सीख देती है। याद रहे कि जो इस तरह नहीं सीखता है, वह जीवन में कभी कुछ नहीं सीख पाता। महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहा करते थे, हर व्यक्ति जिससे मैं मिलता हूँ, किसी न किसी बात में मुझसे श्रेष्ठ है। वही मैं उससे सीखने की कोशिश करता हूँ।
  
उन्हीं के जीवन का एक प्रसंग है। वह किसी दूसरे देश में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में गए हुए थे। इस विश्वविद्यालय ने उनके लिए एक व्याख्यान माला का आयोजन किया था। उन्हें सुनने के लिए विभिन्न विषयों के विद्वान, राजनेता, उच्च पदाधिकारी सभी पधारे थे। एक दिन सायं वह अपने व्याख्यान को समाप्त कर घूमने के लिए निकले। राह में उन्होंने देखा, एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था। उस कुम्हार की कारीगरी उन्हें विलक्षण लगी। जीवन और जगत् के स्रष्टा की भाँति, वह भी एक नवीन सृष्टि गढ़ रहा था। आइन्स्टीन काफी देर तक खड़े रहकर उसका यह कौशल देखते रहे।
  
फिर उन्होंने उससे कहा- ईश्वर की खातिर मुझे भी अपना बनाया हुआ बर्तन देंगे क्या? उनके मुख से ईश्वर का नाम सुनकर वह कुम्हार चौंका। फिर उसके होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी। उसने अपने हाथ में लिया हुआ काम छोड़ दिया और अपने बनाए हुए बर्तनों में से एक सबसे सुन्दर बर्तन उठाया। उसे साफ करके बड़े ही सुन्दर ढंग से उसने आइन्स्टीन के हाथों में थमाया। कुम्हार का दिया बर्तन अपने हाथों में लेने के बाद उन महान् वैज्ञानिक ने उसे देने के लिए पैसे निकाले। परन्तु उस कुम्हार ने उन पैसों को लेने से इन्कार करते हुए कहा- महोदय! आपने तो ईश्वर की खातिर बर्तन देने को कहा था, पैसों की खातिर नहीं। आइन्स्टीन, अपनी मित्र मण्डली में हमेशा इस घटना का जिक्र करते हुए कहते थे, जो मैं कभी किसी विश्वविद्यालय में नहीं सीख सका, वह मुझे उस कुम्हार ने सिखा दिया। मैंने उससे निष्काम ईश्वर भक्ति सीखी। भला जीवन से बड़ा विश्वविद्यालय और कहाँ?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८९

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

Bhav Sarita- Album of Spiritual songs by Shraddey Shailbala Pandya (Jiji)



Title

👉 मन

भर्तृहरि सम्राट् थे। उन्होंने सब छोड़ दिया, छोड़-छाड़ जंगल चले गए। मन को यह बात जंची न होगी। मन को यह बात कभी नहीं जंचती। जंगल में बैठे हैं, वर्षों बीत गए हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे तरंगें शांत होती जा रही हैं। एक दिन सुबह ही आंख खोली, सुबह का सूरज निकला है, सामने ही राह जाती है--जिस चट्टान पर बैठे हैं, उसी के सामने से राह जाती है। उस राह पर एक बड़ा हीरा पड़ा है! बांध-बूंध के वर्षों में मन को किसी तरह बिठाया था--और मन दौड़ गया! और मन जब दौड़ता है तो कोई सूचना भी नहीं देता कि सावधान कि अब जाता हूं। वह तो चला ही जाता है तब पता चलता है। वह तो इतनी त्वरा से जाता है, इतनी तीव्रता से जाता है कि दुनिया में किसी और चीज की इतनी गति नहीं है जितनी मन की गति है। तुम्हें पता चले, चले, चले, तब तक तो वह काफी दूर निकल गया होता है।

शरीर तो वहीं बैठा रहा, लेकिन मन पहुंच गया हीरे के पास। मन ने तो हीरा उठा भी लिया। मन तो हीरे के साथ खेलने भी लगा। तुमने कहानियां तो पढ़ी हैं न शेखचिल्लियों की, वे सब कहानियां मन की कहानियां हैं। मन शेखचिल्ली है। और इस के पहले कि मन शरीर को भी उठा दे, दो घुड़सवार दोनों तरफ से आए, उन्होंने तलवारें खींच लीं। दोनों को हीरा दिखाई पड़ा, दोनों ने तलवारें हीरे के पास टेक दीं और कहा, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। भर्तृहरि का मन तो कहने लगा कि यह बात गलत है, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। मगर यह अभी मन में ही चल रहा है। और इसके पहले भर्तृहरि कुछ बोलें, वे तो तलवारें खिंच गईं। राजपूत थे। तलवारें एक-दूसरे की छाती में घुस गईं। दोनों लाशें गिर पड़ीं। हीरा अपनी जगह पड़ा है सो अपनी जगह पड़ा है।

लोग आते हैं और चले जाते हैं, हीरे अपनी जगह पड़े हैं अपनी ही जगह पड़े रह जाते हैं। लाशों का गिर जाना, लहू के फव्वारे फूट जाना, चारों तरफ खून बिखर जाना, हीरे का अपनी जगह ही पड़े रहना--होश आया भर्तृहरि को कि मैं यह क्या कर रहा था! वर्षों की साधना मिट्टी हो गई? मेरा मन तो भाग ही गया था, मैं तो खुद भी दावेदार हो गया था। मैं तो कहने ही जानेवाला था कि चुप, हीरे को पहले मैंने देखा है! तुम दोनों पीछे आए हो। हीरा मेरा है!

मगर इसके पहले कि कुछ कहते, उसके पहले ही यह घटना घट गई--दो लाशें गिर गईं। भर्तृहरि ने आंखें बंद कर लीं। सोचा कि हद हो गई, कितने हीरे घर छोड़ आया हूं जो इससे बड़े-बड़े थे! इस साधारण-से हीरे के लिए फिर लालच में आ गया। कुछ हुआ नहीं, बाहर कोई कृत्य नहीं उठा, लेकिन मन के भीतर तो सब यात्रा हो गई।

जरूरी नहीं है कि तुम बाहर कुछ करो, मन तो भीतर ही सब कर लेता है। यह हो भी सकता है कि बाहर से कोई हिमालय गुफा में बैठा हो और मन सारे संसार की यात्राएं करता रहे। बाहर की गुफाओं से धोखे में मत पड़ जाना। असली सवाल मन का है। और यह भी हो सकता है कि कोई राजमहल में बैठा हो और मन कहीं न जाता हो।

बात बाहर की नहीं है; बात भीतर की है, बात मन की है। और मन बड़ा लोभी है। मन हर चीज में लोभ लगा लेता है। मन कहता है सब मेरा हो जाए। और यह लोभ उसका ऐसा है कि ज़रा-ज़रा से स्वाद के पीछे जहर भी गटक जाता है।

👉 आत्मोपदेश सरल है


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 5)

Q.10. What is the significance of Havan (Yagya) in an Anusthan?

Ans. Jap and Havan are basic ingredients of an Anusthan. After initiation (Dikcha) the worshipper (Sadhak) makes a total surrender to Gayatri and Yagya (his spiritual parents), which are inseparable. Invocation of both is done through specified procedures during the Anusthan.

Q.11. What are the number of ‘Ahutis’ prescribed for various types of Anusthans?

Ans. In ancient times, it was convenient to oblate one tenth of the total number of Japs in the Havan in an  Anusthan. In the present circumstances, it is sufficient to offer one hundredth number of ‘Ahutis’. The number thus amounts to :-
  
(a) Small Anusthan - 240 Ahutis.  
(b) Medium Anusthan - 1250 Ahutis.
(c) Big Anusthan - 24000 Ahutis.    The number may however, be varied depending on circumstances.

Q.12. How are the number of Ahutis distributed during the Yagya (Havan) in course of Anusthans?  
Ans. Havan may either be performed each day or on the last day of the Anusthan. Oblations required each day are equal to the number of ‘malas’, (cycles of rosary) whereas on the last day the number of ‘Ahutis’ should be equal to one hundredth of the total number of Japs (recitation of Mantras).
                          
When more than one person participates in the Havan, the cumulative number (number of persons multiplied by number of Ahutis) is counted. (e.g. 100 Ahutis by 5 persons will be considered as 500 Ahutis; for 240 Ahutis 6 persons may offer together 40 ‘Ahutis’ each etc.).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 76

👉 सहनशक्ति

आज लोगों में सहनशक्ति बहुत कम होती जा रही है। आप भी ऐसा अनुभव करते होंगे, कि आज से 25/30 वर्ष पहले लोगों में जितनी सहनशक्ति, आपस में प्रेम, सहानुभूति,  सेवा, आदर सम्मान की भावना, त्याग तपस्या आदि थी, आज ये सब गुण उतने नहीं रहे। सबसे अधिक तो सहनशक्ति कम हुई है, जिसके बहुत से दुष्परिणाम लोगों को भोगने पड़ रहे हैं। छोटी-छोटी बात पर लोग गुस्सा करते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं, अभिमान करते हैं, नाराज हो जाते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि आपसी संबंध टूट जाते हैं। यह सब क्यों हो रहा है? संबंधों को ठीक से निभाना नहीं जानते।

और यह नहीं जानते कि कोई भी संबंध अच्छा तभी चल पाएगा, जब संबंध रखने वालों में परस्पर एक दूसरे के प्रति सद्भावना सहानुभूति तथा सहनशक्ति हो।

लोगों को देखिए, उनको समझिए, उनसे मिलिए, उनके गुण कर्म को जानने का प्रयास कीजिए, और सहानुभूति प्रेम सद्भावना पूर्वक उनके साथ संबंध निभाने की सहनशक्ति भी रखिए। तभी आप संबंधों की रक्षा कर पाएंगे और आपके जीवन की भी सुरक्षा हो पाएगी। 

👉 राष्ट्र धर्म

राष्ट्र हममें से हर एक के सम्मिलित अस्तित्त्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम हैं, कल थे और आने वाले कल में होंगे, सभी कुछ शामिल है। हम और हममे से हर एक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यों न हों? राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती हैं। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत, झर-झर कर बहते निर्झर, विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन, सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश विहार करने वाले पक्षी सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित हैं। प्रान्त, शहर, जातियाँ, बोलियाँ, भाषाएँ यहाँ तक कि रीति, रिवाज, धर्म, मजहब, आस्थाएँ, परम्पराएँ, राष्ट्र के ही अंग अवयव हैं।
  
राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नहीं है। भारतवासियों की एक ही पहचान है भारत देश, भारत मातरम्। हममें से हर एक का एक ही परिचय है- राष्ट्र ध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणों का गान है। हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परम्पराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक सार्थक और औचित्यपूर्ण हैं, जहाँ तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती हैं। जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में, राष्ट्र के उत्थान में सहायक हैं। राष्ट्र की अखण्डता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को न्यौछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है।
  
राष्ट्रधर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। यह हिन्दू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि सिख, मुस्लिम या ईसाई के लिए। यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कहीं अधिक है। इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है, राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदनशील होना, सजग होना, कर्त्तव्यनिष्ठ होना, राष्ट्रीय हितों के लिए, सुरक्षा व स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत् बलिदान करते रहना।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८८

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

👉 सच्चा सद्भाव

पुत्र की उम्र पचास को छूने लगी। पिता पुत्र को व्यापार में स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मन में चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी। पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभावमें किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर कर लेते, कभी भूखे सो जाते। जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवा का भाव था। उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिता के प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मन में दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया। वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्र को खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुर के गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुर को खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। जब पति को मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- ‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’ बहू बोली- ‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें’; इसके बिना मुझे कुछ संतोष नहीं है, बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आने पर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुप में मिले हो। तुम्हारे मन में कृतज्ञता का भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?

पत्नी के सद्भाव ने पतिकी निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्र पर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

परिवार के किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।

👉 सब कुछ आपके अंदर ही है।


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 4)

Q. 6. Does one himself benefit by doing Jap-Anusthan for others?

Ans. It is true that like helping the needy through one’s own resources, a person reaps spiritual benefits while performing Upasana-Tap for others (“Distant therapy”). The only condition is that it should be carried out to support a deserving cause. On the contrary, if divine powers are sought to further some misdeed, it becomes a sinful act. Purity of motive is, therefore, a pre-requisite for an Anusthan.

Q.7. Is acceptance of a donation or gift in cash or kind is permissible in lieu of an Anusthan done for others?
Ans. It is sanctioned to the extent of minimum amount for bare sustenance. Very little benefit accrues when an Anusthan is performed for others with an eye on deriving maximum personal benefit.

Q.8. What is the time of the day recommended for Jap during an Anusthan? Is it necessary to complete  Jap at a stretch?

Ans. Mornings are best suited. Otherwise, one may complete the count in instalments at different periods of the day.

Q.9. What to do if there is some irregularity during the Anusthan?


Ans. There should not be any apprehension about incurring any divine displeasure as a consequence of an unavoidable irregularity during the Anusthan. Nevertheless, it is advisable to seek protection of a competent Guru toward off possible disturbances and to take care of advertent or inadvertent errors. This service is also provided free from Shantikunj, Hardwar, Uttar Pradesh, India. One is advised to send details of personal introduction and time proposed for the Anusthan for receiving spiritual protection and rectification of errors through the power of Guru. It will doubly ensure success of the Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 75

👉 जीवन सन्देश

मनुष्य की शक्ति अनन्त है। परन्तु यह अचरज भरे दुःख की बात है कि उसकी ये ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने की अन्तिम रात्रि आ जाती है, परन्तु इन शक्तियों का जागरण नहीं हो पाता। यदि कहीं कुछ होता भी है, तो बहुत थोड़ा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनन्त शक्तियों एवं असीमित सम्भावनाओं के बारे में सोचते भी नहीं। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममें से ज्यादातर लोग तो आधा-चौथाई ही जी पाते हैं। कोई-कोई तो अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ या फिर लाखवाँ हिस्सा ही जी पाते हैं। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधूरा ही हो पाता है। आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी जलती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।
  
इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनन्त-अनन्त शक्ति स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए जिन्हें अपने आप की पूर्णता अनुभव करनी है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं। जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही अपने विचारों को क्रिया रूप में परिणत करते रहते हैं। वे जो थोड़ा सा जानते हैं, उसका क्रियान्वयन करते हैं। बहुत ज्यादा जानने के लिए वे नहीं रुके रहते।
  
इस विधि से एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में अनन्त-अनन्त शक्ति का कुआँ खोद लेते हैं। जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनन्त शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। और उसकी अपनी पूर्ण सम्भावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्म शक्ति की अनन्तता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन सन्देश के स्वर यही कहते हैं- कि विचार पर ही मत रुके रहो। चलो और कुछ करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ़ चलना ज्यादा मूल्यवान् है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८३

👉 मधुमक्खी बनाम मक्खी-मच्छर प्रकृति

मधुमक्खी से उम्मीद करो कि वह पुष्प पर बैठेगी और उसका चयन करेगी। लेकिन मक्खी से से उम्मीद मत करो कि कचड़ा छोड़कर वह पुष्प चुनेगी, वह तो कचड़े पर ही बैठेगी। गाय व घोड़े साफ स्थान पर चारा चरेंगे व बैठेंगे। सुअर और भैंस से उम्मीद मत करो कि वह कीचड़ में नहीं लौटेंगे।

तुम्हारे भाषण व ज्ञान देने से मक्खी, सुअर व भैस कचड़ा व कीचड़ नहीं छोड़ेंगे। जैसे भगवान कृष्ण के ज्ञान देने से दुर्योधन ने अधर्म नहीं छोड़ा।

अतः इसीप्रकार अपने मक्खी, सुअर, भैंस की प्रवृत्ति के पड़ोसी, रिश्तेदार से यह उम्मीद मत करो कि वह तुम्हारी निंदा, चुगली नहीं करेंगे और तुम पर अपशब्दों व तानों के कीचड़ नहीं फेंकेंगे। अतः उन्हें इग्नोर करें और अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

साथ ही स्वयं पर भी चेकलिस्ट लगाएं कि हम स्वयं मख्खी है या मधुमक्खी?  निंदा-चुगली का कचड़ा पसन्द है? या ध्यान-स्वाध्याय-भजन-सत्संग का पुष्प?

मक्खी रोग उत्तपन्न करती है और मधुमक्खी मीठा शहद उतपन्न करती है। स्वयं के व्यवहार व स्वभाव की चेकलिस्ट चेक कीजिये कि आपका शहद से मीठा व्यवहार है या  कड़वा, दुःख-विषाद व रोग उतपन्न करने वाला मक्खी-मच्छर सा व्यवहार है?

यदि परिवर्तन चाहते तो परिवर्तन का हिस्सा बनो...स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

👉 कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माँहि!!

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता,तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। भगवान इससे दुखी हो गए थे।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं !! मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं,न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए।

गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।

भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।

इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं।"

वरुण देव बोले आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।

भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ?

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू !! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा। पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।

ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं,बाएं,आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा है।

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 3)

Q.5. Is it possible to have an Anusthan performed by someone else?

Ans. To get Jap performed by others on payment on one’s behalf amounts to purchasing labour and deriving advantage out of it. This earns no merit. There are some important tasks which require to be carried out by one’s own self. It becomes ridiculous if they are got done by others. Can a servant be appointed to study on one’s own behalf ? Can one entrust his sleep to someone else? Nobody appoints someone else to procreate children on his behalf. How can a disease be cured if a person other than the patient is paid and asked to take treatment on behalf of the patient? In the same way devotional worship of God has to be done in His proximity, attained by  the devotee in person. Self-discipline , penance or endurance are required to be practised and friendship is nurtured by a person himself. Physical exercise is also done by a person himself. The same norm applies to Sadhana.

As for as practicable, one should perform his or her own Anusthan, In specific cases of contingency it can be entrusted to a qualified Brahman. The term Brahman here needs an elaboration. In ancient times individuals considered Brahmans were scholars of the science of Brahma. They possessed a high level of upright character, lived a virtuous life with minimum means of sustenance  and comfort.

Now-a-days, it is difficult to find such Brahmans, who besides having been born in a Brahman family (by caste and heredity) and wearing traditional costumes of Brahmans of yore also have the credibility of Brahmanism in their character, behaviour and thoughts. It is very difficult to find a true Brahman from amongst hordes of hypocrites masquerading as Brahmans.

It is, therefore, recommended that if at all necessary, irrespective of caste and creed, Anusthan may be entrusted to such an individual of high character who has an infallible faith in God and is not desirous of any worldly gains of name, fame or material gain.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 73

👉 जीवन में सुख दुख

जीवन में सुख भी आते हैं, दुख भी आते हैं। सुख आने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, उछलता कूदता नाचता है। और जब दुख आता है, तो दहाड़ें मार-मार कर रोता भी है। ये सुख दुख भी अनेक स्तर के होते हैं।

पढ़ाई-लिखाई करने में, धन कमाने में, परिवार के पालन में, देश विदेश की यात्रा आदि कार्यों में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं। व्यक्ति इन सारे कष्टों को अच्छी प्रकार से सह लेता है, क्योंकि उसके सामने कुछ लक्ष्य होता है। अपनी उन्नति, परिवार का पालन करना, समाज को सुख देना, धर्म की रक्षा करना, देश की रक्षा करना इत्यादि कारणों से वह इन सारे दुखों को सह लेता है।

परंतु कभी-कभी जब जीवन में उसे धोखा खाना पड़ता है, विश्वासघात का सामना करना पड़ता है, और वह भी कोई अपना निकट का व्यक्ति ही उसे धोखा दे, तब जो उसको दुख होता है, उसे सहन करना बहुत कठिन पड़ता है।

कोई बात नहीं। यह संसार है। यहाँ सब कुछ होता है। अपने पराए सब लोग सुख भी देते  हैं, दुख भी देते हैं। जब भी कोई अपना निकट का व्यक्ति दुख देवे, धोखा देवे, विश्वासघात करे, तब भी आप विचलित न होवें, यही आपकी वीरता है।

उस समय कैसे उस दुख को सहन करें? कैसे धैर्य रखें? इस प्रश्न का उत्तर है, कि तब ऐसा सोचें, यह संसार अनित्य है। यहां सुख आता है, वह चला जाता है। दुख आता है, वह भी चला जाएगा।

इस प्रकार से सोचने से वह दुख आपको हल्का लगेगा। और फिर भी वह दुख  पूरा दूर न हो, तो उस दुख को, उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर, आप छोड़ देवें। और अपने मन में तीन शब्द बोलें, "ईश्वर न्याय करेगा। ऐसा सोचने से आपका दुख हल्का हो  जाएगा। आपका मन बुद्धि विचलित नहीं होगा। आप अपना जीवन ठीक प्रकार से चला पाएंगे।

👉 शान्ति

शान्ति में स्वतः ही समस्त सुखों का अनुभव होता है, जबकि अशान्ति के क्षणों में समूचा जीवन दुःखमय हो जाता है। अन्तर्मन में शान्ति प्रगाढ़ हो तो दुःखमय परिस्थितियाँ, बाहरी जीवन के सारे आघात मिलकर भी अन्तस में दुःख को अंकुरित नहीं कर पाते। लेकिन यदि अपना अन्तःकरण अशान्त हो, तो सुख साधन, बाह्य जगत् का सुखद व्यवहार सिमटकर भी मन को सुख का अनुभव नहीं दे पाते। यह सच निरन्तर अनुभव होने के बावजूद भी प्रायः सभी का मन इस बोध से वीरान रहता है। सत्य यही है कि अन्तरात्मा शान्ति चाहती है, परन्तु जो हम करते हैं, उससे अशान्ति ही बढ़ती है। याद रहे कि अशान्ति की जड़ महत्त्वाकांक्षा है, जिसे शान्ति की चाहत है, उसे महत्त्वाकांक्षा छोड़नी पड़ेगी। क्योंकि शान्ति का प्रारम्भ वहाँ से होता है, जहाँ से महत्त्वाकांक्षा समाप्त होती है।
  
सन्त इमर्सन ने लिखा है- ‘युवावस्था में मेरे अनेकों सपने थे। उन्हीं दिनों मैंने एक सूची बनायी थी कि जीवन में मुझे क्या-क्या पाना है। इस सूची में वे सारी चीजें थीं, जिन्हें पाकर मैं धन्य होना चाहता था। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सुयश, सम्पत्ति, सुख इसमें सभी कुछ था। इस सूची को लेकर मैं बुजुर्ग सन्त थॉरो के पास गया। और उनसे कहा क्या मेरी इस सूची में जीवन की सभी उपलब्धियाँ नहीं आ जाती हैं? उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना और उनकी आँखों में हँसी की चमक गहरी हो उठी। उनके होंठ मुस्करा उठे और वे बोले- मेरे बेटे! तुम्हारी यह सूची बड़ी सुन्दर है। बहुत विचारपूर्वक तुमने इसे बनाया है। फिर भी तुमने इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात छोड़ दी है, जिसके बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। मैंने पूछा- वह क्या है? उत्तर में उन वृद्ध अनुभवी सन्त ने मेरी सम्पूर्ण सूची को बुरी तरह से काट दिया। और उसकी जगह उन्होंने केवल एक शब्द लिखा- शान्ति।

यह शान्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह तो स्वयं का ही एक ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में अन्तःकरण में शान्ति की मधुर सरगम प्रवाहित होती रहे। यह विचार की नहीं अनुभव की अवस्था है। यह कोई रिक्त, खाली, खोखली मनःस्थिति नहीं है, बल्कि अन्तर्मन के सकारात्मक संगीत की मुधरता है

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

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