शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६६)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा की प्रथम कक्षा- रेकी

प्राण चिकित्सा ऋषि भूमि भारत की प्राचीन परम्परा है। वेदों, उपनिषदों एवं पुराण कथाओं में इससे सम्बन्धित कई कथानक पढ़ने को मिलते हैं। तप व योग की अनेकों ऐसी रहस्यमय प्रक्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा विश्वव्यापी प्राण ऊर्जा से अपना सम्पर्क बनाया जा सकता है। इन प्रक्रियाओं द्वारा इस प्राण ऊर्जा को पहले स्वयं ग्रहण करके फिर इच्छित व्यक्ति में इसे सम्प्रेषित किया जाता है। फिर यह व्यक्ति दूर हो अथवा पास इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। प्राण विद्या का यही रूप इन दिनों ‘रेकी’ नाम से प्रचलन में है। रेकी जापानी भाषा का शब्द है। इसका मतलब है- विश्वव्यापी जीवनीशक्ति। रेकी शब्द में ‘रे’ अक्षर का अर्थ है विश्वव्यापी तथा ‘की’ का मतलब है जीवनीशक्ति। यह विश्वव्यापी जीवनीशक्ति समस्त सृष्टि में समायी है। सही रीति से इसके नियोजन एवं सम्प्रेषण के द्वारा विभिन्न रोगों का उपचार किया जा सकता है।

प्राण चिकित्सा की प्राचीन विधि को नवजीवित करने का श्रेय जापान के डॉ. मेकाओ उशी को है। डॉ. मेकाओ उशी जापान के क्योटो शहर में ईसाई विद्यालय के प्रधान थे। एक बार उनके एक विद्यार्थी ने उनसे सवाल किया कि ईसामसीह जिस प्रकार किसी को छूकर किसी रोगी को रोगमुक्त कर देते थे वैसा आजकल क्यों नहीं होता है? क्या आप वैसा कर सकते हैं? डॉ. उशी इस सवाल का उस समय कोई जवाब नहीं दे सके, लेकिन उन्हें यह बात लग गई। वे इस विधि की खोज में अमेरिका के शहर शिकागो पहुँचे, वहाँ उन्होंने अध्यात्म विद्या में डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की। किन्तु अनेकों ईसाई एवं चीनी ग्रंथों के पन्ने पलटने के बावजूद उन्हें इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद वे उत्तर भारत आये, यहाँ उन्हें कतिपय संस्कृत ग्रंथों में कुछ संकेत मिले।

इन सूत्रों व संकेतों के आधार पर साधना करने के लिए डॉ. उशी अपने शहर से १६ मील दूर स्थित कुरीयामा नाम की एक पहाड़ी पर गये। यहाँ इन्होंने अपनी आध्यात्मिक साधना की। इस एकान्त स्थान पर २१ दिन का उपवास रखकर ये तप साधना में लग गये। साथ ही उन संस्कृत मंत्रों का जप भी करते रहे। बीस दिनों तक इनको कोई खास अनुभूति नहीं हुई। लेकिन इक्कीसवाँ दिन इन्हें एक तेज प्रकाश पुञ्ज तीव्र गति से उनकी ओर बढ़ता हुआ दिखाई दिया। यह प्रकाश पुञ्ज ज्यों- ज्यों उनकी ओर बढ़ता था, त्यों- त्यों बड़ा होता जाता था। अन्त में वह उनके सिर के मध्य में टकराया। इन्होंने सोचा कि अब तो मरना निश्चित है। फिर अचानक उन्हें विस्फोट के साथ आकाश में कई रंगों वाले लाखों चमकीले सितारे दिखाई दिये। तथा एक श्वेत प्रकाश में उन्हें वे संस्कृत के श्लोक दिखाई दिये, जिनका वे जप करते थे। यहीं से उन्हें विश्वव्यापी प्राण ऊर्जा के उपयोग की विधि प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने रेकी का नाम दिया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९१

👉 जैसी आपकी सोच, वैसे आपके कर्म

समय बड़ा विचित्र है न ये समय।  कहा जाय तो एक भाव है, एक संख्या है, एक विषय है, अब देखिये न, सूर्योदय सबका एक साथ होता है, है न? किसी का आगे किसी का पीछे तो नहीं होता न? सूर्यास्त भी सबका एक साथ होता है? अब सोचिये यही समय सबके लिये भिन्न-भिन्न है। किसी के लिये यही समय अच्छा है, तो किसी के लिये यही समय बुरा है। अभी इसी क्षण किसी के मुख पर सफलता का तेज है, तो किसी के मुख पर असफलता की निराशा। भला ऐसा क्यों ? क्यों ये समय किसी के लिये श्रेष्ठ है, क्यों ये समय किसी को निराश कर रहा है? इसका उत्तर है, आपकी सोच, आपके कर्म। जैसी आपकी सोच, जैसे आपके कर्म। उसी  के अनुरूप होगा आपका ये सब।

आपके जीवन में सुख तभी मिलेगा जब आप किसी के जीवन में आशा की मुस्कान ला दो। आपको प्रसन्नता तभी मिलेगी, जब जीवन में आप किसी को प्रसन्न कर दो। हाँ ये हर बार नहीं कि आप किसी को प्रसन्नता दे पाओ। किन्तु ये तो आपके वश में है कि किसी को आप दुःख न पहुँचाओ, आप किसी को नाराज न करो? और आपका ये किसी को दुःख न पहुँचाने का प्रयास भी आपका कर्म ही तो है, और आपको इस शुभकर्म का फल प्रकृति आपको अवश्य देगी। स्मरण रखियेगा अच्छा समय उसी का आता है,  जो कभी किसी का बुरा न चाहे।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

👉 मूर्ख कौन?

ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था। वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था। रोज सुबह उठकर पूजा- पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था। उसके बाद वह दुकान में काम करने  जाता। दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।

बाकी के समय में वह साधु- संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु- संग एवं दान-पुण्य करता। व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते। लोग कहतेः  "यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है। फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है। सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा- पाठ में गँवा देता है। यह तो पागल ही है।"

एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया। उसने एक लाल टोपी बनायी थी। नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः  "यह टोपी मूर्खों के लिए है। तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा, इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ। इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।"

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया। एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे। नगरसेठ ने कहाः "भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।"

ज्ञानचंद ने पूछाः   "कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो? वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं? आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा कि नहीं?"

"भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है। कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है ।आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।"

सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः "आप ही इसे पहनो।"

नगरसेठः  "क्यों?"

ज्ञानचंदः  "मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा, भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे बरबाद कर दी?"

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 12 Sep 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 12 Sep 2019


👉 अंडा खाइये और लकवा बुलाइये

इधर मूर्ख नेताओं वाले देश भारतवर्ष में तृतीय पंचवर्षीय योजना देश भर में मुर्गी पालन और अण्डा उत्पादन का अभियान चला रही थी उधर फ्लोरिडा अमेरिका का कृषि विभाग ‘अण्डों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है’ उसकी शोध और परीक्षण कर रहा है। अट्ठारह महीनों के परीक्षण के बाद 1967 की हेल्थ बुलेटिन ने बताया- अण्डों में डी.डी.टी. विष पाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक है।

कैलीफोर्निया के विश्व विख्यात डॉ. कैथेराइन निम्मो डी.सी.आर.एन. तथा डॉ. जे. एमन विल्किन्ज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में बताया-एक अण्डे में लगभग 4 ग्रेन ‘केले स्टरोल’ नामक अत्यन्त विषैला तत्व पाया जाता है। यह विष हृदय रोगों का मुख्य कारण है। इतनी सी मात्रा से ही हाई ब्लडप्रेशर, पित्ताशय में पथरी, गुर्दों की बीमारी तथा रक्त में जाने वाली धमनियों में घाव हो जाते हैं ‘इस स्थिति में अण्डों से स्वास्थ्य की बात सोचना मूर्खता ही है।’

इन डाक्टरों की यह रिपोर्ट पढ़कर विश्वभर के डॉक्टर चौंके और तब सारे संसार की प्रयोगशालाओं में परीक्षण होने लगे। उन परीक्षणों में न केवल उपरोक्त तथ्य पुष्ट हुये वरन् कुछ नई जानकारियाँ मिलीं जो इनसे भी भयंकर थीं।

उदाहरण के लिये इंग्लैंड के डॉ. राबर्ट ग्रास, इविंग डैविडसन तथा प्रोफेसर ओकड़ा ने कुछ पेट के बीमारों का- अण्डे खाने और अण्डे खाना छोड़ देने इन, दोनों परिस्थितियों में परीक्षण किया और पाया कि जब तक वे मरीज अण्डे खाते रहे तब तक उनका पाचन बिगड़ा रहा, पेचिश हुआ और ट्यूबर कुलैसिस बैक्टीरिया (टी.बी.) जन्म लेता दिखाई दिया।’

अमेरिका के डॉ. ई.वी.एम.सी. कालम ने तो इन तथ्यों का विधिवत प्रचार किया उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यूअर नॉलेज आफ न्यूट्रिन पेज 171 में लिखा है’ अण्डों में कार्बोहाइड्रेट्स तथा कैल्शियम की कमी होती है। अतः यह पेट में सड़ाँद उत्पन्न करते हैं, यह सड़न ही अपच, मन्दाग्नि और अनेक रोगों के रूप में फूटती है साथ ही स्वभाव में चिड़चिड़ापन- थोड़े में क्रुद्ध हो जाना जैसी बुराइयाँ उत्पन्न करता है।

‘दि नेचर ऑफ डिसीज’ पत्रिका के द्वितीय वाल्यूम पेज 194 में चेतावनी देते हुए डॉ. जे.ई.आर.एम.सी. डोनाह एफ.आर.सी.पी. (इंग्लैंड) लिखते हैं- ‘कैसा पागलपन है कि जो अंडा आँतों में विष और घाव उत्पन्न करता है आज उन्हीं अण्डों की उपज में वृद्धि करने की व्यावसायिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं।’

धार्मिक आध्यात्मिक और जीव दया जैसी अत्यधिक आवश्यक बातें उपेक्षित भी की जा सकती हैं पर क्या इन डाक्टरी निष्कर्षों को भी ठुकराया जा सकता है। अण्डा किसी भी अर्थ में स्वास्थ्य वर्धक नहीं। इंग्लैण्ड के डॉ. आर. जे. विलियम्स का कथन है आज जो लोग अण्डे खाकर स्वस्थ होने की कल्पना करते हैं वहीं कल जब एक्जिमा और लकवे जैसे भयंकर रोग से शिकार होंगे- तब पश्चाताप करेंगे कि घास की रोटी खा लेती तो अच्छा था अण्डा खाकर आत्मघात जैसा दुर्भाग्य तो सिर पर न पड़ता।

📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ ३१
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.31

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६५)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

प्राणायाम के अलावा बन्ध हठयोग की अन्य महत्त्वपूर्ण विधि है। इसे अन्तः शारीरिक प्रक्रिया कहा गया है। इनके अभ्यास से व्यक्ति शरीर के विभिन्न अंगों तथा नाड़ियों को नियंत्रित करने में समर्थ होता है। इनके द्वारा शरीर के आन्तरिक अंगों की मालिश होती है। रक्त का जमाव दूर होता है। इन शारीरिक प्रभावों के साथ बन्ध सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त विचारों एवं आत्मिक तरंगों को प्रभावित कर चक्रों पर सूक्ष्म प्रभाव डालते हैं। यहाँ तक कि यदि इन का अभ्यास विधिपूर्वक जारी रखा जाय तो सुषुम्रा नाड़ी में प्राण के स्वतन्त्र प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाली ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि व रुद्रग्रन्थि खुल जाती है और आध्यात्मिक विकास का पथ प्रशस्त होता है।

हठयोग की एक अन्य विधि के रूप में मुद्राएँ सूक्ष्म प्राण को प्रेरित, प्रभावित व नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाएँ हैं। इनमें से कई मुद्राएँ तो ऐसी हैं जिनके द्वारा अनैच्छिक शरीरगत प्रक्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। मुद्राओं का अभ्यास साधक को सूक्ष्म शरीर स्थित प्राण- शक्ति की तरंगों के प्रति जागरूक बनाता है। अभ्यास करने वाला इन शक्तियों पर चेतन रूप से नियंत्रण प्राप्त करता है। फलतः व्यक्ति अपने शरीर के किसी अंग में उसका प्रवाह ले जाने या अन्य व्यक्ति के शरीर में उसे पहुँचाने की क्षमता प्राप्त करता है।

हठयोग की ये सभी विधियाँ जीवन व्यापी प्राण के स्थूल व सूक्ष्म रूप को प्रेरित, प्रभावित, परिशोधित व नियंत्रित करती हैं। इनके प्रभाव से प्राण प्रवाह में आने वाले व्यतिक्रम या व्याघात को समाप्त किया जा सकता है। इसके लाभ अनगिनत है। ऐसे ही एक लाभ का उदाहरण हम यहाँ पर दे रहे हैं। जिनसे इन पंक्तियों के पाठक इन विधियों के महत्त्व को जान सकेंगे। उन दिनों यहाँ से एक योग विशेषज्ञ अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में गए थे। वहाँ उनका एक योग विषय पर व्याख्यान था। जिस विश्वविद्यालय में उन्हें व्याख्यान देना था, वहाँ उन दिनों विद्यार्थियों को द्रुत शिक्षण व प्रशिक्षण पर कुछ प्रयोग सम्पन्न किए जा रहे थे। इसे उन लोगों ने साल्ट नाम दिया था। साल्ट यानि कि सिस्टम ऑफ एक्सीलरेटेड लर्निंग् एण्ड ट्रेनिंग।

उस प्रयोग के दौरान जब बात होने लगी तो यहाँ पहुँचे योग विशेषज्ञ ने अपनी चर्चा में कहा, मस्तिष्क एवं मन की ग्रहणशीलता का सम्बन्ध श्वास से होता है। योग इस बात को स्वीकार करता है। इस बात को सुनते ही प्रयेागकर्त्ता वैज्ञानिक प्रसन्न हो गए और उन्होंने कहा, आप तो भारत से आए हैं क्यों नहीं हमारे विद्यार्थियों पर प्रयोग करते। इस बात ने एक लघुप्रयोग का सिलसिला जुटाया। आचार्य श्री द्वारा बताए गए प्राणायाम की सरलतम विधि प्राणाकर्षण प्राणायाम को विद्यार्थियों को सिखाया गया। और प्रयोग प्रारम्भ हो गया। एक महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। एक महीने के बाद पाया गया कि विद्यार्थियों की ग्रहणशीलता तीस से चालीस प्रतिशत तक बढ़ गयी। उनके तनाव, दुश्चिन्ता आदि भी समाप्त हुए। इस प्रयोग से वहाँ के वैज्ञानिक समुदाय को हठयोग की विधियों के महत्त्व का भान हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि इन विधियों का केन्द्रीभूत तत्त्व प्राण चिकित्सा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८९

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (अन्तिम भाग)

आत्मोन्नति के सम्बन्ध में विपरीत वृत्तियाँ आलस्य, प्रमाद अथवा असंयम आदि स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जाने पातीं। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं हैं। जिसे पढ़ना है और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ का पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अव्यवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कार्य करने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप में बड़े अच्छे ढंग से चला करता है। जिसने जीवन के क्षणों को इस प्रकार उपयोगिता पूर्वक नियम-बद्ध कर दिया है, उसका तो एक-एक क्षण तपस्या का ही समय माना जायेगा। जिसने जीवन में व्यवस्था एवं नियम बद्धता का अभ्यास कर लिया, उसने मानो अपने आत्म लक्ष्य के लिये एक सुन्दर नसेनी तैयार कर ली है, जिसके द्वारा वह सहज ही में ध्येय तक जा पहुँचेगा।

अनुभव सिद्ध विद्वानों ने स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ-प्रदर्शक बताया है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल विवेकानंद और बुद्धि कुण्ठित रहती है। इन समस्याओं के कारण उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता। इसीलिये तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य को यही अन्तिम उपदेश दिया करता था--

“स्वाध्यायात् मा प्रमद।”
अर्थात्- हे प्यारे शिष्य! अपने भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता ही है, साथ ही उस न कोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।

स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।

किन्तु इसमें पछताने की बात होते हुए भी अधिक चिन्ता की बात नहीं है। ऐसे लोग जो स्वयं पढ़-लिख नहीं सकते, उन्हें विद्वानों का सत्संग करके और दूसरों द्वारा सद्ग्रन्थों को पढ़वाकर सुनने अथवा उनके प्रवचन का लाभ उठाकर अपनी इस कमी की पूर्ति करते रहना चाहिये। जिनके घर पढ़े-लिखे बेटी-बेटे अथवा नाती-पोते हों, उन्हें चाहिये कि वे सन्ध्या समय उनको अपने पास बिठा कर सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने का अभ्यास हो जायेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह-के सिद्धान्त के अनुसार यदि स्वाध्याय में रुचि है और उसके महत्व का हृदयंगम कर लिया गया है तो शिक्षा अथवा अशिक्षा का कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24

शनिवार, 7 सितंबर 2019

Vyakti Nirmaan, Pariwaar Nirmaan Aur Samaj Nirmaan | Pt Shriram Sharma A...



Title

👉 सत्य की जीत

एक राज्य में एक अत्यंत न्यायप्रिय राजा था। वह अपने राज्य में सभी का ध्यान रखता था। वह वेष बदल कर अपने राज्य में भ्रमण करता था ,और अपने राज्य संचालन में निरन्तर सुधार का प्रयत्न करता रहता था। कई दिन उसने अपने राज्य में परेशानियां देखी। कुछ दिन बाद उसने अपने राज्य में एक कानून पारित किया कि -'यदि बाजार में किसी का सामान बेचने के बाद रह जाता है, और वह नही बिकता तो उसे राजा खरीद लेंगे।'
       
एक दिन की बात थी, एक चित्रकार की चित्र नही बिक रही थी। उस पर शनि देव की चित्र बनी थी। वह राजा के पास गया और राजा ने उसे खरीद लिया। उसने अपने राज महल में शनि देव की स्थापन करवाई। स्थापना के अगले दिन ही राजा के स्वप्न में लक्ष्मी जी आई। लक्ष्मी जी ने कहा -"राजन,आपने अपने महल में शनि देव की स्थापन करवाई है, मैं अब यहां नही रुक सकती, मैं अब यह से जा रही हूँ।  अगले दिन स्वप्न में धर्म आया उसने भी यही कहा और वहां से चल दिया। राजा मन ही मन परेशान हो गया उसके समझ में नही आ रहा था वह क्या करे?

अगले दिन पुनः उसके स्वप्न में सत्य आया उसने भी यही बात कही और जाने लगा, राजा ने अपने कथनानुसार सत्य जा पालन किया था। राजा ने उत्तर में कहा-'देव मैंने अपने कथनानुसार सत्य का पालन किया है, आप का जाना न्याय सांगत नही होगा।' राजा की यह बात यथार्थ थी और सत्य नही गया। कुछ दिनों बाद लक्ष्मी जी और धर्म पुनः वापस आ गए।
      
दोस्तों, आज के समय में सत्य बोलने का सबसे बड़ा फायदा यह है की आप के कहे गए वाक्यो को, आपको याद करने की आवश्यकता नही होती। सत्य हमे आत्मसम्मान दिलाता है, हमे अपनी ही दृष्टि में उच्च बनाता है।रात को जब हम निद्रा के लिए जाते है, तो अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। दोस्तों, सत्य का प्रयोग करके देखे उत्तर आप के सामने स्वतः ही आ जायेगा।

👉 कर्मफल हाथों-हाथ

अहंकार और अत्याचार संसार में आज तक किसी को बुरे कर्मफल से बचा न पाये। रावण का असुरत्व यों मिटा कि उसके सवा दो लाख सदस्यों के परिवार में दीपक जलाने वाला भी कोई न बचा। कंस, दुर्योधन, हिरण्यकशिपु की कहानियाँ पुरानी पड़ गयीं। हिटलर, सालाजार, चंगेज और सिकन्दर, नैपोलियन जैसे नर-संहारकों को किस प्रकार दुर्दिन देखने पड़े, उनके अन्त कितने भयंकर हुए, यह भी अब अतीत की गाथाओं में जा मिले हैं। नागासाकी पर बम गिराने वाले अमेरिकन वैमानिक फ्रेड ओलीपी और हिरोशिमा के विलेन (खलनायक) मेजर ईथरली का अन्त कितना बुरा हुआ, यह देखकर सुनकर सैंकड़ों लोगों ने अनुभव कर लिया कि संसार संरक्षक के बिना नहीं है। शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने वाला न रहता होता, तो संसार में आज जो भी कुछ चहल-पहल, हंसी खुशी दिखाई दे रही है, वह कभी की नष्ट हो चुकी होती।

इन पंक्तियों में लिखी जा रही कहानी एक ऐसे खलनायक की है जिसने अपने दुष्कर्मों का बुरा अन्त अभी-अभी कुछ दिन पहले ही भोगा है। जलियावाला हत्याकाँड की जब तक याद रहेगी तब तक जनरल डायर का डरावना चेहरा भारतीय प्रजा के मस्तिष्क से न उतरेगा। पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि डायर को भी अपनी करनी का फल वैसे ही मिला जैसे सहस्रबाहु, खर-दूषण, वृत्रासुर आदि को।

पंजाब में जन्मे, वहीं के अन्न और जल से पोषण पा कर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सिख धर्म में दीक्षित होकर भी जनरल डायर ने हजारों आत्माओं को निर्दोष पिसवा दिया था, उसे कौन नहीं जानता। इंग्लैंड उसकी कितनी ही प्रशंसा करता पर वह भगवान के दण्ड-विधान से उसी प्रकार नहीं बच सकता था, जैसे संसार का कोई भी व्यक्ति अपने किये हुए का फल भोगने से वंचित नहीं रहता। भगवान की हजार आँखें, हजार हाथ और कराल दाढ़ से छिपकर बचकर कोई जा नहीं सकता। जो जैसा करेगा, उसे वैसा भरना ही पड़ेगा। यह सनातन ईश्वरीय नीति कभी परिवर्तित न होगी।

हंटर कमेटी ने उसके कार्यों की सार्वजनिक निन्दा की, उससे उसका मन अशान्त हो उठा। तत्कालीन भारतीय सेनापति ने उसके किये हुए काम को बुरा ठहराकर त्यागपत्र देने का आदेश दिया। फलतः अच्छी खासी नौकरी हाथ से गई, पर इतने भर को नियति की विधि-व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आगे जो हुआ, प्रमाण तो वह है, जो यह बताता है कि करने के फल विलक्षण और रहस्यपूर्ण ढंग से मिलते हैं।

सन 1921 में जनरल डायर को पक्षाघात हो गया, उससे उसका आधा शरीर बेकार हो गया। प्रकृति इतने से ही सन्तुष्ट न हुई फिर उसे गठिया हो गया। उसके मित्र उसका साथ छोड़ गये। उसके संरक्षक माइकेल ओडायर की हत्या कर दी गई। उसे तो चलना-फिरना तक दूभर हो गया। ऐसी ही स्थिति में एक दिन उसके दिमाग की नस फट गई और लाख कोशिशों के बावजूद वह ठीक नहीं हुई। डायर सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर मर गया। अन्तिम शब्द उसके यह थे-

‘मनुष्य को परमात्मा ने यह जो जीवन दिया है, उसे बहुत सोच-समझ कर बिताने वाले ही व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, पर जो अपने को मुझ जैसा चतुर और अहंकारी मानते हैं, जो कुछ भी करते न डरते हैं न लजाते हैं, उनका क्या अन्त हो सकता है? यह किसी को जानना हो तो इन प्रस्तुत क्षणों में मुझसे जान ले।’

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६४)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

शारीरिक दृष्टि से देखें तो आसनों से शरीर की सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तःस्रावी ग्रन्थि प्रणाली नियंत्रित एवं सुव्यवस्थित होती है। परिणामतः सभी ग्रन्थियों से उचित मात्रा में रस का स्राव होने लगता है। ध्यान देने की बात यह भी हे कि मांसपेशियां, हड्डियाँ, स्नायु मण्डल, ग्रन्थिप्रणाली, श्वसन प्रणाली, उत्सर्जन प्रणाली, रक्त संचरण प्रणाली सभी एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। वे एक दूसरे के सहयोगी हैं। आसन के अनेक प्रकार शरीर को लचीला तथा परिवर्तित वातावरण के अनुकूल बनाने के योग्य बनाते हैं। इनके प्रभाव से पाचन क्रिया तीव्र हो जाती है। उचित मात्रा में पाचक रस तैयार होता है। अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तंत्रिका प्रणाली में सन्तुलन आ जाता है। फलस्वरूप इनके द्वारा बाहरी और आन्तरिक अंगों के कार्य ठीक ढंग से होने लगते हैं।

शरीर के साथ आसनों की क्रियाएँ मन को भी समर्थ व शक्तिशाली बनाती हैं। इनके प्रभाव से दृढ़ता व एकाग्रता की शक्ति विकसित होती है। यहां तक कि कठिनाइयाँ मानसिक शक्तियों के विकास का माध्यम बन जाती हैं। व्यक्ति में आत्मविश्वास आता है और वह औरों के लिए प्रेरणादायक बन जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आसनों के प्रभाव से शरीर शुद्ध होकर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं के लिए तैयार हो जाता है। यहाँ इस सच्चाई को स्वीकारने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं कि आसनों से कोई आध्यात्मिक अनुभव तो नहीं होते पर ये आध्यात्मिक अनुभवों को पाने में सहायक जरूर हैं।

प्राणायाम आसनों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म विधि है। यूं तो इसकी सारी प्रक्रियाएँ श्वसन के आरोह- अवरोह एवं इसके स्वैच्छिक नियंत्रण पर टिकी हैं। पर यथार्थ में यह विश्व व्यापी प्राण ऊर्जा से अपना सामञ्जस्य स्थापित करने की विधि है। आमतौर पर लोग इसे केवल अधिक आक्सीजन प्राप्त करने की प्रणाली के रूप में जानते हैं। किन्तु सत्य इससे भिन्न है। श्वसन के माध्यम से इसके द्वारा नाड़ियों, प्राण नलिकाओं एवं प्राण के प्रवाह पर व्यापक असर होता है। परिणामतः नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है तथा मौलिक और मानसिक स्थिरता प्राप्ति होती है। इसमें की जाने वाली कुम्भक प्रक्रिया द्वारा न केवल प्राण का नियंत्रण होता है, बल्कि मानसिक शक्तियों का भी विकास होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८८

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Sep 2019

★ गायत्री मंत्र में सम्स्त संसार को धारण, पोषण और अभिवर्द्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गई यह उपासना साधक की अंतश्चेतना में, उसके मन, अन्त:करण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं में सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भरती है। साधक जब इस महामंत्र के अर्थ पर विचार करता है तो वह समझ जाता है कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बडी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।  
 
□ ज्ञानवान, विवेकवान, और विद्वान बनने का साधन पुस्तकावलोकन ही है। पेट से कोई ज्ञानी नहीं होता वरन् परिस्थिति संगति एवं वातावरण में रहकर तदनुसार मनोभूमि का निर्माण होता है। जिस दिशा में हमें मस्तिष्क उन्नत करना है, उस दिशा में आगे बढे़ हुए विद्वानों का सत्संग उनकी पुस्तकों द्वारा ही हो सकता है। अत: स्वाध्याय की आदत डालिये।
 
◆ सच्ची नीति का नियम यह है कि हम जिस मार्ग को जाते हैं उसे ही ग्रहण करके न रह जायें। किन्तु जो मार्ग सच्चा है फिर चाहे हम उससे परिचित हों या न हों उसे ग्रहण करना ही चाहिए। मतलब यह है कि जब हम यह जान जायें कि फलाँ मार्ग सच्चा है तब हमें उस पर जाने के लिए निर्भय होकर जी तोड परिश्रम करना चाहिए। जब इस प्रकार नीति का पालन किया जा सकें तभी हम आगे बढ़ सकते हैं।

◇ हिन्दू धर्म आध्यात्म प्रधान रहा है। आध्यात्मिक जीवन उसका प्राण है। अध्यात्म के प्रति उत्सर्ग करना ही सर्वोपरि नहीं है, बल्कि पूर्ण शक्ति का उद्भव और उत्सर्ग दोनों की ही आध्यात्मिक जीवन में आवश्यकता है। कर्म करना और कर्म को चैतन्य के साथ मिला देना ही यज्ञमय जीवन है। यह यज्ञ जिस संस्कृति का आधार होगा, वह संस्कृति और संस्कृति को मानने वाली जाति हमेशा अमर रहेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Sep 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 7 Sep 2019



शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६३)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

हठयोग की विधियाँ जीवन के प्राण प्रवाह को सम्वर्धित , नियंत्रित व नियोजित करती हैं। अध्यात्म चिकित्सा के सभी विशेषज्ञ इस बारे में एक मत हैं कि प्राण प्रवाह में व्यतिक्रम या व्यतिरेक आने से देह रोगी होती है और मन अशान्त। इस असन्तुलन के कारण शारीरिक हो सकते हैं और मानसिक भी, पर परिणाम एक ही होता है कि हमारा विश्व व्यापी प्राणऊर्जा से सम्बन्ध दुर्बल या विच्छिन्न हो जाता है। यदि यह सम्बन्ध पुनः संवर सके और देह में प्राण फिर से सुचारू रूप से संचालित हो सके तो सभी रोगों को भगाकर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है। इतना ही नहीं प्राण प्रवाह के सम्वर्धन से देह को दीर्घजीवी व वज्रवत बनाया जा सकता है। नाड़ियाँ व स्नायु संस्थान के विद्युतीय प्रवाह अधिक प्रबल किए जा सकते हैं।

हठयोग की प्रक्रियाएँ आरोग्य व प्राण बल के सम्वर्धन की सुनिश्चित गारंटी देती है। क्योंकि इस विद्या के जानकारों को यह ज्ञान है कि यदि जीवन में प्राणों की दीवार अभेद्य है तो कोई भी रोग प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए इन प्रक्रियाओं का सारा जोर प्राणों के सम्वर्धन, परिशोधन व विकास पर है। हमारे जीवन में प्राण प्रवाह का स्थूल रूप श्वास है श्वास के आवागमन से देह में प्राण प्रवेश करते हैं और अंग- प्रत्यंग में विचरण करते हैं। आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्रा आदि प्रक्रियाओं के द्वारा इन पर नियंत्रण स्थापित करके इनके प्रवाह को अपनी इच्छित दिशा में मोड़ा जा सकता है। यही वजह है कि हठयोगी अपने स्वास्थ्य का स्वामी है। रोग उसके पास फटकते भी नहीं। किसी तरह की बीमारियाँ उसे प्रभावित नहीं कर पाती।

ये प्रभाव हठयोग की विधियों के हैं, जिनमें सबसे प्रारम्भिक विधि आसन है। शरीर के विभिन्न अंगों को मोड़- मरोड़ कर किए जाने वाले ये आसन अनेक हैं। और प्रत्यक्ष में ये किसी व्यायाम जैसे लगते हैं, किन्तु यथार्थता इससे भिन्न है। व्यायाम की प्रक्रियाएँ कोई भी हो, कैसी भी हो इनका प्रभाव केवल शरीर के प्रत्येक अवयव में प्राण को क्रियाशील करके उसे सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है। प्रभाव की दृष्टि से सोचें तो इनके प्रभाव शारीरिक होने के साथ मानसिक व आध्यात्मिक भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८७

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग ४)

स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।

चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।

उसी प्रकार रुचि-साम्य-संपर्क के सिद्धान्त के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४

बुधवार, 4 सितंबर 2019

👉 "मर्द"..आज के..

आज हमेंशा की तरह ट्रेन में कम भीड़ थी,पुष्पा ने खाली जगह पर अपना ऑफिस बैग रखा और खुद बगल में बैठ गई। पूरे डिब्बे में कुछ मर्दों के अलावा सिर्फ पुष्पा ही थी। रात का समय था सब उनींदे से सीट पर टेक लगाये या तो बतिया रहे थे या ऊंघ रहे थे।

अचानक डिब्बे में 3-4 तृतीय लिंगी तालियां बजाते हुए पहुंचे और मर्दों से 5-10 रूपये वसूलने लगे कुछ ने चुपचाप दे दिए और कुछ उनींदे से बड़बड़ाने लगे- क्या मौसी रात को तो छोड़ दिया करो ये हफ्ता वसूली... वह सभी पुष्पा की तरफ रुख न करते हुए सीधा आगे बढ़ गए, फिर ट्रेन कुछ देर रुकी और कुछ लड़के चढ़े, फिर दौड़ ली आगे की ओर।

पुष्पा की मंजिल अभी 1 घंटे के फासले पर थी वे 4-5 लड़के पुष्पा के नजदीक खड़े हो गए और उनमे से एक ने नीचे से उपर तक पुष्पा को ललचाई नजरो से देखा और बोला -मैडम अपना ये बैग तो उठा लो सीट बैठने के लिए है, सामान रखने के लिए नहीं।

साथी लड़कों ने वीभत्स हंसी से उसका साथ दिया, पुष्पा ने अपना बैग उठाया और सीट पर सिमट कर बैठ गई। वे सारे लड़के पुष्पा के बगल में आकर बैठ गए।

पुष्पा ने कातर नजरों से सामने बैठे 2-3 पुरुषों की ओर देखा पर वे ऐसा जाहिर करने लगे मानो पुष्पा का कोई अस्तित्व ही ना हो। तभी पास बैठे लड़के ने पुष्पा की बांह पर अपनी ऊंगली फेरी तो बाकी लड़कों ने फिर उसी वीभत्स हंसी से उसका उत्साहवर्धन किया।

ओ मिस्टर थोड़ा तमीज में रहिये- पुष्पा सीट से उठ खड़ी हुई और ऊंची आवाज में बोली। डिब्बे के सभी मर्द अब भी अपनी अपनी मोबाइल में विचरण कर रहे थे। किसी के मुंह से कुछ नहीं निकला।

अरे..अरे मैडम तो गुस्सा हो गईं,अरे बैठ जाइये मैडम आपकी और हमारी मंजिल अभी दूर है तब तक हम आपका मनोरंजन करते रहेंगे,कत्थई दांतों वाला लड़का पुष्पा का हाथ पकड़कर बोला।

डिब्बे की सारीं सीटों पर मानो पत्थर की मूर्तियां विराजमान थी। तभी...अरे तूं क्या मनोरंजन करेगा? हम करतें हैं तेरा मनोरंजन।

शबाना उठा रे लहंगा, ले इस चिकने को लहंगे में बड़ी जवानी चढ़ी है इसे। आय हाय मुंह तो देखो सुअरों का,कुतिया भी ना चाटे। इनके बदन में बड़ी मस्ती चढ़ी है,अरे वो जूली उतारो इनके कपड़े,पूरी मस्ती निकालते हैं इन कमीनों की।

जूली नाम का भयंकर डीलडौल वाला तृतीय लिंगी जब उन लड़कों की तरफ बढ़ा तो सभी लड़के डिब्बे के दरवाजे की ओर भाग निकले और धीमे चलती ट्रेन से बाहर कूद पड़े।
पुष्पा की भीगी आंखों ने अपनी सुरक्षा करने के लिए सिर झुकाकर उन सभी तृतीय लिगिंयों का अभिवादन किया और फिर नजर जब डिब्बे के कथित मर्दों की तरफ पड़ी जो अपनी आंखे झुकाएं अपनी मोबाइल में व्यस्त थे।

और असली मर्द तालियां बजाते आगे की ओर बढ़ गये।
कौन है असली मर्द??

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग ३)

एक वकालत में ही नहीं, किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में अध्ययन-शीलता एवं अध्ययन-हीनता का परिणाम एक जैसा ही होता है। इसमें चिर, नवीन अवस्था का कोई आपेक्ष नहीं होता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है जिसमें अपवाद के लिए कोई गुँजाइश नहीं है।

धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिये कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता, तीन-तीन घण्टे आसन लगाता, जाप करता अथवा कीर्तन में मग्न रहता। व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।

अध्ययन के अभाव में इस आत्म-जगत् में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त हुए बिना उनसे संपर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान् मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त हो सकना सम्भव है, जो अवतार रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन ध्यान, पूजा-पाठ तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिये, इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के दैविक तत्त्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके। इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 4 Sep 2019




👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 4 Sep 2019



👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६२)

👉 अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा

पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि श्री अरविन्द के शिष्य नलिनीकान्त गुप्त ने स्वाध्याय के बारे में अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कई मर्मिक बातें कही हैं। यहाँ ध्यान दिलाना आवश्यक है कि नलिनीकान्त अपनी सोलह वर्ष की आयु से लगातार श्री अरविन्द के पास रहे। श्री अरविन्द उन्हें अपनी अन्तरात्मा का साथी- सहचर बताते थे। वह लिखते हैं कि आश्रम में आने पर अन्यों की तरह मैं भी बहुत पढ़ा करता है। अनेक तरह के शास्त्र एवं अनेक तरह की पुस्तकें पढ़ना स्वभाव बन गया था। एक दिन श्री अरविन्द ने बुलाकर उनसे पूछा- इतना सब किसलिए पढ़ता था। उनके इस प्रश्र का सहसा कोई जवाब नलिनीकान्त को न सूझा। वह बस मौन रहे।

वातावरण की इस चुप्पी को तोड़ते हुए श्री अरविन्द बोले- देख पढ़ना बुरा नहीं है। पर यह पढ़ना दो तरह का होता है- एक बौद्धिक विकास के लिए, दूसरा मन- प्राण को स्वस्थ करने के लिए। इस दूसरे को स्वाध्याय कहते हैं और पहले को अध्ययन। तुम इतना अध्ययन करते हो सो ठीक है, पर स्वाध्याय भी किया करो। इसके लिए अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप किसी मन्त्र या विचार का चयन करो। और फिर उसके अनुरूप स्वयं को ढालने की साधना करो। नलिनीकान्त लिखते हैं, यह बात उस समय की है, जब श्री अरविन्द सावित्री पूरा कर रहे थे। मैंने इसी को अपने स्वाध्याय की चिकित्सा की औषधि बना लिया।

फिर मेरा नित्य का क्रम बन गया। सावित्री के एक पद को नींद से जगते ही प्रातःकाल पढ़ना और सोते समय तक प्रतिपल- प्रतिक्षण उस पर मनन करना। उसी के अनुसार साधना की दिशा- धारा तय करना। इसके बाद इस तय क्रम के अनुसार जीवन शैली- साधना शैली विकसित कर लेना। उनका यह स्वाध्याय क्रम इतना प्रगाढ़ हुआ कि बाद के दिनों में जब श्री अरविन्द से किसी ने पूछा- कि आपके और माताजी के बाद यहाँ साधना की दृष्टि से कौन है? तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- नलिनी। इतना कहकर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोले, ‘नलिनी इज़ इम्बॉडीमेण्ट ऑफ प्यूरिटी’ यानि कि नलिनी पवित्रता की मूर्ति है। नलिनी ने वह सब कुछ पा लिया है जो मैंने या माता जी ने पाया है। ऐसी उपलब्धियाँ हुई थीं स्वाध्याय चिकित्सा से नलिनीकान्त को। हालांकि वह कहा करते थे कि स्वस्थ जीवन के लिए शुरूआत अपनी स्थिति के अनुसार मन के स्थान पर तन से भी की जा सकती है। इसके लिए हठयोग की विधियाँ श्रेष्ठ हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८५

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Sep 2019

★ मानसिक रोगों का एक कारण मनोविज्ञानी आत्म केन्द्रित होना बताते हैं। व्यक्ति जितना आत्म केन्द्रित होगा उतनी ही मानस रोग एवं शारीरिक रोग की संभावना उसमें बढ़ जाएगी। संभवत: इस तथ्य से हमारे प्राचीन ऋषि परिचित रहे होंगे । इसलिए "आत्मवत सर्वभूतेषु" और "वसुधैव कुटुम्बकम्" जैसे सिद्धान्त-वाक्यों के पीछे उनका एक भाव व्यक्ति और सामाज को आत्मकेन्द्रित होने से बचाना भी होगा, ताकि स्वरुप मन और स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति और समाज की रचना की जा सके। 
 
□ पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से संसार में स्वार्थपरता की वृद्धि के साथ ही ईश्वर से विमुखता का भाव भी जोर पकड रहा था। अब कई बार ठोकरें खाने के बाद संसार को विशेष रुप से सबसे धनी और ऐश्वर्यशाली देशों को फिर से ईश्वर की याद आ रही है। केवल धन से ही सुख तथा शान्ति नहीं मिलती। इसके लिए चित्त की शुद्धता बिना विवेक के संभव नहीं और विवेक धर्म तथा ईश्वर के ज्ञान से ही उत्पन्न हो सकता है।
 
◆ मनुष्य चाहे समाज की दृष्टि से बचकर चुपचाप कोई पाप कर डाले, जंगल में छिपकर किसी की हत्या कर डाले, रात के घनघोर अन्धकार में पाप कर ले, लेकिन सर्वव्यापक परमात्मा की दिनरात, भीतर बाहर सब ओर देखने वाली असंख्य दृष्टियों से नहीं बच सकता। घर, बाहर, जंगल, समुद्र, आकाश, व्यवहार, व्यापार सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर है। आप की अलग कोई सत्ता नहीं है। आप स्वयं ही अपने अन्दर परमात्मा को बसाये हुए हैं।

◇ जिस प्रकार शरीर के रोग हैं उसी प्रकार मन के रोग भी हैं और वे मनुष्य की कल्पना से ही जन्म लेते हैं। जब मन में क्रोध होता है तो किसी से बदला लेने की इच्छा होती है। ईर्ष्या होती है तो मन अशान्त हो जाता है और मन दु:खी रहता है। अनेक लोग दुसरों को झूठ-मूँठ शत्रु अथवा प्रतियोगी समझकर दुख पाते हैं। जिस मनुष्य ने अपने जीवन में अनेक अत्याचार किये हैं वह भी मरने के समय उनकी स्मृति से अत्यन्त दु:ख को प्राप्त होता है। चुगलखोर के मन में एक प्रकार की खुजलाहट बनी रहती है जो उसके मन को सदैव अशान्त रखती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

Hriday Mandir Ke Andar Santosh हृदय-मंदिर के अंदर संतोष | Pt Shriram Sha...



Title

👉 झूठा अभिमान

एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की, और कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’

हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना, तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है । हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछ चाहती थी। हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सक रहा है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो।

सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये, स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें। धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो, ना की साधारण।

तुम मिट्टी से ही बने हो और फिर मिट्टी में मिल जाओगे, तुम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हो वरना तो तुम बस एक मिट्टी के पुतले हो और कुछ नहीं। अहंकार सदा इस तलाश में है–वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

याद रखना आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए अपना झूठा अहंकार छोड़ दो और सब का सम्मान करो क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा है।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६१)

👉 अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा

इस विधि के चार मुख्य बिन्दु है। इसके पहले क्रम में हम उन ग्रन्थों- विचारों का चयन करते हैं, जिन्हें स्व की अनुभूति से सम्पन्न महामानवों ने सृजित किया है। ध्यान रखें कोई भी पुस्तक या विचार स्वाध्याय की सामग्री नहीं बन सकता। इसके लिए जरूरी है कि यह पुस्तक या विचार किसी महान् तपस्वी अध्यात्मवेत्ता के द्वारा सृजित हो। इसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद् अथवा परम पूज्य गुरुदेव के द्वारा लिखित ग्रन्थों का चयन किया जा सकता है। इस चयन के बाद दूसरा चरण प्रारम्भ होता है। इस क्रम में हम इन महान् विचारों के परिप्रेक्ष्य में स्वयं को देखते हैं, ऑकलन करते हैं। इस सत्य पर विचार करते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या कर रहे हैं? क्या सोचना चाहिए और क्या सोच रहे हैं?

यह बड़ा ही महत्त्वपूर्ण क्रम है। इसी स्तर पर हम अपने स्वयं के चिन्तन तंत्र की विकृतियों व विकारों को पहचानते हैं। उनका भली प्रकार निदान करते हैं। गड़बड़ियाँ कहाँ है- और उनके प्रभाव कहाँ पड़ रहे हैं, आगे कहाँ पड़ने की उम्मीद है। इन सभी बातों पर विचार करते हैं। यह सच है कि निदान सही हो सका तो समाधान की नीति भी सही तय होती है। स्वाध्याय चिकित्सा का तीसरा मुख्य बिन्दु यही है। विचार, भावनाओं, विश्वास, आस्थाओं, मान्यताओं, आग्रहों से समन्वित अपने दृष्टिकोण को ठीक करने की नीति तय करना। इसकी पूरी प्रकिया को सुनिश्चित करना। हम कहाँ से प्रारम्भ करें और किस रीति से आगे बढ़ें। इसकी पूरी विधि- विज्ञान को इस क्रम में बनाना और तैयार करना पड़ता है।

इसके बाद चौथा बिन्दु है, इस विधि- विज्ञान के अनुसार व्यवहार। यानि कि स्वाध्याय को औषधि के रूप में ग्रहण करके स्वयं के परिष्कार का साहसिक कार्य। यह काम ऐसा है, जिसे जुझारू एवं संघर्षशील लोग ही कर पाते हैं। क्योंकि किसी सत्य की वैचारिक स्वीकारोक्ति कर लेना आसान है, पर उसके अनुसार जीवन जीने लगना कठिन है। इसमें आदतों एवं संस्कारों की अनेक बाधाएँ आती हैं। अहंकार अनगिन अवरोध खड़ा करता है। इन्हें दूर करने का एक ही उपाय है हमारी जुझारू एवं साहसिक वृत्ति। जो अपने अहंकार को अपने ही पाँवों के नीचे रौंदने का साहस करते हैं, उनसे बड़ा साहसी इस सृष्टि में और कोई नहीं। सचमुच ही जो अपने को जीतता है, वह महावीर होता है। स्वाध्याय की औषधि का सेवन करने वाले को ऐसा ही साहसी होना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८४

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग २)

नित्य ही तो न्यायालयों में देखा जा सकता है कि कोई एक वकील तो धारावाहिक रूप में बोलता और नियमों की व्याख्या करता जाता है और कोई टटोलकर भूलता याद करता हुआ सा कुछ थोड़ा-बहुत बोल पाता है। दोनों वकीलों ने एक समान ही कानून की परीक्षा पास की, उनके अध्ययन का समय भी बराबर रहा, पैसा और परिश्रम भी परीक्षा पास करने में लगभग एक सा ही लगाया और न्यायालयों में पक्ष प्रतिपादन का अधिकार भी समान रूप से ही मिला है- तब यह ध्यानाकर्षण अन्तर क्यों? इस अन्तर का अन्य कोई कारण नहीं एक ही अन्तर है और वह है स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायु-मण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेता है -वह निश्चय ही बिलाना। घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।

योंहीं अपनी पिछली योग्यता, स्मृति शक्ति के आधार पर पक्ष प्रतिपादन का असफल प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार के स्वाध्याय हीन वकील अथवा प्रोफेसर अपने काम में सफल नहीं हो पाते और प्रगति की दौड़ में पीछे पड़े हुये घिसटते रहते हैं। उनको अपने पेशे में कोई अभिरुचि नहीं रहती और शीघ्र ही वे उसे छोड़कर भाग जाने की सोचने लगते है।
ऐसे असफल न जाने कितने वकील एवं प्रोफेसर देखने को मिल सकते हैं, जो स्वाध्याय-हीनता के दोष के कारण अपना-अपना स्थान छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी में चले गये है। ऐसे विशाल एवं सम्मानित क्षेत्र को अपने अवांछनीय दोष के कारण भाग खड़ा होना मनुष्य के लिए बड़ी लज्जाप्रद असफलता है।

इतना ही नहीं वर्षों पुराने, अनुभवी और मजबूती से जमे हुए अनेक वकील प्रमाद के कारण नये-नये आये हुए वकीलों द्वारा उखाड़ फेंके जाते देखे जा सकते हैं। पुराने लोग अपने विगत स्वाध्याय, जमी प्रेक्टिस, प्रमाणित प्रतिभा और लम्बे अनुभव के अभिमान में आकर यह सोच कर दैनिक स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 3 Sep 2019


👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 3 Sep 2019

सोमवार, 2 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६०)

👉 अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा
स्वाध्याय चिकित्सा की उपयोगिता असाधारण है। इसके द्वारा पहले मन स्वस्थ होता है, फिर जीवन। चिकित्सा के सिद्धान्त एवं प्रयोगों के जो विशेषज्ञ हैं, उन सबका यही कहना है कि रोगी मन ही जीवन को रोगी बनाता है। यदि किसी तरह से मन को निरोग कर लिया जाय तो जीवन निरोग हो सकता है। बात सही भी है यदि हमारे सोच- विचार का तंत्र ही दूषित है तो उसके प्रभाव शारीरिक रोगों एवं व्यावहारिक गड़बड़ियों के रूप में क्यों न उभरेंगे। मानसिक आरोग्य की ओर ध्यान दिए बगैर शरीर को स्वस्थ करने की सोचना, या व्यावहारिक दोषों को ठीक करना, कुछ वैसा ही है, जैसे पत्तों को काटकर पेड़ की जड़ों को सींचते रहना। जब तक पेड़ की जड़ों को खाद- पानी मिलता रहेगा, पत्ते अपने आप ही हरे होते रहेंगे। इसी तरह से जब तक सोच- विचार के तंत्र में विकृति बनी रहेगी, शारीरिक व व्यावहारिक परेशानियाँ बनी रहेंगी।

सोच- विचार या बोध के तंत्र को निरोग करने की सार्थक प्रक्रिया स्वाध्याय से बढ़कर और कुछ नहीं है। लेकिन स्वाध्याय के इस गहरे अर्थ व प्रभाव से ज्यादातर लोग अपरिचित हैं। कुछ लोग तो स्वाध्याय को अध्ययन का पर्याय मान बैठते हैं। वे चाहे कुछ भी क्यों न पढ़ें उसे स्वाध्याय की संज्ञा देते हैं। जबकि इस तरह की पढ़ाई को मात्र अध्ययन कहा जा सकता है स्वाध्याय नहीं। अध्ययन केवल बौद्धिक विकास तक सीमित है, जबकि स्वाध्याय अपने बोध को संवारने की प्रक्रिया है। विशेषज्ञ हमारे बोध के दो आयाम बताते हैं। इनमें से पहला है बाह्य बोध या इन्द्रियों की सहायता से होने वाला बोध। दूसरा है आन्तरिक बोध यानि बौद्धिक विवेचन, विश्लेषण एवं आन्तरिक अनुभूतियों से होने वाला ज्ञान।

बोध के ये दोनों आयाम परस्पर गहरे में गुंथे हैं। जो इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं, बुद्धि उस पर विचार किए बिना नहीं रहती। इसी तरह से हमारी आन्तरिक सोच में जो विचार, भावनाएँ, विश्वास, आस्थाएँ, अपेक्षाएँ व आग्रह समाए रहते हैं, वे इन्द्रिय अनुभूतियों को अपने रंग में रंगे बिना नहीं रहते। कहावत भी है जैसी दृष्टि- वैसी सृष्टि। यदि दृष्टिकोण को स्वस्थ बना लिया जाय तो जीवन के सभी आयाम अपने आप ही स्वस्थ हो जाते हैं। और स्वाध्याय इसी दृष्टिकोण की चिकित्सा करता है। स्वाध्याय को यदि अंग्रेजी भाषा में कहें तो ‘सेल्फ स्टडी’ न होकर ‘स्टडी ऑफ सेल्फ’ होगा। दरअसल यह स्वयं के सूक्ष्म अध्ययन की विधि है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८३

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 2 Sep 2019




👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 2 Sep 2019


कर्मों से मुक्ति नहीं मिलती Karmo Se Mukti Nahin Milti | Dr Chinmay Pandya



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ज्ञान सम्पदा | Gayan_Sampda | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 गणेश चतुर्थी की मंगलकामनाएं।

गणपति जी से ग्रहण करने वाली जीवन शिक्षा -

1- विशाल मस्‍तक - जो हमें सिखाता है लीक से हट कर कुछ अलग सोचना और नया करना चाहिए।

2-विशाल आखें - ये बताती है जो दिख रहा उसके परे सत्‍य को देखना चाहिए। यानि सच केवल वो ही नहीं होता जो आंखों के सामने दिखता है।

3-  विशाल कान - ये कहते हैं कि सबकी सुनो और उसे समझो और हमेशा सर्तक रह कर हर धीमी से धीमी आवाज पर भी ध्‍यान दो। कोई भी बात आधी या अनसुनी मत रहने दो। -

4- टूटा दांत - त्‍याग ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्‍ता है ये सिखाते हैं एकदंत।

5- कुल्‍हाड़ी - ये इस बात की प्रतीक है कि हमें भौतिकता से जुड़े हर बंधन को काटना होगा, तभी ईश्‍वर की प्राप्‍ति होगी।

6-  लड्डू - गणपति को मोदक प्रिय हैं जो ये कहते हैं कि परिश्रम का फल ही मीठा होता है।

7- विशाल उदर - ये हमें हर परस्‍थिति में अच्‍छे बुरे को पचाने और उचित आचरण करने की शिक्षा देता है।

8- मूषक - गणपति का वाहन मूषक इस बात का प्रतीक है कि वे हमारे मस्‍तिष्‍क के कोने कोने में पल रही हर अच्‍छी बुरी बात को जानते हैं इसलिए सोच हमेशा पवित्र होनी चाहिए।

गणराया तुझ्या येण्याने सुख, समृध्दी, शांती, आरोग्य लाभले सर्व संकटाचे निवारण झाले तुझ्या आशिर्वादाने यश लाभले असाच आशीर्वाद राहू दे…
गणेशचतुर्थीच्या हार्दिक शुभेच्छा !

May Lord Ganesha bless you with Wisdom, Happiness and Joy in your life.

शनिवार, 31 अगस्त 2019

बसायें एक नया संसार | Basayen Ek Naya Sansaar | Pragya Bhajan Sangeet



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बसायें एक नया संसार | Basayen Ek Naya Sansaar | Pragya Bhajan Sangeet



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👉 संगठन में ताकत Strength in Organization 💪💪💪

एक वन में बहुत बडा अजगर रहता था। वह बहुत अभिमानी और अत्यंत क्रूर था। जब वह अपने बिल से निकलता तो सब जीव उससे डर कर भाग खडे होते। उसका मुंह इतना विकराल था कि खरगोश तक को निगल जाता था।

एक बार अजगर शिकार की तलाश में घूम रहा था। सारे जीव तो उसे बिल से निकलते देख कर ही भाग चुके थे। उसे कुछ न मिला तो वह क्रोधित होकर फुफकारने लगा और इधर-उधर खाक छानने लगा। वहीं निकट में एक हिरणी अपने नवजात शिशु को पत्तियों के ढेर के नीचे छिपा कर स्वयं भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी। अजगर की फुफकार से सूखी पत्तियां उडने लगी और हिरणी का बच्चा नजर आने लगा। अजगर की नजर उस पर पडी हिरणी का बच्चा उस भयानक जीव को देख कर इतना डर गया कि उसके मुंह से चीख तक न निकल पाई। अजगर ने देखते-ही-देखते नवजात हिरण के बच्चे को निगल लिया।

तब तक हिरणी भी लौट आई थी, पर वह क्या करती? आंखों में आंसू भर जड होकर दूर से अपने बच्चे को काल का ग्रास बनते देखती रही। हिरणी के शोक का ठिकाना न रहा। उसने किसी-न-किसी तरह अजगर से बदला लेने की ठान ली। हिरणी की एक नेवले से दोस्ती थी। शोक में डूबी हिरणी अपने मित्र नेवले के पास गई और रो-रोकर उसे अपनी दुख-भरी कथा सुनाई। नेवले को भी बहुत दुख हुआ। वह दुख-भरे स्वर में बोला 'मित्र, मेरे बस में होता तो मैं उस नीच अजगर के सौ टुकडे कर डालता। पर क्या करें, वह छोटा-मोटा सांप नहीं है, जिसे मैं मार सकूं वह तो एक अजगर है। अपनी पूंछ की फटकार से ही मुझे अधमरा कर देगा। लेकिन यहां पास में ही चीटिंयों की एक बांबी हैं। वहां की रानी मेरी मित्र हैं। उससे सहायता मांगनी चाहिए।'

हिरणी ने निराश स्वर में विलाप किया “पर जब तुम्हारे जितना बडा जीव उस अजगर का कुछ बिगाडने में समर्थ नहीं हैं तो वह छोटी-सी चींटी क्या कर लेगी?” नेवले ने कहा 'ऐसा मत सोचो। उसके पास चींटियों की बहुत बडी सेना है | संगठन में बडी शक्ति होती है |'

हिरणी को कुछ आशा की किरण नजर आई। नेवला हिरणी को लेकर चींटी रानी के पास गया और उसे सारी कहानी सुनाई। चींटी रानी ने सोच-विचार कर कहा 'हम तुम्हारी सहायता करेंगे। हमारी बांबी के पास एक संकरीला नुकीले पत्थरों भरा रास्ता है। तुम किसी तरह उस अजगर को उस रास्ते से आने पर मजबूर करो। बाकी काम मेरी सेना पर छोड दो।'

नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था। इस लिए वह अपनी जान जोखिम में डालने पर तैयार हो गया। दूसरे दिन नेवला जाकर सांप के बिल के पास अपनी बोली बोलने लगा। अपने शत्रु की बोली सुनते ही अजगर क्रोध में भर कर अपने बिल से बाहर आया। नेवला उसी संकरे रास्ते वाली दिशा में दौडा। अजगर ने पीछा किया। अजगर रुकता तो नेवला मुड कर फुफकारता और अजगर को गुस्सा दिला कर फिर पीछा करने पर मजबूर करता। इसी प्रकार नेवले ने उसे संकरीले रास्ते से गुजरने पर मजबूर कर दिया। नुकीले पत्थरों से उसका शरीर छिलने लगा। जब तक अजगर उस रास्ते से बाहर आया तब तक उसका काफ़ी शरीर छिल गया था और जगह-जगह से ख़ून टपक रहा था।

उसी समय चींटियों की सेना ने उस पर हमला कर दिया। चींटियां उसके शरीर पर चढकर छिले स्थानों के नंगे मांस को काटने लगीं। अजगर तडप उठा। अपना शरीर पटकने लगा जिससे और मांस छिलने लगा और चींटियों को आक्रमण के लिए नए-नए स्थान मिलने लगे। अजगर चींटियों का क्या बिगाडता? वे हजारों की गिनती में उस पर टूट पड रही थीं। कुछ ही देर में क्रूर अजगर ने तडप-तडप कर दम तोड दिया।

सीख -- संगठन शक्ति बड़े-बड़ों को धूल चटा देती है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 31 August 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 31 Augest 2019



👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ५९)

👉 अंतर्मन की धुलाई एवं ब्राह्मीचेतना से विलय का नाम है- ध्यान
 
ध्यान जिसका भी हम करते हैं, वह हमारे ईष्ट, आराध्य हो अथवा सद्गरु या फिर कोई पवित्र विचार या भाव। उसके प्रति प्यार भरे अपनेपन से सोचें- याद करें। नियमित उसके लिए अपनी याद को प्रगाढ़ करें। यहाँ तक कि यह प्रगाढ़ता हमारी आस्था, श्रद्धा व प्रेम का रूप ले ले। फिर इस प्रेम से परिपूर्ण छवि को अपने शरीर के उच्चस्तरीय केन्द्रों यथा अनाहत चक्र, हृदय स्थान अथवा आज्ञा चक्र- मस्तक पर दोनों भौहों के बीच स्थापित करें। अब देखिए हमारी भावनाएँ एवं विचार स्वतः ही उस ओर मुड़ चलेंगे। प्रेम से पुलकित मन स्वतः ही उस ध्यान में डूबने लगेगा। और अपने आप ही व्यक्तित्व में सकारात्मक विचारों व भावनाओं की सघनता सधने लगेगी। सकारात्मक भावों व विचारों का यह सघन रूप औषधि की भाँति है, जिसका नियमित निरन्तर सेवन व्यक्तित्व को सब भाँति विकारों व विषादों से मुक्त कर देगा।

ध्यान की यह चिकित्सा प्रणाली सब भाँति अद्भुत है। इसके पहले चरण में अन्तर्चेतना एकाग्र होती है। इस एकाग्रता के सधने पर हमारी मानसिक क्षमताओं का विकास होता है। दूसरे चरण में यह एकाग्र अन्तर्चेतना- अन्तर्मुखी हो स्वयं ही गहराई में प्रवेश होती है। ऐसा होते ही अन्तर्मन, अचेतन मन धुलने लगता है। यहीं पर हमें अनुभूतियों के प्रथम दर्शन होते हैं। सबसे पहले इन अनुभूतियों में विकार व विषाद के स्रोत के रूप में हमारी दमित वासनाएँ, भावनाएँ व मनोग्रन्थियाँ तरह- तरह के रूप धारणकर प्रकट होती हैं। ध्यान के साधक को न इसमें आकर्षित होना चाहिए और न इससे परेशान होना चाहिए। बस तटस्थ होकर निहारते रहना चाहिए। व्यक्तित्व की आन्तरिक सफाई का यह दौर सालों- साल चलता रहता है। इसके साथ ही रोग- शोक के कारणों से छुटकारा मिल जाता है।

इस परिष्कार के बाद क्रम आता है ब्राह्मी चेतना से लय स्थापित होने का। ज्यों- ज्यों अन्तर्चेतना परिष्कृत होती जाती है, अपने आप ही यह सामञ्जस्य स्थापित होने लगता है। दिव्य अनुभवों के द्वार खुलने लगते हैं। ब्राह्मी चेतना का प्रभाव अन्तर्चेना में घुलने से सभी कुछ दिव्यता में रूपान्तरित हो जाता है। इस स्थिति में जो कुछ अनुभव होता है उसे कहकर अथवा लिखकर नहीं बताया जा सकता। यहाँ तो जो पहुँच सकेंगे वे स्वयं इसके भेद को जान सकेंगे। इसके बारे में बस इतना कहना ही पर्याप्त है कि ध्यान के प्रभाव से साधक में सकारात्मक विचारों व भावों का चुम्बकत्व सघन होने से समूचा व्यक्तित्व स्वयं ही सद्गुणों का स्रोत हो जाता है। युगऋषि गुरुदेव का इस बारे में कहना था कि ध्यान से प्रेम प्रकट होता है। और प्रेम सच्चा हो तो अपने आप ही ध्यान होने लगता है। हालांकि ये रहस्य इतने गहरे हैं कि इन्हें समझने के लिए पहले व्यक्तित्व को स्वाध्याय चिकित्सा से गुजरना आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८१

👉 कर सकते थे, किया नहीं

रावण तथा विभीषण एक ही कुल में उत्पन्न हुए सगे भाई थे, दोनों विद्वान-पराक्रमी थे। एक ने अपनी दिशा अलग चुनी व दूसरे ने प्रवाह के विपरीत चलकर अनीति से टकराने का साहस किया। धारा को मोड़ सकने तक की क्षमता भगवान ने मनुष्य को दी ही इसलिए है ताकि वह उसका सहयोगी बन सके।

भगवान ने मनुष्य को इच्छानुसार वरदान माँगने का अधिकार भी दिया है। रावण शिव का भक्त था। उसने अपने इष्ट से वरदान सामर्थ्यवान होने का माँगा पर साथ ही यह भी कि मरूँ तो मनुष्य के हाथों। उसकी अनीति को मिटाने, उसका संहार करने के लिए स्वयं भगवान को राम के रूप में जन्म लेना पड़ा। राम शिव के इष्ट थे। यदि असाधारण अधिकार प्राप्त रावण प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी अपने इष्ट भगवान शिव से सत्परामर्श लेना नहीं चाहता तो अन्त तो उसका सुनिशित होगा ही। यह भगवान का सहज रूप है जो मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा देकर छोड़ देता है।

जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान इस धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड बन जाती हैं व दूसरी ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पडी बूंद के आत्म विस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।

मनुष्य को इस विशिष्ट उपलब्धि को देने के बाद विधाता ने यह सोचा भी नहीं होगा कि वह ऊर्ध्वगामी नहीं उर्ध्वगामी मार्ग चुन लेगा। अन्य जीवों, प्राणियों का जहाँ तक सवाल है वे तो बस ईश्वरीय अनुशासन-व्यवस्था के अन्तर्गत अपना प्राकृतिक जीवनक्रम भर पूरा कर पाते हैं। आहार ग्रहण, विसर्जन-प्रजनन यही तक उनका जीवनोद्देश्य सीमित रहता है। परन्तु बहुसंख्य मानव ऐसे होते हैं जो इन्हीं की तरह जीवन बिताते और अदूरदर्शिता का परिचय देते सिर धुन- धुनकर पछताते देखे जाते हैं। इनकी तुलना चासनी में कूद पड़ने वाली मक्खी से की जा सकती है।

चासनी के कढाव को एक बारगी चट कर जाने के लिए आतुर मक्खी बेतरह उसमें कूदती है और अपने पर-पैर उस जंजाल में लपेट कर बेमौत मरती है। जबकि समझदार मक्खी किनारे पर बैठ कर धीरे-धीरे स्वाद लेती, पेट भरती और उन्मूक्त आकाश में बेखटके बिचरती है। अधीर आतुरता ही मनुष्य को तत्काल कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें कि नीतिपूर्वक उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक सम्भव हो सके।

मछली वंशी में लिपटी आटे की गोली भर को देखती है। उसे उतना अवकाश या धीरज नहीं होता कि यह ढूँढ़-समझ सके कि इसके पीछे कहीं कोई खतरा तो नहीं है। घर बैठे हाथ लगा प्रलोभन उसे इतना सुहाता है कि गोली को निगलते ही बनता है। परिणाम सामने आने में देर नहीं लगती। काँटा आँतों में उलझता है और प्राण लेने के उपरान्त ही निकलता है।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग १)

बहुत बार हम से अनेक लोग किसी की धारा-प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देखकर मंत्र कीलित जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान एवं उसकी प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं और कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती भी प्रत्यक्ष कृपा है। इसके अंतर्पट खुल गये हैं, तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इसके शब्दों में मुख के द्वारा बाहर बहता चला रहा है।

बात भी सही है, श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य विभोर हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता अथवा समर्थ प्राध्यापक जिस विषय को ले लेते हैं, उस पर घण्टों एक बार बोलते चले जाते हैं, और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनकी उस विषय का साँगोपाँग ज्ञान है और उनकी सारी विद्या जिह्वा के अग्रभाग पर रखी हुई है। जबकि वह कोई मांत्रिक सिद्धि नहीं होती है। वह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।

यही तो वह अबाध तप है जिसका फल ज्ञान एवं मुखरता के रूप में वक्ताओं एवं विद्वानों की जिह्वा पर सरस्वती के वास का विश्वास उत्पन्न करा देता है। चौबीसों घण्टों सरस्वती की उपासना में लगे रहिये, जीवन भर ब्राह्मी मंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिये, किन्तु स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

👉 कमी का एहसास

एक प्रेमी-युगल शादी से पहले काफी हँसी मजाक और नोक झोंक किया करते थे। शादी के बाद उनमें छोटी छोटी बातो पे झगड़े होने लगे। कल उनकी सालगिरह थी, पर बीबी ने कुछ नहीं बोला वो पति का रिस्पॉन्स देखना चाहती थी। सुबह पति जल्द उठा और घर से बाहर निकल गया। बीबी रुआँसी हो गई।

दो घण्टे बाद कॉलबेल बजी, वो दौड़ती हुई जाकर दरवाजा खोली। दरवाजे पर गिफ्ट और बकेट के साथ उसका पति था। पति ने गले लग के सालगिरह विश किया। फिर पति अपने कमरे मेँ चला गया। तभी पत्नि के पास पुलिस वाले का फोन आता है की आपके पति की हत्या हो चूकी है, उनके जेब में पड़े पर्स से आपका फोन नम्बर ढूढ़ के कॉल किया।

पत्नि सोचने लगी की पति तो अभी घर के अन्दर आये है। फिर उसे कही पे सुनी एक बात याद आ गई की मरे हुये इन्सान की आत्मा अपना विश पूरा करने एक बार जरूर आती है। वो दहाड़ मार के रोने लगी। उसे अपना वो सारा चूमना, लड़ना, झगड़ना, नोक-झोंक याद आने लगा। उसे पश्चतचाप होने लगा की अन्त समय में भी वो प्यार ना दे सकी।

वो बिलखती हुई रोने लगी। जब रूम में गई तो देखा उसका पति वहाँ नहीं था। वो चिल्ला चिल्ला के रोती हुई प्लीज कम बैक कम बैक कहने लगी, लगी कहने की अब कभी नहीं झगड़ूंगी। तभी बाथरूम से निकल के उसके कंधे पर किसी ने हाथ रख के पूछा क्या हुआ?

वो पलट के देखी तो उसके पति थे। वो रोती हुई उसके सीने से लग गइ फिर सारी बात बताई। तब पति ने बताया की आज सुबह उसका पर्स चोरी हो गया था। फिर दोस्त की दुकान से उधार लिया गिफ्ट।

जिन्दगी में किसी की अहमियत तब पता चलती है जब वो नही होता, हमलोग अपने दोस्तो, रिश्तेदारो से नोकझोंक करते है, पर जिन्दगी की करवटे कभी कभी भूल सुधार का मौका नहीं देती।

!! हँसी खुशी में प्यार से जिन्दगी बिताइये, नाराजगी को ज्यादा दिन मत रखिये !!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 29 Augest 2019



👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 29 August 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ५८)

👉 अंतर्मन की धुलाई एवं ब्राह्मीचेतना से विलय का नाम है- ध्यान

ध्यान का यह रूप हमारे जीवन में भले न हो, पर कोई न कोई रूप तो है ही। और जैसा यह रूप है वैसा ही हमारा जीवन है। हमारे विचार और भावनाएँ प्रतिपल- प्रतिक्षण कहीं न कहीं तो एकाग्र होती हैं। यह बात अलग है कि यह एकाग्रता कभी द्वेष के प्रति होती है, कभी बैर के प्रति। कभी हम ईर्ष्या के प्रति एकाग्र होते हैं तो कभी लोभ- लालच के प्रति। यही नकारात्मक भाव, यही क्षुद्रताएँ हमारे ध्यान का विषय बनती हैं। और जैसा हमारा ध्यान वैसे ही हम बनते चले जाते हैं। कहीं हम अपने गहरे में इसे अनुभव करें तो यही पाएँगे कि ध्यान के इन नकारात्मक रूपों ने ही हमें रोगी व विषादग्रस्त बनाया। पल- पल भटकते हुए निषेधात्मक ध्यान के कारण ही हमारी यह दशा हुई है। इसकी चिकित्सा भी ध्यान ही है- सकारात्मक व विधेयात्मक ध्यान।

जब सही व सकारात्मक ध्यान की बात आती है, तो अनेको लोग सवाल उठाते हैं- कैसे करें ध्यान? मन ही नहीं लगता है। सच बात तो यह है कि उनका मन पहले से ही कहीं और लगा हुआ है। नकारात्मक क्षुद्रताओं में वह लिप्त है, अब सकारात्मक महानताएँ उसे रास नहीं आ रही। इस समस्या का हल यही है कि मन ने जिस विधि से गलत ध्यान सीखा है, उसी विधि से उसे सही ध्यान सीखना होगा। और यह विधि हमेशा से यह है कि जिस सत्य को, व्यक्ति को, विचार को हम लगातार याद करते हैं, अपने आप ही हमें उससे लगाव होने लगता है। यह लगाव धीरे- धीरे प्रगाढ़ प्रेम में बदलता है। उसी के प्रति हमारी श्रद्धा व आस्था पनपती है। यदि यही प्रक्रिया जारी रही तो इसकी सघनता इतनी अधिक होती है कि दुनिया की बाकी चीजें अपने आप ही बेमानी हो जाती हैं। और सारे विचार और सम्पूर्ण भावनाएँ उसमें एक रस हो जाती हैं। यही भाव दशा तो ध्यान है। साथ ही यही ध्यान में मन लगने के सवाल का समाधान है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८०

बुधवार, 28 अगस्त 2019

Positivity a Door to Progress | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 अस्थिर आस्था के लूटेरे

एक विशाल नगर में हजारों भीख मांगने वाले थे। अभावों में भीख मांगकर आजिविका चलाना उनका पेशा था। उनमें कुछ अन्धे भी थे। उस नगर में एक ठग आया और भीखमंगो में सम्मलित हो गया। दो तीन दिन में ही उसने जान लिया कि उन भीखारियों में अंधे भीखारी अधिक समृद्ध थे। अन्धे होने के कारण दयालु लोग उन्हे कुछ विशेष ही दान देते थे। उनका धन देखकर ठग ललचाया। वह अंधो के पास पहुंच कर कहने लगा-“सूरदास महाराज ! धन्य भाग जो आप मुझे मिल गये। मै आप जैसे महात्मा की खोज में था! गुरूवर, आप तो साक्षात भगवान हो। मैं आप की सेवा करना चाहता हूँ! लीजिये भोजन ग्रहण कीजिए, मेरे सर पर कृपा का हाथ रखिए और मुझे आशिर्वाद दीजिये।“

अन्धे को तो जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई। वह प्रसन्न हुआ और भक्त पर आशिर्वाद की झडी लगा दी। नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है। वह सेवा करने लगा। अंधे सभी साथ रहते थे। वैसे भी उन्हे आंखो वाले भीखमंगो पर भरोसा नहीं था। थोडे ही दिनों में ठग ने अंधो का विश्वास जीत लिया। अनुकूल समय देखकर उस भक्त ने, अंध सभा को कहा-“ महात्माओं मुझे आप सभी को तीर्थ-यात्रा करवाने की मनोकामना है। आपकी यह सेवा कर संतुष्ट होना चाहता हूँ। मेरा जन्म सफल हो जाएगा। सभी अंधे ऐसा श्रवणकुमार सा योग्य भक्त पा गद्गद थे। उन्हे तो मनवांछित की प्राप्ति हो रही थी। वे सब तैयार हो गये।सभी ने आपना अपना संचित धन साथ लिया और चल पडे। आगे आगे ठगराज और पिछे अंधो की कतार।

भक्त बोला- “महात्माओं, आगे भयंकर अट्वी है, जहाँ चोर डाकुओं का उपद्रव रहता है। आप अपने अपने धन को सम्हालें”। अंध-समूह घबराया ! हम तो अंधे है अपना अपना धन कैसे सुरक्षित रखें? अंधो ने निवेदन किया – “भक्त ! हमें तुम पर पूरा भरोसा है, तुम ही इस धन को अपने पास सुरक्षित रखो”, कहकर सभी ने नोटों के बंडल भक्त को थमा दिये। ठग ने इस गुरुवर्ग को आपस में ही लडा मारने की युक्ति सोच रखी थी। उसने सभी अंधो की झोलीयों में पत्थर रखवा दिये और कहा – “आप लोग मौन होकर चुपचाप चलते रहना, आपस में कोई बात न करना। कोई मीठी मीठी बातें करे तो उस पर विश्वास न करना और ये पत्थर मार-मार कर भगा देना। मै आपसे दूरी बनाकर नजर रखते हुए चलता रहूंगा”। इस प्रकार सभी का धन लेकर ठग चलते बना।

उधर से गुजर रहे एक राहगीर सज्जन ने, इस अंध-समूह को इधर उधर भटकते देख पूछा –“सूरदास जी आप लोग सीधे मार्ग न चल कर, उन्मार्ग – अटवी में क्यों भटक रहे हो”? बस इतना सुनते ही सज्जन पर पत्थर-वर्षा होने लगी. पत्थर के भी कहाँ आँखे होती है, एक दूसरे अंधो पर भी पत्थर बरसने लगे। अंधे आपस में ही लडकर समाप्त हो गये।

आपकी डाँवाडोल, अदृढ श्रद्धा को चुराने के लिए,  सेवा, परोपकार और सरलता का स्वांग रचकर ठग, आपकी आस्था को लूटेने के लिए तैयार बैठे है। यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारा ज्ञान भी अंध है। अज्ञान का अंधापा हो तो अस्थिर आस्था जल्दी विचलित हो जाती है। एक बार आस्था लूट ली जाती है तो सन्मार्ग दिखाने वाला भी शत्रु लगता है. अज्ञानता के कारण ही अपने  समृद्ध दर्शन की कीमत हम नहीं जान पाते। हमेशा डाँवाडोल श्रद्धा को सरल-जीवन, सरल धर्म के पालन का प्रलोभन देकर आसानी से ठगा जा सकता है। विचलित विचारी को गलत मार्ग पर डालना बड़ा आसान है। आस्था टूट जाने के भय में रहने वाले ढुल-मुल  अंधश्रद्धालु को सरलता से आपस में लडाकर खत्म किया जा सकता है।

अस्थिर आस्थाओं की ठग़ी ने आज जोर पकड़ा हुआ है। निष्ठा पर ढुल-मुल नहीं सुदृढ बनें।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ५७)

👉 अंतर्मन की धुलाई एवं ब्राह्मीचेतना से विलय का नाम है- ध्यान

ध्यान के प्रयोग अध्यात्म चिकित्सा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई इन्हें सम्यक् रूप से जान ले- सीख ले तो वह स्वयं ही अपने व्यक्तित्व की चिकित्सा कर सकता है। ध्यान शब्द से बहुसंख्यक लोग सुपरिचित हो चले हैं। क्योंकि इन दिनों इसके बारे में बहुत कुछ कहा- सुना और लिखा- पढ़ा जा रहा है। किन्तु इसके अर्थ के बारे में, मर्म के बारे में प्रायः सभी अपरिचित हैं। इनमें वे भी शामिल हैं जो ध्यान के बारे में जानने और नियमित इसके अभ्यास का दावा करते हैं। यह अचरज भरा सच हो सकता है कई लोगों को नागवार लगे। फिर भी सत्य को कहा जाना चाहिए। यही सोचकर विनम्रतापूर्वक ये पंक्तियाँ लिखी गयी हैं, क्योंकि इनसे आत्मावलोकन में मदद मिलेगी और नए सिरे से ध्यान के बोध को पाया जा सकेगा।

ध्यान के प्रयोग में हम अपने विचारों और भावनाओं को रूपान्तरित करते हैं। इन्हें लयबद्ध करते हैं- स्वरबद्ध करते हैं। और फिर इस लय से हम अपने जीवन की खोई हुई लय को फिर से पाते हैं। बिखरे हुए स्वरों को, ध्यान के संगीत को सजाकर जिन्दगी का भूला हुआ गीत फिर से गाते हैं। दुःख- विषाद को आनन्द में बदलना, पतन के गर्त में गिरती जा रही जीवन की ऊर्जा का फिर से ऊर्ध्वारोहण करना ध्यान के प्रयोगों का ही सुफल है। बस हमें इन्हें करना आना चाहिए। ध्यान के अभाव में ही हम ब्राह्मी चेतना से अपना सामञ्जस्य गंवा बैठे हैं। ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों से विलग होकर हम निस्तेज और शक्तिहीन हो गए हैं। ध्यान के प्रयोग से यह योग पुनः सम्भव है।

यूं तो ध्यान अपने में गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया है। प्रत्येक धर्म व पंथ के आचार्यों ने इसका विशद विवेचन किया है। इसकी प्रक्रिया, प्रभावों व परिणामों का बोध कराया है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्र का तो यह केन्द्रीय तत्त्व है। अष्टांग योग के आठ अंगों के क्रम में यह सातवें स्थान पर है। इसके पहले के छह अंग ध्यान की तैयारी के लिए है। और बाद का आठवां अंग ध्यान के परिणाम व सुफल बताने के लिए है। यह विवेचन कहीं भी और कितना भी क्यों न किया गया हो, पर उसका सार यही है कि हम अपने विचारों और भावनाओं को श्रेष्ठता- महानता और व्यापकता में एकाग्र करना सीखे। इसके माध्यम से व्यक्तित्व में ऐसे खिड़की- दरवाजे खोलें, जिनके माध्यम से ब्राह्मी चेतना का सुखद- सुरभित और निर्मल झोंका हमारे व्यक्तित्व में प्रवाहित हो सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ७९

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