बुधवार, 4 सितंबर 2019

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग ३)

एक वकालत में ही नहीं, किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में अध्ययन-शीलता एवं अध्ययन-हीनता का परिणाम एक जैसा ही होता है। इसमें चिर, नवीन अवस्था का कोई आपेक्ष नहीं होता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है जिसमें अपवाद के लिए कोई गुँजाइश नहीं है।

धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिये कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता, तीन-तीन घण्टे आसन लगाता, जाप करता अथवा कीर्तन में मग्न रहता। व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।

अध्ययन के अभाव में इस आत्म-जगत् में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त हुए बिना उनसे संपर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान् मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त हो सकना सम्भव है, जो अवतार रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन ध्यान, पूजा-पाठ तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिये, इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के दैविक तत्त्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके। इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४

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