शनिवार, 7 सितंबर 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Sep 2019

★ गायत्री मंत्र में सम्स्त संसार को धारण, पोषण और अभिवर्द्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गई यह उपासना साधक की अंतश्चेतना में, उसके मन, अन्त:करण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं में सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भरती है। साधक जब इस महामंत्र के अर्थ पर विचार करता है तो वह समझ जाता है कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बडी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।  
 
□ ज्ञानवान, विवेकवान, और विद्वान बनने का साधन पुस्तकावलोकन ही है। पेट से कोई ज्ञानी नहीं होता वरन् परिस्थिति संगति एवं वातावरण में रहकर तदनुसार मनोभूमि का निर्माण होता है। जिस दिशा में हमें मस्तिष्क उन्नत करना है, उस दिशा में आगे बढे़ हुए विद्वानों का सत्संग उनकी पुस्तकों द्वारा ही हो सकता है। अत: स्वाध्याय की आदत डालिये।
 
◆ सच्ची नीति का नियम यह है कि हम जिस मार्ग को जाते हैं उसे ही ग्रहण करके न रह जायें। किन्तु जो मार्ग सच्चा है फिर चाहे हम उससे परिचित हों या न हों उसे ग्रहण करना ही चाहिए। मतलब यह है कि जब हम यह जान जायें कि फलाँ मार्ग सच्चा है तब हमें उस पर जाने के लिए निर्भय होकर जी तोड परिश्रम करना चाहिए। जब इस प्रकार नीति का पालन किया जा सकें तभी हम आगे बढ़ सकते हैं।

◇ हिन्दू धर्म आध्यात्म प्रधान रहा है। आध्यात्मिक जीवन उसका प्राण है। अध्यात्म के प्रति उत्सर्ग करना ही सर्वोपरि नहीं है, बल्कि पूर्ण शक्ति का उद्भव और उत्सर्ग दोनों की ही आध्यात्मिक जीवन में आवश्यकता है। कर्म करना और कर्म को चैतन्य के साथ मिला देना ही यज्ञमय जीवन है। यह यज्ञ जिस संस्कृति का आधार होगा, वह संस्कृति और संस्कृति को मानने वाली जाति हमेशा अमर रहेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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