शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Aug 2019

■  इस संसार में वाणी से बढ़कर कोई शक्तिशाली वस्तु नहीं है। वाणी से मित्र को शत्रु तथा शत्रु को मित्र बनाया जा सकता है। ऐसी शक्तिशाली वस्तु का उपयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच-समझकर करना चाहिये। वाणी का माधुर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है और न बनने वाला कार्य भी बन जाता है।

◇ आप मन में जिस दु:ख को जैसा मान ले, वैसी ही कठिनाई एवं आंतरिक दु:ख का बोध होता है। सुख दु:ख तो आपके मन की दो स्थितियाँ मात्र है। आप जिस स्थिति को मन में देर तक रखना चाहें, अपने दृढ़ आग्रह से रख सकते हैं। मन के क्लेश का निर्माण स्वयं आपके मन के गलत प्रयोग द्वारा ही होता है। 

★ विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टेगौर ने लिखा है- "मानव जीवन का ध्येय आत्म-तोष प्राप्त करना है और आत्म-तोष की प्राप्ति का उपाय मानवीय सामर्थ्य का विकास करना है। सामर्थ्य का विकास साधना से होता है और साधना तप के बिना पूरी नहीं होती। अपने जीवन का तुम कुछ भी ध्येय बनाओ किन्तु उसके लिए तुम्हें गहरी साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पडेगा।

◇ जो चैतन्य सत्ता इस स्थूल संसार का धारण पोषण कर रही है, जो आत्म स्वरुप में सब में व्याप्त हैं, वह प्रेम ही है। व्यष्टि और समष्टि में आत्मा का वह प्रेम प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी रचना का सन्देश दे रहा है। जब मनुष्य आत्मा के उस प्रेम प्रकाश का अवम्बलन लेता है तभी वह संसार को आनन्द और सुखों का घर मानने लगता है और तभी उसे सच्चा सुख मिलता है। प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है । जो इस प्रकाश में जीवन पथ पर अग्रसर होता है, उसे संसार शूल नहीं फूल नजर आता है, दु:खों का घर नहीं वरन् स्वर्ग मालूम होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 14 अगस्त 2019

👉 एक ओंकार सतनाम

नानक एक मुसलमान नवाब के घर मेहमान थे। नानक को क्या हिंदू क्या मुसलमान! जो ज्ञानी है, उसके लिए कोई संप्रदाय की सीमा नहीं। उस नवाब ने नानक को कहा कि अगर तुम सच ही कहते हो कि न कोई हिंदू न कोई मुसलमान, तो आज शुक्रवार का दिन है, हमारे साथ नमाज पढ़ने चलो। नानक राजी हो गए। पर उन्होंने कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी पढ़ेंगे। नवाब ने कहा, यह भी कोई शर्त की बात हुई? हम पढ़ने जा ही रहे हैं।

पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुसलमान-हिंदू सब इकट्ठे हो गए। हिंदुओं में तहलका मच गया। नानक के घर के लोग भी पहुंच गए कि यह क्या कर रहे हो? लोगों को लगा कि नानक मुसलमान होने जा रहे हैं। लोग अपने भय से ही दूसरों को भी तौलते हैं।

नानक मस्जिद गए। नमाज पढ़ी गई। नवाब बहुत नाराज हुआ। बीच-बीच में लौट-लौट कर देखता था कि नानक न तो झुके, न नमाज पढ़ी। बस खड़े हैं। जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की, क्योंकि क्रोध में कहीं नमाज हो सकती है! करके किसी तरह पूरी, नानक पर लोग टूट पड़े। और उन्होंने कहा, तुम धोखेबाज हो। कैसे साधु, कैसे संत! तुमने वचन दिया नमाज पढ़ने का और तुमने की नहीं।

नानक ने कहा, वचन दिया था, शर्त आप भूल गए। कहा था कि अगर आप नमाज पढ़ोगे तो मैं पढूंगा। आपने नहीं पढ़ी तो मैं कैसे पढ़ता?

नवाब ने कहा, क्या कह रहे हो? होश में हो? इतने लोग गवाह हैं कि हम नमाज पढ़ रहे थे।

नानक ने कहा, इनकी गवाही मैं नहीं मानता, क्योंकि मैं आपको देख रहा था भीतर क्या चल रहा है। आप काबुल में घोड़े खरीद रहे थे।

नवाब थोड़ा हैरान हुआ; क्योंकि खरीद वह घोड़े ही रहा था। उसका अच्छे से अच्छा घोड़ा मर गया था उसी दिन सुबह। वह उसी की पीड़ा से भरा था। नमाज क्या खाक! वह यही सोच रहा था कि कैसे काबुल जाऊं, कैसे बढ़िया घोड़ा खरीदूं, क्योंकि वह घोड़ा बड़ी शान थी, इज्जत थी।

और नानक ने कहा, यह जो मौलवी है तुम्हारा, जो पढ़वा रहा था नमाज, यह खेत में अपनी फसल काट रहा था।

और यह बात सच थी। मौलवी ने भी कहा कि बात तो यह सच है। फसल पक गयी है और काटने का दिन आ गया है, गांव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और चिंता मन पर सवार है।

तो नानक ने कहा, अब तुम बोलो, तुमने नमाज पढ़ी जो मैं साथ दूं?

एक ओंकार सतनाम🙏

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 14 Augest 2019




👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 14 August 2019



👉 जमाना तेजी से बदलेगा

हमारा पहला परामर्श यह है कि अब किसी को भी धन का लालच नहीं करना चाहिए और बेटे-पोतों को दौलत छोड़ मरने की विडम्बना में नहीं उलझना चाहिये। यह दोनों ही प्रयत्न सिद्ध होंगे। अगला जमाना जिस तेजी से बदल रहा है उससे इन दानों विडम्बनाओं से कोई कुछ लाभान्वित न हो सकेगा वरन् लोभ और मोह की इस दुष्प्रवृत्ति के कारण सर्वत्र धिक्कार भर जायेगा। दौलत छिन जाने का दुख और पश्चाताप सताएगा सो अलग। इसलिए यह परामर्श हर दृष्टि से सही ही सिद्ध होगा कि मानव जीवन जैसी महान् उपलब्धि का उतना ही अंश खर्च करना चाहिए जितना निर्वाह के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हो। इस मान्यता को हृदयंगम किये बिना आज की युग पुकार के लिये किसी के लिये कुछ ठोस कार्य कर सकना सम्भव न होगा। एक ओर से दिशा पड़े बिना दूसरी दिशा में चल सकना सम्भव ही न होगा। लोभ-मोह में जो जितना डूबा हुआ होगा उसे लोक मंगल के लिए न समय मिलेगा न सुविधा। सो परमार्थ पक्ष पर चलने वालों को सबसे प्रथम अपने इन दो शत्रुओं को-रावण कुम्भ करण को- कंस, दुर्योधन को निरस्त करना होगा।

यह दो आन्तरिक शत्रु ही जीवन-विभूति को नष्ट करने के सब से बड़े कारण है। सो इनसे निपटने का अन्तिम महाभारत हमें सबसे पहले आरम्भ करना चाहिए। देश के सामान्य नागरिक जैसे स्तर का सादगी और मितव्ययिता पूर्ण जीवन स्तर बनाकर स्वल्प व्यय में गुजारे की व्यवस्था बनानी चाहिए और परिवार को स्वावलम्बी बनाने की योग्यता उत्पन्न करने और हाथ-पाँव से कमाने में समर्थ बना कर उन्हें अपना वजन आप उठा सकने की सड़क पर चला देना चाहिये। बेटे-पोतों के लिये अपनी कमाई की दौलत छोड़ मरना भारत की असंख्य कुरीतियों और दुष्ट परम्पराओं में से एक है। संसार में अन्यत्र ऐसा नहीं होता। लोग अपनी बची हुई कमाई को जहाँ उचित समझते हैं वसीयत कर जाते हैं। इसमें न लड़कों की शिकायत होती है न बाप को कंजूस कृपण को गालियाँ पड़ती है।

सो हम लोगों में से जो विचारशील है, उन्हें तो ऐसा साहस इकट्ठा करना चाहिए। जिनके पास इस प्रकार का ब्रह्म वर्चस न होगा। वे माला सटक कर, पूजा-पत्री उलट-पलट कर मिथ्या आत्म प्रवंचना भले ही करते रहें। वस्तुतः परमार्थ पथ पर एक कदम भी न बढ़ सकेंगे। समय, श्रम, मन और धन का अधिकाधिक समर्पण विश्व-मानव की सेवा को समर्पण कर सकने की स्थिति तभी बनेगी जब लोभ और मोह के खर-दूषण कुछ अवसर मिलने दें लोभ और मोह ग्रस्त को ‘आपापूती’ से ही फुरसत नहीं, बेचारा लोक-मंगल के लिये कहाँ से कुछ निकाल सकेगा और इसके बिना जीवन साधना का स्वरूप ही क्या बन पड़ेगा ? जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक सम्पत्ति मौजूद है, उनके लिये यही उचित है कि आगे के लिये उपार्जन बिलकुल बन्द कर दें और सारा समय परमार्थ के लिये लगायें। प्रयत्न यह भी होना चाहिए कि सुयोग्य स्त्री-पुरुषों में से एक कमाये घर खर्च चलाये और दूसरे को लोक-मंगल में प्रवृत्त होने की छूट दे दे संयुक्त परिवारों में से एक व्यक्ति विश्व सेवा के लिये निकाला जाय और उसका खर्च परिवार वहन करें। जिनके पास संग्रहित पूँजी नहीं है। रोज कमाते रोज खाते हैं उन्हें भी परिवार का एक अतिरिक्त सदस्य बेटा ‘लोक-मंगल’को मान लेना चाहिए और उसके लिए जितना श्रम समय और धन अन्य परिवारियों पर खर्च होता है उतना तो करना ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५७


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.57

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४८)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

प्रक्रिया की दृष्टि से तो मंत्र की कार्यशैली अद्भुत है। इसकी साधना का एक विशिष्ट क्रम पूरा होते ही यह साधक की चेतना का सम्पर्क ब्रह्माण्ड की विशिष्ट ऊर्जा धारा या देवशक्ति से कर देता है। यह इसके कार्य का एक आयाम है। इसके दूसरे आयाम के रूप में यह साथ ही साथ साधक के अस्तित्व या व्यक्तित्व को उस विशिष्ट ऊर्जाधारा अथवा देव शक्ति के लिए ग्रहणशील बनाता है। इसके लिए मंत्र साधना द्वारा साधक के कतिपय गुह्य केन्द्र जागृत हो जाते हैं। ऐसा होने पर ही वह सूक्ष्म शक्तियों को ग्रहण करने- धारण करने एवं उनका नियोजन करने में समर्थ होता है। ऐसा होने पर ही कहा जाता है कि मंत्र सिद्ध हो गया।

यह मंत्र सिद्धि केवल मंत्र को रटने या दुहराने भर से नहीं मिलती। और यही वजह है कि सालों- साल किसी मंत्र की साधना करने वालों को बुरी तरह से निराश होना पड़ता है। पहले तो उनको कोई फल ही नहीं मिलता और यदि किसी तरह कुछ मिला भी तो वह काफी नगण्य व आधा- अधूरा सा होता है। इस स्थिति के लिए दोष मंत्र का नहीं, स्वयं साधक का है। ध्यान रहे किसी मंत्र की साधना में साधक को मंत्र की प्रकृति के अनुसार अपने जीवन की प्रकृति बनानी पड़ती है। मंत्र साधना के विधि- विधान के सम्यक् निर्वाह के साथ उसे अपने खानपान, वेश- विन्यास, आचरण- व्यवहार देवता या देवी की प्रकृति के अनुसार ढालना पड़ता है। उदाहरण के लिए कहीं तो श्वेत वस्त्र, श्वेत खानपान आवश्यक होते हैं, तो कहीं यह रंग पीला हो जाता है। आचरण- व्यवहार में भी पवित्रता का सम्यक् समावेश जरूरी है।

यदि सब कुछ सही रीति से निभाया जाय तो मंत्र का सिद्ध होना अनिवार्य है। मंत्र सिद्ध होने का मतलब है कि मंत्र की शक्तियों का साधक की चेतना में क्रियाशील हो जाना। यह स्थिति कुछ इसी तरह से है जैसे कि कोई श्रमशील किसान किसी महानदी से पर्याप्त बड़ी नहर खोदकर उसका पानी अपने खेतों तक ले आये। जेसे नदी से नहर आने पर किसान के समूचे क्षेत्र में जलधाराएँ उफनती- उमड़ती रहती हैं। उसी तरह से मंत्र सिद्ध होने पर देव शक्ति का ऊर्जा प्रवाह हर पल- हर क्षण साधक की अन्तर्चेतना में उफनता- उमड़ता रहता है। इसका वह मनचाहे ढंग से अपने संकल्प के अनुसार नियोजन कर सकता है। मंत्र की शक्ति व प्रकृति के अनुसार वह असाध्य बीमारियों को ठीक कर सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६८

👉 Awakening Divinity in Man (Part 1)

Let us begin with the Gayatri mantra:

“Om bhur bhuva¡ swah tatsaviturvarenyan bhargo devasya dhimahi dhiyo yonah pracodayat”

You all must have heard of the grace of God. His manifestations are called “devata” (deity) in the Vedas; devata means “one who gives”.  Many of us pray and worship the deities because we either want something or we need help in adverse moments. Let us discuss about deities.

There is no doubt that deities do bless us enormously; otherwise they would not have been named as “deities” because by definition deities always give something. There is nothing wrong or unnatural if one requests something from someone who always wants to give. But what do deities give? They give only what they themselves possess. Naturally, one can give only what one has. Deities have only one thing – divinity (devatva). Divinity is the most refined and virtuous form of one’s nature, conduct, qualities and deeds. Deities bestow divinity upon the devotees and become relieved, saying that, “we have given you the best we could; now it is up to you to accept and make use of it in the way you find it suitable and succeed accordingly.”

There is one thing in the world that indeed yields commendable success and that is excellence of personality. It is the minimum requirement to achieve anything worthwhile and fulfilling. If one has somehow gained something despite having an inferior personality and without demonstrating his talents, hard work and essential qualities, then his success will be short lived and incomplete. If your digestive system is weak then an overdose of eatables is sure to create problems and upset your health. Similarly, if you don’t have wisdom and the ability to make proper use of the resources, facilities and prosperities available to you, then these would trouble you in one way or the other. If there is a lack of virtues and saneness then your inherited or inappropriately earned wealth will act as a catalyst for your evils and weaknesses; these would nurture improper addictions, enhance your ego and sooner or later ruin your life.

.....to be continue

सोमवार, 12 अगस्त 2019

संकल्प जगायें ऊँचे उठें | Studying the Self-life & its Significance | Pt...



Title

Gayatri Ka Jaap Karo | गायत्री का जाप करो | Pragya Bhajan Sangeet



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👉 चरित्र-रक्षा के लिये बलिदान

राजनर्तकी मुदाल के सौंदर्य की ख्याति पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह सारे उरु प्रदेश में फैली हुई थी। उसे पाने के लिए राजधानी के बड़े-बड़े सामंतों, विद्वानों, प्रचारकों तथा राज घराने तक के लोगों में कुचक्र चल रहा था। ठीक उसी समय मुदाल अपने बिस्तर पर लेटी अपने और राष्ट्र के भविष्य पर विचार कर रही थी।

देश के कर्णधार मार्गदर्शक और प्रभावशाली लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो गये तो फिर सामान्य प्रजा का क्या होगा ? अभी वह इस चिन्ता में डूबी थी कि किसी ने द्वार पर दस्तक दी- मुदाल ने दरवाजा खोला तो सामने खड़े महाराज करुष को देखते ही स्तम्भित रह गई। इस समय आने का कारण महाराज! न चाहते हुए भी मुदाल को प्रश्न करना पड़ा।

बड़ा विद्रूप उत्तर मिला- मुदाल! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा उरु प्रदेश मुग्ध है। त्यागी, तपस्वी तुम्हारे लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं, फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे!

महाराज! सामान्य प्रजा की बात आप छोड़िये। आप इस देश के कर्णधार है, प्रजा मार्ग भ्रष्ट हो जाये तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर यदि समाज के शीर्षस्थ लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो जाये तो वह देश खोखला हो जाता है, ऐसे देश, ऐसी जातियाँ अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाती महाराज! इसीलिये आपका इस समय यहाँ आना, अशोभनीय ही नहीं, सामाजिक अपराध भी है।

किसी ने सच कहा है अधिकार और अहंकार मनुष्य के दो प्रबल शत्रु है। वह जिस अन्तः करण में प्रवेश कर जाते हैं उसमें उचित और अनुचित के विचार की शक्ति भी नहीं रह पाती। मुदाल के यह सीधे-साधे शब्द करुष को बाण की तरह चुभे। वे तड़प कर बोले- मुदाल हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये, तुम एक नर्तकी हो और शरीर का सौदा तुम्हारा धर्म है। कीमत माँग सकती हो, धर्म क्या है, अधर्म क्या है ? यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है।

नर्तकी भर होते तब तो आपका कथन सत्य था महाराज! मुदाल की गंभीरता अब दृढ़ता और वीरोचित स्वाभिमान में बदल रही थी - किन्तु हम मनुष्य भी है और मनुष्य होने के नाते समाज के हित, अहित की बात सोचना भी हमारा धर्म है। हम सत्ता को दलित करके अपने देशवासियों को मार्ग-भ्रष्ट करने का पाप अपने सिर कदापि नहीं ले सकते।

स्थिति बिगड़ते देखकर महाराज करुष ने बात का रुख बदल दिया। पर वे अब भी इस बात को तैयार नहीं थे कि साधारण नर्तकी उनकी वासना का दमन कर जाये और मुदाल का कहना था कि विचारशील और सत्तारूढ़ का पाप सारे समाज को पापी बना देता है। इसलिये चरित्र को वैभव के सामने झुकाया नहीं जा सकता। मुदाल ने बहुत समझाया पर महाराज का रौद्र कम न हुआ। स्थिति अनियंत्रित होते देखकर मुदाल ने कहा- महाराज यदि आप साधिकार चेष्टा करना ही चाहते हैं तो तीन दिन और रुके, मैं रजोदर्शन की स्थिति में हूँ आज से चौथे दिन आप मुझे “चैत्य सरोवर” के समीप मिलें, आपको यह शरीर वही समर्पित होगा।

तीन दिन करुष ने किस तरह बिताये यह वही जानते होगे। चौथे दिन चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में अगणित उपहारों के साथ महाराज करुष जब चैत्य विहार पहुँचे तो वहाँ जाकर उन्होंने जो कुछ देखा उससे उनकी तृष्णा और कामुकता स्तब्ध रह गई। मुदाल का शरीर तो वहां उपस्थित था पर उसमें जीवन नहीं था। एक पत्र पास ही पड़ा हुआ था - सौंदर्य राष्ट्र के चरित्र से बढ़कर नहीं चरित्र की रक्षा के लिये यदि सौंदर्य का बलिदान किया जा सकता है तो उसके लिए मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ शव देखने से लगता था मुदाल ने विषपान कर लिया है।

मुदाल के बलिदान ने करुष की आंखें खोल दी। उस दिन से वे आत्म-सौंदर्य की साधना में लग गये।

📖 अखण्ड ज्योति 1971 फरवरी पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.44

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 12 Augest 2019




👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 12 August 2019



👉 परिजनों को परामर्श

अपना विशाल परिवार हमने एक ही प्रयोजन के लिये बनाया और सींचा है कि विश्व-मानव की अन्तर्वेदना हलकी करने में और रुदन, दरिद्र, जलन से बचाने के लिये कुछ योगदान सम्भव हो सके, पेट और प्रजनन की कृमि कीटकों जैसी सड़न से ही हम सब बहुमूल्य जिन्दगी न बिता डालें वरन् कुछ ऐसे हो जो जीवनोद्देश्य को समझें और उसे पूरा करने के लिये अपनी विभूतियों और सम्पत्तियों का एक अंश अनुदान दे सकने में तत्पर हो सकें। उच्च आदर्शों पर चल कर विश्व के भावनात्मक नव-निर्माण की दृष्टि से ही हमने अपना विशाल परिवार बनाया। यों दुख कष्ट से पीड़ितों की सहायता के लिए हमारे पास जो कुछ था उसे देते रहे पर उसका प्रयोजन विवेकहीन तथा कथित दानियों द्वारा लोगों की तृष्णा भड़काना स्वल्प प्रयत्न में अधिक लाभ उठाने की दुष्प्रवृत्ति जगाना एवं भिक्षा-वृत्ति का अभ्यस्त बनाना नहीं था। सिद्ध पुरुष हमें संयोग ने ही बना दिया, मनोकामना पूर्ण करने की बात अनायास ही हमारे ऊपर लग पाई वस्तुतः हम लोक मानस में उत्कृष्टता की वृष्टि करने वाले एक संदेश वाहक के रूप में ही आये और जिये। परिवार भी अपने मूल प्रयोजन के लिये ही बनाया।

अपने इस हरे-भरे उद्यान परिवार के फले-फूले परिजन वट-वृक्षों से हम कुछ आशा अपेक्षा रखें तो उसे अनुचित नहीं कहा जाना चाहिए उनके लिए कुछ भाव भरा संदेश प्रस्तुत करें तो इसे उचित ओर उपयुक्त ही माना जना चाहिए। हमारा प्रत्येक परिजन को बहुत ही मार्मिक और दूर-दर्शिता भरा परामर्श हैं, उन्हें गम्भीरता पूर्वक लिया जाना चाहिए उन पर चिंतन−मनन किया जाना चाहिए और यदि वे उचित जंचे तो तद्नुकूल अपनी मनोभूमि एवं क्रिया-पद्धति में ढालने के लिए विचार किया जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५७

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.57

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४७)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

मंत्र चिकित्सा अध्यात्म विद्या का महत्त्वपूर्ण आयाम है। इसके द्वारा असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है। कठिनतम परिस्थितियों पर विजय पायी जा सकती है। व्यक्तित्व की कैसी भी विकृतियाँ व अवरोध दूर किये जा सकते हैं। अनुभव कहता है कि मंत्र विद्या से असम्भव- सम्भव बनता है, असाध्य सहज साध्य होता है। जो इस विद्या के सिद्धान्त एवं प्रयोगों से परिचित हैं वे प्रकृति की शक्तियों को मनोनुकूल मोड़ने में समर्थ होते हैं। प्रारब्ध उनके वशवर्ती होता है। जीवन की कर्मधाराएँ उनकी इच्छित दिशा में मुड़ने और प्रवाहित होने के लिए विवश होती हैं। इन पंक्तियों को पाठक अतिशयोक्ति समझने की भूल न करें। बल्कि इसे विशिष्ट साधकों की कठिन साधना का सार निष्कर्ष मानें।

मंत्र है क्या? तो इसके उत्तर में कहेंगे- ‘मननात् त्रायते इति मंत्रः’ जिसके मनन से त्राण मिले। यह अक्षरों का ऐसा दुर्लभ एवं विशिष्ट संयोग है, जो चेतना जगत् को आन्दोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित करने में सक्षम होता है। कई बार बुद्धिशील व्यक्ति मंत्र को पवित्र विचार के रूप मं परिभाषित करते हैं। उनका ऐसा कहना- मानना गलत नहीं है। उदाहरण के लिए गायत्री महामंत्र सृष्टि का सबसे पवित्र विचार है। इसमें परमात्मा से सभी के लिए सद्बुद्धि एवं सन्मार्ग की प्रार्थना की गयी है। लेकिन इसके बावजूद इस परिभाषा की सीमाएँ सँकरी हैं। इसमें मंत्र के सभी आयाम नहीं समा सकते। मंत्र का कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी। यह एक पवित्र विचार हो भी सकता है और नहीं भी। कई बार इसके अक्षरों का संयोजन इस रीति से होता है कि उससे कोई अर्थ प्रकट होता है और कई बार यह संयोजन इतना अटपटा होता है कि इसका कोई अर्थ नहीं खोजा जा सकता।

दरअसल मंत्र की संरचना किसी विशेष अर्थ या विचार को ध्यान में रख कर की नहीं जाती। इसका तो एक ही मतलब है- ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की किसी विशेष धारा से सम्पर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि का विकास है। मंत्र कोई भी हो वैदिक अथवा पौराणिक या फिर तांत्रिक इसी विधि के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इस क्रम में यह भी ध्यान रखने की बात है कि मंत्र की संरचना या निर्माण कोई बौद्धिक क्रियाकलाप नहीं है। कोई भी व्यक्ति भले ही कितना भी प्रतिभावान् या बुद्धिमान क्यों न हो, वह मंत्रों की संरचना नहीं कर सकता। यह तो तप साधना के शिखर पर पहुँचे सूक्ष्म दृष्टाओं व दिव्यदर्शियों का काम है।

ये महासाधक अपनी साधना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न व विशिष्ट धाराओं को देखते हैं। इनकी अधिष्ठातृ शक्तियाँ जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है, उन्हें प्रत्यक्ष करते हैं। इस प्रत्यक्ष के प्रतिबिम्ब के रूप में मंत्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रकट होता है। इसे ऊर्जाधारा या देवशक्ति का शब्द रूप भी कह सकते हैं। मंत्र विद्या में इसे देव शक्ति का मूल मंत्र कहते हैं। इस देवशक्ति के ऊर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण- धारण करना है उसी के अनुरूप इस देवता के अन्य मंत्रों का विकास होता है। यही कारण है कि एक देवता या देवी के अनेकों मंत्र होते हैं। यथार्थ में इनमें से प्रत्येक मंत्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध व सार्थक करने में समर्थ होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६७

👉 Solving Life’s Problems - Last Part

I got her a job in a florist shop so she could earn her living working with flowers. She loved it. She said she would do it for nothing. But we used the other things too. Remember, she needed more than just a livelihood. She needed other things. The swimming became her exercise. It fits in with sensible living habits. The piano playing became her path of service. She went to a retirement home and played the old songs for the people there. She got them to sing, and she was good at that. Out of those three things such a beautiful life was built for that woman. She became a very attractive woman and married a year or so later.. She stayed right in that life pattern.

I knew another woman who was confined to her room and had been there for quite some time. I went in to see her and I could tell immediately from the lines in her face and her tenseness that it wasn’t physical at all. And I don’t think I had talked to her for more than five minutes before she was telling me all about how mean her sister had been to her. The way she told it, I knew she had told that story again and again and mulled over in her mind constantly that bitterness against her sister. I found myself explaining to her that if she would forgive, ask forgiveness, and make peace with her sister, then she could look for an improvement in her health. “Huh!” she said. “I’d rather die. You have no idea how mean she was.” So the situation drifted for a while.
To be continued...

But early one morning at dawn this woman wrote a beautiful and inspired letter to her sister, which she showed to me. (There is something very wonderful to be said about dawn. Sunset is good, too. The only thing is, at sunset almost everybody is awake and they’re hurrying and scurrying around. At dawn, mostly everybody is slowed down or asleep and they are much more harmonious when they’re asleep. So dawn is often a good time for spiritual things.) I immediately went into town and mailed the letter before she could change her mind. When I got back, she had changed her mind — so it’s a good thing I had mailed it! She worried a little, but by return mail came a letter from her sister, and her sister was so glad they were to be reconciled. And, you know, on the same day that letter arrived from her sister the woman was up and around and out of bed, and the last I saw of her she was joyously off for a reconciliation with her sister.

There’s something to that old saying that hate injures the hater, not the hated.

...End...
📖 From Akhand Jyoti

शनिवार, 10 अगस्त 2019

👉 संस्कार

सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"

सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या!! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"

संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।

दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"

चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए, और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया।

अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।

एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की, तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा, मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।

पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा।।"

दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा, अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!

बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ?"
माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है!"
पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।"
माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है!"
पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना, मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है!"

ये कहकर कमरे मे चला गया।

दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,
दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे, उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी।।",

ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया।

तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।"
यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया।।

संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया! और ये ऐसा बर्ताव, अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....

इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।

माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"

इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।

"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।

सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !

सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं।

अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले, असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती।

मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 10 August 2019




👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 10 Augest 2019



👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा

बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभावतः हर मनुष्य में भरी पड़ी है। उसके लिये किसी को सिखाना ही पड़ता। धन, पद, इन्द्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं है? पेट और प्रजनन के लिये किसका चिंतन योचित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों के समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही वस्तुतः महा मानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का संकल्प और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महा मानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियां महा मानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती है कि उन्हीं के लिये सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है ओछे स्तर के- बड़प्पन के भूखे लोग बरसाती उद्भिजों की तरह अहर्निश बढ़ते चले जा रहे हैं पर महामानवों की उद्भव स्थली सूनी पड़ी है। गीदड़ों के झुण्ड बढ़ चले पर सिंहों की गुफाएं सुनसान होती चली जा रही है। इस युग की सब से बड़ी आवश्यकता महामानवों का उद्भव होना ही है। वे बढ़ने तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक सन्तापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिये किया था इस खान से नर रत्न निकले और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरम्भ करें। युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान को उथले स्तर के व्यक्तियों द्वारा नहीं केवल उन्हीं लोगों से सम्पन्न किया जा सकता है जिनको महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके।

हर विभूति कुछ मूल्य देकर खरीदी जाती है। उपहार पाने के लिये भी पात्रता उत्पन्न करनी पड़ती है। समय आ गया कि अपने विशाल परिवार के सामने उन प्रयोगों को प्रस्तुत करें जो आत्मबल सम्पन्न तथा लोक निर्माण में समर्थ व्यक्तियों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हमने अपनी जीवन साधना में इन तत्वों का समावेश किया और मंजिल की एक सन्तोष जनक लम्बाई पार कर चुके। अपने हर अनुयायी से इस अवसर पर यही अनुरोध कर सकते हैं कि जितना अधिक सम्भव हो इसी मार्ग पर कदम बढ़ायें जिस पर हम चलते रहे है। महामानव बनने के लिए जिन त्याग बलिदानोँ का मूल्य चुकाना पड़ता है आत्म परिष्कार का जो प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी की चर्चा यहाँ कर रहे है।

हम अपने जीवन का भावी कार्यक्रम निर्धारित कर चुके है, अपनी धर्म-पत्नी को एक निश्चित कार्य-पद्धति में जुटा दिया। हमारे साथ चल सकने की हिम्मत जिनने दिखाई उन्हें बुला कर युग-निर्माण योजना में जुटा दिया। गायत्री तपोभूमि में एक ऐसी टीम छोड़ दी जो हमारे संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चों पर समर्थ चतुरंगिणी की तरह लड़ती रहेगा। अब हमारा विशाल परिवार ही शेष रह गया है जिसे कुछ अन्तिम निर्देश देकर जाना है। कितने व्यक्ति कहते रहते हैं कि हम आपके साथ हिमालय चलेंगे। उनसे यही कहना है कि वे आदर्शों के हिमालय पर उसी तरह चढ़ें जिस तरह हम जीवन भर चढ़ते रहे। तपश्चर्या का मार्ग अति कठिन है। हमारी हिमालय यात्रा काश्मीर की सैर नहीं है जिसका मजा लूटने हर कोई विस्तार बाँधकर चलदे। उसकी पात्रता उसी में हो सकती है। जिसने आदर्शों के हिमालय पर चढ़ने की प्राथमिक पात्रता एकत्रित कर ली। सो हम अपने हर अनुयायी से अनुरोध करते रहे है और अब अधिक कहें और अधिक सजीव शब्दों में अनुरोध करते हैं कि वे बड़प्पन की आकाँक्षा को बदल कर महानता की आराधना शुरू करदें। यह युग परिवर्तन का शुभारम्भ है जो हमारे परिजनों को तो आरम्भ कर देना चाहिए। हम बदलेंगे युग बदलेगा’ का नारा-हमें अपने व्यक्तिगत जीवन कि विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन प्रस्तुत करके सार्थक बनाना चाहिए। निःसन्देह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव यदि आ जाये तो फिर कोई शक्ति युग-परिवर्तन एवं नव-निर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५६

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.56

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४६)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

मंत्र चिकित्सा अध्यात्म विद्या का महत्त्वपूर्ण आयाम है। इसके द्वारा असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है। कठिनतम परिस्थितियों पर विजय पायी जा सकती है। व्यक्तित्व की कैसी भी विकृतियाँ व अवरोध दूर किये जा सकते हैं। अनुभव कहता है कि मंत्र विद्या से असम्भव- सम्भव बनता है, असाध्य सहज साध्य होता है। जो इस विद्या के सिद्धान्त एवं प्रयोगों से परिचित हैं वे प्रकृति की शक्तियों को मनोनुकूल मोड़ने में समर्थ होते हैं। प्रारब्ध उनके वशवर्ती होता है। जीवन की कर्मधाराएँ उनकी इच्छित दिशा में मुड़ने और प्रवाहित होने के लिए विवश होती हैं। इन पंक्तियों को पाठक अतिशयोक्ति समझने की भूल न करें। बल्कि इसे विशिष्ट साधकों की कठिन साधना का सार निष्कर्ष मानें।

मंत्र है क्या? तो इसके उत्तर में कहेंगे- ‘मननात् त्रायते इति मंत्रः’ जिसके मनन से त्राण मिले। यह अक्षरों का ऐसा दुर्लभ एवं विशिष्ट संयोग है, जो चेतना जगत् को आन्दोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित करने में सक्षम होता है। कई बार बुद्धिशील व्यक्ति मंत्र को पवित्र विचार के रूप मं परिभाषित करते हैं। उनका ऐसा कहना- मानना गलत नहीं है। उदाहरण के लिए गायत्री महामंत्र सृष्टि का सबसे पवित्र विचार है। इसमें परमात्मा से सभी के लिए सद्बुद्धि एवं सन्मार्ग की प्रार्थना की गयी है। लेकिन इसके बावजूद इस परिभाषा की सीमाएँ सँकरी हैं। इसमें मंत्र के सभी आयाम नहीं समा सकते। मंत्र का कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी। यह एक पवित्र विचार हो भी सकता है और नहीं भी। कई बार इसके अक्षरों का संयोजन इस रीति से होता है कि उससे कोई अर्थ प्रकट होता है और कई बार यह संयोजन इतना अटपटा होता है कि इसका कोई अर्थ नहीं खोजा जा सकता।

दरअसल मंत्र की संरचना किसी विशेष अर्थ या विचार को ध्यान में रख कर की नहीं जाती। इसका तो एक ही मतलब है- ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की किसी विशेष धारा से सम्पर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि का विकास है। मंत्र कोई भी हो वैदिक अथवा पौराणिक या फिर तांत्रिक इसी विधि के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इस क्रम में यह भी ध्यान रखने की बात है कि मंत्र की संरचना या निर्माण कोई बौद्धिक क्रियाकलाप नहीं है। कोई भी व्यक्ति भले ही कितना भी प्रतिभावान् या बुद्धिमान क्यों न हो, वह मंत्रों की संरचना नहीं कर सकता। यह तो तप साधना के शिखर पर पहुँचे सूक्ष्म दृष्टाओं व दिव्यदर्शियों का काम है।

ये महासाधक अपनी साधना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न व विशिष्ट धाराओं को देखते हैं। इनकी अधिष्ठातृ शक्तियाँ जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है, उन्हें प्रत्यक्ष करते हैं। इस प्रत्यक्ष के प्रतिबिम्ब के रूप में मंत्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रकट होता है। इसे ऊर्जाधारा या देवशक्ति का शब्द रूप भी कह सकते हैं। मंत्र विद्या में इसे देव शक्ति का मूल मंत्र कहते हैं। इस देवशक्ति के ऊर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण- धारण करना है उसी के अनुरूप इस देवता के अन्य मंत्रों का विकास होता है। यही कारण है कि एक देवता या देवी के अनेकों मंत्र होते हैं। यथार्थ में इनमें से प्रत्येक मंत्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध व सार्थक करने में समर्थ होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६७

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Aug 2019

■  हम आज जहाँ हैं वही से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढें और उन्हें सुधारे। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनाएँ। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पडे़गा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुए प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।

◇ ओ,  मानवधारी परमात्मा के अमरपुत्र। अपने पिता की सम्पत्ति को सम्भालो। यह सब तुम्हारे पिता की है, इसलिये तुम्हारी है। सबको अपना समझो और अपनी वस्तु की तरह विश्व की समस्त वस्तुओं को अपनी प्रेम की छाया में रखों। सबकों आत्मभाव और आत्मदृष्टि से देखो। 

★ आग बुझाने के लिए पानी डालना पड़ता है। अन्धकार होते ही दिया जलाना पड़ता है। ये बातें किसे नहीं मालूम है? और यदि ये बातें समझ में आती हैं तो सन्तों को यह बात क्यों नहीं समझाना चाहिए कि क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से, कृपणता को उदारता से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए। ये बातें भी व्यवहार की हैं।

◇ यदि आप यह जानना चाहें कि आप उन्नति कर रहे या नहीं, तो इसके लिए अधिक आत्म विवेचन करने की आवश्यकता नहीं है। इस बात को आप केवल यह देखकर समझ सकते है कि आपकी रुचि उत्तरोत्तर परिमार्जित हो रही है या नहीं। यदि आपकी रुचि सुसंस्कृत और निर्मल हो रही है तो आश्वास होकर अपने से कह सकते है कि मैं उन्नति कर रहा हूँ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Solving Life’s Problems - Part 4

Many common problems are caused by wrong attitudes. People see themselves as the center of the universe and judge everything as it relates to them. Naturally you won’t be happy that way. You can only be happy when you see things in proper perspective: all human beings are of equal importance in God’s sight, and have a job to do in the divine plan.

I’ll give you an example of a woman who had some difficulty finding out what her job was in the divine plan. She was in her early forties, single, and needed to earn a living. She hated her work to the extent that it made her sick, and the first thing she did was to go to a psychiatrist who said he would adjust her to her job. So after some adjustment she went back to work. But she still hated her job. She got sick again and then came to me. Well, I asked what her calling was, and she said, “I’m not called to do anything.”

That was not true. What she really meant was she didn’t know her calling. So I asked her what she liked to do because if it is your calling you will do it as easily and joyously as I walk my pilgrimage. I found she liked to do three things. She liked to play the piano, but wasn’t good enough to earn her living at that. She liked to swim, but wasn’t good enough to be a swimming instructor, and she liked to work with flowers.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

उपासना का महत्त्व | Intercession & its Significance | Pt Shriram Sharma ...



Title

He Prabhu Apni Krupa Ki | हे प्रभु! अपनी कृपा की | Pragya Geet



Title

👉 राम का स्थान कहाँ?

एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, सन्यासी के मन में जिज्ञासा उतपन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए सन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है?

दुकानदारने कहा - इसमे नमक है ! सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है! इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है!

सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा राम राम? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला - महात्मन! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं! संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई !

जिस बात के लिये मैं दर दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यपारी से समझ आ रही है। वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा,,, ओह, तो खाली मे राम रहता है !

सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ? (काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा? राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है!)

एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी! आज सन्यासी अपने आनंद में था।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 6 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 6 Augest 2019


👉 स्वर्णिम ऊषा का उदय

अगले क्षणों जिस स्वर्णिम ऊषा का उदय होने वाला है, उसके स्वागत की तैयारी में हमें जुट जाना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ इसी प्रकार का शुभारम्भ मंगलाचरण है। असुरता की पददलित और मानता की पुण्य प्रतिष्ठापना का अपना व्रत संकल्प ईश्वरीय प्रेरणा का प्रतीक है। उसकी व्यापकता एवं सफलता सुनिश्चित है। प्रश्न केवल इतना भर है कि जिन आत्माओं में उसके लिए आवश्यक प्रकाश आगे बढ़कर अपने शौर्य प्रक्रियाएँ अपने ढंग से सम्पन्न होना है, वे परिपूर्ण होकर रहेंगी। किसी व्यक्ति के साहस या कार्यपन्न की प्रतीक्षा किये बिना गति अपने पथ पर अग्रसर होती रहेगी, उठा हुआ तूफान अपने वेग से बढ़ता रहेगा। प्रश्न इतना भर है कि जिन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करनी थी, वे समय रहते सजग हुए या अवसाद की मूर्छा में पड़े हुए, अपने को कलंक एवं पश्चाताप का भागी बनाने का दुर्भाग्य पूर्ण खेल खेलते रहें।

हम भाग्यशाली हैं, जो सस्ते में निपट रहे हैं। असली काम और बढ़े-चढ़े त्याग बलिदान अगले लोगों को करने पड़ेंगे। अपने जिम्मे ज्ञान-यज्ञ का समिधाधान और आज्याहुति होम मात्र प्रथम चरण आया है। आकाश छूने वाली लपटों में आहुतियाँ अगले लोग देंगे। हम प्रचार और प्रसार की नगण्य जैसी प्रक्रियाएँ पूरी करके सस्ते में छूट रहे हैं। रचनात्मक और संघर्षात्मक अभियानों का बोझ तो अगले लोगों पर पड़ेगा। कोई प्रबुद्ध व्यक्ति नव-निर्माण के इस महाभारत में भागीदार बने बिना बच नहीं सकता। इस स्तर के लोग कृपणता बरतें तो उन्हें बहुत महंगी पड़ेगी। लड़ाई के मैदान से भाग खड़े होने वाले भगोड़े सैनिकों की जो दुर्दशा होती है, अपनी भी उससे कम न होगी। चिरकाल बाद युग परिवर्तन की पुनरावृत्ति हो रही है। रिजर्व फोर्स के सैनिक मुद्दतों से मौज-मजा करते रहें, कठिन प्रसंग साथ ने आया तो कतराने लगे, यह अनुचित है। परिजन एकान्त में बैठकर अपनी वस्तुस्थिति पर विचार करें, वे अन्न कीट और भोग कीटों की पंक्ति में बैठने के लिए नहीं जन्मे हैं। उनके पास जो आध्यात्मिक सम्पदा है, वह निष्प्रयोजन नहीं है। अब उसे अभीष्ट विनियोग में प्रयुक्त किये जाने का समय आ गया, सो उसके लिये अग्रसर होना ही चाहिये।

हमारा आज का ज्ञान-यज्ञ छोटा-सा है। उसका उत्तर दायित्व भी नगण्य सा हम लोगों के कन्धों पर आया है। युग-निर्माण की विशालकाय प्रक्रिया में यह बीजारोपण मात्र है। इसका श्रेय, सुअवसर हमें मिला हो तो उसे करने के लिए उत्साह के साथ आगे आना चाहिये। प्रस्तुत छोटे से क्रिया-कलाप को-ज्ञान-यज्ञ के प्रस्तुत कार्यक्रम को गतिशील बनाने के लिए हमें बिना कुषण्ता दिखाये अपने उत्तरदायित्व निबाहने के लिये निष्ठा और उल्लासपूर्वक अग्रसर होना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ अधूरा न रहना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६७



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.67

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४५)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

इस प्रवाहमान सृष्टि में इसमें संव्याप्त ऊर्जा धाराएँ भी प्रवाहित हैं। इनमें से प्रत्येक की स्थिति, क्षमता, प्रकृति, दिशा सभी कुछ अलग है। कुछ निश्चित क्षणों में एक विशिष्ट रीति से इनका मिलन होता है। इन पलों में इनके विशेष प्रभाव पदार्थ पर भी पड़ते हैं और स्थान पर भी। मंत्र या यंत्र साधना भी इससे प्रभावित होती हैं। यही वजह है कि विशेष साधना के लिए विशेष क्षणों का चयन करना पड़ता है। जैसे ग्रहण का समय, दीवाली या होली की रातें अथवा फिर शिवरात्रि या नवरात्रि के अवसर। कुछ विशेष योग भी इसमें उपादेय माने गये हैं। जैसे- गुरुपुण्य, रविपुण्य योग, सर्वार्थ सिद्धि, अमृतसिद्धि योग। इन पुण्य क्षणों में तंत्र तकनीकें शीघ्र फलदायी होती हैं।

जिन्हें इन सबका सम्पूर्ण ज्ञान होता है, वही अपनी आध्यात्मिक चिकित्सा में तंत्र की तकनीकों का प्रयोग करने में सक्षम हो पाते हैं। तांत्रिकों के आराध्य बाबा कीनाराम इस प्रक्रिया के परम विशेषज्ञ थे। उनके बारे में कहा जाता है कि जो बाबा विश्वनाथ कर सकते हैं, वही बाबा कीनाराम भी कर सकते हैं। अपने बारे में इस उक्ति पर वह हँसते हुए कहते हैं- अरे! यहाँ है ही क्या रे, यहाँ सब तो कणों की धूल का बवण्डर है। महामाया की ऊर्जा का खेल भर है। उन्होंने जो दिखा दिया है, मैं वही करता रहता हूँ। एक बार उनके यहाँ एक प्रौढ़ महिला अपने बीस वर्षीय बेटे को लेकर आयी। उसका लड़का लगभग मरणासन्न था। सभी चिकित्सकों ने उसे असाध्य घोषित कर दिया था। वह जब बाबा कीनाराम के पास आयी तो उन्होंने कहा- अभी जा शाम के समय आना। वह बहुत रोयी, गिड़गिड़ाई, पर वे नहीं माने। एक नजर सूरज की ओर देखा और शाम को आने को बोल दिया।

लाचार महिला क्या करती। रोती- कलपती चली गयी और शाम को पहुँची। बाबा कीनाराम ने वही घाट के पास से एक पत्ती तोड़ी और उसका रस उस युवक के मुँह में निचोड़ दिया। सभी को भारी अचरज तब हुआ जब वह मरणासन्न युवक उठ बैठा। उपस्थित जन उनकी जयकार करने लगे। इस पर वह सभी को डपटते हुए बोले- अरे जय बोलते हो तो महाकाल की बोलो। इस क्षण की बोलो। इस क्षण का विशेष महत्त्व है। इसमें प्रयोग किया जाने वाली औषधि एवं मंत्र मुर्दे में भी जान डाल सकती है। दरअसल यह बाबा कीनाराम के द्वारा प्रयोग की गई चिकित्सा की विशेष विधि थी, जो मंत्र चिकित्सा पर आधारित थी। इसके सफल प्रयोग ने उस युवक को नवजीवन दे दिया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 65

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Aug 2019

■  इस चिर-दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर छोटे-छोटे कर्म फलों के लिये लालायित रहता है, वह परमात्मा के साक्षात्कार जैसे परमलाभ से वंचित रह जाता है। प्रत्येक कर्म को परमात्मा का समझकर करने और उसके फल को भी उसका समझ लेने में मनुष्य का अपना कुछ बिगड़ता नहीं, तब न जाने वह क्यों कर्माभिमानी बनकर अनमोल मानव-जीवन का दुरुपयोग किया करता है?

◇ मनुष्य जीवन एक बहुमूल्य अवसर है। यह बार-बार नहीं आता। मनुष्य जीवन एक ऐसा अवसर है, जिसका सदुपयोग करके कोई भी सच्चिदानन्द परमात्मा को पा सकता है। तुच्छ शारीरिक भोगों की तुलना में जो सर्वसुख रुप परमात्मा के साक्षात्कार और परामद मोक्ष की उपेक्षा करता है, जो चिन्तामणि को गुंजा फल के लोभ में त्याग देता है।

★ सर्वांगीण  मनुष्यत्व की साधना के लिए शरीर, वाक् और मन से सत्य को ग्रहण करना होगा। सत्य को केवल बुद्धि के द्वारा जानने से ही काम नहीं चलेगा वरन उसके लिए आंतरिक अनुराग होना चाहिए और उसका आश्रय ग्रहण करके परम आनन्द प्राप्त करना चाहिए।
स्वयं शान्ति से रहना और दूसरों को शान्ति से रहने देना यही जीवन जीने की सर्वोत्तम नीति है। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जो हमें अपने लिये पसन्द नहीं। सत्य ही बोलना चाहिए। सभी से प्रेम करना चाहिए और अन्याय के मार्ग पर एक कदम भी नहीं धरना चाहिए। श्रेष्ठ, सदाचारी और परमार्थयुक्त जीवन ही मनुष्य की उपयुक्त बुद्धिमत्ता कही जा सकती है।

◇ धर्म का तात्पर्य है-सदाचरण, सज्जनता, संयम, न्याय , करुणा और सेवा। मानव प्रवृत्ति में इन सत्तत्त्वों को समाविष्ट बनाये रखने के लिये धर्म मान्यताओं को मजबूती से पकडे़ रहना पड़ता है। मनुष्य-जाति की प्रगति उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण संभव हो सकी है। यदि व्यक्ति अधार्मिक, अनैतिक एवं उद्धत मान्यताएँ अपना ले तो उसका ही नहीं समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Solving Life’s Problems - Part 3

Difficulties with material things often come to remind us that our concentration should be on spiritual things instead of material things. Sometimes difficulties of the body come to show that the body is just a transient garment, and that the reality is the indestructible essence which activates the body. But when we can say, “Thank God for problems which are sent for our spiritual growth,” they are problems no longer. They then become opportunities.

Let me tell you a story of a woman who had a personal problem. She lived constantly with pain. It was something in her back. I can still see her, arranging the pillows behind her back so it wouldn’t hurt quite so much. She was quite bitter about this. I talked to her about the wonderful purpose of problems in our lives, and I tried to inspire her to think about God instead of her problems. I must have been successful to some degree, because one night after she had gone to bed she got to thinking about God.

“God regards me, this little grain of dust, as so important that he sends me just the right problems to grow on,” she began thinking. And she turned to God and said, “Oh, dear God, thank you for this pain through which I may grow closer to thee.” Then the pain was gone and it has never returned. Perhaps that’s what it means when it says: ‘In all things be thankful.’ Maybe more often we should pray the prayer of thankfulness for our problems.

Prayer is a concentration of positive thoughts.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 एकता और समता का आदर्श

राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है-मानवीय एकता। मनुष्य की एक जाति है। उसे किन्हीं कारणों से विखण्डित नहीं होना चाहिए। भाषा, क्षेत्र, सम्प्र्रदाय, जाति, लिंग, धन, पद आदि के कारण किसी को विशिष्ट एवं किसी को निकृष्ट नहीं माना जाना चाहिए। सभी को समाज में उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। उपरोक्त कारणों में से किसी को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि अपने को बड़प्पन के अहंकार से भरे और दूसरे को हेय समझे।
  
कई प्रान्तों में सम्प्रदाय विशेष के सदस्य होने के कारण अथवा पृथक् भाषा-भाषी होने के कारण अपने वर्ग-वर्ण को पृथक् मानने और राष्ट्रीय धारा से कटकर अपनी विशेष पहचान बनाने की प्रवृत्ति चल पड़ी है। इसे शान्त करने के लिए वैसे ही प्रयत्न कि ए जाने चाहिए, जैसे अग्निकाण्ड आरम्भ होने पर उसके फै लने से पूर्व ही किए जाते हैं। समता और एकता के उद्यान उजाड़ डालने की छूट किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। द्वेष को प्रेम से जीता जाता है। विग्रह को तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करते हुए विवेकपूर्वक शान्त किया जाता है। इसलिए दुर्भाव और विग्रहों के पनपते ही उनके शमन समाधान का प्रयत्न करना चाहिए।
  
यह सामयिक उभार है, जो देश का बुरा चाहने वालों को दुरभिसंधि के कारण उठ खड़े हुए हैं। यह विषवेलि पानी न मिलने पर समयानुसार सूख जायेगी। पर कुछ व्याधियाँ ऐसी हैं, जो चिरकाल से चली आने के कारण प्रथा परिपाटी बन गई हैं और उनके कारण देश की क्षमता तथा एकता दुर्बल होती चली आई है। समय आ गया है कि उन भूलों को अब समय रहते सुधार लिया जाय। अन्यथा यह सड़ते हुए फोड़े समूचे शरीर को विषैला कर सकते हैं।
  
जब सभी मनुष्यों की संरचना, रक्त-माँस की बनावट एक जैसी है, तो उनमें से किसे ऊँचा, किसे नीचा कहा जा सकता है? ऊँच-नीच तो सत्कर्म और कुकर्म के कारण बनते हैं। उसका जाति-वंश से कोई सम्बन्ध नहीं। धर्म एक है। सम्प्रदायों का प्रचलन तो समय और क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप हुआ है। उनमें से जो जिसे भावे, वह उसे अपनावे। खाने-पहनने सम्बन्ध विभिन्न रुचि को जब सहन किया जाता है, तो भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा, भिन्न परम्पराओं का अपनाया जाना किसी को क्यों बुरा लगना चाहिए? एक बगीचे में अनेक रंगों के फूल हो सकते हैं, तो एक देश में अनके सम्प्रदायों के प्रचलन में ऐसी क्या बात है, जिसके कारण परस्पर विद्वेष किया जाय और एक-दूसरे को नास्तिक या  अधर्मी कहकर निन्दित बताया जाय। सम्प्रदायों की एकता पर हम सबको पूरा जोर देना चाहिए। भाषाओं की भिन्नता पर लड़ने की आवश्यकता नहीं। अनेकता को हटाकर हमें भाषायी एकता अपनानी चाहिए ताकि समूचे देशवासी अपने विचारों का आदान-प्रदान सरलता के साथ कर सकें।
  
नर-नारी के बीच बरता जाने वाला भेद-भाव तो और भी निन्दनीय है। हम अपनी ही माताओं, पुत्रियों, बहिनों, पत्नियों को हेय दृष्टि से देखें, यह कैसी अनीति है? इस भूल को अपनाये रहने पर  आधा समाज पक्षाघात पीड़ित की तरह अपंग रह जाता है। परिवार वैसे नहीं बन पाते जैसे कि सुयोग्य गृहलक्ष्मी के नेतृत्व में वे बन सकते हैं।
  
भारतीय संस्कृ ति के दो प्रमुख आदर्श हैं। एक ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ दूसरा ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’। इन दोनों को हृदयंगम करने पर एक ता और समता को ही मान्यता देनी पड़ती हैै। इन आदर्शों को हमें किसी देश, क्षेत्र, सम्प्रदाय के सुधार तक ही सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाना चाहिए, ताकि समूची मनुष्य जाति सुख-शान्ति से रह सके और सर्वतोमुखी कर सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 5 अगस्त 2019

👉 अच्छाई-बुराई :-

एक बार बुरी आत्माओं ने भगवान से शिकायत की कि उनके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों किया जाता है, जबकी अच्छी आत्माएँ इतने शानदार महल में रहती हैं और हम सब खंडहरों में, आखिर ये भेदभाव क्यों है, जबकि हम सब भी आप ही की संतान हैं।

भगवान ने उन्हें समझाया- ”मैंने तो सभी को एक जैसा ही बनाया पर तुम ही अपने कर्मो से बुरी आत्माएं बन गयीं। सो वैसा ही तुम्हारा घर भी हो गया।“

भगवान के समझाने पर भी बुरी आत्माएँ भेदभाव किये जाने की शिकायत करतीं रहीं और उदास होकर बैठ गयी।

इसपर भगवान ने कुछ देर सोचा और सभी अच्छी-बुरी आत्माओं को बुलाया और बोले- “बुरी आत्माओं के अनुरोध पर मैंने एक निर्णय लिया है, आज से तुम लोगों को रहने के लिए मैंने जो भी महल या खँडहर दिए थे वो सब नष्ट हो जायेंगे, और अच्छी और बुरी आत्माएं अपने अपने लिए दो अलग-अलग शहरों का निर्माण नए तरीके से स्वयं करेंगी।”

तभी एक आत्मा बोली- “ लेकिन इस निर्माण के लिए हमें ईटें कहाँ से मिलेंगी?”

भगवान बोले- “जब पृथ्वी पर कोई इंसान अच्छा या बुरा कर्म करेगा तो यहाँ पर उसके बदले में ईटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईटें मजबूती में एक सामान होंगी, अब ये तुम लोगों को तय करना है कि तुम अच्छे कार्यों से बनने वाली ईंटें लोगे या बुरे कार्यों से बनने वाली ईटें!”

बुरी आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर बुराई करने वाले अधिक लोग हैं इसलिए अगर उन्होंने बुरे कर्मों से बनने वाली ईटें ले लीं तो एक विशाल शहर का निर्माण हो सकता है, और उन्होंने भगवान से बुरे कर्मों से बनने वाली ईंटें मांग ली।

दोनों शहरों का निर्माण एक साथ शुरू हुआ, पर कुछ ही दिनों में बुरी आत्माओं का शहर वहाँ रूप लेने लगा, उन्हें लगातार ईंटों के ढेर के ढेर मिलते जा रहे थे और उससे उन्होंने एक शानदार महल बहुत जल्द बना भी लिया। वहीँ अच्छी आत्माओं का निर्माण धीरे-धीरे चल रहा था, काफी दिन बीत जाने पर भी उनके शहर का केवल एक ही हिस्सा बन पाया था।

कुछ दिन और ऐसे ही बीते, फिर एक दिन अचानक एक अजीब सी घटना घटी। बुरी आत्माओं के शहर से ईटें गायब होने लगीं… दीवारों से, छतों से, इमारतों की नीवों से,… हर जगह से ईंटें गायब होने लगीं और देखते ही  देखते उनका पूरा शहर खंडहर का रूप लेने लगा।

परेशान आत्माएं तुरंत भगवान के पास भागीं और पुछा- “हे प्रभु! हमारे महल से अचानक ये ईटें क्यों गायब होने लगीं …हमारा महल और शहर तो फिर से खंडहर बन गया?”

भगवान मुस्कुराये और बोले-
“ईटें गायब होने लगीं!!  अच्छा! दरअसल जिन लोगों ने बुरे कर्म किए थे अब वे उनका परिणाम भुगतने लगे हैं यानी अपने बुरे कर्मों से उबरने लगीं हैं उनके बुरे कर्म और उनसे उपजी बुराइयाँ नष्ट होने लगे हैं। सो उनकी बुराइयों से बनी ईटें भी नष्ट होने लगीं हैं। आखिर को जो आज बना है वह कल नष्ट भी होगा ही। अब किसकी आयु कितनी होगी ये अलग बात है।“

इस तरह से बुरी आत्माओ ने अपना सिर पकड़ लिया और सिर झुका के वहा से चली गई|

मित्रों! इस कहानी से हमें कई ज़रूरी बातें सीखने को मिलती है, बुराई और उससे होने वाला फायदा बढता तो बहुत तेजी से है। परंतु नष्ट भी उतनी ही तेजी से होता है।

वही सच्चाई और अच्छाई से चलने वाले धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं पर उनकी सफलता स्थायी होती है. अतः हमें हमेशा सच्चाई की बुनियाद पर अपने सफलता की इमारत खड़ी करनी चाहिए, झूठ और बुराई की बुनियाद पर तो बस खंडहर ही बनाये जा सकते हैं।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 August 2019



👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 5 Augest 2019



👉 रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे

नया युग लाने के लिए धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए-सतयुग की पुनरावृत्ति आँखों के सामने देखने के लिए-हमें कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण, दुस्साहस भरे रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे। शत-सूत्री कार्यक्रमों के अंतर्गत उसकी कुछ चर्चा हो चुकी है। बड़े परिवर्तनों के पीछे बड़ी कार्य पद्धतियाँ भी जुड़ी रहती हैं। निश्चित रूप से हमें ऐसे अगणित छोटे-बड़े आन्दोलन छेड़ने पड़ेंगे, संघर्ष करने पड़ेंगे, प्रशिक्षण संस्थाएँ चलानी पड़ेंगी जन करना अभियान में लाखों मनुष्यों का जन, सहयोग, त्याग-बलिदान सूझ-बूझ एवं प्रयत्न, पुरुषार्थ नियोजित किया जाएगा भारत के पिछले राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में कितनी जनशक्ति और कितनी धन-शक्ति लगी थी। यह सर्वविदित है, यह भारत तक और उसके राजनैतिक क्षेत्र तक सीमित थी। अपने अभियान का कार्यक्षेत्र उससे सैकड़ों गुना बड़ा है।

अपना कार्यक्षेत्र समस्त विश्व है और परिवर्तन राजनीति में ही नहीं वरन् व्यक्ति तथा समाज के हर क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने हैं। इसके लिये कितने सृजनात्मक और कितने संघर्षात्मक मोर्चे खोलने पड़ेंगे, इसी कल्पना कोई भी दूरदर्शी कर सकता है। वर्तमान अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में परिवर्तित करना एक बड़ा काम है। मानवीय मस्तिष्क की दिशा, विचारणा, आकांक्षा अभिरुचि ओर प्रवृत्ति को बदल देना-निष्कृष्टता के स्थान पर उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करना-सो भी समस्त पृथ्वी पर रहने वाले चार अरब व्यक्तियों में निस्सन्देह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक काम है। इसमें अग्रणी व्यक्तियों, असंख्य आन्दोलनों और असीम क्रिया तन्त्रों का समन्वय होगा।

यह एक अवश्यम्भावी प्रक्रिया है, जिसे महाकाल अपने ढंग से नियोजित कर रहे हैं। हर कोई देखेगा कि आज की वैज्ञानिक प्रगति की तरह कल भावनात्मक उत्कर्ष के लिए भी प्रबल प्रयत्न होंगे और उसमें एक से एक बढ़कर व्यक्तित्व एवं संगठन गज़ब की भूमिका प्रस्तुत कर रहे होंगे। यह सपना नहीं, सच्चाई है। जिसे अगले दिनों हर कोई मूर्तिमान् होते हुए देखेगा। इसे भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिये, एक वस्तुस्थिति है जिसे हम आज अपनी आँखों पर चढ़ी दूरबीन से प्रत्यक्षतः देख रहे हैं। कल वह निकट आ पहुँचेगी और हर कोई उसे प्रत्यक्ष देखेगा। अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से आगे बढ़ता चला आ रहा है। जो इस सड़ी दुनियाँ को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शान्त होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.66

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४४)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ सदियों से यही करते आ रहे हैं और इन क्षणों में भी यही कर रहे हैं। तंत्र का समूचा विज्ञान मूल रूप से पाँच तत्त्वों पर टिका हुआ है। जिस तरह से पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से सृष्टि बनती है, उसी तरह से १. पदार्थ, २. स्थान, ३. शब्द, ४. अंक एवं ५. काल, इन पाँच अवयवों के सहारे तंत्र की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्रियाशील होती है। तंत्र के क्षेत्र में इन पाँचों का अपना विशिष्ट अर्थ है। जिसे जानकर ही इसके प्रयोग किये जा सकते हैं। इस क्रम में सबसे पहला है पदार्थ। इस सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिकों की भाँति तंत्र विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न धाराओं ने एक विशिष्ट क्रम से मिलकर इस सृष्टि के विभिन्न पदार्थों की सृष्टि की है। इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव भले ही वह वस्तु हो या प्राणी अथवा वनस्पति ऊर्जा का ही सघन रूप है।

जगत् और जीवन की इस सच्चाई को स्वीकारते तो वैज्ञानिक भी हैं, पर वे सृष्टि के प्रत्येक अवयव को समपूर्णतया या आँशिक रूप से ऊर्जा में परिवर्तित करने की कला नहीं जानते। लेकिन तांत्रिक ऐसा करने में सक्षम होते हैं। वे अपने प्रयोगों में सृष्टि के प्रत्येक अवयव का चाहे वह जीवित हो या मृत उसमें निहित ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। वृक्षों की जड़ें या पत्तियाँ, पशु- पक्षियों एवं मनुष्यों के नाखून या बाल तक में निहित ऊर्जा का वह समुचित प्रयोग कर लेते हैं। इन प्रयोगों में दूसरा क्रम स्थान का है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जाधाराएँ प्रत्येक स्थान पर एक सुनिश्चित रीति से केन्द्रीभूत होती हैं। इसलिए किस ऊर्जा का किस तरह से क्या उपयोग करना है, उसी क्रम में स्थल का चयन किया जाता है। यह स्थान मंदिर, देवालय भी हो सकता है और पीपल, वट आदि वृक्षों की छाँव भी अथवा नदी का किनारा या श्मशान भी हो सकता है।

तंत्र विज्ञान में तीसरा किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। शब्द की तन्मात्रा आकाश है। आकाश परम तत्त्व है, इसी से अन्य तत्त्व उपजे हैं। इसी वजह से तंत्र ने आकाश तत्त्व को अपनी साधना के आधार के रूप में स्वीकारा है। शब्द से बने बीजाक्षर एवं मंत्राक्षरों के सविधि प्रयोग से तंत्र विशेषज्ञ ब्रह्माण्ड की ऊर्जाधाराओं की दिशा को नियंत्रित एवं नियोजित करते हैं। पढ़ने वाले भले इसे असम्भव माने, पर ऐसा होता है। इसे कोई भी अनुभव कर सकता है। तंत्र विद्या में शब्द के प्रयोग अतिरहस्यमय हैं और तुरन्त प्रभाव प्रकट करने वाले हैं। इसमें कोई बीजाक्षर तो ऐसे हैं जो एक- डेढ़ अक्षर के होते हुए भी सिद्ध हो जाने पर कुछ ही सेकण्डों में चमत्कार पैदा करने लगते हैं।

इस क्रम में चौथे तत्त्व के रूप में अंक का स्थान है। शब्दों की भाँति अंक भी तंत्र विद्या में महत्त्व रखते हैं। इन अंकों और कुछ निश्चित रेखा कृतियों के संयोग से यंत्रों का निर्माण होता है। इन यंत्रों की पूजा- प्रतिष्ठा एवं सविधि साधना के द्वारा विशिष्ट ऊर्जाधारा को इसमें केन्द्रित किया जाता है। इसी को यंत्र की जागृति कहते हैं। ऐसा होने पर फिर यंत्र ट्रांसफार्मर जैसा काम करने लगता है, यानि कि वह अपने में केन्द्रित ऊर्जा को काम्य प्रयोजन की पुर्ति के योग्य बनाता है। इस विज्ञान का पाँचवा तत्त्व है काल, जिस पर सारी प्रयोग प्रक्रिया निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत यह जानना होता है कि उपरोक्त सभी चारों तत्त्वों का संयोग कब- किन विशेष क्षणों में किया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Aug 2019

■  मनुष्य में एक छोटी सी समस्या है, वो कभी स्वयं की निंदा सुन नहीं पाता। यदि कोई उसके विषय में बुरा कहे, सह नहीं पाता। सदैव भयभीत रहता है कि जो चार लोग हैं, कहीं मेरे विषय में बुरा न सोचें और यदि उसे पता लग जाए कि कोई उसकी पीठ पीछे उसकी बुराई कर रहा है, तो दुःखी हो जाता है। अब क्या इस कारण से स्वयं को दुखी कर लेना क्या उचित है? कदापि नहीं। क्योंकि सबसे पहली बात जो आपको स्मरण रखनी है। यदि कोई पीठ पीछे आपकी बुराई करता है, वो आपसे दो कदम पीछे है, है न? जो आपके बारे में आपसे सारी बातें कर सकता है। यदि ऐसा नहीं है, यदि वो सत्य कह रहे हैं, तो सर्वप्रथम अपनी भूलों को समझें। उस सत्य को समझें और निकाल फेंकें इन अवगुणों को और फिर देखें आप उनसे दो कदम और आगे बढ़ जाएँगे। क्योंकि ये जीवनरथ आगे देखकर चलाया जाता है, पीछे देखकर नहीं। तो ये पीछे देखना छोड़ दीजिये। जो वर्तमान है इसे देखिये इसे जीयें। जो आपका लक्ष्य है उसे साधिये।

◇ मनुष्य जो है ये भूलों का पिटारा है। मनुष्य जो है, गलतियों का पुतला है और ये सत्य है। भूल भला किससे नहीं होती? हर एक से होती है और एक नहीं अनेक भूलें होती हैं। किन्तु स्मरण रखियेगा उनके वस्त्रों पर कीचड़ लगता है, जो कीचड़ साफ करने का प्रयास करते हैं। तो जहाँ प्रयास वहाँ भूलें तो होंगी ही। अब यदि आप कोई नया संकल्प करने जा रहे हैं, कोई बड़ा कार्य करने जा रहे हैं, और आपसे कोई भूल हो जाए, तो कोई बात नहीं। पश्चाताप न करें। अपनी भूल को पहचानें, उसे समझें, उसे सुधारने का प्रयास करें और सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी भूलों से सीखें। उन्हीं के हाथों से लहू बहता है, जो काँटों में छिपे उस पुष्प को निकालने का प्रयास करते हैं। स्मरण रखिये जिसने जीवन में कभी कोई भूल नहीं की उसने कभी कोई नया करने का प्रयास ही नहीं किया। ये भूल आपका सबसे बड़ा शिक्षक है। इससे दुःखी न होइये। पश्चाताप ना करें, इस भूल का आदर करना सीखें, फिर देखें आप स्वयं को जीवन में और ऊँचा पायेंगे।

★ दूध को जल से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, और इसीलिये दूध का मूल्य जल से तनिक अधिक है। अब दूध को यदि दही बनाओगे तो इस दूध की आयु कुछ और अधिक बढ़ जाती है। इसका मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब इस दही का माखन बनाओगे तो इसकी आयु कुछ सप्ताहों तक और बढ़ जाती है, और मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब यदि इस माखन का घी बनाएँगे तो इसकी आयु वर्षों तक चलती है, और मूल्य माखन से कुछ और अधिक होता है। अब इन सबका मूल दूध ही है। तो इन सबकी जीवन आयु एवं इनके मूल्य में इतना अंतर क्यों? इसका कारण ये दूध को दही बनने के लिए खटास सहनी पड़ी, दही को माखन बनने के लिए बिलोने के आघात सहने पड़े, और माखन को घण्टों तक ताप सहना पड़ा। तब जाके इसकी आयु इतनी बढ़ी, तब जाके इसका मूल्य इतना बढ़ा। अब हम सारे मनुष्य एक समान दूध की भाँति किन्तु महान वही बनते हैं, जो कठिनाइयों का सामना करते हैं। संकटों का सामना करते हैं। जो इन चुनौतियों पर खरे उतरते हैं। यदि ये सब करोगे तभी जीवन में आगे बढ़ोगे। तभी आपके यश की आयु बढ़ती जायेगी, और तभी ये संसार आपको महत्व देता जायेगा।

👉 पुण्य की कमाई

" टिकट कहाँ है ? " -- टी सी ने बर्थ के नीचे छिपी लगभग तेरह - चौदह साल की लडकी से पूछा।"
नहीं है साहब।

"काँपती हुई हाथ जोड़े लडकी बोली।
"तो गाड़ी से उतरो।" टी सी ने कहा।
इसका टिकट मैं दे रहीं हूँ।............पीछे से ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।

"तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की से पूछा" पता नहीं मैम ! "" तब मेरे साथ चल बैंगलोर तक ! ""
तुम्हारा नाम क्या है ? "" चित्रा

"बैंगलोर पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी एक पहचान के स्वंयसेवी संस्थान को सौंप दिया । और अच्छे स्कूल में एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली होने की वजह से चित्रा से कभी-कभार फोन पर बात हो जाया करती थी ।करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गई तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल भर दिया था।"तुमने मेरा बिल क्यों भरा ? ? ""

मैम, यह बम्बई से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने कुछ नहीं है ।
""अरे चित्रा ! ! ? ? ? . . . .

चित्रा कोई और नहीं इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थी, एवं इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति जी की पत्नी थी।

यह उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से लिया गया कुछ अंश

कभी कभी आपके द्वारा भी की गई सहायता किसी की जिन्दगी बदल सकती है।

👉 Solving Life’s Problems - Part 2

I once met a woman who had virtually no problems. I was on a late-night radio program in New York City. This woman called the station and wanted me to come to her home. I was intending to spend the night at the bus station, so I said okay. She sent her chauffeur for me, and I found myself in a millionaire’s home, talking to a middle-aged woman who seemed like a child. She was so immature, and I wondered at her immaturity, until I realized that the woman had been shielded from all problems by a group of servants and lawyers. She had never come to grips with life. She had not had problems to grow on, and therefore had not grown. Problems are blessings in disguise!

Were I to solve problems for others they would remain stagnant; they would never grow. It would be a great injustice to them. My approach is to help with cause rather than effect. When I help others, it is by instilling within them the inspiration to work out problems by themselves. If you feed a man a meal, you only feed him for a day — but if you teach a man to grow food, you feed him for a lifetime.

It is through solving problems correctly that we grow spiritually. We are never given a burden unless we have the capacity to overcome it. If a great problem is set before you, this merely indicates that you have the great inner strength to solve a great problem. There is never really anything to be discouraged about, because difficulties are opportunities for inner growth, and the greater the difficulty the greater the opportunity for growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी है, क्योंकि जिस वातावरण, जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए जो सिद्धान्त एवं आचार शास्त्र विनिर्मित किए, कालान्तर में वे ही धर्म-सम्प्रदायों के नाम से पुकारे जाने लगे। इस कारण उनके बाह्य कलेवर में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी, जहाँ तक मौलिक सिद्धान्तों की बात है, वह सभी तथाकथित धर्मों में एक ही है। सभी ने एक सार्वभौम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है।
  
सभी प्रचलित धर्मों में ‘प्रार्थना’ को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया एवं अपने दैनिक क्रिया-कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। अमेरिका के विख्यात साइक्रियेटिस्ट डॉ. ब्रिल के अनुसार- ‘कोई भी व्यक्ति, जो वास्तव में धार्मिक है, मनोरोगों का शिकार नहीं हो सकता।’ मनःचिकित्सकों एवं मनोविश्लेषकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धार्मिक कर्मकाण्डों में जो प्रार्थना की जाती है। प्रसिद्ध विचारक डेल कारनेगी ने लिखा है- ‘जीवन की जटिलताओं और विषमताओं से संघर्ष करके सफलता पाने में कोई भी व्यक्ति अकेले समर्थ नहीं है, आस्था और विश्वास के साथ इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए।’ मौलाना रूम ने कहा है- ‘रूह की दोस्ती इल्म और ईमान से है, उसके लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि में कोई फर्क नहीं है।’
  
प्रसिद्ध ईसाई धर्मोपदेशक जस्टिन ने कहा है- ‘जितनी भी श्रेष्ठ विचारणाएँ हैं, वे चाहे किसी भी देश या धर्म की हों, सब मनुष्यों के लिए ईश्वरीय निर्देश की तरह हैं।’ शिव महिमा में उल्लेख है-जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार से घूमकर अंततः समुद्र में ही जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार अलग-अलग धर्म, पंथों से चलकर उसी एक ईश्वर तक पहुँचते हैं।
  
इंजील ने लिखा है- ‘मनुष्य के नथुनों में जितने श्वास आते हैं, उतने ही ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते हैं।’ चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कथन है- ‘अलग-अलग धर्मों की प्रेरणाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, पूरक हैं।’ प्रसिद्ध संत जरथ्रुस्त के अनुसार-‘हम संसार के उन सभी धर्मों को मानते और पूजते हैं, जो नेकी सिखलाते हैं।’ योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा  है-‘सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों से चलकर अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं।’
  
अनेकों मनीषियों, युगद्रष्टा ऋषियों ने इसे स्वीकार किया है कि विभिन्न धर्मों में वर्णित आदर्श एवं सिद्धान्त सनातन हैं। एक्लेजियास्टिक्स ने उल्लेख किया है- क्या कोई ऐसा आदर्श है, जिसके संदर्भ में यह कहा जा सके कि यह नया है? हर सिद्धान्त सनातन है, जिसका उल्लेख विभिन्न धर्मों में मिलता है।
  
हजरत मोहम्मद ने सभी धर्मानुयायियों को संबोधित करते हुए कहा- ‘आओ हम सब मिलकर उन बातों पर विचार करें, जो हममें और तुममें एक सी हैं।’ ‘शोतोकु’ नामक संत ने कहा- ‘शिनतो, कन्फ्यूशियस व बौद्ध ये तीनों धर्म एक धर्म रूपी वृक्ष के विभिन्न अवयव हैं।  जापानी जनता ने धर्म के मूल तत्त्व को आत्मसात् कर लिया और धर्मों के बाह्य कलेवरों की भिन्नता को समझ लेने के फलस्वरूप विभेदता की कुचाल में न फँसी, उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ती गई।’
  
उक्त विवेचनों से यही निष्कर्ष निकलता है कि विविध धर्मों के बाह्य कलेवर एवं क्रिया-कृत्यों में न्यूनाधिक भिन्नता भले ही हो, परन्तु सबका प्राण तत्त्व एक ही है। धर्म का सच्चा स्वरूप वस्तुतः वही है, जो शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। धर्म के उस प्राण तत्त्व को हृदयंगम कर व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट किए जाने से ही सबका कल्याण संभव हो सकेगा और मानवीय समाज सुख-शांति का रसास्वादन कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...